फर्ज की नींव

नीलिमा की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उसने हकबकाते हुए कहा, “इ… इस्तीफा? नौकरी छोड़नी होगी? आपका दिमाग तो ठीक है आकाश? आप यह क्या बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं? अगर आप यह नौकरी छोड़ देंगे तो कमाएंगे क्या? खाएंगे क्या? हमारे बच्चे की परवरिश कैसे होगी? हम सड़क पर आ जाएंगे!”

आकाश ने अत्यंत शांत स्वर में कहा, “यही तो मैं तुम्हें समझाना चाह रहा हूं नीलिमा। जिस नौकरी के रोब पर, जिस वेतन के घमंड में तुम आज यह कह रही हो कि मैं कमाने वाला अकेला हूं और बाकी सब मुझ पर बोझ हैं, क्या तुम भूल गई कि यह नौकरी मुझे मिली कैसे थी?”

 कमरे के आईने के सामने खड़े होकर आकाश अपने दफ्तर के लिए टाई की गांठ कस रहा था। तभी दरवाजे की चौखट पर एक धीमी सी आहट हुई।

आकाश ने पलटकर देखा तो मां यशोदा जी हाथ में अपने चश्मे का एक टूटा हुआ फ्रेम लिए खड़ी थीं। उनकी आंखों में उम्र की धुंधली लकीरें थीं, मगर चेहरे पर वही ममतामयी मुस्कान बिखरी हुई थी जिसने इस पूरे घर को हर मुश्किल में संभाले रखा था।

“बेटा आकाश! जरा देखना, कल रात दवा की शीशी ढूंढते वक्त हाथ लग गया और चश्मे की कमानी चटक गई। तू तो जानता ही है, बिना चश्मे के मुझे अखबार के अक्षर भी चींटियों जैसे दिखते हैं। अगर तेरे पास वक्त हो तो लौटते हुए इसे बाजार में किसी दुकान पर दिखाता लाना।” यशोदा जी ने बेहद संकोच के साथ वह चश्मा मेज पर रख दिया।

आकाश ने तुरंत अपनी टाई को ठीक करना छोड़ा, आगे बढ़कर मां के हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और चश्मा उठाकर अपनी जेब में सहेजते हुए बोला, “अरे मां, इसमें पूछने वाली क्या बात है? शाम को दफ्तर से आते वक्त मैं इसे नया ही बनवा लाऊंगा। वैसे भी यह फ्रेम काफी पुराना हो चुका था। तुम बस दोपहर में आराम करना, बिना चश्मे के सिलाई-कढ़ाई करने मत बैठ जाना।”

यशोदा जी के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान तैर गई। वे सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद देती हुई अपने कमरे की तरफ बढ़ गईं।

आकाश अभी अपनी कलाई पर घड़ी बांध ही रहा था कि कॉलेज का भारी-भरकम बैग कंधे पर लटकाए उसकी छोटी बहन रिया तेजी से कमरे में दाखिल हुई। रिया के चेहरे पर हल्की सी घबराहट और उलझन साफ नजर आ रही थी। वह अपनी उंगलियां मरोड़ते हुए बोली, “भैया… वो… कॉलेज के सेमेस्टर की फीस जमा करने की कल आखिरी तारीख है। अगर कल दोपहर तक ड्राफ्ट जमा नहीं हुआ तो फाइन लग जाएगा। मैं दो दिनों से कहने की सोच रही थी पर आप काम में इतने उलझे थे कि…”

रिया की बात पूरी होने से पहले ही आकाश खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसने अपनी जेब से एक मुड़ी हुई रसीद निकाली और रिया के हाथ में थमा दी।

“तू भी ना रिया, बिल्कुल बुद्धू की बुद्धू ही रहेगी! तुझे क्या लगता है कि तेरा यह बड़ा भाई अपनी गुड़िया की पढ़ाई की तारीख भूल जाएगा? कल ही लंच टाइम में जाकर मैंने तेरी पूरी फीस ऑनलाइन ट्रांसफर कर दी थी और रसीद भी ले ली थी। यह ले, इसे अपने फॉर्म के साथ नत्थी कर देना और पूरी लगन से पढ़ाई कर। बाकी सारी चिंताएं मुझ पर छोड़ दे।”

रिया ने जब अपने हाथ में फीस की पक्की रसीद देखी तो उसकी आंखें खुशी से चमक उठीं। उसने उछलकर अपने भाई के गले में बांहें डाल दीं, “सच में भैया! आप दुनिया के सबसे अच्छे भाई हो। थैंक यू सो मच भैया!”

