अनकहा दर्द  

 विमलेश जी जो कभी रसोई की तरफ झांकते तक नहीं थे, वे खुद शारदा के लिए दलिया बनाकर कटोरी में ठंडा कर रहे थे। बहू नताशा शारदा के पैरों को दबा रही थी और बड़े प्यार से पूछ रही थी, “माँ जी, दोपहर में मौसमी का जूस निकाल दूं?” मयंक दफ्तर जाने से पहले अपनी माँ के माथे को चूमकर कह रहा था, “माँ, शाम को जल्दी आऊंगा, फिर हम बालकनी में टहलेंगे।”

पूरा घर बदल चुका था। जिस औरत को उन्होंने बरसों तक अनदेखा किया था, आज वही औरत उस पूरे परिवार के अस्तित्व का केंद्र बन चुकी थी। 

कानपुर के पुराने मोहल्ले में स्थित उस दोमंजिला मकान की चौखट पर खड़े होकर जब मालती ने गहरी सांस ली, तो उसके चेहरे पर बरसों बाद एक अजीब सा संतोष था। हाथ में पकड़े ताजे फलों के थैले को संभालते हुए उसने अपनी सहेली शारदा के घर का दरवाजा खटखटाया। अंदर से आती हल्की सी आहट और फिर शारदा की खिलखिलाती हुई कमजोर ही सही, पर जिंदादिल आवाज सुनकर मालती की आंखें नम हो गईं। सच ही तो है, दुनिया के सारे अस्पताल, महंगी से महंगी गोलियां और सिरप मिलकर भी वह चमत्कार नहीं कर सकते, जो अपनों की सच्ची मुस्कान, सहेलियों की बेतकल्लुफ हंसी और दिल से निकला अपनापन कर दिखाता है। आज तीसरी बार जब मालती अपनी हमउम्र और सबसे प्यारी सहेली शारदा से मिलकर लौटी थी, तो मन का भारीपन पूरी तरह उतर चुका था।

शारदा और मालती का साथ कोई दो-चार महीनों का नहीं था। पिछले पच्चीस बरसों से वे दोनों एक ही इलाके में रहती थीं, सुख-दुख साझा करती थीं और मोहल्ले के भलाई मंडल की बैठकों में साथ हंसती-बतियाती थीं। शारदा स्वभाव से बेहद शांत, सीधी-सादी, सांवले रंग-रूप की और संकोची मिजाज की औरत थी। शरीर से दुबली-पतली, लेकिन काम के मामले में मानो कोई मशीन हो जो कभी थकने का नाम ही न ले। शादी के तैंतीस साल बीत जाने के बाद भी उस घर में उसकी हैसियत किसी थकी-हारी मजदूरनी से ज्यादा कभी नहीं बन पाई थी। उसके पति, विमलेश जी, सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त एक सख्त और मिजाज के अक्खड़ इंसान थे। घर में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं खड़कता था, लेकिन उस मर्जी के पीछे शारदा की पसंद या आराम की कभी कोई जगह नहीं थी।

विमलेश जी के पास गांव में कुछ पुश्तैनी जमीन थी। वहां से हर मौसम में बोरियों में भरकर खड़ा गेहूं, चना, उड़द और सरसों घर पर आता था। विमलेश जी का सीधा हुक्म था कि बाजार से पिसा हुआ आटा या रेडीमेड मसाले जहर के बराबर होते हैं, इसलिए सब कुछ घर पर ही तैयार होना चाहिए। बेचारी शारदा भोर के चार बजे उठकर पहले तो बोरियों से अनाज निकालती, उसे धूप में सुखाती, फटकती, बीनती और फिर घर में रखी चक्की को चलाकर घंटों आटा, बेसन और दलिया पीसती। त्योहार हो या कोई आम दिन, विमलेश जी की थाली में बाजार की कोई मिठाई या नमकीन नहीं जा सकती थी। गुलाब जामुन खाने का मन हुआ तो घर में दूध मंगाकर घंटों कड़ाही में मावा भूना जाता, नमकीन सेव बनाने के लिए खुद बेसन गूंथा जाता और यदि पनीर की सब्जी बननी हो तो बाजार की डेयरी से लाने के बजाय घर में ही दूध फाड़कर छैना उतारा जाता।

