माइक के सामने खड़े होकर, ट्रॉफी को अपने हाथों में लेकर वैदेही ने पूरे आत्मविश्वास और नम आँखों के साथ कहा, “यह सम्मान केवल एक बिजनेस की कामयाबी का नहीं है। यह सम्मान उस संकल्प का है जो हर उस बेटी को यह सिखाता है कि किसी शारीरिक कमी या समाज के खोखले मापदंडों से किसी स्त्री का मूल्य तय नहीं होता। मातृत्व सुंदर है, लेकिन एक स्त्री का अस्तित्व केवल उसी तक सीमित नहीं है। वह अपने कर्म, अपनी मेहनत और अपने स्वाभिमान से अपनी एक नई पहचान बना सकती है।
शहर के सबसे प्रतिष्ठित उद्योगपति संगठन द्वारा आयोजित होने वाले वार्षिक सम्मान समारोह का यह आमंत्रण पत्र अपने आप में एक मील का पत्थर था। उस पत्र पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’वर्ष की सर्वश्रेष्ठ महिला उद्यमी: वैदेही शर्मा’। लेकिन जिस महिला के नाम यह सम्मान था, वह अपनी कुर्सी पर बिल्कुल जड़वत बैठी थी। उसकी आँखें उस पत्र पर टिकी थीं, पर उसका मन कहीं बहुत दूर, अतीत के उस खौफनाक मोड़ पर भटक रहा था जहाँ से उसकी ज़िंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल गई थी।
उसे अपने कानों में अपनी बड़ी ताई जी और चाची की वे तीखी आवाजें आज भी साफ सुनाई दे रही थीं। ठीक सात साल पहले, जब मेडिकल रिपोर्ट्स ने यह साबित कर दिया था कि एक गंभीर हार्मोनल समस्या और गर्भाशय में जन्मजात विकृति के कारण वह कभी माँ नहीं बन सकती, तब उसके अपने ही घर में जैसे कोई मातम पसर गया था। वह दिन उसकी स्मृति में किसी खौफनाक काले साए की तरह दर्ज था।
“देख वैदेही! अब ज्यादा नखरे दिखाने का वक्त नहीं रहा तुम्हारे पास। जॉब-वॉब करने की जो जिद तुमने पकड़ रखी है, उसे अपने दिमाग से निकाल दो। शादी के बाद तुम्हारा पति जैसा कहेगा, वैसा ही करना। अगर वो नौकरी करने दे तो कर लेना, चूल्हा फूंकने को कहे तो वही करना। अभी तो बस चुपचाप इस रिश्ते के लिए हाँ कह दो। हम में और हमारे पूरे खानदान में अब इतनी हिम्मत नहीं बची है कि इस समाज के तीखे तानों को और बर्दाश्त करें। लोग पीठ पीछे बातें बनाते हैं कि हमारी लड़की में ही कोई खोट है। बस अब हम सबका पीछा छोड़ो, शादी कर अपनी ससुराल जाओ और अपना घर-बार संभालो। वैसे भी, एक ऐसी लड़की से कौन समझदार लड़का शादी करेगा जो कभी इस कुल को वारिस ही न दे सके? सामने वाले लड़के की उम्र थोड़ी ज्यादा है और वो विधुर है तो क्या हुआ, वो तुम्हें अपनाने को तैयार तो है! तुम क्यों नहीं समझती हो बेटा, हम जो कुछ भी कह रहे हैं, तुम्हारे भले के लिए ही सोच रहे हैं।”
उस दिन वैदेही के अपने सगे माता-पिता भी ताई जी और समाज के दबाव के आगे घुटने टेक चुके थे। किसी ने यह नहीं देखा कि वैदेही की आँखों में क्या सपने थे। किसी ने यह नहीं सोचा कि मातृत्व ही किसी स्त्री के संपूर्ण जीवन का एकमात्र आधार नहीं होता। सब बस उस पर एक अधूरा होने का ठप्पा लगाकर, उसे एक बोझ की तरह घर से विदा कर देना चाहते थे ताकि समाज में उनकी तथाकथित प्रतिष्ठा पर कोई आंच न आए। उस भयानक मानसिक प्रताड़ना, आंसुओं और बेबसी के बीच वैदेही ने उस दिन अपनी तकदीर का फैसला खुद करने की ठान ली थी। उसने उस जबरन थोपे जा रहे बेमेल रिश्ते को ठुकरा दिया था, जिसके बदले में उसे अपने ही घर की दहलीज से बेदखल कर दिया गया था। ताई जी ने साफ कह दिया था, “अगर आज इस चौखट से बाहर पैर रखा, तो इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।” और वैदेही अपनी सूटकेस उठाकर, बिना पीछे मुड़े, उस अंधेरी रात में निकल पड़ी थी।
“अरे वैदेही जी! क्या बात है? मैं पिछले पाँच मिनट से पूछ रहा हूँ कि पार्टी में मेनू क्या रखना है और आप हैं कि खुली आँखों से सपनों की दुनिया में खोई हुई हैं!”
