राख से उठी उड़ान

“गलती सिर्फ वक्त की नहीं थी अनिका… कुछ चूक तुमसे हुई और बहुत बड़ी कायरता मुझसे,” समीर की भारी आवाज में बरसों का दर्द साफ छलक रहा था। “अगर उस दिन मैंने समाज और परिवार के तानों की परवाह किए बिना तुम्हारा हाथ थाम लिया होता, तो आज जिंदगी की यह तस्वीर कुछ और ही होती। मैं क्यों इतना कमजोर पड़ गया अपने फैसले पर?”

अनिका ने सामने रखे ठंडे हो चुके प्याले को छुआ और एक हल्की, मगर बेहद परिपक्व मुस्कान अपने होठों पर बिखेर दी। “समीर, जो लम्हे बीत गए, उन्हें कुरेदने से सिर्फ जख्म ताजे होते हैं, तकदीर नहीं बदलती। प्यार का मतलब केवल पा लेना या साथ रहना ही नहीं होता, कभी-कभी अपने प्रिय के स्वाभिमान और उसके वर्तमान का सम्मान करना भी प्यार ही है। तुम्हारी एक सुलझी हुई गृहस्थी है, दो प्यारे बच्चे हैं। उन बच्चों को केवल अच्छी तालीम ही मत देना, बल्कि उनके सपनों और उनके फैसलों को वह आजादी भी देना जो हमें कभी नहीं मिली। अब मुझे निकलना होगा, मेरी अगली मीटिंग का वक्त हो रहा है।”

समीर की आंखों में एक अनकही तड़प थी। उसने धीमे स्वर में पूछा, “क्या हम फिर कभी इस तरह नहीं मिल सकते?”

अनिका ने पूरी दृढ़ता के साथ अपना सिर हिलाया। “नहीं समीर, अब व्यक्तिगत रूप से इस तरह मिलना सही नहीं होगा। मैं तुम्हारी पत्नी की नजरों में किसी ऐसी औरत की छवि नहीं बनना चाहती जो किसी का बसा-बसाया संसार हिला दे। तुम्हें भी अपने उस रिश्ते का पूरा आदर करना चाहिए जो आज तुम्हारी ताकत है।”

उस कैफे की मेज पर आमने-सामने बैठे ये दो चेहरे कभी अपने विश्वविद्यालय के सबसे चर्चित और होनहार साथी हुआ करते थे। दोनों का सपना एक जैसा था, सोच एक जैसी थी और दोनों एक-दूसरे की सांसों की तरह करीब थे। कॉलेज का हर कोना उनकी मासूम हंसी और बड़े-बड़े ख्वाबों का गवाह था। पर शायद वक्त को उनकी यह साझी उड़ान रास नहीं आई।

अनिका ने उसी शाम अपने विभाग में राज्य के दूसरे जिले में स्थानांतरण का आवेदन जमा कर दिया। वह भली-भांति जानती थी कि एक ही शहर में रहते हुए अतीत के साए से पूरी तरह मुक्त होना आसान नहीं होता। जब वह अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी ठंडी हवा को महसूस कर रही थी, तब बरसों पुरानी यादें किसी चलचित्र की मानिंद उसकी आंखों के सामने तैरने लगीं।

विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी होते ही अनिका और समीर दोनों ने संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी में अपनी पूरी जान झोंक दी थी। दोनों का लक्ष्य प्रशासनिक सेवा में जाकर समाज के लिए कुछ सार्थक करने का था। लेकिन अनिका का परिवार एक पारंपरिक और बेहद संकीर्ण सोच वाला मध्यवर्गीय परिवार था। अनिका के पिता और बड़े भाइयों का मानना था कि लड़कियों के लिए ज्यादा पढ़ना-लिखना सिर्फ समय की बर्बादी है और उम्र रहते उसके हाथ पीले कर देना ही खानदान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

घर में जब अनिका के रिश्ते तलाशे जाने लगे, तो उसने हाथ जोड़कर अपने माता-पिता से सिर्फ दो साल का वक्त मांगा था। उसने कहा था कि वह अपनी काबिलियत साबित करना चाहती है, पर उसकी पढ़ाई और उसके सपनों को घर की मर्यादा के सामने तुच्छ समझ लिया गया। परिस्थितियां जब हाथ से निकलने लगीं, तो समीर खुद अनिका के घर पहुंचा था। उसने अनिका के पिता के सामने सिर झुकाकर पूरी विनम्रता से कहा था कि वह परीक्षा के शुरुआती दो चरण पास कर चुका है और अंतिम साक्षात्कार की तैयारी में है। उसने हाथ जोड़कर केवल एक वर्ष का समय मांगा था।

