रूह के धागे 

“मुझे माफ कर दो बच्चों,” विद्याधर जी की आवाज भर्रा गई। “मैं परंपराओं के खोखले खोल में इतना उलझ गया था कि संस्कारों और सच्चे प्रेम की पहचान ही भूल गया था। संस्कृति किसी को बांटने का नाम नहीं है, बल्कि अपनों को दिल से अपनाने का नाम है। अवनि, तुम सिर्फ अरनव की पसंद नहीं, इस घर की सबसे बड़ी ताकत बनोगी।”

शहनाई की गूंज, फूलों की महक और चारों तरफ फैली जगमगाहट के बीच जब किसी की नजरें सिर्फ एक चेहरे पर आकर ठहर जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि नियति अपना खेल शुरू कर चुकी है। चंडीगढ़ के एक भव्य बैंक्वेट हॉल में चारों तरफ हंसी-ठिठोली का माहौल था। अवनि अपनी सबसे पक्की सहेली रिया के विवाह समारोह में भागदौड़ कर रही थी। सुनहरे गोटे वाले गुलाबी लहंगे में सजी अवनि की बड़ी-बड़ी आंखें, चेहरे पर फैली मासूमियत और होंठों पर तैरती स्वाभाविक मुस्कान किसी को भी एक पल के लिए ठहरने पर मजबूर कर सकती थी। वह बैंक में क्रेडिट मैनेजर के पद पर कार्यरत थी, जितनी बुद्धिमान उतनी ही शालीन।

बारात आ चुकी थी और मंच पर दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को वरमाला पहना रहे थे। उसी भीड़ में अवनि का ध्यान अचानक उस नौजवान की तरफ गया, जो मंच के पास खड़ा होकर लगातार वरमाला के फूलों और फोटोग्राफर को सही कोण समझा रहा था। गहरे नीले रंग की शेरवानी, करीने से संवरे बाल, चेहरे पर एक धीर-गंभीर ठहराव और गहरी संजीदा आंखें। उसके व्यक्तित्व में एक अजीब सा आकर्षण था, जिसमें कोई दिखावा नहीं था, बस एक शांत गरिमा थी। अवनि कुछ पलों के लिए सब कुछ भूलकर उसे ही देखती रह गई।

रस्मों के बीच जब अवनि कॉफी काउंटर की तरफ बढ़ी, तो अचानक सामने से तेज कदमों से आ रहे उसी नौजवान से उसकी टक्कर हो गई। अवनि के हाथ से पर्स फिसल कर नीचे गिर पड़ा। “आई एम सो सॉरी, मेरा ध्यान नहीं था,” उस लड़के ने झुककर पर्स उठाते हुए कहा। उसकी आवाज में इतनी विनम्रता और मिठास थी कि अवनि पल भर के लिए अवाक रह गई। अवनि ने नजरें उठाईं, दोनों की आंखें मिलीं और उस एक पल में जैसे आसपास का शोर बिल्कुल थम गया। “कोई बात नहीं, गलती शायद मेरी भी थी,” अवनि ने मुस्कुराते हुए कहा। उस लड़के के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान खिली, उसने सिर झुकाकर अभिवादन किया और भीड़ में आगे बढ़ गया।

स्टेज पर बैठी रिया के पास जाकर अवनि ने धीरे से उसकी चुन्नी ठीक करते हुए कान में फुसफुसाया, “रिया, वो जो नीली शेरवानी में लड़का है, जो बार-बार अंकल जी के साथ बात कर रहा है, वो कौन है?” रिया ने शरारत से अवनि की तरफ देखा और मुस्करा कर बोली, “अरे, वो तो मेरे पति कबीर का मौसेरा भाई है, अरनव। पुणे में एक रिन्यूएबल एनर्जी फर्म में सीनियर प्रोजेक्ट हेड है। बहुत सुलझा हुआ और शांत लड़का है। क्यों, कुछ खास बात है क्या?” अवनि झेंप गई और बात टालते हुए बोली, “अरे नहीं, बस ऐसे ही पूछ लिया था।” लेकिन सच तो यह था कि अरनव का चेहरा अवनि के दिल के किसी कोने में गहरी छाप छोड़ चुका था।

शादी की तमाम व्यस्तताओं के बीच दोनों कई बार एक-दूसरे के आमने-सामने आए। कभी डाइनिंग हॉल में, तो कभी विदाई के समय। हर बार नजरें टकरातीं, दोनों झिझक कर मुस्कुरा देते और नजरें फेर लेते।

शादी के तीन दिन बाद, रिया जब पहली बार कबीर के साथ मायके आई, तो उनके साथ अरनव भी था। घर में सिर्फ करीबी रिश्तेदार बैठे थे। रिया ने ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे अरनव को देखा, जिसकी आंखें बार-बार मुख्य दरवाजे की तरफ उठ रही थीं, मानो वह किसी खास आहट का इंतजार कर रहा हो। रिया सब समझ रही थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अरनव भैया, क्या बात है? सोफे पर बैठे-बैठे भी आपकी नजरें दरवाजे पर टिकी हैं, किसी खास का इंतजार है क्या?”