अचानक गूंजी इस खिलखिलाती आवाज और आँखों के ठीक सामने बजी चुटकी ने वैदेही को अतीत के उस स्याह बवंडर से खींचकर वर्तमान में ला खड़ा किया। सामने उसका बिजनेस पार्टनर और सबसे अज़ीज़ दोस्त कबीर खड़ा था। कबीर के चेहरे पर वही चिर-परिचित आत्मीय मुस्कान थी, लेकिन वैदेही की पलकों के कोरों पर लुढ़के दो आंसुओं की बूंदों को उसने फौरन भांप लिया।
वैदेही ने बड़ी सफाई से अपने दुपट्टे के पल्लू से उन आंसुओं को पोंछा और एक फीकी मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए कहा, “कुछ नहीं कबीर, बस यूं ही थोड़ा सिर भारी था।”
कबीर ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और उसके सामने की कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसने बहुत संजीदगी से वैदेही की आँखों में देखा और धीमी, गंभीर आवाज में बोला, “मुझसे छुपाने की कोशिश मत करो वैदेही। मैं जानता हूँ कि उस निमंत्रण पत्र को देखकर तुम्हारा मन कहाँ गया था। मैं जानता हूँ कि तुम अपने घरवालों, अपने उस पुराने आंगन और अपने माता-पिता के लिए भीतर ही भीतर कितना तड़पती हो। तुम हर तीज-त्यौहार पर खामोश हो जाती हो, तुम्हारी आँखें अपनों का दीदार करने के लिए तरसती हैं, लेकिन अपने स्वाभिमान की खातिर तुमने अपने कदमों को रोक रखा है। तुम कभी लौटकर वापस नहीं गईं क्योंकि तुम्हारे दिल पर गहरे जख्म लगे थे। लेकिन वैदेही, यह भी तो एक सच है न कि वे जैसे भी हैं, तुम्हारे अपने हैं। खून का रिश्ता है तुम्हारा उनसे। वो इसी समाज और उसी दकियानूसी दुनिया की सोच का शिकार थे। मैंने और शांतनु ने शुरुआत से तुम्हारा संघर्ष देखा है। जब तुम इस शहर में खाली हाथ आई थीं, छोटे से कमरे में रहकर रात-रात भर डिजाइनिंग करती थीं, दिन में मार्केटिंग के लिए दर-दर भटकती थीं। हमने देखा है कि तुमने कैसे आंसुओं को अपनी ताकत बनाया। आज जब तुमने सब कुछ हासिल कर लिया है, तो अपने मन के सारे गिले-शिकवे परे रखकर, एक बार सिर्फ एक बेटी बनकर उनके पास जाओ। मुझे पूरा विश्वास है कि वक्त ने उन्हें उनकी गलती का अहसास कराया होगा और वे तुम्हें अब पूरे दिल से स्वीकार कर लेंगे।”
वैदेही की आँखों में अचानक एक कड़वाहट और गहरा दर्द तैर गया। उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं और भारी आवाज में बोली, “कबीर, तुम उस परिवार की असलियत नहीं जानते। मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूँ उन सबको। वे बेहद स्वार्थी और संकीर्ण सोच वाले लोग हैं। जब मैं बेसहारा थी, जब मुझे उनके सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब उन्होंने मुझे सिर्फ इसलिए धुतकार दिया था क्योंकि मैं उनकी नजरों में एक ‘अधूरी औरत’ थी। और अगर आज मैं अपनी इस सफलता, इस बड़ी गाड़ी और शोहरत के साथ उनके सामने चली भी गई न, तो वे मुझे गले जरूर लगा लेंगे, लेकिन इसलिए नहीं कि उन्हें अपनी बेटी से प्यार है, बल्कि इसलिए क्योंकि आज मेरे पास दुनिया के सारे ऐशो-आराम और दौलत है। आज मैं एक कामयाब बिजनेसवुमन हूँ। घर आई लक्ष्मी को भला कौन ठुकराता है कबीर? मैं उनके झूठे और मतलबपरस्त प्यार का तमाशा नहीं देखना चाहती।”