पर अनिका के परिजनों की नजर में एक संघर्षरत, बेरोजगार युवक कभी एक योग्य दामाद नहीं बन सकता था। उन्होंने समीर को बेहद अपमानित करके घर से निकाल दिया। उस दिन समीर ने अनिका से कहा था, “अनिका, चलो हम आज ही अदालत चलकर शादी कर लेते हैं। हम दोनों बालिग हैं, समझदार हैं और अपनी जिंदगी की राह खुद बना सकते हैं।”

किंतु अनिका उस मोड़ पर अपने ही संस्कारों के जाल में उलझ गई थी। जिस मां-बाप ने चौबीस बरस तक उंगली पकड़कर पाला, उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर वह खुद को स्वार्थी नहीं साबित कर सकी। उसने सोचा कि दिल के रिश्ते के लिए वह खून के रिश्ते की बलि कैसे चढ़ा दे। उसने समीर का हाथ छोड़ दिया और अपने आंसुओं को पीते हुए घर वालों के फैसले के आगे सिर झुका दिया।

यहीं से उस सुनहरे ख्वाब का अंत हो गया और एक भयानक दुस्वप्न की शुरुआत हुई। अनिका के पिता ने बिना किसी ठोस जांच-पड़ताल के, सिर्फ लड़के की कथित पैतृक संपत्ति और चमक-दमक देखकर उसका विवाह इंदौर के एक संपन्न व्यापारी परिवार के बेटे कुणाल से तय कर दिया। शादी के पहले ही हफ्ते में अनिका पर यह हकीकत बिजली बनकर गिरी कि दौलत के बड़े-बड़े अंबार इंसानी संस्कारों और संवेदनशीलता का विकल्प नहीं हो सकते।

कुणाल स्वभाव से बेहद अहंकारी, शक्की और गुस्सैल था। खुद कम पढ़ा-लिखा होने की हीनभावना उसे अनिका की योग्यता और बुद्धिमत्ता देखकर और ज्यादा कचोटती थी। वह बात-बात पर अनिका को नीचा दिखाता और अपने पुरुषवादी दंभ को शांत करने के लिए उस पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार करता। जब अनिका ने अपनी मां से फोन पर रोते हुए अपने हालात बयां किए, तो मां का ठंडा और रूखा जवाब आया, “बेटी, ससुराल ही औरत का असली घर होता है। चारदीवारी के भीतर थोड़ा-बहुत क्लेश हर घर में होता है, थोड़ा बर्दाश्त करना सीखो। समाज क्या कहेगा?”

वे अपने झूठे पारिवारिक मान के पीछे अपनी ही बेटी की तिल-तिल कर घुटती हुई रूह को नहीं देख पा रहे थे। अनिका हर रात आंसुओं के समंदर में डूबती और हर सुबह एक जिंदा लाश बनकर उठती। वह लगातार अपमान और प्रताड़ना के उस चक्रव्यूह में पिसती रही, जहां उसकी पहचान, उसका आत्मविश्वास और उसका आत्मसम्मान सब कुछ कुचला जा रहा था।

लेकिन हर इंसान के सब्र का एक आखिरी छोर होता है। एक रात जब कुणाल ने अकारण ही हिंसक होकर उस पर हाथ उठाया, तो उस क्षण अनिका के भीतर कुछ हमेशा के लिए टूट गया और उसी टूटे हुए टुकड़े से एक असीम शक्ति का जन्म हुआ। उसने तय कर लिया कि अब और नहीं। अगली सुबह, अपने बदन और अंतरात्मा पर गहरे घाव लिए, वह उस घर की दहलीज लांघकर बाहर आ गई।

जब वह मायके की चौखट पर पहुंची, तो वहां भी उसे सांत्वना नहीं, बल्कि उलाहने मिले। पिता ने कहा कि खानदान की नाक कट गई और मां ने नसीहत दी, “पति तो परमेश्वर का रूप होता है अनिका, अगर कभी गुस्से में हाथ उठ भी गया तो क्या हुआ? औरत को ही झुकना पड़ता है।”

