“भाभी, आप कहीं नहीं जाएँगी,” वीरेंद्र की दृढ़ आवाज़ गूँजी। उसने अपना क्रेडिट कार्ड और चेकबुक काउंटर पर रख दी। “डॉक्टर साहब, आप बिना किसी देरी के सर्जरी की तैयारी शुरू कीजिए। पैसों की चिंता मत कीजिए, मैं पूरा डिपॉज़िट अभी क्लियर कर रहा हूँ। और ब्लड ग्रुप ओ-पॉज़िटिव है न भैया का? मेरा भी वही है। जितनी यूनिट चाहिए, मैं अभी देता हूँ।”
सुबह के साढ़े छह बज रहे थे। अक्टूबर की हल्की ठंडी हवा में नीम के पत्तों से ओस की बूँदें टपक रही थीं। कानपुर की शास्त्री नगर कॉलोनी में रोज़ की तरह चहल-पहल शुरू हो रही थी। वंदना मुख्य दरवाज़े के बाहर झाड़ू लगा ही रही थी कि साइकिल की घंटी की जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी।
मोहल्ले का पुराना सब्ज़ी वाला शंभू अपनी ठेली रोकते हुए बोला, “छोटी भाभी जी, आज ताज़ा मेथी और परवल लाया हूँ। पर एक बात बताइए, बड़ी कोठी में कोई है नहीं क्या? पिछले तीन दिनों से आवाज़ लगा रहा हूँ, कोई दरवाज़ा ही नहीं खोल रहा। पहले तो मंजू भाभी सुबह-सुबह ही टोकरी लेकर बाहर आ जाती थीं। कल भी उनकी देहरी पर रखे गमलों के पास दो दिन का अख़बार पड़ा देखा। कहीं बाहर गई हैं क्या?”
वंदना का हाथ झाड़ू पर एक पल के लिए ठहर गया। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए चेहरे पर एक कृत्रिम बेपरवाही लाने की कोशिश की और कहा, “अरे शंभू भैया, हमें क्या पता? तुम तो जानते ही हो, पिछले चार साल से बीच के अहाते में ईंटों की जो दीवार खिंची है, उसके बाद से हमारा उनका कोई सीधा वास्ता नहीं रहा। ना वो हमारे यहाँ झाँकती हैं, ना हम उधर जाते हैं। मायके गई होंगी, अपने भाई के यहाँ।”
“मायके?” शंभू ने माथा सिकोड़ते हुए कहा, “भाभी जी, पिछले पंद्रह साल से सब्ज़ी दे रहा हूँ इस गली में। बिटिया की शादी के अलावा कभी जेठानी जी को हफ़्ते भर के लिए भी बाहर जाते नहीं देखा। और फिर उनके दोनों लड़के—अमित और सुमित—उनकी तो बारहवीं और दसवीं की छमाही परीक्षा चल रही है न? कल कॉलोनी के मोड़ पर मिले थे, बड़े परेशान से दिख रहे थे। मुझे लगा आपको तो पक्का पता होगा, आख़िर एक ही छत के दो टुकड़े ही तो हैं।”
शंभू अपनी ठेली आगे बढ़ा ले गया, लेकिन वंदना के मन में एक अजीब सी हलचल छोड़ गया। वह दरवाज़ा बंद करके भीतर दालान में आई। घर के बीचों-बीच जो कच्ची ईंटों की छह फुट ऊँची दीवार उठा दी गई थी, उसकी तरफ़ उसकी नज़र अनायास ही चली गई। यही वह दीवार थी जो चार साल पहले पैतृक ज़मीन के बँटवारे और व्यापार के मामूली मुनाफ़े के विवाद में खींची गई थी। बात इतनी बढ़ी थी कि सगे भाई—नरेंद्र और वीरेंद्र—एक-दूसरे का मुँह देखने के भी रवादार नहीं रहे थे। सास कल्याणी देवी उसी बँटवारे की मार झेलते हुए भीतर ही भीतर टूट गई थीं। तय यह हुआ था कि माँ छह महीने छोटे बेटे वीरेंद्र के साथ रहेंगी और छह महीने बड़े बेटे नरेंद्र के साथ। इस समय माँ वंदना और वीरेंद्र के हिस्से में थीं।
रसोई में चाय चढ़ाते हुए वंदना का ध्यान बार-बार जेठानी मंजू के घर की ख़ामोशी पर जा रहा था। आमतौर पर सुबह के समय उस आँगन से मिक्सर की आवाज़, प्रेशर कुकर की सीटी या जेठ नरेंद्र जी के खाँसने की आवाज़ें आ ही जाती थीं। लेकिन पिछले तीन-चार दिनों से वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था।
चाय की प्याली हाथ में लेकर वंदना बैठक में पहुँची जहाँ कल्याणी देवी रामायण का पाठ कर रही थीं। पास ही सोफे पर उसका बेटा रोहन अपने स्कूल का बस्ता तैयार कर रहा था।
वंदना ने धीमे स्वर में पूछा, “रोहन, तूने पिछले दो-तीन दिनों से अमित भैया को देखा क्या? स्कूल बस में वो लोग दिख रहे हैं?”