शारदा के हाथ दिनभर पानी, आग और बर्तनों से ही जूझते रहते थे। सुबह का सूरज उगने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह रसोई और आंगन के बीच एक लट्टू की तरह घूमती रहती थी। लेकिन इस हाड़-तोड़ मेहनत के बदले उसे घर में जो मिला, वह सिर्फ उपेक्षा और कड़वे तानों की चुभन थी। इस दर्द की जड़ और भी गहरी थी। शारदा की एक बेटी थी, पल्लवी। पल्लवी जब कॉलेज में थी, तब उसने एक गैर-बिरादरी के साधारण लड़के से प्रेम कर लिया और घरवालों की लाख बंदिशों के बावजूद उससे शादी कर ली। विमलेश जी ने उस दिन अपनी पगड़ी जमीन पर पटक दी थी और पूरे खानदान के सामने कसम खा ली थी कि आज के बाद उस लड़की का नाम इस घर में कोई नहीं लेगा। बेटी से तो उन्होंने उसी पल नाता तोड़ लिया, लेकिन उस पूरे कांड का सारा ठीकरा उन्होंने अनजाने में शारदा के सिर पर फोड़ दिया।

विमलेश जी का हर दूसरा ताना इसी बात पर होता कि माँ ने ही ढील दी होगी, माँ ने ही बेटी को बिगड़ने दिया। इतना ही नहीं, जब बेटे मयंक की शादी हुई, तो बहू नताशा भी उसी रंग में रंग गई। मयंक निजी बीमा कंपनी में शाखा प्रबंधक था। सुबह नौ बजे उसे दफ्तर निकलना होता था। बहू नताशा अक्सर सुबह देर तक सोती रहती। जब कभी शारदा अपनी सहेलियों के बीच रोते हुए कहती कि बहू उठकर बेटे का टिफिन तक नहीं बनाती, तो मालती और बाकी सहेलियां कहतीं, “शारदा, तू क्यों इतना सिर पर उठाती है? बहू से कह कि अपने पति का नाश्ता खुद बनाए।” लेकिन शारदा बेबसी से सिर झुका लेती। मयंक खुद अपनी माँ से कह देता, “माँ, नताशा को रात में देर से नींद आती है, आप ही मेरा लंच पैक कर दिया करो, इसमें कौन सी बड़ी बात है।” और विमलेश जी तो सीधे डांट पड़ते, “घर में नई-नई बहू आई है, उसके पीछे क्यों पड़ी रहती हो? तुम क्या महारानी हो जो तुमसे बेटे के लिए चार रोटियां नहीं सेकी जातीं? बेकार में घर में कलह मत मचाया करो।”

शारदा घूंट पीकर रह जाती। बहू नताशा जब भी कोई बात होती, तीखे लहजे में सुना देती, “अरे माँ जी, आप तो रहने ही दीजिए। जिस माँ की खुद की बेटी कुल की मर्यादा लांघकर चली गई हो, वो दूसरों को गृहस्थी के कायदे क्या सिखाएगी!” यह ताना शारदा के कलेजे में बरछी की तरह उतर जाता था। बेटी तो विमलेश जी ने खोई ही थी, पर क्या शारदा ने अपनी कोख से जाई को नहीं खोया था? माँ का दिल तो हर पल उस बेटी की याद में तड़पता था, पर वह रो भी नहीं सकती थी। घर में न कोई उसकी पीड़ा समझता था, न उसकी मेहनत का कोई मोल था।

इसी घुटन और अवसाद के बीच शारदा का शरीर अंदर ही अंदर बीमारियों का घर बनता चला गया। डॉक्टर ने उसे उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) और गंभीर मधुमेह (डायबिटीज) का मरीज घोषित कर रखा था। सख्त हिदायत थी कि समय पर दवा खानी है, नमक-मीठा नियंत्रित रखना है और तनाव बिल्कुल नहीं लेना है। लेकिन शारदा ने अपनी जिंदगी से जैसे मोह ही छोड़ दिया था। जब भी मालती या उसकी सहेलियां उससे पूछतीं, “शारदा, तूने आज बीपी की गोली खाई?” तो वह बेपरवाही से हाथ हिलाकर कह देती, “क्या करना है जी कर? कौन सा इस घर में मेरे होने से किसी को खुशी मिलती है। बस जब तक सांस चल रही है, घिसट रही हूं। मैं तो परहेज रखती हूं, मीठा नहीं खाती, बस काफी है।” वह रोज-रोज दवाइयां लेना छोड़ देती थी। कभी दो दिन खा ली, तो कभी हफ्तों दवाइयों का डिब्बा छुआ तक नहीं। मन की कड़वाहट और अकेलापन उसे भीतर से खोखला कर रहा था।