आकाश ने प्यार से उसकी पीठ पर एक हल्की सी धौल जमाई और मुस्कुराते हुए कहा, “चल पगली, अपनों को भी कभी थैंक यू बोला जाता है क्या? खबरदार जो आगे से मुझे थैंक यू कहा तो! चल, अब देर हो रही है, जल्दी कॉलेज निकल, वरना बस छूट जाएगी।”

रिया हंसती हुई कमरे से बाहर दौड़ गई। भाई-बहन का यह स्नेह अभी हवा में तैर ही रहा था कि डाइनिंग टेबल की तरफ से थाली रखने की आवाज आई। आकाश की पत्नी नीलिमा हाथ में नाश्ते की प्लेट लिए वहीं खड़ी थी। उसके चेहरे के भाव कुछ तने हुए थे और आंखों में एक अजीब सी तल्खी साफ पढ़ी जा सकती थी।

“वाह जी वाह! बहुत खूब! आप इस घर के हर सदस्य के लिए अपनी जान हथेली पर लिए घूमते हैं। बहन की फीस, मां का चश्मा, भाई की जरूरतें… कम से कम इन लोगों को आपको झुककर धन्यवाद तो कहना ही चाहिए। आखिर आप इनके लिए कर ही कितना कुछ रहे हैं!” नीलिमा ने नाश्ते की प्लेट मेज पर रखते हुए व्यंग्य भरे लहजे में कहा।

आकाश ने एक गहरी सांस ली। वह अपनी पत्नी के स्वभाव से वाकिफ था, मगर हर बार वह बात को हंसी में टालने की कोशिश करता था। उसने डाइनिंग चेयर खींचते हुए कहा, “नीलिमा, तुम भी सुबह-सुबह कैसी बातें लेकर बैठ जाती हो। यह मेरा परिवार है, मेरे अपने हैं। घर के लोगों के बीच अगर हिसाब-किताब और औपचारिकताएं आ जाएं, तो फिर परिवार और किराये के मकान में फर्क ही क्या रह जाएगा? अपनों के बीच कोई लेन-देन नहीं होता।”

नीलिमा भी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसने चाय का कप आकाश के आगे खिसकाया और अपनी त्योरियां चढ़ाते हुए बोली, “परिवार अपनी जगह है आकाश, लेकिन जमीनी हकीकत भी तो कोई चीज होती है। आपको पता भी है कि इस महीने घर का बजट किस कदर बिगड़ा हुआ है? केवल राशन, दूध, सब्जियों और बिजली के बिल में ही आपके दिए हुए पैसों में से पंद्रह हजार से ज्यादा उड़ गए। ऊपर से आए दिन किसी न किसी की कोई न कोई फरमाइश तैयार रहती है।”

आकाश ने पराठे का निवाला तोड़ा ही था कि नीलिमा की बातें सुनकर उसके हाथ वहीं रुक गए। उसने शांत भाव से पूछा, “नीलिमा, हमारे घर में छह सदस्य हैं। मां हैं, हम दोनों हैं, हमारा छोटा बेटा है, रिया है और नीचे छोटा भाई मयंक है। इतने बड़े कुनबे में महीने का इतना खर्च होना कोई असामान्य बात तो नहीं है। महंगाई के इस दौर में इतना तो लगेगा ही।”

“असामान्य बात तब नहीं होती आकाश, जब कमाने वाले भी चार हाथ हों!” नीलिमा का स्वर अब तीखा हो चुका था। “यहाँ कमाने वाला केवल एक इंसान है—आप! और उस एक इंसान की कमाई पर बैठकर ऐश करने वाले पांच-पांच लोग हैं। बाबूजी के जाने के बाद मां जी को जो पेंशन मिलती है, वह आधी है, जिससे उनका खुद का दवा-दारू का खर्च बमुश्किल निकलता है। रिया की महंगी कॉलेज की पढ़ाई, उसकी किताबें, उसका रहन-सहन… सब कुछ आपकी जेब पर। और तो और, मयंक बाबू जो दिन-रात सिविल सर्विसेज की तैयारी का ढोंग रचाकर कमरे में बंद रहते हैं, उनके फॉर्म भरने से लेकर कोचिंग की फीस तक का ठेका भी आपने ही उठा रखा है। मैं तो बस यह देखकर हैरान हूं कि आप अपनी आंखें कब खोलेंगे!”