रोहन ने जूते के फीते बाँधते हुए सिर उठाया, “नहीं मम्मी, अमित भैया तीन दिन से स्कूल नहीं आए। कल क्लास टीचर भी असेंबली में पूछ रही थीं कि उनका प्रोजेक्ट अधूरा है। मैंने उन्हें कॉल करने की सोची थी, पर पापा ने मना कर रखा है न कि उस तरफ़ कोई बात नहीं करनी।”
कल्याणी देवी ने रामायण का चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा। उनकी बूढ़ी आँखों में चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने भारी मन से कहा, “बहू, तू क्यों इन बातों में पड़ रही है? जब उन लोगों ने संबंध तोड़ते वक़्त माँ की ममता तक का मोल नहीं समझा, तो अब हम क्यों परवाह करें? अपने काम पर ध्यान दे। वीरेंद्र को दफ़्तर जाने में देर हो जाएगी।”
लेकिन वंदना अपनी सास की आवाज़ का वह काँपता हुआ दर्द पहचानती थी। मुँह से चाहे जो कहें, पर माँ का दिल तो दोनों बेटों के लिए एक जैसा ही धड़कता था। नाश्ते की मेज़ पर जब वीरेंद्र तैयार होकर आया, तो वंदना ने सहज भाव से कहा, “सुनिए जी, शंभू कह रहा था कि भैया जी के घर तीन दिन से ताला लटका है। बच्चे भी स्कूल नहीं जा रहे। कहीं कुछ…”
वीरेंद्र ने कलाई घड़ी बाँधते हुए बीच में ही टोक दिया, “वंदना, कितनी बार कहा है कि उस घर की फ़िक्र करना छोड़ दो। नरेंद्र भाई साहब को जब अपनी मर्ज़ी से जीना था, अलग होना था, तब तो उन्होंने एक बार भी नहीं सोचा कि छोटा भाई क्या महसूस करेगा। कहीं घूमने गए होंगे परिवार समेत, हमें क्या लेना-देना?” इतना कहकर वीरेंद्र ने नाश्ता ख़त्म किया और स्कूटर स्टार्ट करके दफ़्तर निकल गया।
मगर घर के पुरुषों का दफ़्तर जाना और बच्चों का स्कूल निकलना भी उस सन्नाटे के रहस्य को दबा नहीं सका। वंदना से रहा नहीं गया। उसने देखा कि माँ जी खिड़की के पास खड़ी होकर बार-बार उस बंद आँगन की ओर देख रही थीं, जहाँ तुलसी का पौधा पानी न मिलने से मुरझाने लगा था।
वंदना ने धीरे से कहा, “माँ जी, मन नहीं मान रहा। भले ही हमारी बोलचाल बंद है, पर पड़ोस में कुछ बुरा तो नहीं हो गया? मैं सामने वाले तिवारी जी के घर फ़ोन करके ज़रा पता लगाऊँ? उनकी बहू तो अक्सर सब ख़बर रखती है।”
कल्याणी देवी ने कोई विरोध नहीं किया, बस एक गहरी साँस लेकर चुपचाप सिर हिला दिया। यह मौन सहमति ही बहुत थी।
वंदना ने तुरंत फोन उठाया और सामने रहने वाली सरिता तिवारी को मिलाया। दो-तीन औपचारिक बातों के बाद जब उसने झिझकते हुए पूछा, “भाभी जी, हमारे पड़ोस वाले हिस्से में कोई दिख नहीं रहा, सब ख़ैरियत तो है न?”
