वंदना जी ने एक गहरी साँस ली और दोनों बेटों की आँखों में आँखें डालकर कहा, “बेटों का ख्याल था, तभी तो तुम्हारे बाबूजी ने अपनी जवानी की हर खुशी कुचलकर तुम्हें इस काबिल बनाया कि आज तुम दोनों लाखों में कमा रहे हो, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हो। माता-पिता का फ़र्ज़ बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करना होता है, उनके जीवन भर के लालच का बोझ ढोना नहीं। यह घर तुम्हारे बाबूजी ने अपने खून-पसीने से सींचा था, तुम लोगों ने नहीं। तुम दोनों ने तो इस घर को सिर्फ़ एक तिजोरी समझा, जिसे तोड़कर तुम अपनी ख्वाहिशें पूरी करना चाहते थे। पर मेरे लिए यह घर मेरे पति की आत्मा है।”
“माँ, इसमें ग़लत क्या है? अगर बाबूजी अपने जीते-जी कायदे से वसीयत लिखकर चले जाते, तो आज हमें यूँ आपके सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता! आज अमन को अपने नए क्लिनिक के लिए पैसों की ज़रूरत है, इसलिए वह अपना हिस्सा माँग रहा है। कल को मुझे अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए पैसों की दरकार होगी, तब मैं किसके पास जाऊँगा? आप पालमपुर के उस सुनसान कोने में बैठकर यह नहीं समझ सकतीं कि दिल्ली और गुड़गाँव जैसे महानगरों में स्टेटस मेंटेन करना और बच्चों को पालना कितना महँगा हो गया है। आप बस अपनी ज़िद पकड़कर उस पुराने खंडहर से चिपकी रहिए!”
वंदना जी ने भीगी पलकों और रुँधे गले से समझाने की बहुत कोशिश की थी, “नीरज बेटा, क्या अपने पुरखों की छत और तुम्हारे बाबूजी के सपनों का यह आशियाना बेच देने से तुम दोनों भाइयों की ज़िंदगी की सारी ज़रूरतें हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएँगी?”
“हमेशा के लिए न सही माँ, पर आज जो हमारे सिर पर कर्ज़ और ज़रूरतों का पहाड़ खड़ा है, वह तो उतर जाएगा! ख़ैर, छोड़िए… आपसे बहस करना ही बेकार है। आपको तो बस अपने उस बाग़ीचे और पत्थरों के मकान से प्यार है, अपनी औलादों की परेशानियों से नहीं। हम खुद देख लेंगे कि हमें क्या करना है!” और इसके साथ ही नीरज ने झटके से फ़ोन काट दिया था।
वंदना जी ने धीरे से रिसीवर को क्रेडल पर रखा। उनके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी। वे लड़खड़ाते कदमों से बैठक के उस कोने में पहुँचीं, जहाँ दीवार पर उनके स्वर्गीय पति मनोहर जी की एक बड़ी सी तस्वीर टँगी थी। तस्वीर पर चढ़ी चंदन की माला से आती भीनी-भीनी खुशबू आज उन्हें सुकून नहीं, बल्कि एक अजीब सी घुटन दे रही थी।
वे तस्वीर के सामने पड़ी आरामकुर्सी पर ढह-सी गईं और उनके बाँध से रुके हुए आँसू गालों पर लुढ़क आए। उन्होंने काँपते हाथों से अपने चश्मे को उतारा और मनोहर जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर को एकटक देखती रहीं।
“देख रहे हैं आप?” वंदना जी ने सिसकते हुए उस बेजान तस्वीर से शिकायत की, जैसे मनोहर जी अभी बोल पड़ेंगे। “कितना गुमान था आपको अपने इन दोनों हीरों पर! जब भी मैं कहती थी कि बुढ़ापे के लिए कुछ अलग से बचाकर रखिए, तो आप यही कहते थे न कि ‘वंदना, हमारे दोनों बेटे ही हमारी सबसे बड़ी जमा-पूंजी हैं, हमारी असली दौलत हैं। वे कभी तुम्हें अकेला नहीं पड़ने देंगे।’ आज देखिए अपनी उस अनमोल पूंजी का रंग! आपकी चिता की राख अभी ठीक से ठंडी भी नहीं हुई है और दोनों भाइयों को इस घर की ईंटों में सिर्फ़ नोटों की गड्डियाँ नज़र आने लगी हैं।”
