समर्पण का मौन कर्ज

 आलोक का स्पर्श पाते ही वंदना का सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। उसने आलोक के हाथों को अपनी आंखों से लगा लिया और फूट-फूट कर रोते हुए, टूटते शब्दों में बोली, “आप… आप इतने अच्छे क्यों हैं? क्यों करते हैं आप मेरे लिए इतना सब कुछ? मैंने कल रात आपकी और भैया की सारी बातें सुन ली थीं। आपने मेरे इलाज के लिए अपनी वो सपनों वाली जमीन बेच दी… जिस पर आप अपना बगीचा बनाना चाहते थे! मैंने आपकी जिंदगी में आकर आपको जिम्मेदारियों और खर्चों के सिवा क्या दिया है? पहले मेरी बेटी की जिम्मेदारी, फिर उसकी शादी, और अब मेरी ये बीमारी… मैं आपका ये कर्ज सात जन्मों में भी नहीं उतार पाऊंगी!”

 शहर के एक बड़े निजी अस्पताल के कमरा नंबर तीन सौ दो में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे में केवल मॉनिटर की धीमी-धीमी ‘बीप-बीप’ की आवाज गूंज रही थी, या फिर पचपन वर्षीय वंदना की दबी हुई सिसकियां। वंदना की आंखों से आंसू बिना रुके बह रहे थे और उन गर्म आंसुओं ने उसके सिर के नीचे रखे सफेद तकिए के एक बड़े हिस्से को पूरी तरह भिगो दिया था। उसके होंठ कांप रहे थे, गले से रह-रह कर हिचकियां निकल रही थीं और पूरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन जैसे शब्द उसके कंठ में ही कहीं अटक कर रह गए थे। वह बार-बार अपने कांपते हुए हाथों से अपना चेहरा ढकने की कोशिश कर रही थी, मानो वह दुनिया से ही नहीं, बल्कि खुद अपनी ही नजरों से छुप जाना चाहती हो।

कमरे में मौजूद हर शख्स हैरान और परेशान था। डॉक्टर ने तो सुबह ही कह दिया था कि वंदना की एंजियोप्लास्टी सफल रही है और अब खतरे की कोई बात नहीं है। फिर ऐसा कौन सा दुख था, ऐसी कौन सी पीड़ा थी जो वंदना को भीतर ही भीतर इस कदर कचोट रही थी? वह अपने मन की बात किसी से कह क्यों नहीं रही थी?

वंदना के पलंग के ठीक नीचे, पैरों की तरफ उसकी बहू नंदिनी बैठी हुई थी। नंदिनी धीरे-धीरे अपनी सास के ठंडे पड़ते पैरों को अपने हाथों की गर्माहट दे रही थी। पिछले तीन दिनों से नंदिनी ने पलक तक नहीं झपकाई थी। सास की दवाई से लेकर उनके सूप और स्पंज बाथ तक का सारा काम वह खुद अपने हाथों से कर रही थी। आज के दौर में जहां सास-बहू के रिश्तों में अक्सर खटास की खबरें सुनने को मिलती हैं, वहां नंदिनी जैसी बहू का मिलना किसी वरदान से कम नहीं था। वंदना मन ही मन खुद को बेहद खुशनसीब मानती थी कि उसके बेटे प्रतीक के जीवन में नंदिनी जैसी सुलझी हुई और संस्कारी लड़की आई। नंदिनी की आंखों में भी अपनी सास को इस तरह तड़पते देख आंसू तैर रहे थे।

दूसरी तरफ, स्टूल पर बैठी वंदना की सत्ताईस वर्षीय बेटी मानसी लगातार अपनी मां के माथे और बालों को सहला रही थी। मानसी की शादी को दो साल हो चुके थे, लेकिन मां की तबीयत की खबर सुनते ही वह ससुराल से भागी चली आई थी। मां को इस तरह बच्चों की तरह बिलखते देख मानसी का दिल बैठा जा रहा था। उसने झुककर वंदना के माथे को चूमा और रुंधे हुए गले से सांत्वना देते हुए बोली, “मां, प्लीज शांत हो जाओ न। डॉक्टर अंकल ने कहा है कि आपको बिल्कुल स्ट्रेस नहीं लेना है। आप क्यों रो रही हो? आप देखना, आप बहुत जल्द बिल्कुल ठीक होकर घर चलोगी। और पापा हैं न बाहर! वो डॉक्टर से बात करके अभी आते ही होंगे। वो सब संभाल लेंगे मां। मेरे पापा दुनिया के सबसे अच्छे पापा हैं, उनके रहते आपको कभी कुछ हो ही नहीं सकता।”