दूसरी तरफ़ से सरिता की आवाज़ में जो घबराहट और ताज्जुब उभरा, उसने वंदना के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
“अरे वंदना! तुम्हें सच में कुछ नहीं पता? तुम लोग तो एक ही अहाते में रहते हो! अरे, तीन दिन पहले जो तूफ़ानी बारिश हुई थी, उस रात नरेंद्र भाई साहब छत पर पानी का बहाव देखने गए थे। तेज़ हवा और काई की वजह से उनका पैर फिसला और वो पहली मंज़िल की खुली सीढ़ी से नीचे पक्के फ़र्श पर गिर पड़े! सिर में गहरी अंदरूनी चोट आई है। रात के तीन बजे मंजू भाभी की चीख़ें सुनकर हमारे घरवाले और मोहल्ले के दो लड़के दौड़े थे। आनन-फ़ानन में उन्हें सिटी केयर हॉस्पिटल के आईसीयू में भर्ती कराया गया है। सुना है कल रात से उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है, हालत बहुत नाज़ुक है!”
फ़ोन वंदना के हाथ से छूटते-छूटते बचा। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“क्या हुआ बहू? किसने क्या कहा?” कल्याणी देवी ने घबराकर वंदना का कंधा हिलाया।
“माँ जी… वो… जेठ जी…” वंदना का गला रुँध गया, “तीन दिन पहले छत से गिर गए थे। सिर में गंभीर चोट है… सिटी केयर अस्पताल के आईसीयू में हैं… वेंटिलेटर पर…”
कल्याणी देवी के हाथ से रामायण की पोथी छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “मेरा नरेंद्र… मेरा बच्चा…” बूढ़ी माँ की चीख़ दालान में गूँज गई। उनके आँसू बाँध तोड़कर बह निकले, “हाय राम, चार दिन से मेरा लाल मौत से लड़ रहा है और मुझे ख़बर तक नहीं? बहू, चल… जल्दी रिक्शा बुला! मुझे मेरे बेटे के पास ले चल!”
“माँ जी, आप संभलिए। पहले मैं वीरेंद्र जी को फ़ोन कर दूँ?” वंदना ने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।
“नहीं! उसे फ़ोन करने में वक़्त मत गँवा। वो दफ़्तर पहुँच गया होगा, वहाँ से आने में देर लगेगी। पहले हम दोनों चलते हैं। चाहे उसने मुझसे बात करना छोड़ दिया हो, चाहे उसने ज़मीन के लिए दीवार खड़ी कर दी हो, पर मेरी कोख से जन्मा है वो! माँ का कलेजा कैसे मानेगा?”