वंदना जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछे और खिड़की के बाहर फैले उस विशाल आँगन को निहारने लगीं। अतीत की अनगिनत यादें किसी चलचित्र की तरह उनकी आँखों के सामने तैरने लगीं।
मनोहर जी वन विभाग में एक उच्च अधिकारी थे। अपनी पूरी नौकरी के दौरान उन्होंने जंगलों, पहाड़ों और प्रकृति के बीच वक़्त गुज़ारा था। उन्हें शहरों की भीड़-भाड़, धुएँ और कंक्रीट के जंगलों से हमेशा चिढ़ रही। उनका एक ही सपना था कि रिटायरमेंट के बाद वे प्रकृति की गोद में एक ऐसा घर बनाएँगे, जहाँ सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नींद खुले, आँगन में सेब, आड़ू और खुबानी के पेड़ हों, और घर के पीछे एक छोटी सी क्यारी हो जहाँ वे अपने हाथों से सब्ज़ियाँ उगा सकें।
अपनी ज़िंदगी भर की पाई-पाई जोड़कर, यहाँ तक कि प्रोविडेंट फंड का एक बड़ा हिस्सा लगाकर, मनोहर जी ने पालमपुर की इस शांत घाटी में ज़मीन का यह टुकड़ा खरीदा था और खुद खड़े होकर एक-एक पत्थर जुड़वाया था। जब यह घर बनकर तैयार हुआ था, तो मनोहर जी ने किसी छोटे बच्चे की तरह पूरे घर में दौड़कर वंदना जी का हाथ थामा था और कहा था, “वंदना, यह सिर्फ़ मकान नहीं है, यह हमारे बुढ़ापे का स्वर्ग है। यहाँ हमारे बच्चे और फिर उनके बच्चे आकर खेलेंगे।”
वंदना जी और मनोहर जी ने अपनी खुशियों और ज़रूरतों में कटौती करके दोनों बेटों—नीरज और अमन—को बेहतरीन शिक्षा दिलाई थी। कभी उन्हें यह एहसास तक नहीं होने दिया कि घर का बजट कैसे चलता है। बड़े बेटे नीरज को देश के नामी कॉलेज से आईटी इंजीनियर बनाया और छोटे बेटे अमन को डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए बड़े शहर भेजा।
पढ़ाई पूरी होते ही दोनों बेटों को बड़े शहरों में ऊँचे पैकेज वाली नौकरियाँ मिल गईं। समय रहते दोनों की धूमधाम से शादियाँ भी कर दी गईं। नीरज की पत्नी सोनिया और अमन की पत्नी ऋचा, दोनों ही आधुनिक विचारों वाली और बड़े शहरों की चकाचौंध में पली-बढ़ी लड़कियाँ थीं। शुरू-शुरू में तो दोनों बेटे साल में दो-तीन बार त्योहारों या गर्मियों की छुट्टियों में पालमपुर आ जाया करते थे। जब वे अपने बच्चों के साथ आते, तो ‘आशीर्वाद’ का सूना आँगन किलकारियों से गूँज उठता। मनोहर जी अपने पोते-पोतियों को कंधे पर बिठाकर पूरे बाग़ीचे की सैर कराते और वंदना जी रसोई में तरह-तरह के पकवान बनाते नहीं थकतीं।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, बेटों के आने का सिलसिला कम होता गया। पहले साल में एक बार, फिर दो साल में एक बार, और फिर बात सिर्फ़ फ़ोन कॉल और वीडियो कॉल तक सिमट कर रह गई। बहाना हमेशा एक ही होता—”माँ, काम का बहुत प्रेशर है, बच्चों के स्कूल हैं, छुट्टियाँ ही नहीं मिलतीं।”
मनोहर जी ऊपर से तो मुस्कुराकर कह देते कि बच्चे अपनी ज़िंदगी में तरक्की कर रहे हैं, यही बहुत है; पर वंदना जी जानती थीं कि हर दिवाली और होली पर जब मुख्य द्वार की कुंडी नहीं खटकती थी, तो मनोहर जी के भीतर कुछ टूटता था। वे घंटों बगीचे में अकेले बैठे रहते।
उम्र की ढलान के साथ मनोहर जी का शरीर भी जवाब देने लगा था। पिछले साल सर्दियों की एक सुबह, जब वे हमेशा की तरह अपने सेब के पेड़ों की छंटाई कर रहे थे, अचानक उनके सीने में तेज़ शूल उठा। वंदना जी जब तक पड़ोसियों की मदद से उन्हें अस्पताल ले जातीं, तब तक मनोहर जी ने वंदना जी के हाथों में ही दम तोड़ दिया। बिना किसी शिकायत के, बिना किसी को सेवा का मौका दिए, वे अपनी जीवनसंगिनी को इस भरी दुनिया में अकेला छोड़कर चले गए।