वैदेही के भीतर अपने ही परिवार के प्रति इस कदर कड़वाहट और अविश्वास देखकर कबीर का दिल पसीज गया। वह जानता था कि जब घाव बहुत गहरे होते हैं, तो इंसान अपनों की परछाई से भी नफरत करने लगता है। कबीर ने कोई बहस नहीं की। उसने केवल एक गहरी सांस ली, उदास मन से अपनी कुर्सी से उठा और केबिन का दरवाजा खोलकर बाहर गलियारे की तरफ चला गया।
केबिन के ठीक बाहर, थोड़ी दूरी पर बने कैफेटेरिया में कबीर की छोटी बहन तान्या और उसका मंगेतर शांतनु खड़े थे। कबीर को यूं चुपचाप और तने हुए चेहरे के साथ बाहर निकलते देख तान्या ने शांतनु से धीमी आवाज में कहा, “लो, फिर से उसी बात पर बहस हो गई इन दोनों के बीच। ये कबीर भैया भी न जाने क्यों हर बार दीदी को उनके मायके वालों से मिलने के लिए मजबूर करते रहते हैं! जब वे अच्छी तरह जानते हैं कि दीदी को अपने उन पुराने दिनों और घरवालों के बारे में सोचकर ही कितनी बेइंतहा तकलीफ होती है, तो फिर बार-बार वही बात क्यों छेड़ देते हैं? दीदी ने अपनी मेहनत से यह मुकाम पाया है, उन्हें अपनी जिंदगी शांति से जीने क्यों नहीं देते?”
शांतनु ने अपनी कॉफी का मग टेबल पर रखा और तान्या के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद परिपक्वता से समझाया, “तान्या, तुम बात की गहराई को नहीं समझ रही हो। कबीर भैया कोई दुश्मन नहीं हैं वैदेही के। कबीर और मैंने वैदेही को उस दौर से देखा है जब वह डिप्रेशन की कगार पर थी। कामयाबी, बैंक बैलेंस, बड़े-बड़े बंगले और ये चमचमाती ट्रॉफियां इंसान को शोहरत तो दे सकती हैं, लेकिन मन की शांति नहीं दे सकतीं। वैदेही बाहर से चाहे जितनी सख्त दिखे, लेकिन भीतर से वह आज भी उसी बिखरी हुई, सहमी हुई लड़की की तरह है जो अपने माता-पिता के एक दुलार भरे स्पर्श के लिए तरस रही है। नफरत और कड़वाहट का यह बोझ वैदेही को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। जब तक वह अपने अतीत का सामना नहीं करेगी, जब तक वह उन बंधनों और शिकायतों से मुक्त नहीं होगी, तब तक वह कभी पूरी तरह खुश नहीं रह पाएगी। कबीर भैया बस उसके उस खालीपन को भरना चाहते हैं।”
तान्या ने शांतनु की बात सुनी और चुप रह गई। उसे अहसास हुआ कि सच में, वैदेही दीदी की आँखों में कभी भी वह सच्ची, खिलखिलाती हुई खुशी नहीं दिखती थी जो एक संतुष्ट इंसान के चेहरे पर होती है।
उधर केबिन में, वैदेही अकेली बैठी थी। कबीर के जाने के बाद कमरे में छाई खामोशी उसे काटने को दौड़ रही थी। उसने टेबल पर रखे उस आमंत्रण पत्र को फिर से देखा। मन के किसी अनछुए कोने में एक अजीब सी बेचैनी करवटें ले रही थी। क्या सच में कबीर गलत कह रहा था? क्या सच में वह अपने स्वाभिमान की आड़ में अपने अहंकार को तो नहीं पाल रही थी? या फिर वह सच का सामना करने से डर रही थी?