अरनव एकदम सकपका गया। उसने अपने कुर्ते की आस्तीन ठीक करते हुए बात बनाई, “नहीं-नहीं रिया, वो बस बाहर मौसम देख रहा था, शायद बारिश होने वाली है।”

रिया मन ही मन हंस पड़ी। उसने शादी में अवनि के सवालों और उसकी आंखों की चमक को बहुत अच्छी तरह भांप लिया था। रिया ने अपनी मां से कहा, “मम्मी, अवनि का फोन आया था, वो मुझसे मिलने के लिए बहुत बेचैन हो रही है। क्या मैं उसे यहीं बुला लूं?” मां ने तुरंत अनुमति दे दी। रिया ने बिना देर किए अवनि को कॉल मिला दिया।

आधे घंटे के भीतर जब अवनि ने घर में कदम रखा, तो सामने अरनव को बैठे देख उसके कदम वहीं ठिठक गए। चेहरे पर अचानक आई लालिमा और आंखों की चमक यह बताने के लिए काफी थी कि यह मुलाकात उसके लिए कितनी अप्रत्याशित और सुखद थी। अरनव के चेहरे पर भी वही शांत खुशी तैर गई, जिसे वह छिपाने की असफल कोशिश कर रहा था।

नाश्ते की मेज पर जब सब बैठे, तो बातों का सिलसिला शुरू हुआ। अवनि ने मेज पर रखी प्लेट्स को सजाते हुए कबीर से कहा, “जीजा जी, यह खास काजू कतली हमारे शहर की सबसे पुरानी और मशहूर दुकान की है, आप लीजिए।” फिर उसने प्लेट अरनव के सामने बढ़ा दी।

अरनव ने अवनि की आंखों में सीधे देखते हुए बहुत धीमी आवाज में कहा, “मैं तभी लूंगा जब आप भी एक पीस लेंगी, अकेले मीठा खाने का क्या फायदा?”

अवनि ने पलकें झुकाते हुए बिना कोई बहाना बनाए एक टुकड़ा उठा लिया। बातचीत आगे बढ़ी तो अरनव ने पूछा, “रिया बता रही थी कि आप बैंकिंग में हैं, काम का दबाव बहुत रहता होगा?”

अवनि ने हंसते हुए जवाब दिया, “हां, जिम्मेदारी तो है, पर मुझे अपना काम पसंद है। और आपका तो एनर्जी सेक्टर है, नई तकनीक पर काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता होगा?” दोनों के बीच बातों का ऐसा सहज प्रवाह शुरू हुआ कि दोनों को समय का अहसास ही नहीं रहा। विदा लेते समय दोनों ने एक-दूसरे के मोबाइल नंबर साझा कर लिए।

शुरुआत बहुत औपचारिक संदेशों से हुई। सुबह का एक सीधा “सुप्रभात” और शाम को “आशा है आपका दिन अच्छा रहा होगा।” लेकिन धीरे-धीरे इन औपचारिकताओं ने आत्मीयता का रूप ले लिया। एक शाम अवनि ने गलती से अरनव का नंबर डायल कर दिया और घबराकर तुरंत काट दिया। अरनव ने फौरन वापस कॉल किया। अवनि ने हिचकिचाते हुए कहा, “माफ कीजिएगा, वो मैं अपनी कलीग को कॉल कर रही थी, गलती से आपका नंबर लग गया।”

फोन के दूसरी तरफ अरनव की धीमी हंसी गूंजी, “कोई बात नहीं अवनि, वैसे अगर यह जानबूझकर भी लगाया होता, तो मुझे बहुत खुशी होती। मैं खुद काफी देर से सोच रहा था कि आपसे बात करूं।” उस शाम दोनों ने लगभग दो घंटे फोन पर बात की। अपने शौक, बचपन की यादें, जिंदगी को लेकर उनके विचार और सपने—सब कुछ एक खुली किताब की तरह सामने आने लगा।

कुछ हफ्तों बाद अरनव को एक सरकारी प्रोजेक्ट के सिलसिले में चंडीगढ़ आना पड़ा। उसने अवनि को पहले से नहीं बताया। शाम के समय जब अवनि अपने बैंक से बाहर निकली, तो पार्किंग के पास अरनव को मुस्कुराते हुए खड़े देखकर वह दंग रह गई।

“आप यहां? और मुझे बताया भी नहीं!” अवनि की खुशी उसके चेहरे से झलक रही थी।

अरनव ने अपनी कार की चाबी घुमाते हुए कहा, “कुछ मुलाकातें बिना बताए ही ज्यादा खूबसूरत होती हैं। अगर आपके पास वक्त हो, तो क्या हम थोड़ी देर वॉक पर चल सकते हैं?”

