स्नेह की छांव  

“नहीं भाभी, बिल्कुल नहीं!” प्रियांशी ने विभा के गले में बाहें डालते हुए कहा, “चार दिन हो गए हैं मुझे यहाँ आए हुए। आप और भैया जिस तरह मेरी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रख रहे हैं, माँ होतीं तो शायद वो भी इतना ही करतीं। गर्भावस्था के इस दौर में मन कभी खट्टा खाने का करता है, तो कभी मीठा… और आप बिना मेरे बोले मेरी थाली में वो सब कुछ सजा देती हैं। माँ हमेशा मुझसे कहती थीं कि बेटा, अपनी भाभी का आदर करना सीख, उसमें कमियां निकालना बंद कर। वो पराए घर को छोड़कर तुम्हारे घर को अपना बनाने आई है, 

 स्वर्गीय कौशल्या जी की एक बड़ी सी तस्वीर दीवार पर टंगी हुई थी। तस्वीर पर ताजे गेंदे के फूलों का हार चढ़ा था और सामने जलती अगरबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू पूरे कमरे में तैर रही थी। उस तस्वीर के सामने फर्श पर बैठी प्रियांशी घुटनों में सिर छुपाए सुबक रही थी। उसके बहते आंसुओं से उसकी सूती साड़ी का पल्लू भीग चुका था।

तभी दरवाजे की ओट से एक बेहद कोमल और जानी-पहचानी आवाज गूंजी, “प्रियांशी… अरे यहाँ बंद कमरे में माँ की तस्वीर के सामने बैठकर क्या रो रही हो छोटी? चलो उठो, बाहर धूप में बैठो। इस हालत में कमरे के अंधेरे में बैठना और इस तरह आंसू बहाना बिल्कुल अच्छा नहीं होता। चलो बाहर, हम सब तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं।”

विभा ने आगे बढ़कर झुकते हुए बड़ी आत्मीयता से प्रियांशी के सिर पर हाथ फेरा और उसके कंधे को हल्के से थपथपाया। प्रियांशी ने चौंककर ऊपर देखा। विभा की बड़ी-बड़ी ममतामयी आंखों में सिर्फ और सिर्फ प्यार और चिंता तैर रही थी। प्रियांशी ने जल्दी से अपनी हथेलियों से भीगे गाल पोंछे और धीमी आवाज में बोली, “हाँ भाभी… बस आ ही रही थी। माँ की बहुत याद आ रही थी तो खुद को रोक नहीं पाई।”

विभा ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ पकड़ा और उसे सहारा देकर बाहर दालान में ले आई, जहाँ धूप की हल्की गर्माहट फैली हुई थी। अभी प्रियांशी दीवान पर बैठी ही थी कि विभा रसोई की ओर मुड़ी और थोड़ी ही देर में हाथ में एक बड़ी सी पीतल की थाली लिए लौटी। थाली में गर्मागर्म, खस्ता मूंग दाल की कचौड़ियां, तीखी-मीठी इमली की चटनी और साथ में कुरकुरे पोहे रखे हुए थे। पीछे-पीछे विभा के दोनों बच्चे—आठ साल का चिन्मय और पांच साल की तन्वी—भी अपनी छोटी-छोटी प्लेटें और स्टील के गिलास थामे खिलखिलाते हुए दौड़े चले आ रहे थे।

“ये लो प्रियांशी, पहले पेट पूजा करो। तुम्हारी पसंद की खास कचौड़ियां हैं। तुम्हारे भैया जब सुबह मंडी की तरफ गए थे, तो स्पेशल तुम्हारे लिए ताजा पिसी दाल और ये कचौड़ियां बनवा कर लाए हैं और अभी-अभी कह कर गए हैं कि बाजार के चौराहे से तुम्हारी मनपसंद केसरिया जलेबी और रबड़ी लेकर आते हैं।” विभा ने प्यार से थाली प्रियांशी के सामने छोटी मेज पर टिका दी और खुद एक प्लेट लेकर उसके पास ही कालीन पर बैठ गई।