आकाश ने निवाला नीचे रख दिया। उसने पानी का घूंट भरा और संयम बरतते हुए कहा, “नीलिमा, यह हमेशा की स्थिति नहीं है। तुम इतना अधीर क्यों हो रही हो? मयंक दिन-रात मेहनत कर रहा है, उसकी परीक्षा के नतीजे आते ही उसकी नौकरी लग जाएगी। जैसे ही वह अपने पैरों पर खड़ा होगा, अपनी जिम्मेदारियां खुद संभालने लगेगा। और रिया का भी यह आखिरी साल है, शादी-ब्याह होकर वह भी अपने घर चली जाएगी। परिवार में जब कोई संकट आता है, तो सब मिलकर ही तो सहारा बनते हैं।”

नीलिमा ने एक ठंडी और कुटिल मुस्कान के साथ आकाश की तरफ देखा। ऐसा लग रहा था जैसे वह काफी दिनों से इस बातचीत की तैयारी कर रही थी और आज सही मौका देखकर उसने अपना पासा फेंका था।

“वह सब जब होगा, तब देखा जाएगा आकाश! लेकिन तब तक क्या हम अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की जरूरतों को पूरा करने में ही होम कर दें? हमारे अपने बच्चे का भविष्य नहीं है क्या? उसके अच्छे स्कूल में एडमिशन के लिए हमें पैसे नहीं बचाने चाहिए? मैं तो कहती हूं कि मयंक की नौकरी लगने का इंतजार करने से बेहतर है कि हम खुद ही इस झंझट से अलग हो जाएं।”

आकाश चौंक गया। उसने नीलिमा की आंखों में देखते हुए पूछा, “अलग हो जाएं? तुम्हारा मतलब क्या है, मैं कुछ समझा नहीं?”

“सीधी सी बात है,” नीलिमा ने फुसफुसाते हुए मगर पूरी दृढ़ता से कहा, “आपकी सरकारी नौकरी है। आपके विभाग में तो हर दो-तीन साल में दूसरे शहरों में ट्रांसफर के विकल्प खुलते ही रहते हैं ना?”

“हां, विकल्प तो होते हैं, लेकिन उसका यहां क्या संबंध?”

“संबंध क्यों नहीं है? आप इसी महीने अपने उच्च अधिकारियों से बात करके जमशेदपुर या रांची किसी दूसरे शहर के लिए अपना ट्रांसफर क्यों नहीं करवा लेते? हम दोनों अपने बच्चे को लेकर वहां शिफ्ट हो जाएंगे। एक नया शहर होगा, नया माहौल होगा, छोटा सा प्यारा सा आशियाना होगा। न रोज-रोज की फरमाइशें होंगी, न किसी का बोझ होगा। हमारी अच्छी-खासी बचत होगी और हम अपने बच्चे के नाम से एफडी करवा सकेंगे।” नीलिमा ने जैसे एक सुनहरे भविष्य का सपना एक ही सांस में खींच कर रख दिया।

आकाश कुछ पलों के लिए बिल्कुल सुन्न रह गया। वह अपनी पत्नी का चेहरा देखता रहा, जिसमें उसे अपने ही परिवार के लिए केवल स्वार्थ और बेरुखी नजर आ रही थी। उसके भीतर एक टीस उठी, मगर उसने अपना आपा नहीं खोया। उसने अपने चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी।

“तो यह बात है… तुम चाहती हो कि हम इस घर को, मां को, छोटे भाई-बहनों को यहीं उनके हाल पर छोड़कर अपनी एक अलग दुनिया बसा लें?”