पिता के अंतिम संस्कार पर जब नीरज और अमन परिवार सहित आए, तो घर में शोक से ज़्यादा एक अजीब सी औपचारिकता का माहौल था। तेरहवीं की रस्म पूरी होते ही, चौदहवें दिन की सुबह जब वंदना जी पूजा घर में दीया जला रही थीं, तभी दोनों बेटों ने अपनी पत्नियों के इशारे पर अपना असली मकसद सामने रख दिया था।
छोटे बेटे अमन ने कहा था, “माँ, अब आप इतने बड़े घर में अकेले कैसे रहेंगी? हमारी मानिए तो इस प्रॉपर्टी को बेच देते हैं। आजकल पहाड़ों में ज़मीन के दाम आसमान छू रहे हैं। कोई भी बड़ा होटल ग्रुप या बिल्डर इसके मुँहमाँगे दाम दे देगा। पैसे हम दोनों भाई आधा-आधा बाँट लेंगे और आप छह महीने मेरे पास और छह महीने नीरज भैया के पास रह लिया कीजिएगा।”
उस दिन वंदना जी को लगा था जैसे किसी ने उनके कलेजे पर हथौड़ा मार दिया हो। छह महीने यहाँ, छह महीने वहाँ… यानी अपने ही घर की मालकिन को अब बेटों के घरों में एक मेहमान या किसी सामान की तरह बारी-बारी से रखा जाएगा!
उन्होंने उसी दिन कठोर स्वर में मना कर दिया था, “जब तक मेरी साँस चल रही है, यह घर नहीं बिकेगा। यहाँ तुम्हारे बाबूजी की साँसें बसी हैं, उनकी यादें हैं। मैं अपनी जड़ें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”
तब तो दोनों बेटे मुँह फुलाकर वापस लौट गए थे, पर पिछले छह महीनों से वे लगातार वंदना जी पर मानसिक दबाव बना रहे थे। कल अमन ने फ़ोन करके साफ़ कह दिया कि उसे अपने मल्टी-स्पेशलिटी क्लिनिक के लिए पचास लाख रुपयों की ज़रूरत है और उसे इस पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा चाहिए। और आज बड़े बेटे नीरज ने भी अमन के सुर में सुर मिलाते हुए बाबूजी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
रात के दस बज रहे थे। पूरे घर में घड़ी की टिक-टिक के अलावा कोई आवाज़ नहीं थी। वंदना जी बहुत देर तक मनोहर जी की तस्वीर को निहारती रहीं। रोते-रोते उनकी आँखें सूज चुकी थीं, पर अचानक उनकी नज़र तस्वीर के नीचे रखे उस छोटे से लकड़ी के संदूक पर पड़ी, जिसमें मनोहर जी अपनी डायरियाँ और ज़रूरी काग़ज़ात रखते थे।
वंदना जी उठीं और उन्होंने काँपते हाथों से वह संदूक खोला। उसमें मनोहर जी की एक पुरानी, चमड़े की जिल्द वाली डायरी रखी थी। उन्होंने डायरी के पन्ने पलटे। उसमें मनोहर जी ने अपने रिटायरमेंट के बाद के कई विचार लिखे थे। एक पन्ने पर उनकी नज़र ठहर गई। वहाँ मनोहर जी की सुंदर लिखावट में लिखा था—
“मेरा हमेशा से यह सपना रहा है कि पहाड़ के जिन गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है, या जिन बुजुर्गों और महिलाओं के पास स्वरोज़गार का कोई साधन नहीं है, उनके लिए मैं कुछ कर सकूँ। मैंने अपने दोनों बेटों को तो काबिल बना दिया, अब मेरी इच्छा है कि अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अपने इस बाग़ीचे के एक हिस्से में गाँव के बच्चों के लिए एक पुस्तकालय और कौशल केंद्र शुरू करूँ, ताकि मेरे जाने के बाद भी यह घर वीरान न हो, बल्कि इसमें हमेशा ज़िंदगी मुस्कुराती रहे।”
