चाँदी से चमकते बालों के बीच से झांकती माथे की लकीरें तब और भी गहरी हो जाती थीं, जब गौरी के सूखे होंठों पर अचानक कोई बेवजह की मुस्कान खिल उठती थी। चौंसठ बरस की उम्र में भी उसके भीतर जैसे कोई अल्हड़ बच्ची सांस ले रही थी। वह आँगन में बैठी मटर छीलते-छीलते खुद ही कोई पुरानी बात याद करती और खिलखिलाकर हँस पड़ती। उसकी वह निश्छल और पवित्र हँसी ऐसी थी कि राह चलते किसी बटोही के कदम भी ठिठक जाएं। परंतु विधि का विधान देखिए, जितनी जल्दी उसके होंठों पर हँसी के फूल खिलते थे, उतनी ही तेजी से उसकी बूढ़ी आँखों से खारे पानी का सोता भी फूट पड़ता था। कोई सिसकी नहीं, कोई आवाज नहीं—बस आँसुओं की एक अनवरत धारा, जो उसकी झुर्रियों की पगडंडियों से होती हुई उसकी सूती साड़ी के पल्लू में जज्ब हो जाती थी। कभी-कभी तो भीतर का गुबार इतना उमड़ता कि पल्लू निचोड़ने लायक हो जाता, पर उसके होंठ सिले के सिले ही रहते।
गौरी का समूचा जीवन जैसे पीड़ा की किसी मोटी किताब का एक अंतहीन अध्याय था। उम्र के छह दशक पार कर लेने के बाद भी उसके हाथों की फुर्ती किसी बीस बरस की युवती को मात देती थी। घर का कोना-कोना उसकी मेहनत से आईने की तरह चमकता था। चाहे मिट्टी का चूल्हा लीपना हो या आँगन में तुलसी के चौरे पर रंगोली बनानी हो, हर काम में एक गजब का सलीका था। खुद भी वह फटी साड़ी भले पहन ले, पर बिना धुले और बिना सलीके से तह किए हुए कपड़े को हाथ तक न लगाती थी। विधाता ने उसके हाथों में दुनिया भर का हुनर और रूप तो कूट-कूट कर भरा था, लेकिन जब उसकी तकदीर लिखने की बारी आई, तो शायद ऊपरवाले की कलम की स्याही ही सूख गई थी।
कमल के फूल सी नाजुक और रूपवती गौरी जब ब्याह कर माधो के घर आई थी, तब उसे अंदाजा भी नहीं था कि ससुराल के नाम पर उसे अभावों का एक गहरा कुआँ मिलने वाला है। घर में इतनी गरीबी थी कि एक वक्त का चूल्हा जलता, तो दूसरे वक्त के आटे की फिक्र माथे पर पसीना ले आती। उस पर से उसका पति माधो—जिसका स्वभाव किसी सुलगते हुए अंगारे से कम न था। अक्खड़, मुंहफट और बात-बात पर आपा खो देने वाला इंसान। अपनी गरीबी और लाचारी की सारी भड़ास वह बेकसूर गौरी पर निकालता। गाली-गलौज और हाथ उठाना तो जैसे माधो की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। गौरी सब सहती, मार खाकर भी कोने में बैठकर रो लेती, और फिर उठकर उसी माधो के लिए गरम रोटियाँ सेकने लगती।
ब्याह के शुरुआती सालों में सास ने कभी गौरी को चैन की सांस नहीं लेने दी। सुबह तड़के चार बजे से जो चक्की पीसने और गोबर पाथने का सिलसिला शुरू होता, वह देर रात तक चलता रहता। फिर भी सास के ताने उसके कलेजे को छलनी करने से बाज नहीं आते। जब कभी सब्र का बांध टूटता और गौरी रोती-बिलखती अपने मायके भाग जाती, तो उसकी माँ उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बस एक ही नसीहत देती, “बिटिया, ससुराल की चौखट ही औरत का असली मुकद्दर है। आज सास का राज है, तो कल तेरा भी वक्त आएगा। सब्र रख, एक न एक दिन उसी घर में तेरा हुक्म चलेगा।”
माँ के इन दिलासों की पोटली बांधकर भोली गौरी फिर से उसी नर्क में लौट आती। उसने इस उम्मीद में अपनी जवानी खपा दी कि कभी तो इस छत के नीचे उसकी भी सुनी जाएगी। मगर किस्मत को तो उसके साथ अभी और भी क्रूर खेल खेलने बाकी थे। वंश चलाने वाले एक बेटे की चाह में गौरी ने तीन बेटियों को जन्म दिया। हर बार जब बेटी पैदा होती, तो ससुराल में मातम सा पसर जाता और गौरी को ऐसे देखा जाता मानो उसने कोई घोर अपराध कर दिया हो। कौन सा ऐसा पीर-फकीर या देवी-देवता का चौखट था, जहाँ गौरी ने अपनी नाक नहीं रगड़ी? कितने ही निर्जला व्रत रखे, मन्नतों के धागे बांधे, तब जाकर भगवान ने तरसा-तरसा कर उसकी झोली में एक बेटे—बिरजू को डाला।