उस दिन अनिका की आंखों से आंसुओं की जगह अंगारे बरस पड़े। उसने भरी आवाज में कहा, “अगर परमेश्वर ऐसा क्रूर और अत्याचारी होता है, तो मुझे ऐसे किसी परमेश्वर की बंदगी नहीं करनी! जो इंसान एक औरत के मान-सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता, वह मेरे लिए कुछ भी नहीं है।”

अगले ही पल अनिका ने उस मायके के दरवाजे को भी सदा के लिए पीछे छोड़ दिया, जिसने उसे सहारा देने के बजाय जिंदा दफन करने की सलाह दी थी। दोनों ही घरों के किवाड़ उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके थे। सड़क पर अकेली खड़ी अनिका के पास न कोई ठिकाना था, न सिर छुपाने की जगह। उस रात उसने खुद को कोसते हुए सोचा था कि काश उसने सही समय पर सही फैसला लिया होता, काश उसने समीर का हाथ थाम लिया होता जो आज एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपनी कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाना जाता था और जिसका विवाह बाद में उसकी ही एक सहकर्मी स्निग्धा से हो चुका था।

लेकिन अनिका ने आंसुओं की नदी में बह जाने के बजाय उस दर्द को अपनी ताकत बनाने की ठानी। उसने एक छोटे से हॉस्टल में शरण ली और दिन में एक स्कूल में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी। रात के सन्नाटे में, जब पूरी दुनिया सोती थी, अनिका टेबल लैंप की मद्धिम रोशनी में अपनी अधूरी छोड़ी किताबों के पन्ने पलटती। उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था, लेकिन पाने के लिए उसका खोया हुआ आत्मसम्मान था।

दिन-रात की अनथक मेहनत, आंसुओं से सींची गई तपस्या और अडिग संकल्प आखिरकार रंग लाए। दो वर्षों की कठिन साधना के बाद अनिका ने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में न केवल सफलता प्राप्त की, बल्कि पूरे राज्य में शीर्ष स्थान हासिल किया। वह दिन उसकी नई पहचान का दिन था। वह अब किसी की प्रताड़ित पत्नी या किसी रूढ़िवादी परिवार की मजबूर बेटी नहीं थी, बल्कि अपने जिले की एक स्वाभिमानी, स्वतंत्र और सशक्त महिला अधिकारी थी।

सालों बाद जब एक आधिकारिक बैठक के सिलसिले में समीर और अनिका का आमना-सामना हुआ, तो वे दोनों एक-दूसरे की स्थिति और मर्यादा को भली-भांति समझ चुके थे। उस कैफे की मुलाकात में कोई गिला-शिकवा नहीं था, बल्कि बीते हुए कल को अलविदा कहकर आगे बढ़ने की एक मूक सहमति थी।

स्थानांतरण के बाद अनिका अपने नए कार्यक्षेत्र में पूरी निष्ठा के साथ जुट गई। उसने विशेष रूप से घरेलू हिंसा, बालिकाओं की शिक्षा और महिलाओं के कानूनी अधिकारों के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया। वह हर उस महिला के लिए ढाल बनकर खड़ी हुई जो समाज के डर से अत्याचार सहने को मजबूर थी। अपने काम के माध्यम से उसने सैकड़ों टूटी हुई जिंदगियों को एक नया हौसला और नई राह दिखाई।

अनिका ने समाज को यह साबित कर दिखाया कि एक औरत का जीवन किसी पुरुष की छत्रछाया या किसी चौखट की मोहताज नहीं होता। रिश्ते जब घुटन और हिंसा बन जाएं, तो उनसे बाहर निकलना कोई गुनाह नहीं, बल्कि खुद के अस्तित्व की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है। उसने अपने टूटे हुए दिल और बिखरे हुए सपनों को जोड़कर एक ऐसा मुकाम हासिल किया था, जहां से वह हजारों बेसहारा आंखों को जीने की रोशनी दे रही थी।

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अक्सर हमारे समाज में बेटियों को सहने और समझौते करने की तालीम तो दी जाती है, लेकिन अपने स्वाभिमान के लिए खड़े होने का हौसला नहीं दिया जाता। क्या आपको लगता है कि समाज और परिवार के झूठे मान-सम्मान के लिए किसी बेटी को घुट-घुट कर जीने पर मजबूर करना सही है? क्या अनिका का फैसला सही था? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

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