“अजी सुनते हो! सुबह-सुबह चश्मा नाक पर टिकाए ऐसे क्या घूर रहे हो? कोई अजूबा देख लिया क्या? जैसे-जैसे बाल सफेद हो रहे हैं, वैसे-वैसे आपकी शरारतें बढ़ती जा रही हैं!” अपनी सूती साड़ी के पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए गौरी देवी ने मीठी झिड़की दी। उनके हाथों में तुलसी के गमले में डालने के लिए तांबे का लोटा था और चेहरे पर सुबह की ताजगी।
बेंत की आरामकुर्सी पर बैठे उमाकांत तिवारी जी ने अखबार को थोड़ा नीचे किया और अपनी पत्नी को ऊपर से नीचे तक निहारते हुए मुस्कुराए। “अरे भागवान, अजूबा ही तो देख रहा हूँ। पचपन साल की हो गईं, कमर थोड़ी फैल गई है, घुटनों में कट-कट की आवाज आने लगी है, फिर भी जब तुम सुबह नहा-धोकर सिंदूर लगाती हो न, तो कसम से आज भी वही पुरानी मधुबाला लगती हो। मैं तो सोच रहा हूँ कि इस उम्र में इतना रूप-रंग ठीक नहीं, कहीं मेरी ही नजर न लग जाए तुम्हें!”
उमाकांत जी की इस रसिक बात पर गौरी देवी के झुर्रियों भरे गालों पर अचानक गुलाबी लाली दौड़ गई। वे शर्म से सिमट गईं और झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं, “धत्! बुढ़ापे में मति मारी गई है आपकी। बच्चे सुनेंगे तो क्या कहेंगे? चलिए, चाय ठंडी हो रही है, पी लीजिए।”
प्रयागराज के सिविल लाइंस इलाके में स्थित तिवारी जी की यह पुश्तैनी कोठी आज के दौर में किसी अजूबे से कम नहीं थी। जहाँ आजकल पूरे शहर में माचिस की डिब्बियों जैसे फ्लैट और चार फीट की तंग बालकनियाँ उग आई थीं, वहीं उमाकांत जी ने अपने बाप-दादा की इस विशाल कोठी को सहेज कर रखा था। घर के बीचों-बीच एक बड़ा सा खुला आँगन था, जिसके एक कोने में नीम का पुराना पेड़ और बीच में तुलसी का चौरा था। आँगन के चारों तरफ हवादार कमरे और एक बड़ा सा रसोईघर था।
उमाकांत जी लोक निर्माण विभाग से मुख्य अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने कभी एक पैसे की बेईमानी नहीं की, फिर भी उनकी ईमानदारी की कमाई, पैतृक संपत्ति और भारी-भरकम पेंशन से घर में लक्ष्मी की कोई कमी नहीं थी। भरा-पूरा संयुक्त परिवार था। बड़ा बेटा सिद्धार्थ आयकर विभाग में इंस्पेक्टर था और छोटा बेटा तरुण एक सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर। दोनों बहुएँ—रोहिणी और नंदिनी—पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली थीं। घर में चार पोते-पोतियों की किलकारियाँ गूँजती थीं।
लेकिन आँगन की इस मधुर ठिठोली से ठीक दस कदम दूर, रसोईघर की खिड़की के पीछे एक अलग ही खिचड़ी पक रही थी। बड़ी बहू रोहिणी चाय की पत्ती उबालते हुए मुंह बिचका कर छोटी बहू नंदिनी से बोली, “देख रही हो नंदिनी? बाहर आँगन में क्या रासलीला चल रही है! मतलब हद होती है किसी चीज की। साठ पार कर चुके हैं दोनों, लेकिन मजाल है कि थोड़ा भी लिहाज हो। इस उम्र में तो इंसान को हाथ में माला लेकर हरि भजन करना चाहिए, चारधाम की यात्रा करनी चाहिए, और यहाँ देखो… बुढ़ऊ को अभी भी अपनी बुढ़िया में मधुबाला नजर आ रही है!”