डायरी की उन पंक्तियों को पढ़ते ही वंदना जी के चेहरे से लाचारी और दुख के सारे बादल छँट गए। उनकी झुर्रियों भरे चेहरे पर एक अद्भुत, शांत और दृढ़ मुस्कान खिल उठी। उनके भीतर की वह डरी-सहमी, अकेली औरत जैसे अचानक किसी फौलाद में बदल गई थी। उन्होंने मन ही मन कहा, “आप चिंता मत कीजिए जी… आपने जो सपना देखा था, उसे मैं अधूरा नहीं रहने दूँगी। आपकी इस धरोहर को किसी बिल्डर के हाथों की कठपुतली नहीं बनने दूँगी।”
अगली सुबह जब पालमपुर की पहाड़ियों पर सूरज की पहली सुनहरी किरण पड़ी, तो वंदना जी ने हमेशा की तरह उदास होकर चाय नहीं पी। उन्होंने स्नान किया, साफ-सुथरी सूती साड़ी पहनी, अलमारी की तिजोरी से घर के मूल काग़ज़ात और मनोहर जी की वसीयत—जिसमें उन्होंने जीते-जी सारी संपत्ति का एकमात्र अधिकार अपनी पत्नी वंदना को दिया था—निकाली और एक फ़ाइल में रखकर अपने पुराने पारिवारिक वकील, वर्मा जी के दफ़्तर की ओर निकल पड़ीं।
इसके बाद के तीन महीने वंदना जी के जीवन के सबसे व्यस्त और ऊर्जावान महीने थे। उन्होंने न तो नीरज को फ़ोन किया और न ही अमन के किसी मैसेज का जवाब दिया। दोनों बेटों को लगा कि माँ शायद गुस्से में हैं और कुछ दिनों में अकेलेपन से घबराकर खुद ही घुटने टेक देंगी।
तीन महीने बाद, बसंत पंचमी के शुभ दिन पर, ‘आशीर्वाद’ बंगले के बाहर काफी चहल-पहल थी। पूरे बंगले को गेंदे के फूलों और आम के पत्तों से सजाया गया था। गाँव के सरपंच, स्थानीय स्कूल के अध्यापक, आस-पड़ोस के दर्जनों लोग और नन्हे-मुन्ने बच्चे साफ़-सुथरे कपड़े पहने आँगन में जमा थे।
ठीक उसी समय, मुख्य द्वार के बाहर एक बड़ी सी लग्ज़री कार आकर रुकी। कार से नीरज और अमन अपनी-अपनी पत्नियों के साथ नीचे उतरे। दरअसल, उन्हें अपने किसी पुराने परिचित से भनक लगी थी कि माँ घर में कुछ बड़ा बदलाव कर रही हैं और कुछ काग़ज़ी कार्रवाई चल रही है। दोनों भाई इस उम्मीद और आशंका के साथ भागे-भागे आए थे कि कहीं माँ अकेले ही घर का सौदा न कर रही हों।
लेकिन जैसे ही उन्होंने गेट के भीतर कदम रखा, उनके कदम वहीं के वहीं जम गए। मुख्य द्वार के ऊपर लगे पुराने नेमप्लेट की जगह पीतल का एक विशाल, चमकता हुआ बोर्ड लगा था, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— ‘मनोहर स्मृति बाल विद्या एवं ग्रामोत्थान केंद्र’।
आँगन के जिस हिस्से में कभी सन्नाटा पसरा रहता था, वहाँ आज लकड़ी की छोटी-छोटी मेजें और कुर्सियाँ लगी थीं, जहाँ गाँव के तीस-चालीस बच्चे किताबें और रंगीन पेंसिलें लिए चहक रहे थे। बरामदे के एक हिस्से में सिलाई मशीनें और पहाड़ी ऊन से बुनाई करने के करघे लगे थे, जहाँ गाँव की कुछ महिलाएँ काम सीख रही थीं। और बीचों-बीच वंदना जी, चेहरे पर एक अपूर्व तेज और संतोष की मुस्कान लिए, बच्चों को मिठाइयाँ बाँट रही थीं।
नीरज और अमन हक्के-बक्के से यह सब देख रहे थे। नीरज से रहा नहीं गया, वह भीड़ को चीरता हुआ अपनी माँ के पास पहुँचा और दबी लेकिन तमतमाई हुई आवाज़ में बोला, “माँ! यह सब क्या तमाशा है? आपने इस घर को धर्मशाला क्यों बना दिया है? और यह बाहर किस चीज़ का बोर्ड लगा है?”
वंदना जी ने बहुत शांत भाव से बच्चों के सिर पर हाथ फेरा और फिर अपने दोनों बेटों और बहुओं को लेकर घर के भीतरी कमरे में आईं।
अमन ने गुस्से और घबराहट में पूछा, “माँ, हमने सुना है कि आपने वकील के ज़रिए कुछ काग़ज़ात बनवाए हैं? आपने हमसे पूछे बिना क्या किया है?”