दोनों सास-बहू ने बिना एक पल गँवाए चादर ओढ़ी और बाहर निकल आईं। रास्ते में वंदना ने वीरेंद्र को फ़ोन मिलाया और रोते हुए पूरी बात बताई। फ़ोन के उस पार वीरेंद्र की साँसें थम गईं। चंद पलों का सन्नाटा छा गया, और फिर भारी आवाज़ में सिर्फ़ इतना निकला, “मैं सीधे अस्पताल पहुँच रहा हूँ।”
सिटी केयर अस्पताल की सफ़ेद और गंध भरी गलियारों में सन्नाटा पसरा हुआ था। रिसेप्शन से आईसीयू का पता पूछकर जब कल्याणी देवी और वंदना तीसरे माले पर पहुँचीं, तो वहाँ का दृश्य देखकर किसी का भी दिल दहल जाता।
आईसीयू के बाहर बने संकरे प्रतीक्षालय में लोहे की बेंच पर मंजू बैठी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखें रो-रोकर सूज चुकी थीं और चेहरे पर असीम थकान और खौफ़ की परछाईं थी। पास ही दोनों बेटे—अमित और सुमित—दीवार से टेक लगाए सिर झुकाए खड़े थे।
चार साल की नफ़रत, मुँह फेरने की आदत और अहंकार की सारी परतें उस एक लम्हे में ढह गईं। कल्याणी देवी डगमगाते कदमों से आगे बढ़ीं और उन्होंने पुकारा, “मंजू…”
मंजू ने चौंककर सिर उठाया। सामने अपनी सास और देवरानी को खड़ा देखकर वह कुछ पल स्तब्ध रह गई। उसके अंदर का सारा संकोच, सारी पुरानी कड़वाहट और अकेलेपन का डर एक झटके में आंसुओं का सैलाब बनकर फूट पड़ा। वह उठकर सीधे कल्याणी देवी के सीने से लग गई और फफक-फफक कर रो पड़ी, “माँ जी… इन्होंने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा… चार दिन से आँखें नहीं खोलीं… डॉक्टर कह रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे बहुत भारी हैं… मैं अकेले क्या करूँ माँ जी, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा!”
कल्याणी देवी ने काँपते हाथों से अपनी बड़ी बहू का सिर अपनी छाती से चिपका लिया। उनकी अपनी आँखों से आँसू बहकर मंजू के बालों में समा रहे थे। “चुप हो जा मेरी बच्ची, धीरज धर। माँ आ गई है न। कुछ नहीं होगा मेरे नरेंद्र को। भगवान इतना निष्ठुर नहीं हो सकता।”
वंदना आगे बढ़ी और उसने दोनों भतीजों—अमित और सुमित—को अपने सीने से लगा लिया। बच्चे जो चार दिन से माँ के सामने ख़ुद को मज़बूत दिखाने का नाटक कर रहे थे, अपनी चाची की बाँहों में आते ही बच्चों की तरह सुबकने लगे। “चाची… पापा बात नहीं कर रहे… हमें बहुत डर लग रहा है,” अमित ने हिचकियों के बीच कहा।
“कुछ नहीं होगा बेटा, हम सब आ गए हैं। चाची है न,” वंदना की आँखों से भी आँसू बह रहे थे। उसने तुरंत पानी की बोतल खोली और मंजू के मुँह से लगाई, “दीदी, थोड़ा पानी पीजिए। आपने कब से कुछ खाया-पिया नहीं होगा। ऐसे हिम्मत हारेंगी तो बच्चे कैसे संभलेंगे?”
मंजू ने रोते हुए हाथ जोड़ लिए, “वंदना… मुझे माफ़ कर दे। उस वक़्त के झगड़े में हम इतने अंधे हो गए थे कि तुम्हें पराया समझ बैठे। जब ये हादसा हुआ, तो मेरा मन हुआ कि सबसे पहले वीरेंद्र को आवाज़ दूँ… पर शर्म और झिझक ने मेरे पाँव बाँध दिए। मुझे लगा कि तुम लोग नाराज़ हो, कहीं धुतकार न दो…”
“दीदी, चुप रहिए,” वंदना ने मंजू के हाथ पकड़ लिए, “अपनों से कैसी शर्म? झगड़े अपनी जगह हैं, पर विपत्ति के समय अगर परिवार साथ न खड़ा हो तो फिर रिश्ते किस काम के? अब आप बिल्कुल अकेली नहीं हैं।”