नंदिनी ने परांठे बेलते हुए व्यंग्य से हँसकर कहा, “बिल्कुल सही कह रही हैं दीदी। मुझे तो कभी-कभी शर्म आती है कि अगर बच्चे यह सब देख लें तो उन पर क्या असर पड़ेगा। मम्मी जी को भी देखो न, कैसे इतरा रही हैं जैसे नई-नवेली दुल्हन हों। हमारे मायके में तो इस उम्र के बुजुर्ग अपने कमरे में शांत पड़े रहते हैं, और यहाँ इनका हनीमून ही खत्म नहीं हो रहा।” दोनों देवरानी-जेठानी अपने सास-ससुर के इस निश्छल प्रेम को ‘बेशर्मी’ का नाम देकर आपस में भड़ास निकाल रही थीं। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि जिस प्रेम ने इस पूरे परिवार की नींव को चालीस साल से जोड़कर रखा है, उसी की वजह से आज वे इस सुख-सुविधा भरी कोठी में रानी बनकर राज कर रही हैं।
उमाकांत जी और गौरी देवी को अपनी बहुओं की इस खुसर-फुसर का अंदाजा तो था, पर वे दोनों इसे नादान बच्चों की नासमझी मानकर अनदेखा कर देते थे। उमाकांत जी का मानना था कि जब तक पति-पत्नी आपस में मित्र बने रहते हैं, तब तक बुढ़ापा उन्हें छू भी नहीं सकता।
अभी उमाकांत जी ने चाय की पहली चुस्की ली ही थी कि कोठी का लोहे वाला मुख्य द्वार चरमरा कर खुला। उनका पच्चीस साल पुराना ड्राइवर, बंसीलाल, बदहवास सा दौड़ता हुआ आँगन में आया। बंसीलाल की सांसें फूल रही थीं, चेहरा सफेद पड़ गया था और आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने आते ही उमाकांत जी के पैरों में अपना गमछा रख दिया और फूट-फूट कर रोने लगा।
“अरे-अरे बंसी! यह क्या कर रहे हो भाई? उठो, ऊपर उठो!” उमाकांत जी ने घबराकर चाय का कप मेज पर रखा और बंसीलाल को कंधों से पकड़कर उठाया। गौरी देवी भी लोटा रखकर तुरंत पास आ गईं। “क्या हुआ बंसी भैया? सब खैरियत तो है? घर में सब ठीक हैं न?” गौरी देवी ने ममतामयी स्वर में पूछा।
बंसीलाल ने कांपते हाथों को जोड़ते हुए रुंधे गले से कहा, “बाबूजी, मैं कहीं का नहीं रहा! मेरी जिनगी भर की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी बाबूजी। अगले हफ्ते मेरी मुनिया की बारात आने वाली है, कार्ड छपकर बंट चुके हैं, हलवाई को बयाना दे दिया है। लेकिन कल रात समधी जी का फोन आया… कह रहे हैं कि उन्हें दहेज में अपाचे गाड़ी नहीं, बल्कि चार पहिया की ऑल्टो कार चाहिए और साथ में दो लाख रुपये नकद। कह रहे हैं कि लड़के की नौकरी पक्की हो गई है, इसलिए अब उनका रुतबा बढ़ गया है। अगर तीन दिन में इंतजाम नहीं हुआ, तो वे बारात लेकर नहीं आएंगे!”
इतना कहकर बंसीलाल फिर से सिसकने लगा, “बाबूजी, मैंने अपनी जमीन का छोटा सा टुकड़ा बेचकर और पाई-पाई जोड़कर तीन लाख जमा किए थे। अब अचानक डेढ़ लाख रुपये और कहाँ से लाऊँ? किसके आगे हाथ फैलाऊँ? साहूकार के पास गया तो उसने घर गिरवी रखने को कहा। मुझे अंधेरे में सिर्फ आपकी ही सूरत दिखाई दी बाबूजी, मुझे बचा लीजिए, वरना मेरी फूल सी बच्ची कुंवारी रह जाएगी और मैं जीते-जी मर जाऊँगा।”
उमाकांत जी के माथे पर बल पड़ गए। सरकारी विभाग में बड़े-बड़े ठेकेदारों की अकड़ को एक झटके में सीधा कर देने वाले उमाकांत जी का खून खौल उठा। उन्होंने बंसीलाल के आँसू पोंछते हुए कड़क आवाज में कहा, “रोना बंद करो बंसी! जब तक उमाकांत तिवारी जिंदा है, तुम्हारी मुनिया की शादी कोई नहीं रोक सकता। वह सिर्फ तुम्हारी नहीं, इस घर की भी बेटी है। मेरे सामने घुटनों के बल चलना सीखा है उसने। तुम जरा उस लालची समधी का नंबर तो लगाओ, मैं अभी उसकी अकल ठिकाने लगाता हूँ। दहेज मांगने के जुर्म में ऐसी धाराएं लगवाऊँगा कि पूरी बारात हवालात में चक्की पीसेगी!”