वंदना जी ने मेज पर रखी एक कानूनी फ़ाइल उठाई और दोनों बेटों के सामने रख दी। उनकी आवाज़ में आज न तो कोई कंपन था और न ही कोई आँसू।
“हाँ अमन, मैंने काग़ज़ात बनवा लिए हैं,” वंदना जी ने अडिग स्वर में कहा। “मैंने इस पूरे घर, इस बाग़ीचे और तुम्हारे बाबूजी की जमा-पूंजी को एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के नाम कर दिया है। आज से यह घर एक ट्रस्ट की संपत्ति है, जहाँ गाँव के गरीब बच्चों को मुफ़्त शिक्षा मिलेगी और बेसहारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का हुनर सिखाया जाएगा। मेरे जीते-जी मैं इस ट्रस्ट की मुख्य संरक्षक रहूँगी, और मेरे बाद गाँव की समिति इसे चलाएगी। अब इस संपत्ति को दुनिया की कोई भी ताकत न तो बेच सकती है और न ही इसका बँटवारा कर सकती है।”
यह सुनते ही नीरज, अमन और उनकी पत्नियों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सोनिया ने तपाक से कहा, “माँजी, यह आपने क्या किया? करोड़ों की प्रॉपर्टी आपने यूँ ही दान कर दी? अपने सगे बेटों और पोते-पोतियों का भी ख्याल नहीं आया आपको?”
वंदना जी ने एक गहरी साँस ली और दोनों बेटों की आँखों में आँखें डालकर कहा, “बेटों का ख्याल था, तभी तो तुम्हारे बाबूजी ने अपनी जवानी की हर खुशी कुचलकर तुम्हें इस काबिल बनाया कि आज तुम दोनों लाखों में कमा रहे हो, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हो। माता-पिता का फ़र्ज़ बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करना होता है, उनके जीवन भर के लालच का बोझ ढोना नहीं। यह घर तुम्हारे बाबूजी ने अपने खून-पसीने से सींचा था, तुम लोगों ने नहीं। तुम दोनों ने तो इस घर को सिर्फ़ एक तिजोरी समझा, जिसे तोड़कर तुम अपनी ख्वाहिशें पूरी करना चाहते थे। पर मेरे लिए यह घर मेरे पति की आत्मा है।”
वंदना जी ने खिड़की से बाहर खेलते हुए बच्चों की तरफ़ इशारा किया, “तुम लोग कहते थे न कि मैं इतने बड़े घर में अकेले कैसे रहूँगी? देखो बाहर… अब मैं अकेली नहीं हूँ। अब इस आँगन में रोज़ पचास बच्चों की किलकारियाँ गूँजेंगी। गाँव की ये बेटियाँ और महिलाएँ ही अब मेरा परिवार हैं। तुम्हारे बाबूजी का यही सपना था कि यह घर हमेशा गुलज़ार रहे। उन्होंने अपने पिता होने का धर्म पूरी निष्ठा से निभाया था, और आज उनके सपने को साकार करके मैंने अपनी पत्नी होने का धर्म पूरा किया है।”
नीरज और अमन के पास कहने के लिए एक शब्द भी नहीं बचा था। उनके सिर शर्म से झुक गए थे। जिस माँ को वे एक अबला, भावुक और उन पर आश्रित बुजुर्ग समझ रहे थे, वह आज उनके सामने हिमालय की तरह अडिग और स्वाभिमानी बनकर खड़ी थी।
तभी बाहर से कुछ नन्हे बच्चे दौड़ते हुए अंदर आए और वंदना जी की साड़ी का पल्लू पकड़कर बोले, “दादी माँ, चलिए न! अब कहानी सुनाने का समय हो गया है!”
वंदना जी के चेहरे पर एक निश्चल मुस्कान तैर गई। उन्होंने बच्चों का हाथ थामा और अपने बेटों की तरफ़ देखे बिना ही बाहर आँगन की सुनहरी धूप में निकल गईं। उनके पीछे खड़े दोनों बेटों को आज समझ आ चुका था कि दौलत से मकान तो खरीदे जा सकते हैं, पर माँ का आशीर्वाद और पिता की विरासत केवल सेवा और संस्कारों से ही मिलती है। जीवन की इस सांझ में वंदना जी ने अपने अकेलेपन को अपनी कमज़ोरी नहीं, बल्कि सैकड़ों जिंदगियों को रोशन करने की ताकत बना लिया था।
दोस्तों, वंदना जी के इस साहसी फैसले पर आपकी क्या राय है? क्या माता-पिता की संपत्ति पर उन औलादों का कोई हक होना चाहिए, जो बुढ़ापे में अपने ही माँ-बाप के जज़्बातों और उनकी यादों का सौदा करने पर उतर आते हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
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