“बिल्कुल! इसमें बुराई ही क्या है? आज के जमाने में कौन संयुक्त परिवार के पचड़े में पड़ता है? जिसने इस घर में रहना है, वह अपनी व्यवस्था खुद करेगा। आपने कोई इस घर का जीवन भर का पट्टा थोड़ी लिखवा रखा है!” नीलिमा ने बड़ी बेपरवाही से अपने हाथ झटकते हुए कहा।

आकाश अपनी कुर्सी से उठा। उसने खिड़की की तरफ देखा जहां से सुबह की हवा आ रही थी। फिर वह धीरे-धीरे नीलिमा की तरफ मुड़ा। उसकी आवाज में गजब का ठहराव था, मगर उस ठहराव के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी थी जो नीलिमा के होश उड़ाने वाली थी।

“नीलिमा, तुम्हारी यह योजना सुनने में बड़ी व्यावहारिक और आकर्षक लगती है। अपने भविष्य को सुरक्षित करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इस घर की दहलीज लांघकर किसी दूसरे शहर में अपनी नई गृहस्थी बसाने से पहले, हमें कुछ और फैसले भी लेने होंगे।”

नीलिमा उत्साहित हो उठी, उसे लगा कि उसका तीर निशाने पर लग गया है। उसने तुरंत पूछा, “कैसे फैसले? आप जो कहेंगे, मुझे सब मंजूर होगा। आखिर हमें इस घर से मिला ही क्या है जिसे छोड़ते हुए हमें कोई तकलीफ होगी? कोई गड़ा हुआ खजाना तो है नहीं यहां!”

आकाश ने अपनी जेब से पर्स निकाला, उसमें से अपना सरकारी पहचान पत्र निकाला और उसे डाइनिंग टेबल पर नीलिमा के सामने रख दिया।

“फैसला यह नीलिमा… कि दूसरे शहर में ट्रांसफर लेने के लिए अर्जी देने से पहले, मुझे अपने इस पद से इस्तीफा देना होगा। मुझे यह सरकारी नौकरी हमेशा के लिए छोड़नी होगी।”

नीलिमा की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उसने हकबकाते हुए कहा, “इ… इस्तीफा? नौकरी छोड़नी होगी? आपका दिमाग तो ठीक है आकाश? आप यह क्या बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं? अगर आप यह नौकरी छोड़ देंगे तो कमाएंगे क्या? खाएंगे क्या? हमारे बच्चे की परवरिश कैसे होगी? हम सड़क पर आ जाएंगे!”

आकाश ने अत्यंत शांत स्वर में कहा, “यही तो मैं तुम्हें समझाना चाह रहा हूं नीलिमा। जिस नौकरी के रोब पर, जिस वेतन के घमंड में तुम आज यह कह रही हो कि मैं कमाने वाला अकेला हूं और बाकी सब मुझ पर बोझ हैं, क्या तुम भूल गई कि यह नौकरी मुझे मिली कैसे थी?”

नीलिमा अवाक रह गई। उसके होंठ कांपने लगे।

आकाश ने बात जारी रखी, “चार साल पहले जब बाबूजी का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ था, तब वे इसी सरकारी विभाग में कार्यरत थे। उनकी असमय मृत्यु के बाद हमारे पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। उस वक्त मेरे पास कोई बहुत बड़ी डिग्री नहीं थी, न ही मैंने कोई प्रशासनिक परीक्षा पास की थी। मैं तो एक प्राइवेट कंपनी में मामूली क्लर्क की नौकरी ढूंढ रहा था। सरकार ने यह नौकरी किसी प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर मेरी निजी योग्यता देखकर मुझे नहीं दी थी नीलिमा! यह नौकरी बाबूजी की जगह ‘अनुकंपा नियुक्ति’ के तहत मिली थी।”

आकाश की आवाज में अब बाबूजी की यादों की नमी और स्वाभिमान का तेज दोनों घुल चुके थे।

“जब विभाग से नियुक्ति पत्र आया था, तो मां के पास यह विकल्प था कि वह पेंशन के साथ-साथ यह नौकरी अपने पास रख सकती थीं या परिवार के भरण-पोषण के लिए मुझे दिलवा सकती थीं। उस दिन मां ने अपने हाथ जोड़कर विभाग से कहा था कि मेरे बड़े बेटे को यह नौकरी दे दी जाए ताकि वह पूरे परिवार की ढाल बन सके। मयंक, जो उस समय मुझसे भी होशियार था, उसने हंसते हुए अपनी पढ़ाई के लिए मुझे आगे कर दिया और कहा कि भैया आप नौकरी संभालिए, मैं बाद में देख लूंगा। उस दिन पूरे परिवार ने अपनी खुशियां, अपने अधिकार समेटकर मेरी झोली में डाल दिए थे।”