गौरी को लगा कि अब उसके दुखों की काली रात कट गई है। वक्त का पहिया घूमा, उसने और माधो ने अपना पेट काट-काट कर तीनों बेटियों के हाथ पीले कर दिए। अब घर में सिर्फ बिरजू बचा था। गौरी ने बड़े अरमानों से बेटे का ब्याह किया और घर में बहू के रूप में चंपा के कदम पड़े। गौरी ने सोचा था कि अब वह सास बन गई है, अब उसे चूल्हे-चौके की तपन से मुक्ति मिलेगी और माँ की कही बात सच होगी। लेकिन हाय री किस्मत! सास की खाली जगह कब बहू ने ले ली, गौरी को पता ही नहीं चला। चंपा ने घर की कमान ऐसे संभाली कि गौरी और माधो अपने ही घर में पराये और बोझ बन कर रह गए।
चंपा के तीखे बोल और बिरजू की बेरुखी ने दोनों बूढ़े प्राणियों का जीना मुहाल कर दिया। गौरी दिन भर कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती—बर्तन मांजती, कपड़े धोती, गाय का गोबर समेटती, फिर भी बहू के तानों से बच नहीं पाती। अब तो माधो का वह अक्खड़पन भी बुढ़ापे की लाचारी के आगे घुटने टेक चुका था।
एक शाम घर में राशन के किसी हिसाब को लेकर बिरजू और माधो के बीच बहस छिड़ गई। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि खून के रिश्ते पानी हो गए। बिरजू ने गुस्से में आकर आँगन में रखा लोहे का हंसिया उठा लिया और अपने ही बूढ़े बाप की गर्दन पर वार करने दौड़ पड़ा। गौरी चीखती हुई बीच में कूद पड़ी और मोहल्ले वालों ने दौड़कर बिरजू के हाथ से हंसिया छीना। उस दिन माधो के शरीर पर तो कोई घाव नहीं लगा, लेकिन उसकी आत्मा लहूलुहान हो गई। उसने एक नजर अपने बेटे पर डाली, दूसरी नजर कांपती हुई गौरी पर, और बिना चप्पल पहने, खाली हाथ ही घर की दहलीज लांघ कर चला गया।
वह रात बीती, हफ्ते बीते और फिर महीने गुजर गए, लेकिन माधो लौट कर नहीं आया। गौरी की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई। यह सच था कि माधो ने उसे जीवन भर कभी प्यार के दो मीठे बोल नहीं बोले, हमेशा अपनी गृहस्थी की खीझ उस पर उतारी, लेकिन फिर भी वह उसके माथे का सिंदूर था, उसके सिर की छत था। माधो का एक उसूल था—वह खुद गौरी को चाहे जितना डांट ले, पर बाहर वाले या खुद की औलाद को भी गौरी की तरफ आँख उठाकर देखने नहीं देता था। आज उसी ढाल के चले जाने से गौरी अपने ही बेटे-बहू के घर में एकदम निहत्थी हो गई थी।
वह जब भी कुएँ पर पानी भरने जाती या किसी पड़ोसन के पास बैठती, तो उसका गला भर आता। पल्लू से आँखें पोंछते हुए वह कहती, “बहन, मुझे अपने इस शरीर की कोई फिक्र नहीं है… पर न जाने वो किस हाल में होंगे? जिस शाम घर से निकले, न जेब में एक फूटी कौड़ी थी, न कंधे पर कोई गमछा। इस कड़कड़ाती ठंड में कहाँ ठिठुर रहे होंगे? अरे, अगर इस जंजाल से छूटना ही था, तो मुझे भी जहर दे जाते या अपने साथ ही ले जाते! मुझे इस कसाईखाने में अकेला क्यों छोड़ गए?” यह कहते-कहते उसकी हिचकियाँ बंध जातीं।
दिन-रात के क्लेश से अब गौरी के मन से ‘अपने घर’ का मोह पूरी तरह भंग हो चुका था। वह किसी मशीन की तरह घर का सारा काम निपटाती और फिर पिछवाड़े की अंधेरी कोठरी में जाकर शून्य में ताकती रहती।
ठीक तेरह महीने बाद, वैशाख की एक तपती दोपहरी में गाँव की गलियों में अचानक एक शोर उठा—“अरे, माधो काका लौट आए! माधो काका आ गए!”