और आखिरकार, वही अनहोनी घटी जिसका डर मालती को हमेशा सताता था।

सर्दियों की एक उदास दोपहर थी। बहू नताशा अपने मायके गई हुई थी। मयंक दफ्तर में था और विमलेश जी किसी परिचित के यहां गए हुए थे। शारदा घर में अकेली थी। दोपहर करीब एक बजे कपड़े धोने के बाद जब वह स्नानघर में गई, तो अचानक उसके सिर में एक तेज झनझनाहट हुई। आंखों के आगे गहरा अंधेरा छा गया और रक्तचाप इतना ज्यादा बढ़ गया कि वह फर्श पर गिर पड़ी। उसका सिर दीवार के कोने से टकराया और वह बेसुध हो गई। दिमाग की एक बारीक नस फट चुकी थी—ब्रेन हेमरेज का जानलेवा हमला हुआ था।

शारदा उस ठंडे फर्श पर चार घंटे तक अचेत पड़ी रही। शाम को साढ़े पांच बजे जब मयंक दफ्तर से लौटा, तो मुख्य द्वार अंदर से बंद था। उसने कई बार घंटी बजाई, आवाजें दीं, लेकिन अंदर से कोई हलचल नहीं हुई। घबराकर मयंक ने पड़ोसियों को बुलाया। सीढ़ी लगाकर किसी तरह बालकनी के रास्ते घर में घुसा गया। मयंक पागलों की तरह “माँ… माँ…” चिल्लाते हुए कमरों में दौड़ा। जब स्नानघर का दरवाजा धकेला गया, तो सामने का दृश्य देखकर सबके होश उड़ गए। शारदा जमीन पर अचेत पड़ी थी, उसके चेहरे का एक हिस्सा खिंचा हुआ था और होंठों से झाग निकल रहा था।

चीख-पुकार मच गई। विमलेश जी को तुरंत फोन किया गया। आनन-फानन में शारदा को शहर के सबसे बड़े निजी अस्पताल की इमरजेंसी में ले जाया गया। डॉक्टरों ने जांच की और सिर हिला दिया। बहुत देर हो चुकी थी। मस्तिष्क में खून का थक्का काफी बड़ा हो चुका था और शरीर का बायां हिस्सा पूरी तरह सुन्न पड़ गया था। स्थानीय डॉक्टरों ने गंभीर हालत देखते हुए तुरंत जवाब दे दिया और किसी बड़े सुपर स्पेशलिटी केंद्र ले जाने की सलाह दी। मयंक और विमलेश जी बदहवास हालत में उसे लेकर एंबुलेंस से बड़े मेडिकल रिसर्च सेंटर पहुंचे।

अस्पताल के आईसीयू के बाहर खड़े विमलेश जी के हाथ कांप रहे थे। तैंतीस साल के वैवाहिक जीवन में पहली बार उन्हें उस खालीपन का एहसास हो रहा था, जो शारदा के अचानक खामोश हो जाने से पैदा हो गया था। घर की चौखट, रसोई की खुशबू, सुबह की चाय की प्याली, साफ-सुथरे कपड़े—उन सब चीजों के पीछे शारदा की जो खामोश मौजूदगी थी, वह अब तक किसी को दिखाई ही नहीं दी थी। वे हमेशा यही समझते रहे कि घर उनकी पेंशन और उनके हुक्म से चल रहा है, पर आज समझ आ रहा था कि घर तो उस औरत की सांसों और समर्पण से चल रहा था, जिसे उन्होंने कभी दो घूंट सुकून के नहीं दिए। मयंक भी दीवार से सिर टिकाए आंसू बहा रहा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे माँ सुबह उठकर उसका टिफिन सजाती थी और उसने कभी पलटकर यह नहीं पूछा था कि “माँ, तुम्हारी तबीयत कैसी है?”