आकाश ने झुककर नीलिमा की आंखों में आंखें डालीं।

“यह नौकरी मेरे पिता के पसीने और उनके देहांत के बदले इस परिवार को मिला हुआ एक सहारा है। इस वेतन के हर एक रुपये पर जितना हक मेरा और तुम्हारा है, उतना ही हक मेरी बूढ़ी मां, मेरी पढ़ाई कर रही बहन और मेरे छोटे भाई का भी है। अगर आज मैं इस परिवार को उनके हाल पर छोड़कर अपनी अलग दुनिया बसाने निकल पड़ा, तो मैं एक बेटा या भाई नहीं, बल्कि एक चोर कहलाऊंगा जिसने पूरे परिवार के हक की रोटी अकेले खाने की साजिश रची। इसलिए, अगर तुम्हें मेरे साथ इस घर से अलग होना है, तो मुझे यह नौकरी अभी इसी वक्त छोड़नी होगी। फिर मैं अपने दम पर, अपनी मेहनत से कोई मजदूरी या छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी ढूंढूंगा, और उससे जो चार पैसे मिलेंगे, उसमें हम अपनी नई गृहस्थी बसाएंगे। बोलो, क्या तुम्हें मेरी यह शर्त मंजूर है?”

आकाश के एक-एक शब्द हथौड़े की तरह नीलिमा के सीने पर लग रहे थे। उसके पैर कांपने लगे। जिस स्वार्थ के नशे में वह अब तक यह सोच रही थी कि उसका पति पूरे परिवार को पालकर अपनी कमाई लुटा रहा है, वह नशा एक ही झटके में चकनाचूर हो गया था। उसे अपनी सोच की क्षुद्रता और संकीर्णता पर ऐसा गहरा आघात लगा था कि वह जमीन की तरफ देखने लगी। उसकी जुबान से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। वह चाहकर भी अपनी नजरें आकाश से नहीं मिला पा रही थी।

तभी बगल के कमरे का पर्दा हटा। मां यशोदा जी धीरे-धीरे कदमों से बाहर निकलीं। उनकी आंखों से आंसुओं की दो बूंदें ढुलककर उनके गालों पर ठहर गई थीं। वे पिछले कई मिनटों से दरवाजे की ओट में खड़ी अपने बेटे और बहू की यह पूरी बातचीत सुन रही थीं।

यशोदा जी को सामने देखकर नीलिमा का कलेजा मुंह को आ गया। उसे लगा कि अब सास का गुस्सा उस पर फूटेगा, अब घर में महाभारत मचेगी। वह शर्म से गड़ गई और उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।

मगर यशोदा जी के चेहरे पर कोई क्रोध नहीं था। वे चुपचाप आगे बढ़ीं और उन्होंने आकाश के सिर पर अपना हाथ रख दिया।

“आकाश बेटा…” यशोदा जी की आवाज कांप रही थी, “तूने आज साबित कर दिया कि तेरे बाबूजी भले ही इस दुनिया में न हों, लेकिन उनके संस्कार, उनका स्वाभिमान और उनका दिया हुआ प्यार आज भी तेरे रूप में इस घर की छत बनकर खड़ा है। एक मां के लिए इससे बड़ा दिन क्या होगा जब उसका बेटा रिश्तों को तराजू में तोलने के बजाय दिल से निभाना जानता हो।”

फिर यशोदा जी घूमीं और उन्होंने नीलिमा के कांपते हुए कंधों पर अपना ममता भरा हाथ रखा।

नीलिमा ने घबराकर नजरें उठाईं, उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले, “मां जी… मुझे माफ कर दीजिए… मैंने बहुत गलत सोचा… मेरे मन में लालच और स्वार्थ आ गया था… मैं…”

यशोदा जी ने नीलिमा के आंसुओं को अपने पल्लू से पोंछते हुए बड़े ही अपनेपन से कहा, “पगली, तू माफी क्यों मांग रही है? तू इस घर की बहू जरूर है, लेकिन उम्र में अभी नादान है। अपने पति और अपने बच्चे के भविष्य की चिंता करना कोई पाप नहीं है बहू। हर औरत चाहती है कि उसका अपना एक सुरक्षित कोना हो। तेरी चिंता अपनी जगह गलत नहीं थी, बस तेरा नजरिया थोड़ा भटक गया था।”