मानसी के मुंह से ‘पापा’ शब्द सुनते ही वंदना की हिचकियां और तेज हो गईं। उसने कसकर अपनी आंखें भींच लीं। असल में मानसी की यही बात तो वंदना के कलेजे को चीर रही थी। वंदना भी यह बात बहुत अच्छी तरह जानती थी कि उसके पति आलोक सिर्फ नाम के आलोक नहीं हैं, बल्कि उन्होंने सचमुच उसके अंधेरे जीवन में उजाला भरा है। कोई इंसान इतना निस्वार्थ, इतना त्यागी और इतना महान कैसे हो सकता है, यह वंदना ने सिर्फ किताबों में पढ़ा था, लेकिन आलोक के साथ जीते हुए उसने इसे हर पल महसूस किया था। समय के साथ आलोक के प्रति वंदना का सम्मान और प्रेम किसी पूजा की तरह पवित्र हो गया था।

आज मौत के इतने करीब से गुजरने के बाद, वंदना को अपनी जिंदगी का वह पन्ना साफ-साफ दिखाई दे रहा था, जिसे पच्चीस साल पहले नियति के क्रूर हाथों ने फाड़कर बिखेर दिया था।

तब वंदना की उम्र महज पच्चीस साल थी। उसका पहला विवाह क्षितिज के साथ हुआ था। क्षितिज एक हंसमुख, नेक और अपनी पत्नी पर जान छिड़कने वाला इंसान था। शादी के उन चार सालों में क्षितिज ने वंदना को हथेलियों पर छाले की तरह सहेज कर रखा था। छोटी-छोटी बातों पर सरप्राइज देना, वंदना के मायके वालों का खुद से बढ़कर सम्मान करना और दफ्तर से लौटते वक्त वंदना के बालों के लिए मोगरे का गजरा लाना—क्षितिज की इन आदतों ने वंदना की छोटी सी दुनिया को स्वर्ग बना दिया था। उन दोनों की खुशियों की बगिया तब और महक उठी जब मानसी का जन्म हुआ।

मानसी जब डेढ़ साल की हुई, तब वंदना को अक्सर लगता था कि कहीं उसकी इस हंसती-खेलती गृहस्थी को किसी की नजर न लग जाए। और शायद, खुद उसी की नजर लग गई। उस मनहूस बरसात की शाम को वह भला कैसे भूल सकती है, जब क्षितिज स्कूटर से घर लौट रहे थे और नैनी पुल के पास एक अनियंत्रित ट्रक ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। अस्पताल पहुंचने से पहले ही क्षितिज की सांसें थम चुकी थीं।

सफेद चादर में लिपटे क्षितिज के पार्थिव शरीर को देखकर वंदना सुध-बुध खो बैठी थी। महज पच्चीस साल की उम्र में उसकी मांग का सिंदूर पोंछ दिया गया था और हाथों की चूड़ियां तोड़ दी गई थीं। उस रात वह अपनी डेढ़ साल की नन्ही मानसी को सीने से चिपकाए पूरी रात रोती रही थी। मासूम बच्ची को तो यह भी पता नहीं था कि उसके सिर से पिता का साया उठ चुका है; वह तो बस अपनी मां को रोता देख डर के मारे खुद भी बिलख-बिलख कर रोए जा रही थी।

क्षितिज के जाने के बाद जैसे सारे रिश्ते-नाते और समाज का नजरिया ही बदल गया। कुछ महीनों तक तो सबने सहानुभूति दिखाई, लेकिन धीरे-धीरे वंदना और उसकी बच्ची सबको बोझ लगने लगीं। ससुराल वालों ने दबी जुबान में उसे ही अपने बेटे की मौत का जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया और मायके की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे जिंदगी भर बेटी और नातिन का खर्च उठा सकें। वंदना ने सिलाई-कढ़ाई करके अपनी बच्ची को पालने की ठानी, लेकिन एक अकेली जवान विधवा का समाज में जीना कितना कठिन होता है, यह उसे कदम-कदम पर महसूस होने लगा।

ऐसे ही घने अंधेरे के बीच, क्षितिज के ही दफ्तर में काम करने वाले उनके वरिष्ठ सहकर्मी आलोक उसके जीवन में एक फरिश्ते की तरह आए। आलोक की पत्नी का देहांत एक गंभीर बीमारी के कारण दो साल पहले हो चुका था और उनका चार साल का एक बेटा था—प्रतीक। आलोक ने वंदना के मायके वालों के सामने बहुत ही सम्मानजनक तरीके से विवाह का प्रस्ताव रखा। वंदना पहले तो तैयार नहीं हुई; क्षितिज की यादें अब भी उसके जख्मों को हरा रखे हुए थीं। लेकिन जब उसने नन्ही मानसी के भविष्य और आलोक की आंखों में भरी सच्चाई को देखा, तो उसने भारी मन से हां कर दी।