तभी भारी कदमों की आवाज़ सुनाई दी। वीरेंद्र हाँफता हुआ सीढ़ियों से ऊपर आया। उसका कोट अस्त-व्यस्त था और चेहरे पर गहरी घबराहट थी। उसने सामने अपनी भाभी को बेहाल देखा और फिर आईसीयू के शीशे के पार नज़र डाली, जहाँ उसका बड़ा भाई अनगिनत नलियों और मशीनों के बीच बेसुध पड़ा था।
वीरेंद्र का कलेजा मुँह को आ गया। वह भाई जिसके साथ उसने बचपन में कंचे खेले थे, जिसने पहली साइकिल चलाना सिखाया था, जिसने पिता के जाने के बाद उसकी पढ़ाई का ख़र्च उठाया था—वह आज ज़िंदगी और मौत के तराज़ू पर झूल रहा था। वीरेंद्र के मन में बची-खुची कड़वाहट का आख़िरी कतरा भी उसी पल बह गया।
वह सीधे डॉक्टर के केबिन की तरफ़ बढ़ा। डॉक्टर ने फ़ाइलों को देखते हुए कहा, “ब्रेन में क्लॉटिंग है और इंटरनल ब्लीडिंग की वजह से प्रेशर बढ़ रहा है। हमें तुरंत एक मेजर न्यूरोसर्जरी करनी होगी। इसके लिए कुछ विशेष इंजेक्शन और ब्लड यूनिट्स की ज़रूरत है, साथ ही ऑपरेशन के लिए तुरंत पाँच लाख रुपये का शुरुआती डिपॉज़िट करना होगा। परिवार के लोग फ़ैसला लें, क्योंकि समय बहुत कम है।”
मंजू के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। पिछले चार दिनों में अस्पताल के बिलों ने उनकी सारी जमा-पूँजी ख़त्म कर दी थी। वह बदहवास होकर बोली, “डॉक्टर साहब, थोड़ा समय दीजिए… मैं अपने गहने गिरवी रखने का इंतज़ाम करती हूँ…”
“भाभी, आप कहीं नहीं जाएँगी,” वीरेंद्र की दृढ़ आवाज़ गूँजी। उसने अपना क्रेडिट कार्ड और चेकबुक काउंटर पर रख दी। “डॉक्टर साहब, आप बिना किसी देरी के सर्जरी की तैयारी शुरू कीजिए। पैसों की चिंता मत कीजिए, मैं पूरा डिपॉज़िट अभी क्लियर कर रहा हूँ। और ब्लड ग्रुप ओ-पॉज़िटिव है न भैया का? मेरा भी वही है। जितनी यूनिट चाहिए, मैं अभी देता हूँ।”
मंजू ने अवाक होकर अपने देवर को देखा। वह वीरेंद्र जिसके साथ ज़मीन के एक टुकड़े के लिए उसके पति ने महीनों अदालत के चक्कर काटने की धमकी दी थी, आज बिना एक पल सोचे अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार खड़ा था।
वीरेंद्र ने आगे बढ़कर मंजू के सिर पर हाथ रखा, “भाभी, जब तक आपका यह देवर ज़िंदा है, आपको किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं है। भैया मेरे भी हैं। हमने दीवार ज़रूर बनाई थी, पर दिल के रिश्ते इतने सस्ते नहीं हैं कि ईंटों के पीछे दब जाएँ।”
अगले छह घंटे पूरे परिवार के लिए अग्निपरीक्षा जैसे थे। बाहर प्रतीक्षालय में कल्याणी देवी लगातार हाथ में माला लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रही थीं। वंदना ने कैंटीन से चाय और बिस्कुट लाकर दोनों बच्चों और मंजू को ज़बरदस्ती खिलाया। वीरेंद्र ब्लड डोनेट करने के बाद लगातार दवाइयों और इंजेक्शनों के इंतज़ाम में एक काउंटर से दूसरे काउंटर भाग रहा था।
शाम के करीब सात बजे ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती बुझी। डॉक्टर बाहर आए, उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी। उन्होंने मास्क हटाते हुए कहा, “ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा। क्लॉट हटा दिया गया है और ब्लीडिंग रुक गई है। पेशेंट ने रेस्पॉन्ड करना शुरू कर दिया है। अगर आप लोग सही समय पर सर्जरी का फ़ैसला नहीं लेते, तो शायद हम उन्हें बचा नहीं पाते। अब वे ख़तरे से बाहर हैं।”