शाम ढलते-ढलते वैदेही ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपने ड्राइवर को छुट्टी दे दी और खुद अपनी गाड़ी की चाबी उठाई। उसने तय किया कि वह इस द्वंद्व को हमेशा के लिए खत्म करेगी। वह जाएगी, देखेगी कि क्या सच में उसके माता-पिता आज भी उसी संकीर्ण दायरे में कैद हैं, या फिर वक्त की मार ने उनके पत्थरों जैसे दिलों को पिघलाया है। वह किसी गाड़ी के काफिले या तामझाम के साथ नहीं, बल्कि बेहद सादे लिबास में, अपनी पुरानी पहचान के साथ उस शहर के पुराने इलाके में पहुँची जहाँ उसका बचपन बीता था।
उस तंग गली में कदम रखते ही वैदेही की धड़कनें तेज हो गईं। मकान का वही पुराना हरा दरवाजा था, जिस पर अब जंग लग चुका था। दीवारें थोड़ी और जर्जर हो गई थीं। उसने कांपते हाथों से दरवाजे की कुंडी खटखटाई।
कुछ पलों बाद चरमराती आवाज के साथ दरवाजा खुला। सामने उसकी माँ खड़ी थीं। सफेद बालों की लटें, चेहरे पर झुर्रियों का जाल, और आँखों पर चढ़ा मोटा चश्मा। माँ के शरीर पर वही पुरानी, घिसी हुई सूती साड़ी थी। वैदेही को सामने खड़ा देखकर माँ की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ से पानी का लोटा छूटकर जमीन पर गिर पड़ा और छन-छन करता हुआ पानी आँगन में फैल गया।
“वै… वैदेही? मेरी बच्ची?” माँ के सूखे होंठों से केवल यही शब्द निकले और वे वहीं चौखट पर बैठ गईं।
भीतर से खांसते हुए वैदेही के पिता भी बाहर निकल आए। उनकी कमर थोड़ी झुक गई थी और हाथ में लकड़ी की लाठी थी। अपनी बेटी को सात साल बाद जीवित, अपने सामने खड़ा देखकर पिता की आँखें आंसुओं से भर आईं। उनकी लाठी छूट गई और वे थरथराते कदमों से आगे बढ़े।
वैदेही अपने भीतर के पत्थर को पिघलने नहीं देना चाहती थी। उसने अपने चेहरे को सख्त बनाए रखा और बोली, “हाँ, मैं वैदेही हूँ। वही वैदेही जिसे सात साल पहले आपने इस चौखट से धक्के देकर निकाल दिया था क्योंकि मैं एक अधूरी औरत थी। आज मैं सिर्फ यह देखने आई थी कि क्या आपका समाज, जिसके तानों के डर से आपने अपनी औलाद की बलि चढ़ा दी थी, आज आपके बुढ़ापे का सहारा बना है? क्या वो रिश्तेदार आपके काम आए?”
वैदेही के कड़वे शब्दों पर न तो माँ ने कोई गुस्सा दिखाया और न ही पिता ने कोई सफाई दी। पिता ने आगे बढ़कर कांपते हाथों से वैदेही के दोनों हाथ थाम लिए और फफक-फफक कर रो पड़े।
“हमें माफ कर दे मेरी बच्ची… हमें माफ कर दे!” पिता के आंसू वैदेही के हाथों को भिगो रहे थे। “हमने बहुत बड़ा पाप किया था। उस जालिम समाज और झूठी प्रतिष्ठा के डर से हमने अपनी जान से प्यारी फूल जैसी बच्ची का दिल तोड़ दिया। जिस दिन तू इस घर से गई थी, उस दिन से इस चूल्हे की आग बुझ गई थी। तेरी ताई और समाज के लोग तो दो दिन बाद अपनी-अपनी जिंदगी में मस्त हो गए, लेकिन हम दोनों जीते जी नरक भोग रहे हैं।”
माँ ने घुटनों के बल बैठकर वैदेही के पैर पकड़ लिए, “तेरी कमी ने हमें हर पल मारा है बेटी। हमें किसी पोते-पोती या वारिस की चाह नहीं थी, हम तो बस दुनिया के तानों से डर गए थे कि हमारे बाद तेरा क्या होगा। पर हमने यह नहीं समझा कि हमारी बेटी खुद इतनी सक्षम है कि अपनी दुनिया खुद बना सकती है। हर दिन तेरी तस्वीर देखकर रोते थे। हमने तो मंदिर-मंदिर जाकर बस तेरे सलामत रहने की दुआ मांगी है। अगर तू आज भी हमें माफ न करे, तो हमें मंजूर है, लेकिन बस एक बार कह दे कि तू सकुशल है।”
वैदेही ने देखा कि जिस दीवार पर कभी खानदान के पुरखों की तस्वीरें टंगी होती थीं, वहाँ बीचों-बीच उसकी कॉलेज की एक पुरानी हँसती हुई तस्वीर लगी थी, जिसके आगे अगरबत्ती का धुआं उठ रहा था। कमरे के एक कोने में अखबार की कुछ पुरानी कतरनें सहेज कर रखी थीं, जिनमें वैदेही के नए स्टार्टअप और उसकी सफलताओं की छोटी-छोटी खबरें छपी थीं। उसके माता-पिता हर दिन उन कतरनों को देखकर अपनी बेटी की सलामती पर गर्व करते थे, लेकिन उनमें इतना साहस नहीं था कि वे अपने किए पर शर्मिंदा होकर उसके सामने जा सकें।