प्रियांशी ने कचौड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा तोड़ा, पर उसका मन खाने से ज्यादा भीतर उठ रहे भावों के बवंडर में उलझा हुआ था। उसने थाली की तरफ देखा, फिर बच्चों को खेलते हुए देखा और अंत में विभा के चेहरे पर अपनी नजरें टिका दीं। विभा उसी सहजता से बच्चों को डांट रही थी कि चटनी कपड़े पर मत गिराना।

प्रियांशी से अब और रहा नहीं गया। उसने लड़खड़ाती जुबान से पूछा, “भाभी… एक बात सच-सच बताएंगे? क्या आपने मुझे दिल से माफ कर दिया है?”

विभा ने हाथ में पकड़ी कचौड़ी वहीं रोक दी और आश्चर्य से प्रियांशी की ओर देखा। उसकी भवों के बीच हल्की सी शिकन उभरी और फिर एक ममता भरी मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई। विभा बोली, “अरे पगली, ये अचानक तुझे क्या सूझ गया? किस बात की माफी मांग रही है तू? तू अब सातवें महीने में चल रही है, दो महीने बाद तेरे आंगन में एक नन्ही सी जान किलकारियां भरने वाली है। इस समय तो तुझे बस खुश रहना चाहिए, अच्छा-अच्छा सोचना चाहिए, मनपसंद चीजें खानी चाहिए। तू पुरानी बातों की पोटली बांधकर क्यों बैठ गई है? मैंने तो तुझसे कभी कोई बैर नहीं रखा, न कभी कोई गिला किया, फिर माफी किस बात की?”

प्रियांशी की आंखों से आंसुओं की एक नई धार बह निकली। उसने अपने दोनों कांपते हाथों से विभा की हथेली को थाम लिया। रुंधे गले से वह बोली, “भाभी, आप इतनी उदार हैं, इसलिए ऐसा कह रही हैं। लेकिन मैं जानती हूँ कि शादी के बाद जब आप इस घर में नई-नई आई थीं, तब मैंने आपको कितना सताया है। मैं तो उस समय नादान थी, अहंकारी थी। सच कहूं भाभी, जिंदगी वाकई लूडो के खेल जैसी होती है। जब तक माँ जिंदा थीं, मैं लूडो की उस गोटी की तरह थी जो हर बार छह आने पर अकड़कर आगे बढ़ जाती है और जैसे ही अपनी गोटी घर के करीब पहुंचती, मुझे लगता कि मैंने सारा जग जीत लिया है।”

विभा चुपचाप सुनती रही और प्रियांशी का हाथ सहलाती रही।

प्रियांशी ने आगे कहा, “माँ जब तक हमारे बीच थीं, मैं तो आपको कुछ समझती ही नहीं थी। घर के हर छोटे-मोटे काम में आपकी गलतियां ढूंढना, आपकी बनाई चाय में कभी नमक ज्यादा बताना तो कभी खाने में मिर्च की शिकायत करना मेरी आदत बन चुकी थी। जैसे ही आप रसोई से बाहर जातीं, मैं माँ के कान भरने लगती—’माँ देखो, भाभी ने आज ये ठीक नहीं किया, भाभी तो मायके की ही तारीफ करती रहती हैं।’ और जब मेरी बातों में आकर माँ आपके सामने आपको डांट लगाती थीं, तो उस पल मुझे लगता था कि लूडो के खेल में मैंने आपकी गोटी काट दी है और मैं खेल के टॉप पर पहुंच गई हूँ। मुझे उस डांट में एक अजीब सी विकृत जीत का अहसास होता था।”