शादी की पहली ही रात आलोक ने वंदना से एक ऐसी बात कही थी जिसने वंदना को हमेशा के लिए उनका मुरीद बना दिया। आलोक ने बेहद शांत और सौम्य स्वर में कहा था, “वंदना, मैं जानता हूं कि तुमने क्षितिज को बहुत चाहा है। मैं तुम्हारे अतीत को मिटाने या क्षितिज की जगह छीनने नहीं आया हूं। तुम जब चाहो उसे याद कर सकती हो, रो सकती हो। मैं बस तुम्हारे और मानसी के साथ एक दोस्त और एक ढाल बनकर चलना चाहता हूं। आज से मानसी सिर्फ तुम्हारी नहीं, मेरी बेटी है, और प्रतीक तुम्हारा बेटा।”

आलोक ने अपनी इस बात को सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी से इसे साबित किया। उन्होंने कभी मानसी और प्रतीक में रत्ती भर का भी भेदभाव नहीं किया। बल्कि, वंदना ने कई बार देखा कि अगर कभी खिलौने या कपड़ों की बात आती, तो आलोक पहले मानसी की पसंद पूछते और फिर प्रतीक की। जब मानसी को तेज बुखार होता, तो आलोक पूरी-पूरी रात जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखते। उन्होंने मानसी को कभी एहसास ही नहीं होने दिया कि वह उनकी सगी बेटी नहीं है। उधर, वंदना ने भी अपनी पूरी ममता प्रतीक पर उड़ेल दी और दोनों बच्चों ने इस टूटे हुए परिवार को एक खूबसूरत गुलदस्ते में बदल दिया।

लेकिन आज, जब वंदना को दिल का दौरा पड़ा और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो कल रात जब वह अर्ध-बेहोशी की हालत में थी, तब उसने कमरे के बाहर गैलरी में अपने भाई और आलोक के बीच हो रही बातचीत अनजाने में सुन ली थी।

वंदना का भाई आलोक से कह रहा था, “जीजाजी, अस्पताल का बिल और आगे के इलाज का खर्च काफी ज्यादा हो रहा है। आपने तो अपने रिटायरमेंट का सारा पैसा पिछले साल ही मानसी की धूमधाम से शादी करने और प्रतीक का नया बिजनेस सेट करने में लगा दिया था। अब यह आठ लाख रुपये का इंतजाम अचानक कैसे हुआ?”

तब आलोक ने बहुत धीमी आवाज में कहा था, “अरे भाई साहब, आप चिंता मत कीजिए। मैंने वो पुश्तैनी मकान के पीछे वाली जमीन, जिस पर मैं अपने बुढ़ापे के लिए एक छोटा सा बाग और कॉटेज बनाना चाहता था, उसे कल ही कम दाम में बेच दिया है। वंदना की सांसों से बढ़कर मेरे लिए दुनिया की कोई जमीन या सपना नहीं है। बस ये बात वंदना या बच्चों को कभी पता नहीं चलनी चाहिए, वरना वंदना खुद को दोषी मान बैठेगी।”

यही वह बात थी जो आज सुबह से वंदना के सीने में किसी कांटे की तरह चुभ रही थी। वह जानती थी कि आलोक को बागवानी का कितना शौक था। पिछले दस सालों से आलोक हर रविवार को उस जमीन पर जाते थे, वहां की मिट्टी को निहारते थे और वंदना से कहते थे, “देखना वंदना, रिटायरमेंट के बाद हम दोनों यहीं गुलदाउदी और गुलाब के फूल उगाएंगे, और शाम को यहीं बैठकर चाय पिया करेंगे।”

वंदना इसी अपराधबोध और कृतज्ञता के बोझ तले दबी जा रही थी। उसे लग रहा था कि जब से वह आलोक की जिंदगी में आई है, आलोक ने सिर्फ और सिर्फ दिया ही है—अपना नाम, अपना प्यार, अपनी जमा-पूंजी और आज अपने बुढ़ापे का इकलौता सपना भी! और बदले में वह उन्हें क्या दे पाई? बीमारी, अस्पताल के चक्कर और चिंता? यही सोच-सोचकर उसकी आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और आलोक भीतर आए। उनके हाथ में दवाइयों का एक लिफाफा था और चेहरे पर थकान के बावजूद एक शांत मुस्कान थी। सठियाते उम्र के बावजूद उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज था। जैसे ही उन्होंने वंदना को इस तरह हिचकियां लेकर रोते और मानसी व नंदिनी को परेशान देखा, वह तुरंत तेज कदमों से बिस्तर के पास पहुंचे।

“अरे, क्या हुआ वंदना? कहीं दर्द हो रहा है क्या? मानसी, डॉक्टर को बुलाऊं?” आलोक की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी। उन्होंने तुरंत वंदना का कांपता हुआ हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।