दोनों शहर के मशहूर रॉक गार्डन के पास एक शांत कैफे में बैठे। शाम की ठंडी हवा और कॉफी की चुस्कियों के बीच दोनों ने एक-दूसरे के मौन को भी पढ़ना सीख लिया था। यह कोई आकर्षण नहीं था जो कुछ दिनों में फीका पड़ जाता, बल्कि यह दो आत्माओं का गहरा जुड़ाव था, जहां एक-दूसरे की मौजूदगी ही सुकून देती थी। उस दिन अरनव ने अवनि का हाथ अपने हाथ में लेकर बहुत सहजता से कहा, “अवनि, मैं जिंदगी के इस सफर को तुम्हारे बिना अधूरा महसूस करता हूं। क्या तुम हमेशा के लिए मेरा हाथ थामोगी?”

अवनि की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। उसने बिना कुछ कहे अपनी उंगलियां अरनव के हाथ में कस दीं।

कुछ महीनों बाद जब दोनों के घरों में उनके भविष्य को लेकर बातचीत शुरू हुई, तो दोनों ने अपने-अपने परिवारों के सामने अपने प्यार की बात रखी। अवनि के परिवार ने अरनव की योग्यता, उसके व्यवहार और परिवार की प्रतिष्ठा को देखते हुए बिना किसी झिझक के अपनी सहमति दे दी। उन्हें अपनी बेटी की खुशी सबसे प्यारी थी।

लेकिन असली तूफान अरनव के घर में खड़ा हुआ। अरनव के पिता, पंडित विद्याधर शर्मा, परंपराओं और रूढ़ियों के अत्यंत पक्के इंसान थे। वे अपने खानदान की ब्राह्मण परंपराओं और वैदिक रीति-रिवाजों को लेकर बहुत संवेदनशील थे। जब उन्हें पता चला कि अवनि एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है, जिनका रहन-सहन और खान-पान उनकी मान्यताओं से अलग है, तो वे पूरी तरह उखड़ गए।

“यह शादी कभी नहीं हो सकती अरनव!” विद्याधर जी ने दो टूक शब्दों में कह दिया। “हमारे कुल की अपनी मर्यादाएं हैं, हमारी परंपराएं अलग हैं। एक अलग संस्कृति और अलग परिवेश की लड़की हमारे घर के तौर-तरीकों को कभी नहीं समझ सकती। तुम हमारे एकमात्र बेटे हो, हम तुम्हारी शादी अपनी ही बिरादरी में करेंगे।”

अरनव ने अपने पिता को समझाने की हर मुमकिन कोशिश की। उसने बताया कि अवनि कितनी संस्कारी, समझदार और संजीदा है, लेकिन विद्याधर जी अपनी जिद पर अड़े रहे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर उसने अपनी मर्जी चलाई, तो वे उससे हमेशा के लिए नाता तोड़ लेंगे।

अरनव भारी मन से चंडीगढ़ पहुंचा और अवनि से मिला। उसने बिना कुछ छिपाए सारी सच्चाई अवनि के सामने रख दी। उसकी आवाज में बेबसी थी, “अवनि, मैं अपने पिता की इज्जत करता हूं, उन्हें दुख पहुंचाकर हम खुश नहीं रह पाएंगे। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि तुम्हारे बिना मेरा कोई वजूद नहीं है। अगर मेरा विवाह तुमसे नहीं हुआ, तो मैं जिंदगी भर किसी और से शादी नहीं करूंगा। यह मेरा फैसला है।”

अवनि ने अरनव के कांपते हाथों को थामा। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक दृढ़ संकल्प था। उसने कहा, “अरनव, सच्चा प्रेम कभी बगावत या रिश्तों को तोड़कर हासिल नहीं किया जाता। अगर हम अपने बड़ों को चोट पहुंचाकर एक होंगे, तो वह नींव कभी मजबूत नहीं होगी। लेकिन हम हार भी नहीं मानेंगे। हम किसी और से शादी करने का नाटक करके तीन जिंदगियां बर्बाद नहीं करेंगे। हम अपने प्यार की पवित्रता और धैर्य से पिताजी का दिल जीतेंगे। प्रेम में त्याग का मतलब किसी अवांछित रिश्ते में बंधकर खुद को और दूसरे को धोखा देना नहीं होता, बल्कि सही समय का इंतजार करना होता है।”