बंसीलाल थर-थर कांपने लगा। उसने तुरंत उमाकांत जी के हाथ पकड़ लिए, “ना बाबूजी, ना! आपके पैरों पड़ता हूँ, पुलिस या कचहरी का नाम मत लीजिए। हम गरीब लोग हैं बाबूजी। अगर बात बिगड़ गई और शादी टूट गई, तो समाज में लड़की के नाम पर कलंक लग जाएगा। फिर कोई उससे ब्याह नहीं करेगा। मेरी मुनिया यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। आप बस मुझे डेढ़ लाख रुपये उधार दे दीजिए। मैं कसम खाता हूँ, जब तक शरीर में प्राण हैं, आपकी गाड़ी चलाऊँगा। आप हर महीने मेरी तनख्वाह में से पैसे काट लीजिएगा, मैं आधे पेट खा लूँगा बाबूजी, पर उस घर में झगड़ा मत कीजिए।”
एक बेबस पिता की लाचारी देखकर उमाकांत जी का कलेजा पसीज गया। उनकी आँखों के कोरों में नमी तैर गई। उन्हें अपनी इकलौती बेटी मृदुला की याद आ गई, जो ब्याह के बाद पुणे में बस गई थी। काम और गृहस्थी की व्यस्तता के कारण वह साल-दो साल में एकाध बार ही प्रयागराज आ पाती थी। बेटी के वियोग और कन्यादान के मर्म को उमाकांत जी से बेहतर कौन समझ सकता था।
उमाकांत जी ने गहरी सांस ली और बंसीलाल के कंधे पर थपकी देते हुए बोले, “अच्छा, जैसा तुम चाहो। किसी की तनख्वाह काटने की जरूरत नहीं है। मुनिया की शादी में जो डेढ़ लाख घट रहे हैं, वह मैं दूँगा। और सुनो, बारात तुम्हारे उस तंग गली वाले कच्चे मकान में नहीं आएगी। बारात इसी कोठी के आँगन में आएगी। टेंट, बिजली और बारातियों के स्वागत का सारा इंतजाम मेरी तरफ से होगा। आखिर मेरी भी तो बेटी है वह! कन्यादान करने से बड़ा कोई यज्ञ नहीं होता बंसी। जाओ, आँसू पोंछो और मुनिया की डोली सजाने की तैयारी करो।”
बंसीलाल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह अवाक होकर अपने मालिक को देखता रह गया, जैसे साक्षात भगवान उसके सामने खड़े हों। गौरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे अब खड़े-खड़े मुंह क्या ताक रहे हो बंसी भैया? जाओ, अपनी घरवाली को यह खुशखबरी सुनाओ और शाम को उसे लेकर आना, मुनिया के लिए शादी का जोड़ा और चांदी की पायल मेरी तरफ से रहेगी।”
बंसीलाल झोली फैलाकर दुआएं देता हुआ खुशी-खुशी बाहर निकल गया। उमाकांत जी को देखकर गौरी देवी की आँखों में गर्व की चमक थी। उन्होंने धीरे से कहा, “आज आपने फिर साबित कर दिया कि मैंने पिछले जन्म में जरूर कोई बड़े पुण्य किए थे जो आप जैसा जीवनसाथी मिला। किसी गरीब की डूबती नैया पार लगाने से बड़ा कोई धर्म नहीं है।”
लेकिन इस धर्म और पुण्य की सुगंध रसोई से निकलकर ड्राइंग रूम तक पहुँचे दोनों बेटों और बहुओं को रास नहीं आई। ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर निकले सिद्धार्थ और तरुण ने जब यह पूरा वाकया सुना, तो उनके चेहरों का रंग उड़ गया।
बंसीलाल के जाते ही बड़ा बेटा सिद्धार्थ तमतमाता हुआ आँगन में आया और थोड़े तल्ख स्वर में बोला, “पापा, यह आपने क्या किया? डेढ़ लाख रुपये नकद और ऊपर से इस कोठी में बारात का खर्चा! कुल मिलाकर ढाई-तीन लाख का फटका लगा दिया आपने। आपको पता भी है आज के जमाने में तीन लाख रुपये की क्या कीमत होती है? बंसीलाल हमारा नौकर है, उसे नौकर की तरह ही रखिए। दस-बीस हजार की मदद कर देते तो समझ आता, पर आपने तो पूरी तिजोरी ही लुटा दी!”
छोटा बेटा तरुण भी पीछे नहीं रहा, “और नहीं तो क्या पापा! हम लोग यहाँ बच्चों के अच्छे स्कूल की फीस और कार की ईएमआई भरने के लिए बजट बनाते रहते हैं, और आप हैं कि दानवीर कर्ण बने फिरते हैं। साफ मना कर देते कि हमारे पास फालतू पैसे नहीं हैं। पर आपको तो समाज में अपनी वाहवाही लूटने का शौक है!”
रसोई के दरवाजे पर खड़ी बड़ी बहू रोहिणी ने भी आग में घी डालते हुए कहा, “पिछले महीने जब मैंने अपने कमरे के लिए नया एसी और सोफा सेट बदलने की बात कही थी, तब तो पापा जी ने कह दिया था कि फिजूलखर्ची मत करो। अब ड्राइवर की बेटी पर लुटाने के लिए पैसे पेड़ पर उग आए हैं क्या?”