वैदेही का सारा गुस्सा, सारी कड़वाहट और सात सालों से जमा हुआ स्वाभिमान का सख्त आवरण उस एक पल में बह गया। उसका दिल रो पड़ा। उसने झुककर अपनी माँ को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। पिता के गले लगकर वह फफक पड़ी। कमरे में केवल तीनों के रोने की सिसकारियां गूंज रही थीं, जो सात साल के बिछोह और पश्चाताप को धो रही थीं।
वैदेही को समझ आया कि कबीर बिल्कुल सही था। माता-पिता की गलती अक्षम्य जरूर थी, लेकिन उनका पश्चाताप उससे भी कहीं ज्यादा गहरा और सच्चा था। वे उसकी दौलत के भूखे नहीं थे, वे तो केवल अपनी बेटी की एक झलक और उसकी क्षमा के प्यासे थे। समाज की संकीर्ण मानसिकता ने भले ही उन्हें भटका दिया था, लेकिन औलाद के प्रति उनका वात्सल्य मरा नहीं था।
अगले दिन, शहर के भव्य सभागार में वार्षिक सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। बड़े-बड़े उद्योगपति, प्रशासनिक अधिकारी और मीडिया के कैमरे उस मंच की ओर टिके हुए थे। जब मंच से उद्घोषक ने आवाज लगाई—”हम वर्ष की सर्वश्रेष्ठ महिला उद्यमी का पुरस्कार ग्रहण करने के लिए मंच पर आमंत्रित करते हैं सुश्री वैदेही शर्मा को!”—तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
वैदेही मंच की सीढ़ियां चढ़ रही थी, लेकिन वह अकेली नहीं थी। उसके एक हाथ में उसकी माँ का हाथ था और दूसरे हाथ से उसने अपने पिता का कंधा थाम रखा था। सभागार में पहली पंक्ति में बैठे कबीर, शांतनु और तान्या की आँखों में गर्व के आंसू थे।
माइक के सामने खड़े होकर, ट्रॉफी को अपने हाथों में लेकर वैदेही ने पूरे आत्मविश्वास और नम आँखों के साथ कहा, “यह सम्मान केवल एक बिजनेस की कामयाबी का नहीं है। यह सम्मान उस संकल्प का है जो हर उस बेटी को यह सिखाता है कि किसी शारीरिक कमी या समाज के खोखले मापदंडों से किसी स्त्री का मूल्य तय नहीं होता। मातृत्व सुंदर है, लेकिन एक स्त्री का अस्तित्व केवल उसी तक सीमित नहीं है। वह अपने कर्म, अपनी मेहनत और अपने स्वाभिमान से अपनी एक नई पहचान बना सकती है। और सबसे बड़ी बात, जिंदगी में कड़वाहट लेकर जीने से ज्यादा हिम्मत अपनों को माफ करने में लगती है। आज मैं जहाँ भी हूँ, अपने इन माता-पिता के आशीर्वाद की वजह से हूँ, जिन्होंने मुझे अपनी गलतियों से सीखकर एक नई दृष्टि दी है।”
हॉल में उपस्थित हर शख्स खड़ा होकर तालियां बजा रहा था। मंच पर खड़े माता-पिता की आँखों से बहते आंसू अब पश्चाताप के नहीं, बल्कि अपनी बेटी के सम्मान और गौरव के आंसू थे। वैदेही ने मुड़कर कबीर की ओर देखा, जिसने दूर से ही हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए उसकी ओर सिर झुकाया।
उस रात वैदेही ने महसूस किया कि कामयाबी का असली स्वाद बैंक में पड़े करोड़ों रुपयों में नहीं, बल्कि अपनों के आंसुओं को पोछकर, उनकी बाहों में सिर रखकर मिलने वाले उस असीम सुकून में था, जिसे उसने सात साल बाद फिर से पा लिया था। नफरत हार चुकी थी, और प्रेम तथा स्वाभिमान का एक नया, उज्ज्वल सवेरा हो चुका था।
आपके विचार हमारे लिए अनमोल हैं: क्या आपको लगता है कि समाज की संकीर्ण सोच और तानों के डर से माता-पिता द्वारा अपनी ही बेटियों के सपनों और स्वाभिमान का गला घोंटना सही है? और क्या वैदेही की तरह अपनों की भूल को माफ करके उन्हें गले लगाना ही एक सच्ची और परिपक्व संतान का धर्म है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।