यशोदा जी ने नीलिमा को अपने सीने से लगा लिया और बेहद कोमल स्वर में समझाने लगीं, “बहू, परिवार कोई दलदल नहीं होता जिसमें आदमी धंसता चला जाए। परिवार तो वह बरगद का पेड़ होता है जिसकी छांव में जब धूप तेज होती है, तो हर कोई सुकून पाता है। आज अगर आकाश अपने भाई-बहन के लिए खड़ा है, तो कल जब हम बूढ़े होंगे और कोई विपत्ति आएगी, तो यही मयंक और यही रिया आकाश के पीछे चट्टान बनकर खड़े होंगे। अपनों को काटकर कभी कोई अपनी बगिया हरी-भरी नहीं रख पाया है। जो सुख और जो बरकत सबको साथ लेकर चलने में है, वह अकेले बैठकर हलवा खाने में कभी नहीं मिल सकती।”

नीलिमा फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने यशोदा जी के पैर पकड़ लिए, “मां जी, मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। मैं सच में बहुत अंधी हो गई थी। मुझे लगता था कि आकाश की कमाई सिर्फ मेरी है, पर मैं यह भूल गई थी कि आकाश को इस काबिल बनाने में इस पूरे घर ने कितने त्याग किए हैं। मैं वादा करती हूं मां जी, आज के बाद कभी इस घर को बांटने या अलग होने का ख्याल भी अपने मन में नहीं लाऊंगी।”

आकाश ने आगे बढ़कर नीलिमा को उठाया। नीलिमा ने हाथ जोड़कर आकाश की तरफ देखा, उसकी आंखों में अपने पति के लिए अब केवल प्यार ही नहीं, बल्कि एक अगाध सम्मान और श्रद्धा का भाव था।

उसी वक्त बाहर से मयंक हाथ में बाजार का थैला लिए दाखिल हुआ। उसने कमरे का यह भावुक माहौल देखा तो ठिठक गया। “अरे, क्या बात है? सब लोग इतने भावुक क्यों खड़े हैं? भाभी, आपकी आंखों में आंसू? भैया ने फिर से कोई डांट लगाई क्या?”

मयंक के इस भोलेपन पर सब खिलखिलाकर हंस पड़े। माहौल का सारा तनाव एक पल में छूमंतर हो गया।

नीलिमा ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे और हंसते हुए मयंक के हाथ से थैला ले लिया, “नहीं देवर जी, आपके भैया की इतनी हिम्मत कहां जो मुझे डांट सकें! वो तो बस आंखों में कुछ गिर गया था। आप जल्दी से हाथ-मुंह धोकर आइए, मैं आपके लिए गरमा-गरम चाय और नाश्ता लाती हूं।”

आकाश ने मुस्कुराते हुए अपनी मां की तरफ देखा और फिर अपनी जेब में रखे टूटे हुए चश्मे को छुआ। आज उसे महसूस हो रहा था कि घर केवल मजबूत दीवारों से नहीं बनता, बल्कि उस समझदारी, त्याग और संस्कारों से बनता है जो हर बवंडर को झेलकर भी रिश्तों की डोर को टूटने नहीं देते। जिस परिवार में एक-दूसरे के प्रति त्याग और सम्मान का भाव हो, वहां कोई भी आर्थिक तंगी या गलतफहमी कभी दरार नहीं डाल सकती।

***

दोस्तों, यह कहानी सिर्फ आकाश और नीलिमा की नहीं है, बल्कि आज के दौर में बिखरते हुए उन तमाम संयुक्त परिवारों का एक आईना है जहाँ अक्सर लोग अपनी जड़ों को भूलकर सिर्फ अपने स्वार्थ को प्राथमिकता देने लगते हैं। क्या आपको लगता है कि आकाश ने जो फैसला लिया और नीलिमा को जो आईना दिखाया, वह सही था? अगर आप आकाश की जगह होते तो ऐसी परिस्थिति में क्या कदम उठाते? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : पुष्पा कुमारी “पुष्प”

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