यह सुनते ही जैसे पूरे प्रतीक्षालय में ज़िंदगी लौट आई। मंजू ज़मीन पर बैठ गई और हाथ जोड़कर भगवान का धन्यवाद करने लगी। कल्याणी देवी की आँखों से राहत के आँसू छलक पड़े। वीरेंद्र ने दीवार से माथा टिका दिया, उसकी आँखों से भी ख़ुशी की नमी बह निकली।
दो दिन बाद, जब नरेंद्र को सामान्य वार्ड में शिफ़्ट किया गया, तो पूरे परिवार को उनसे मिलने की इजाज़त मिली।
नरेंद्र ने जब धीरे से आँखें खोलीं, तो उसके सिर पर सफ़ेद पट्टियाँ बँधी थीं। उसने धुंधली नज़रों से देखा—सामने बूढ़ी माँ उसका हाथ थामे बैठी थीं, सिरहाने मंजू खड़ी थी, और पैरों के पास वंदना और दोनों बच्चे खड़े थे। और कमरे के एक कोने में, चुपचाप हाथ बाँधे वीरेंद्र खड़ा था, जिसकी आँखों में नींद की कमी और चिंता साफ़ झलक रही थी।
नरेंद्र के सूखे होंठ हिले। उसकी आँखों के कोरों से दो बूँद आँसू ढुलक कर तकिए में समा गए। उसने काँपते हुए हाथ को थोड़ा सा उठाया और वीरेंद्र की तरफ़ बढ़ाया।
वीरेंद्र एक पल भी नहीं रुका। वह आगे बढ़ा और उसने अपने बड़े भाई के हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
“वीरू…” नरेंद्र की आवाज़ बहुत धीमी और भर्राई हुई थी, “मुझे माफ़ कर दे भाई… मैं ज़मीन और पैसों के लालच में इतना अंधा हो गया था कि अपने ही जिगर के टुकड़े को भूल गया। मुझे पता चला कि तूने कैसे मेरी जान बचाई है… मैं किस मुँह से तेरा शुक्रिया अदा करूँ?”
“भैया, कुछ मत कहिए,” वीरेंद्र ने भाई के माथे को चूमते हुए कहा, “माफ़ी तो मुझे माँगनी चाहिए कि मैंने इतने दिन आपसे बात नहीं की। भाई-भाई में तकरार हो सकती है, पर दुश्मनी कभी नहीं। अब बस आप जल्दी से ठीक हो जाइए।”
कल्याणी देवी ने दोनों बेटों के जुड़े हुए हाथों पर अपना काँपता हुआ हाथ रख दिया। उन्होंने नम आवाज़ में कहा, “आज मेरा घर फिर से पूरा हो गया। जिस दिन तू घर लौटेगा नरेंद्र, सबसे पहले उस आँगन की दीवार पर हथौड़ा चलेगा। मेरे जीते-जी अब इस घर में कोई दीवार नहीं रहेगी।”
मंजू और वंदना ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और दोनों की आँखों में आँसुओं के बीच एक आश्वस्त मुस्कान तैर गई। वह दीवार जो नफ़रत और अहंकार से बनी थी, आज प्रेम, त्याग और अपनेपन के आगे भरभरा कर गिर चुकी थी।
घर लौटते हुए जब शाम ढल रही थी, तो उस आँगन के दोनों हिस्सों में एक साथ दीये जलाए गए। चार साल का अंधेरा एक ही दिन में मिट चुका था, क्योंकि जहाँ खून का रिश्ता और पारिवारिक संवेदनाएँ ज़िंदा हों, वहाँ कोई भी दीवार कभी हमेशा के लिए नहीं टिक सकती।
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जीवन की आपाधापी और छोटी-मोटी गलतफहमियों में हम अक्सर अपनों से दूर होकर झूठे अहंकार की दीवारें खड़ी कर लेते हैं; लेकिन सच यही है कि जब ज़िंदगी इम्तिहान लेती है, तो दौलत या ईगो नहीं, सिर्फ़ परिवार का साथ ही ढाल बनकर खड़ा होता है। क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा अनुभव हुआ है जब किसी अपने ने पुरानी बातें भुलाकर आपका साथ निभाया हो? अपनी राय हमें नीचे लिखकर ज़रूर बताएं।
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मूल लेखिका : करुणा मालिक