प्रियांशी ने एक गहरी सांस ली और आंखें मूंद लीं, जैसे वह अतीत के उन पलों को दोबारा देख रही हो। “पर भाभी, माँ कितनी समझदार और दूरदर्शी थीं, ये मुझे अब समझ आता है। वो कभी बेटी और बहू में फर्क नहीं करती थीं। मेरे सामने तो वो आपको डांटने का एक दिखावा कर देती थीं ताकि मेरा बचकाना मन शांत हो जाए, पर फिर मैंने खुद एक दिन खिड़की के पीछे से देखा था कि वो आपके सिर पर तेल लगाते हुए फुसफुसा रही थीं—’बहू, प्रियांशी अभी नादान है, छोटी है। उसके सामने कभी मैं तुझे दो बातें कह भी दूं, तो तू अपने दिल पर मत लेना मेरी बच्ची। वो पराए घर की अमानत है, कल को ब्याह कर ससुराल चली जाएगी, ठोकरें खाएगी तो अपने आप रिश्तों की कीमत समझ जाएगी। तू तो घर की रानी है, तू समझदारी दिखाना।’ भाभी, जब मैंने माँ के मुंह से वो शब्द सुने थे, तो मानो लूडो के बोर्ड पर मेरी पक्की गोटी को किसी ने अंतिम घर के ठीक मुहाने पर काट दिया हो और मैं सीधे शून्य पर आ गिरी थी।”

विभा की आंखें भी अब छलक आई थीं। उसने प्रियांशी के सिर को अपनी छाती से लगा लिया।

प्रियांशी सिसकते हुए कहती रही, “और देखिए ना भाभी, आज जब माँ हमारे सिर पर नहीं हैं, तो आप सचमुच मेरी माँ का रूप बन चुकी हैं। ये चिन्मय और तन्वी जब मेरे पास आकर उछल-कूद करते हैं या मुझे तंग करते हैं, तो आप उन्हें डांटकर मेरे कमरे से बाहर कर देती हैं ताकि मेरी नींद खराब न हो। मुझे सब दिखता है भाभी कि आप मेरे आराम का कितना ध्यान रखती हैं। जब मैं खुद ससुराल गई, तो मुझे एहसास हुआ कि एक नए परिवार में जाकर अपनी जगह बनाना, नए मिजाज के लोगों को समझना और सामंजस्य बिठाना कितना कठिन होता है। जब मेरी ननद ने मेरे साथ वही सब किया जो मैं आपके साथ करती थी, तब जाकर मुझे अपनी गलतियों का अहसास हुआ। उस वक्त मुझे आपकी वह खामोशी, आपकी वह सहनशीलता याद आई। आपकी उसी सीख ने मुझे मेरे ससुराल में बिखरने से बचाया, मुझे रिश्तों को संभालना सिखाया।”

विभा ने अपनी साड़ी के पल्लू से प्रियांशी के आंसू पोंछे और बेहद दुलार से बोली, “मेरी भोली प्रियांशी, तू आज इतना कुछ अपने दिल में दबाए बैठी थी? सच कहूं तो माँ के जाने के बाद तुझे संभालना और समझना मेरे लिए कभी मुश्किल नहीं था। जानती है क्यों? क्योंकि जब मैं बहुत छोटी थी, तभी मेरी अपनी माँ का साया मेरे सिर से उठ गया था। मैं चाचा-चाची और ताऊजी के भरे-पूरे परिवार में पली-बढ़ी। हर किसी का अलग मिजाज, हर किसी की अलग बात। जब मेरी शादी होकर इस घर में तय हुई, तो मैं इस चौखट पर सिर्फ एक पति या ससुराल नहीं ढूंढ रही थी, मैं अपनी खोई हुई माँ को ढूंढ रही थी।”

विभा ने एक पल रुककर दीवार पर लगी तस्वीर की ओर देखा और हाथ जोड़े, “और सच कहूं, तो मुझे इस घर में आकर सासू जी के रूप में साक्षात माँ ही मिली थीं। उन्होंने मुझे कभी बहू का परायापन महसूस नहीं होने दिया। जब तू मुझसे चिढ़ती थी, तो मुझे तेरी उस चिढ़ पर कभी गुस्सा नहीं आया। मुझे हमेशा लगता था कि तू घर की सबसे छोटी लाडली बेटी है। तूने बचपन से माँ के आंचल पर सिर्फ अपना हक देखा था। जब अचानक एक नई लड़की आकर उस आंचल का आधा हिस्सा थामने लगी, तो तेरा इनसिक्योर होना, तेरा यह सोचना कि माँ का प्यार बंट गया है, बहुत स्वाभाविक था। तू तो बस अपने हिस्से का प्यार बचाने के लिए वो सारे जतन करती थी।”