गौरी उस वक्त आँगन में गेहूँ फटक रही थी। उसके हाथ वहीं थम गए। धड़कते कलेजे के साथ जब उसने दरवाजे की तरफ देखा, तो अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं कर पाई। सामने माधो खड़ा था, लेकिन यह वह फटेहाल, झुकी कमर वाला माधो नहीं था। उसके शरीर पर झक्क सफेद खादी का कुर्ता-धोती था, पैरों में चमचमाती चमड़े की जूतियाँ, कलाई पर घड़ी और चेहरे पर एक ऐसा नूर व रौब था, जो किसी बड़े सेठ या जमींदार के चेहरे पर होता है। उसके पीछे दो कुली सिर पर बड़े-बड़े संदूक और फलों की टोकरियाँ लादे खड़े थे।
गौरी की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे, पर होंठों पर वही बच्चों जैसी मुस्कान तैर गई। लोक-लाज के डर से वह दौड़कर पति के गले तो नहीं लग सकी, लेकिन दरवाजे की आड़ में खड़े होकर जिस तरह वह अपने पल्लू से मुंह छिपाकर हँस और रो रही थी, उसने उसके भीतर के असीम आनंद को बयां कर दिया।
माधो अपने साथ जैसे कुबेर का खजाना लेकर लौटा था। पैसे की चमक ऐसी होती है कि अंधे की आँखों में भी रोशनी ला दे। वही बिरजू, जो तेरह महीने पहले बाप का खून करने पर आमादा था, आज माधो के आगे-पीछे दुम हिलाता फिर रहा था। चंपा के सुर तो ऐसे बदले कि जैसे उसके मुंह में मिसरी घुल गई हो। “बाबूजी के लिए ठंडा शरबत लाऊँ? बाबूजी के पैर दबा दूँ?”—पूरा घर माधो की सेवा में बिछ गया। कुछ हफ्ते बड़े ठाठ और शांति से बीते। गौरी को लगा कि चलो, देर से ही सही, पर घर में सुख-शांति तो आई।
लेकिन स्वार्थ की नींव पर खड़े किए गए रिश्तों के महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। बिरजू और चंपा की नजर माधो के संदूकों और उसकी तिजोरी पर थी। एक रात जब बिरजू ने दबे स्वर में माधो से उसके व्यापार और पैसों को अपने नाम करने की बात छेड़ी, तो माधो का पुराना स्वाभिमान जाग उठा। बाप-बेटे में फिर से तीखी बहस हो गई। बिरजू की आँखों में फिर वही लालच और हैवानियत नाचने लगी।
माधो ने बिना चिल्लाए अपने कमरे का दरवाजा खोला और कोने में सहमी खड़ी गौरी का हाथ पकड़ कर कहा, “गौरी! अब इस घर का दाना-पानी खत्म हुआ। चल, अपने कपड़े समेट… हमें अपने घर चलना है!”
माधो की आवाज में चट्टान जैसी दृढ़ता थी, लेकिन आँखों के कोरों पर नमी तैर रही थी। गौरी ने कांपते होंठों से पूछा, “अजी, इतनी रात गए कहाँ जाएंगे? और हमारा अपना घर कहाँ है?”
“कहा न, सवाल मत कर! बस अपनी दो-चार साड़ियाँ बांध ले। कल सूरज उगने से पहले हम यह चौखट लांघ देंगे,” माधो ने अंतिम फैसला सुना दिया।
गौरी ने जीवन में कभी पति की बात नहीं टाली थी। आज भी वह मन में हजारों अनसुलझे सवालों का तूफान लिए चुपचाप अपनी गठरी बांधने लगी। अगली सुबह जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, दोनों बुजुर्ग बिना किसी को जगाए घर से निकल पड़े और रेलवे स्टेशन जा पहुंचे।
ट्रेन के सफर के दौरान भी दोनों के बीच कोई खास बात नहीं हुई। गौरी बस खिड़की से बाहर भागते पेड़ों को देखती रही और अपने भविष्य की कल्पना से सिहरती रही। कई घंटों के सफर के बाद ट्रेन देहरादून के स्टेशन पर रुकी।
प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते ही एक चमचमाती सफेद कार उनके सामने आकर रुकी। उसमें से दो नौजवान उतरे और उन्होंने झुककर माधो और गौरी के चरण स्पर्श किए—“प्रणाम बाबूजी! प्रणाम माँ जी! सफर में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?”