दोनों ने एक अत्यंत कठिन लेकिन परिपक्व निर्णय लिया। न तो वे घर छोड़कर भागे, न ही उन्होंने परिवार के दबाव में आकर किसी बेमेल रिश्ते के लिए हां कही। उन्होंने अपने परिवारों को साफ और विनम्र शब्दों में बता दिया कि वे एक-दूसरे के प्रति समर्पित हैं और किसी तीसरे इंसान की जिंदगी में आकर उसके साथ अन्याय नहीं करेंगे।

समय बीतता गया। एक साल, फिर दो साल। दोनों ने अपने करियर पर पूरा ध्यान दिया, अपने माता-पिता की सेवा की और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाया। वे रोज नहीं मिलते थे, पर उनका विश्वास चट्टान की तरह अडिग था।

इसी बीच, एक बार विद्याधर जी अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें तेज दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अरनव दिन-रात अस्पताल में था। जब यह खबर अवनि को मिली, तो वह बिना एक पल गंवाए पुणे पहुंच गई। उसने किसी रिश्तेदार या बहू के हक से नहीं, बल्कि एक बेटी के फर्ज से अस्पताल में मोर्चा संभाल लिया।

अरनव जब डॉक्टरों से बात करने या दवाइयों के इंतजाम में दौड़ता, तो अवनि विद्याधर जी के सिरहाने बैठकर उनकी देखभाल करती। डॉक्टरों से समय पर सलाह लेना, समय पर दवाइयां दिलवाना और विद्याधर जी की कमजोर हालत में उनका हाथ थामे रखना। आईसीयू के बाहर तीन दिन और तीन रातें अवनि ने बिना सोए, केवल ईश्वर से उनके स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हुए बिता दीं।

जब विद्याधर जी को होश आया, तो उन्होंने देखा कि उनके बिस्तर के पास अवनि थकी हुई, आंखें मूंदे कुर्सी पर बैठी थी, उसके हाथ में अभी भी उनका हाथ था। विद्याधर जी की आंखों से बरसों की जमी बर्फ पिघलने लगी। उन्होंने देखा कि जिस लड़की को उन्होंने केवल एक अलग जाति या संस्कृति के चश्मे से देखा था, उसके भीतर कितना शुद्ध, निस्वार्थ और समर्पित प्रेम था। उसने न कभी कोई ताना दिया, न कोई शिकायत की, बस एक मूक सेवा भाव से खड़ी रही।

डॉक्टर ने आकर जब विद्याधर जी से कहा, “पंडित जी, आप बहुत भाग्यशाली हैं। आपके बेटे और इस बच्ची की समय पर की गई देखभाल और भागदौड़ ने ही आपको एक बड़ा खतरा टालने में मदद की है,” तो विद्याधर जी का गला रुंध गया।

उन्होंने बहुत धीमी आवाज में अवनि को पुकारा, “बेटी…”

अवनि ने तुरंत आंखें खोलीं और घबराकर पानी का गिलास उठाया, “जी अंकल जी, आपको दर्द तो नहीं हो रहा? मैं डॉक्टर को बुलाऊं?”

विद्याधर जी ने कांपते हाथों से अवनि के सिर पर हाथ रख दिया। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने अरनव को पास बुलाया और दोनों के हाथों को एक-दूसरे के ऊपर रख दिया।

“मुझे माफ कर दो बच्चों,” विद्याधर जी की आवाज भर्रा गई। “मैं परंपराओं के खोखले खोल में इतना उलझ गया था कि संस्कारों और सच्चे प्रेम की पहचान ही भूल गया था। संस्कृति किसी को बांटने का नाम नहीं है, बल्कि अपनों को दिल से अपनाने का नाम है। अवनि, तुम सिर्फ अरनव की पसंद नहीं, इस घर की सबसे बड़ी ताकत बनोगी।”

अस्पताल के उस कमरे में दो साल का धैर्य, निष्ठा और पवित्र प्रेम आंसुओं के जरिए मुस्कुरा उठा। कुछ ही महीनों बाद, दोनों परिवारों की भरपूर खुशियों और आशीर्वाद के साथ अवनि और अरनव एक परिणय सूत्र में बंध गए। वह विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि धैर्य, समझदारी और सच्चे पारिवारिक मूल्यों की जीत था।

सच्चा प्रेम केवल साथ पाने की जिद का नाम नहीं है, बल्कि धैर्य, एक-दूसरे के सम्मान और बड़ों के प्रति समर्पण से कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मोड़ने की ताकत रखता है।

क्या आपको भी लगता है कि जब रिश्ते में सच्चाई और धैर्य हो, तो रूढ़ियों और समाज की दीवारों को बिना किसी कड़वाहट के, केवल प्रेम और सेवा भाव से पिघलाया जा सकता है? आपकी इस बारे में क्या राय है, कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : गीता वाधवानी 

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