विभा की आवाज भर्रा गई, “जानती है प्रियांशी, जब माँ अपने अंतिम दिनों में अस्पताल के उस बिस्तर पर थीं, जब उनकी सांसें उखड़ रही थीं, तो उन्होंने मेरा हाथ अपने कमजोर हाथों में थामकर क्या कहा था? माँ ने कहा था—’बहू विभा, प्रियांशी ऊपर से चाहे जितनी नखरेबाज दिखे, पर भीतर से उसका दिल बिल्कुल गंगाजल की तरह साफ है। वो मुझसे बहुत प्यार करती है, इसलिए जब उसे लगता है कि कोई उससे आगे निकल रहा है, तो वो बच्चों की तरह मुंह फुला लेती है। पर उसके मन में कोई खोट नहीं है। मेरे जाने के बाद तू ही उसकी माँ बनना विभा। कभी उसका मायका सूना मत होने देना। जब भी वो उदास हो, उसकी ढाल बन जाना।’ प्रियांशी, ननद और भाभी का रिश्ता दुनिया की नजरों में चाहे तकरार का माना जाता हो, पर माँ ने मुझे तुझे बेटी की तरह सौंप कर विदा लिया था। जब तू इस अवस्था में थी, तो मेरा फर्ज बनता था कि मैं तुझे मायके बुलाऊं। मुझे कई बार डर भी लगता था कि पता नहीं मैं माँ की तरह तेरा लाड़-दुलार कर पाऊंगी या नहीं, पर मैंने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी।”

“नहीं भाभी, बिल्कुल नहीं!” प्रियांशी ने विभा के गले में बाहें डालते हुए कहा, “चार दिन हो गए हैं मुझे यहाँ आए हुए। आप और भैया जिस तरह मेरी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रख रहे हैं, माँ होतीं तो शायद वो भी इतना ही करतीं। गर्भावस्था के इस दौर में मन कभी खट्टा खाने का करता है, तो कभी मीठा… और आप बिना मेरे बोले मेरी थाली में वो सब कुछ सजा देती हैं। माँ हमेशा मुझसे कहती थीं कि बेटा, अपनी भाभी का आदर करना सीख, उसमें कमियां निकालना बंद कर। वो पराए घर को छोड़कर तुम्हारे घर को अपना बनाने आई है, जब तू उसे प्यार देगी, तभी तो वो इस घर को मंदिर बनाएगी। आज मुझे माँ के एक-एक शब्द का मर्म समझ आ रहा है। आप कब मेरी भाभी से बढ़कर मेरी माँ बन गईं, मुझे पता ही नहीं चला। यह खून का रिश्ता नहीं था भाभी, यह आत्मा और दिल का रिश्ता है, जिसे आपने अपने त्याग और ममता से सींचा है।”

कमरे का माहौल बेहद भावुक हो उठा था। दोनों की आंखों से बहते आंसू अब दुख के नहीं, बल्कि वर्षों से जमी गलतफहमियों के पिघलने के आंसू थे।

तभी मुख्य दरवाजे की कुंडी खटखटाई और प्रियांशी के बड़े भाई देवांश हाथ में दो बड़े-बड़े दोने लिए भीतर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर वही पुरानी शरारत भरी मुस्कान थी।