गौरी अवाक सी उन लड़कों को देखती रही। कार पहाड़ियों के घुमावदार और शांत रास्तों से होती हुई शहर के एक बेहद खूबसूरत और शांत इलाके—राजपुर रोड के पास एक कॉलोनी में पहुंची। एक बड़े से हरे रंग के लोहे के फाटक के सामने कार रुकी, जिस पर लाल और गुलाबी बोगनविलिया के फूलों की बेलें लदी हुई थीं।
माधो ने गौरी का हाथ थामा और उसे फाटक के भीतर ले गया। अंदर कदम रखते ही गौरी की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने एक बेहद सुंदर और साफ-सुथरा आँगन था, जिसके चारों तरफ लीची, आम, अनार और अमरूद के हरे-भरे पेड़ झूम रहे थे। आँगन के बीचों-बीच संगमरमर का एक सुंदर तुलसी चौरा बना था। सामने एक हवादार बरामदा, तीन बड़े कमरे, एक आधुनिक रसोई और चारों तरफ फैली हुई असीम शांति।
गौरी को लगा कि वह खुली आँखों से कोई स्वप्न देख रही है। तभी माधो ने उसके दोनों कंधों को थामकर उसे अपनी ओर घुमाया। आज पहली बार उस कठोर इंसान की आँखों में गौरी के लिए अथाह प्रेम और पश्चाताप का सागर लहरा रहा था।
माधो ने रुंधे गले से कहा, “गौरी, पिछले साल जब मैं उस घर से भागा था, तो आत्महत्या करने के इरादे से ट्रेन में बैठा था। पर रास्ते में मुझे एक बड़े सेठ जी मिले, जिनकी नर्सरी और फलों के बागानों का कारोबार था। मुझे पेड़-पौधों और खेती की अच्छी परख थी, सो उन्होंने मुझे अपने बागानों की देखरेख का जिम्मा सौंप दिया। मेरी ईमानदारी और मेहनत से उनका कारोबार दोगुना हो गया। उनकी कोई संतान नहीं थी, सो पिछले महीने अपने देहांत से पहले वो अपना एक छोटा सा बाग और यह मकान मेरे नाम कर गए। मैं गाँव सिर्फ इसलिए लौटा था ताकि बिरजू को परख सकूँ और तुझे इस नर्क से निकाल कर ला सकूँ। देख गौरी… यह तेरा अपना घर है। यहाँ न कोई सास तुझे ताने देगी, न कोई बहू तुझे बोझ समझेगी। इस घर के हर कोने में बस तेरी ही कमी थी… आज से तू ही इस घर की मालकिन है, संभाल इसे!”
माधो के ये शब्द गौरी के कानों में किसी दिव्य अमृत की तरह पड़े। साठ सालों में उसे जितने भी घाव मिले थे—गरीबी के, पति के गुस्से के, सास के तानों के और बेटे-बहू के तिरस्कार के—उन सब पर जैसे एक ही पल में किसी ने चंदन का लेप लगा दिया हो।
उसने भीगी आँखों से उस पूरे घर को ऐसे निहारा जैसे उसे अपनी पुतलियों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहती हो। तुलसी के चौरे के पास जाकर वह घुटनों के बल बैठ गई और धरती को छूकर माथे से लगा लिया। उसके अंतर्मन में सुकून की एक ऐसी शीतल बयार बही, जिसने उसे भीतर तक तृप्त कर दिया।
“सच में… अपना घर तो अपना ही होता है…” बस इतना ही उसके मुंह से निकला और वह फूट-फूट कर रो पड़ी। पर आज के आँसू दुख के नहीं, बल्कि उस सम्मान और स्वाभिमान के थे, जिसका इंतजार उसने पूरी उम्र किया था। माधो ने आगे बढ़कर उसे उठाया और कांपते हाथों से उसी के पल्लू का कोना लेकर उसकी आँखें पोंछने लगा। ढलती उम्र की इस सांझ में, दोनों ने अपनी जिंदगी की एक नई और सुखद सुबह में कदम रख दिया था।
दोस्तों, बुढ़ापे में माता-पिता को बच्चों की दौलत नहीं, बस दो मीठे बोल और थोड़ा सा सम्मान चाहिए होता है। माधो ने अपनी पत्नी के स्वाभिमान के लिए जो कदम उठाया, उस पर आपकी क्या राय है? क्या बिरजू जैसे बेटों को कभी माफी मिलनी चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें!
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