आलोक का स्पर्श पाते ही वंदना का सब्र का बांध पूरी तरह टूट गया। उसने आलोक के हाथों को अपनी आंखों से लगा लिया और फूट-फूट कर रोते हुए, टूटते शब्दों में बोली, “आप… आप इतने अच्छे क्यों हैं? क्यों करते हैं आप मेरे लिए इतना सब कुछ? मैंने कल रात आपकी और भैया की सारी बातें सुन ली थीं। आपने मेरे इलाज के लिए अपनी वो सपनों वाली जमीन बेच दी… जिस पर आप अपना बगीचा बनाना चाहते थे! मैंने आपकी जिंदगी में आकर आपको जिम्मेदारियों और खर्चों के सिवा क्या दिया है? पहले मेरी बेटी की जिम्मेदारी, फिर उसकी शादी, और अब मेरी ये बीमारी… मैं आपका ये कर्ज सात जन्मों में भी नहीं उतार पाऊंगी!”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। मानसी और नंदिनी स्तब्ध रह गईं। तभी दरवाजे के पास खड़ा प्रतीक भी अंदर आ गया, उसने भी अपनी मां की पूरी बात सुन ली थी।

आलोक कुछ पल तक खामोश रहे, फिर उनकी आंखों के कोनों में भी नमी चमक उठी। उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकाला और बड़े ही प्यार से वंदना के आंसू पोंछे। फिर वह बिस्तर के किनारे बैठ गए और वंदना की आंखों में देखते हुए बेहद शांत पर गहरे स्वर में बोले, “वंदना, आज तुमने ‘कर्ज’ और ‘एहसान’ जैसे शब्द बोलकर मेरे पच्चीस सालों के प्यार को बहुत छोटा कर दिया। कौन सा कर्ज वंदना? क्या तुम भूल गईं कि जब तुम मेरी जिंदगी में आई थीं, तब मैं भी कितना अकेला और टूटा हुआ था? मेरे चार साल के प्रतीक को जो मां का आंचल तुमने दिया, रात-रात भर जागकर जो तुमने उसकी परवरिश की, मेरे बूढ़े माता-पिता की जो तुमने अंतिम समय तक सेवा की—क्या दुनिया की कोई भी जमीन या दौलत उस त्याग की कीमत चुका सकती है?”

आलोक ने एक गहरी सांस ली और मुस्कुराते हुए आगे कहा, “और रही बात बगीचे की, तो पगली, बगीचा तो फूलों से बनता है। मेरे पास मानसी, प्रतीक और नंदिनी जैसे खिले हुए फूल हैं, और तुम मेरी उस बगिया की रौनक हो। अगर तुम ही नहीं रहोगी, तो मैं उस सूनी जमीन पर गुलाब उगाकर क्या करूंगा? मेरा सबसे बड़ा सपना कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि तुम्हारे साथ बैठकर बुढ़ापे की हर शाम की चाय पीना है। इसलिए अपने मन से यह बोझ हमेशा के लिए निकाल दो।”

पापा की बातें सुनकर प्रतीक आगे बढ़ा और उसने घुटनों के बल बैठकर अपने पापा और मां दोनों के हाथ पकड़ लिए। प्रतीक की आवाज में गर्व और भावुकता दोनों थी, “पापा, मां… आप दोनों ने हमें जिंदगी भर सिर्फ देना ही सिखाया है। पापा, आपने जिस जमीन को मां के लिए बेचा है, मैं आपसे वादा करता हूं कि अगले दो साल के भीतर मैं और नंदिनी मिलकर अपनी मेहनत से आपके लिए वैसी ही जमीन दोबारा खरीदेंगे, और उस पर पहला पौधा मां और आप दोनों अपने हाथों से लगाएंगे।”

नंदिनी ने भी मुस्कुराते हुए अपनी सास के आंसू पोंछे और बोली, “बिल्कुल मां, अब आपको रोना नहीं है, बल्कि जल्दी से ठीक होकर घर चलना है। आपके बिना घर का आंगन बिल्कुल सूना लगता है।”

मानसी ने आगे बढ़कर अपने पापा के कंधे पर सिर रख दिया और बोली, “मैंने कहा था न मां, मेरे पापा दुनिया के सबसे अच्छे पापा हैं।”

परिवार का यह अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण देखकर वंदना के भीतर का सारा अपराधबोध और भारीपन जैसे आंसुओं के साथ बह गया। उसके कांपते शरीर में एक नई ऊर्जा और सुकून का संचार हो रहा था। उसने देखा कि सचमुच, रिश्ते खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति समर्पण, सम्मान और निस्वार्थ प्रेम से बनते हैं। वंदना के चेहरे पर कई दिनों बाद एक शांत और उजली मुस्कान खिल उठी, और उसने कसकर आलोक का हाथ थाम लिया।

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