“अरे वाह! यहाँ तो दोनों देवरानी-जेठानी… मेरा मतलब ननद-भाभी की पंचायत जमी हुई है!” देवांश ने दोने मेज पर रखते हुए चुटकी ली, “लो प्रियांशी, तुम्हारी खास गर्म जलेबी और मलाईदार रबड़ी! और सुन, तुझे जो कुछ भी खाना हो, बस एक बार इस भाई को हुक्म कर देना। ये विभा तो जब प्रेग्नेंट थी, इसने आधी रात को मुझे इमली और बर्फ का गोला लाने के लिए पूरे शहर में दौड़ाया था, नाक में दम कर दिया था! और एक तू है, जो गूंगों की तरह चुपचाप बैठी रहती है। वो तो हम दोनों तेरी पुरानी पसंद जानते हैं, इसलिए बिना मांगे ले आते हैं।”

देवांश की बात सुनकर प्रियांशी के चेहरे पर एक खिलखिलाती हुई धूप जैसी मुस्कान बिखर गई। उसने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “भैया, सच में मेरा मन तो बस आप दोनों के साथ बैठकर हंसने-बोलने का करता है। लेकिन हाँ, अगर कभी आधी रात को मेरा कुछ खाने का मन हुआ, तो मैं सीधे आपको ही जगाऊंगी, फिर ये मत कहना कि छोटी बहन बहुत नखरे दिखाती है!”

“अरे बिल्कुल नहीं मेरी गुड़िया!” देवांश ने बड़े लाड़ से प्रियांशी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तू इस घर की लाडली राजकुमारी है और राजकुमारी के हर हुक्म को पूरा करना इस भाई और तेरी इस भाभी का पहला कर्तव्य है।”

देवांश का यह फिल्मी अंदाज देखकर चिन्मय और तन्वी भी तालियां बजाकर हंसने लगे। पूरा आंगन बच्चों की खिलखिलाहट और बड़ों के ठहाकों से गूंज उठा। दीवार पर टंगी कौशल्या जी की तस्वीर मानो उस मुस्कुराहट को देखकर और भी ज्यादा जीवंत हो उठी थी, जैसे वे अपनी संतानों को एक सूत्र में बंधा देखकर स्वर्ग से आशीर्वाद बरसा रही हों।

प्रियांशी पूरे एक महीने अपने मायके में रही। यह एक महीना उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सुकून भरा दौर साबित हुआ। अब वह पहले वाली चिड़चिड़ी और असुरक्षित प्रियांशी नहीं थी, जो हर बात में शिकायतें ढूंढती थी। न ही अब उस घर में माँ थीं, जिनके सामने जाकर वह भाभी के खिलाफ शिकायतों का पिटारा खोलती। लेकिन अब उसे किसी शिकायत की जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि उसे भाभी के रूप में एक ऐसी सखी, एक ऐसी माँ मिल चुकी थी जो बिना कहे उसके दिल की हर धड़कन पढ़ लेती थी।

प्रियांशी यह भली-भांति समझ चुकी थी कि जीवन का यह सफर सचमुच लूडो के खेल जैसा ही होता है। कब कौन सा पासा उलटा पड़ जाए, कब कौन सी सीढ़ी आपको आसमान पर पहुंचा दे और कब कोई सांप आपको नीचे धकेल दे, यह कोई नहीं जानता। लेकिन अगर आपके साथ खेलने वाले खिलाड़ी आपके अपने हों, उनके दिलों में आपके लिए सच्चा प्यार और निस्वार्थ समर्पण हो, तो हार और जीत के मायने खत्म हो जाते हैं। तब सुख की धूप और दुख की छांव, दोनों ही बड़ी आसानी और सुकून से कट जाती हैं। क्योंकि दुनिया में खून के रिश्तों से भी बड़ा एक रिश्ता होता है—और वह होता है बिना किसी शर्त के निभाया जाने वाला ‘दिल का रिश्ता’।

अक्सर हमारे परिवारों में ननद और भाभी के रिश्ते को तकरार और ईर्ष्या का पर्याय मान लिया जाता है, लेकिन अगर एक हाथ ममता का बढ़े और दूसरा सम्मान का, तो वही रिश्ता माँ-बेटी से भी ज्यादा गहरा हो सकता है। क्या आपके अनुसार भी रिश्तों की मिठास बनाए रखने के लिए पुरानी कड़वाहटों को भूलकर एक-दूसरे को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश

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