पूरे अट्ठाईस दिन शारदा जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही। वेंटिलेटर हटा, तो पैरालिसिस का असर साफ दिखने लगा। उसकी बाईं आंख, बायां हाथ और पैर पूरी तरह काम करना बंद कर चुके थे। जुबान लड़खड़ा गई थी और सबसे दर्दनाक बात यह थी कि उसकी याददाश्त पर गहरा असर पड़ा था। वह अपने आसपास खड़े चेहरों को एकटक देखती रहती, जैसे किसी धुंधली तस्वीर को पहचानने की कोशिश कर रही हो।

जब शारदा को डिस्चार्ज करके घर लाया गया, तो घर का माहौल किसी वीराने जैसा था। मालती और भलाई मंडल की अन्य सहेलियां तुरंत उससे मिलने दौड़ीं, लेकिन मयंक और विमलेश जी ने हाथ जोड़कर उन्हें दरवाजे से ही लौटा दिया। उनका कहना था, “डॉक्टर ने पूरी तरह शांति बरतने को कहा है। इंफेक्शन का डर है, इसलिए किसी से मिलने की इजाजत नहीं है।” करीब पंद्रह-बीस दिन तक शारदा उस बंद कमरे में छत को ताकती रही। न कोई बात करने वाला, न कोई हंसने वाला। बहू नताशा कमरे में दवा और सूप रख आती, मयंक शाम को हाल पूछ लेता, पर शारदा की हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ने लगी। वह गुमसुम होती चली गई।

जब दोबारा जांच के लिए बड़े न्यूरोलॉजिस्ट के पास ले जाया गया, तो डॉक्टर ने पूरी स्थिति समझने के बाद विमलेश जी और मयंक को फटकार लगाई। डॉक्टर ने कहा, “आप लोग इसे कमरे में कैद करके मार डालना चाहते हैं क्या? दवाइयां अपना काम कर चुकी हैं। अब इनका दिमाग तब तक हरकत में नहीं आएगा जब तक इन्हें सामाजिक और भावनात्मक सहारा नहीं मिलेगा। इन्हें इनके पुराने दोस्तों से मिलवाइए, पुरानी अच्छी यादें ताजा कराइए, इनके चेहरे पर हंसी लाइए। अगर इन्हें अकेला छोड़ा, तो यह डिप्रेशन में चली जाएंगी और फिर कोई दवा काम नहीं करेगी।”

डॉक्टर की बात ने विमलेश जी की आंखें खोल दीं। उसी शाम विमलेश जी ने संकोच और झिझक को दरकिनार करते हुए मालती को फोन मिलाया। कांपती आवाज में उन्होंने कहा, “भाभी जी… अगर आप और आपकी सहेलियों के पास थोड़ा समय हो, तो क्या आप लोग घर आ सकती हैं? शारदा को आप लोगों की जरूरत है।”

अगले ही दिन मालती, विमला, पुष्पा और मोहल्ले की चार अन्य महिलाएं शारदा के घर पहुंचीं। विमलेश जी ने खुद आगे बढ़कर दरवाजा खोला और बड़े आदर से सबको शारदा के कमरे में ले गए। कमरे में व्हीलचेयर पर बैठी शारदा को देखकर मालती का कलेजा मुंह को आ गया। वही शारदा, जो दिनभर पूरे घर को सिर पर उठाए रहती थी, आज एक बेबस गुड़िया की तरह बैठी थी।

मालती ने आगे बढ़कर पुकारा, “शारदा! देख कौन आया है!”

शारदा ने धीरे-धीरे अपनी गर्दन घुमाई। धुंधली आंखों से उसने सामने खड़ी अपनी सहेलियों को देखा। कुछ पलों के लिए उसके चेहरे पर शून्य छाया रहा, फिर अचानक उसकी पथराई आंखों से आंसुओं की दो मोटी बूंदें लुढ़क कर गालों पर बह निकलीं। मालती ने झटपट उसके आंसू पोंछे और उसका हाथ अपने हाथों में थाम लिया। एक-एक करके सबने अपना नाम बताया, “शारदा, पहचान… मैं पुष्पा, ये विमला…” शारदा होंठ हिलाती रही, पर शब्द गले में ही अटक कर रह गए। वह किसी का नाम नहीं बोल पा रही थी, लेकिन उसकी कांपती उंगलियां मालती की हथेली को जोर से भींच रही थीं। मालती ने उसे गले से लगा लिया, “कोई बात नहीं सहेली, मत बोल नाम। हम सब तेरे पास हैं। तू बस मुस्कुरा दे।” उस दिन वे सब करीब एक घंटे तक वहीं बैठी रहीं, इधर-उधर के पुराने किस्से सुनाती रहीं, मोहल्ले की बातें करती रहीं। जाते-जाते उन्होंने देखा कि शारदा का चेहरा पहले से कहीं अधिक शांत था।

दो दिन बाद मालती फिर अकेले शारदा से मिलने पहुंची। मालती और शारदा का रिश्ता सबसे गहरा था। कमरे में जैसे ही मालती ने कदम रखा, शारदा की नजरें दरवाजे पर टिक गईं। इस बार शारदा रोई नहीं, बल्कि उसके सूखे होंठों पर एक बहुत हल्की, लेकिन बेहद प्यारी मुस्कान तैर गई। उसने लड़खड़ाती जुबान से धीमे से कहा, “मा… ल… ती…”

मालती की आंखें खुशी से भर आईं। उसने शारदा के सिर पर हाथ फेरा, “हाँ मेरी जान, मैं मालती। देख, तू कितनी जल्दी ठीक हो रही है। तुझे जल्दी से अपने पैरों पर खड़ा होना है, समझे? ऐसे बिस्तर पर पड़े रहना शोभा नहीं देता तुझे।” मालती ने उसे सकारात्मक बातें समझाईं, उसके हाथ की मालिश की और उसे भरोसा दिलाया कि यह बीमारी सिर्फ एक बुरा सपना थी जो अब बीत चुका है।

कल जब मालती तीसरी बार शारदा के घर गई, तो वहां का नजारा देखकर उसका दिल बाग-बाग हो गया। विमलेश जी जो कभी रसोई की तरफ झांकते तक नहीं थे, वे खुद शारदा के लिए दलिया बनाकर कटोरी में ठंडा कर रहे थे। बहू नताशा शारदा के पैरों को दबा रही थी और बड़े प्यार से पूछ रही थी, “माँ जी, दोपहर में मौसमी का जूस निकाल दूं?” मयंक दफ्तर जाने से पहले अपनी माँ के माथे को चूमकर कह रहा था, “माँ, शाम को जल्दी आऊंगा, फिर हम बालकनी में टहलेंगे।”

पूरा घर बदल चुका था। जिस औरत को उन्होंने बरसों तक अनदेखा किया था, आज वही औरत उस पूरे परिवार के अस्तित्व का केंद्र बन चुकी थी। विमलेश जी ने जब मालती को देखा, तो उनके हाथ अपने आप जुड़ गए। वे भरभराई आवाज में बोले, “भाभी जी, जब से आप लोगों का आना-जाना शुरू हुआ है, शारदा में चमत्कारिक बदलाव आया है। कल रात इसने खुद अपने हाथ से चम्मच पकड़ने की कोशिश की। आप बस रोज थोड़ा समय निकाल कर आती रहा करिए, हमारी यह गुस्ताखी माफ कर दीजिए कि हमने आपको पहले मिलने नहीं दिया।”

मालती ने मुस्कुराते हुए बड़े अपनेपन से कहा, “विमलेश भाई साहब, डॉक्टर की दवाइयां शरीर की नसों को जोड़ सकती हैं, लेकिन जीने की इच्छा तो सिर्फ अपनों का प्यार, सम्मान और सहेलियों की बातें ही जगा सकती हैं। बीमारी तब बड़ी हो जाती है जब इंसान अंदर से अकेला पड़ जाता है। अब आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए, हमारी शारदा बहुत मजबूत है। देखना, कुछ ही महीनों में यह हमारे साथ बैठकर ठहाके लगाएगी।”

शारदा ने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे अपनी सहेली मालती का हाथ पकड़ लिया और इस बार उसकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि भविष्य की एक नई उम्मीद और आत्मविश्वास की चमक थी। घर के उस आंगन में, जहां कभी तानों की कड़वाहट गूंजती थी, आज प्रेम और अपनत्व की एक नई सुबह दस्तक दे रही थी।

जीवन में अक्सर हम उन लोगों की कद्र करना भूल जाते हैं जो बिना किसी शिकायत के हमारे लिए अपनी खुशियां कुर्बान करते रहते हैं। क्या आपके विचार में भी बुजुर्गों या परिवार के सदस्यों के लिए दवाइयों से कहीं अधिक जरूरी उनका मान-सम्मान और अपनापन होता है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : मंजू ओमर 

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