बेटे और बहुओं की कड़वी बातें सुनकर आँगन का माहौल अचानक भारी हो गया। गौरी देवी का चेहरा दुख से सफेद पड़ गया, वे कुछ बोलने ही वाली थीं कि उमाकांत जी ने हाथ के इशारे से उन्हें शांत रहने को कहा। उमाकांत जी अपनी कुर्सी से उठे। उनके चेहरे पर क्रोध नहीं, बल्कि एक अजीब सी गंभीरता थी।
उन्होंने शांत किंतु दृढ़ शब्दों में कहा, “सिद्धार्थ और तरुण, मैं जो कुछ भी खर्च कर रहा हूँ, वह मेरी अपनी पेंशन और मेरी जीवन भर की जमा-पूंजी है। मैंने तुम दोनों से एक रुपया भी नहीं मांगा है। तुम दोनों को पढ़ा-लिखा कर इस काबिल बना दिया कि आज लाखों कमा रहे हो, रहने को यह छत दे दी, अब मेरी कमाई किस काम में लगेगी, यह तय करने का हक सिर्फ मेरा और तुम्हारी माँ का है। बंसीलाल ने पच्चीस साल हमारी सेवा की है। जब तुम्हें आधी रात को बुखार होता था न सिद्धार्थ, तो यही बंसीलाल कड़कड़ाती ठंड में साइकिल भगाकर डॉक्टर को बुलाकर लाता था। आज उसकी इज्जत दांव पर लगी है, तो मैं मुँह मोड़ लूँ? रही बात तुम्हारे सोफे और एसी की बहू, तो विलासिता और किसी की आवश्यकता में जमीन-आसमान का फर्क होता है।”
पापा का यह रौद्र और अडिग रूप देखकर दोनों बेटे सहम गए। वे अच्छी तरह जानते थे कि उमाकांत जी अपने सिद्धांतों के कितने पक्के हैं। अगर वे दोनों अपना सिर भी दीवार पर पटक लें, तब भी पापा अपने फैसले से एक इंच पीछे नहीं हटेंगे। मन ही मन कुढ़ते और बड़बड़ाते हुए दोनों बेटे ऑफिस चले गए और बहुओं ने अपने-अपने कमरों के दरवाजे धड़ाम से बंद कर लिए।
अगले कुछ दिनों तक घर में अघोषित कर्फ्यू जैसा माहौल रहा। बेटों और बहुओं ने उमाकांत जी और गौरी देवी से बात करना बंद कर दिया। सुबह-शाम का खाना मेज पर रख दिया जाता, पर कोई प्यार से पूछने नहीं आता। लेकिन इस बेरुखी ने बुजुर्ग दंपति के उत्साह को जरा भी कम नहीं किया। उमाकांत जी ने खुद खड़े होकर कोठी के आँगन में सुंदर शामियाना लगवाया, रंग-बिरंगी झालरों से पूरे घर को दुल्हन की तरह सजाया। गौरी देवी ने पड़ोस की महिलाओं को बुलाकर मंगल गीत गवाए और खुद अपने हाथों से मुनिया को हल्दी लगाई।
शादी की रात आँगन की रौनक देखते ही बनती थी। बंसीलाल की बेटी मुनिया लाल जोड़े में साक्षात लक्ष्मी लग रही थी। सिद्धार्थ, तरुण और दोनों बहुएँ सिर्फ लोक-लाज के डर से महंगे कपड़े पहनकर एक कोने में मेहमानों की तरह खड़े थे। उनके चेहरों पर साफ लिखा था कि वे इस आयोजन से खुश नहीं हैं।
बारात आई, धूमधाम से स्वागत हुआ। जब वरमाला का समय आया, तो स्टेज पर खड़े दूल्हे के पिता ने चारों तरफ का भव्य इंतजाम देखा, पर उनकी लालची नजरें उस लिफाफे को ढूंढ रही थीं जिसकी उन्होंने शर्त रखी थी। जयमाला के ठीक बाद, जब सब लोग फोटो खिंचवा रहे थे, तभी कोठी के मुख्य द्वार पर पुलिस की एक जीप आकर रुकी।
जीप में से शहर के पुलिस कमिश्नर विवेक राजपूत अपनी पत्नी के साथ उतरे। कमिश्नर साहब के हाथ में फूलों का एक बड़ा सा गुलदस्ता और एक तोहफा था। पुलिस की वर्दी और कंधे पर चमकते सितारे देखकर बारातियों में हलचल मच गई। दूल्हे के पिता का तो पसीना ही छूट गया। वहीं कोने में खड़े सिद्धार्थ और तरुण की आँखें फटी की फटी रह गईं—शहर का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी एक ड्राइवर की बेटी की शादी में कैसे आ गया?
कमिश्नर विवेक राजपूत सीधे चलते हुए उमाकांत जी के पास पहुँचे और सबके सामने झुककर उनके और गौरी देवी के पैर छू लिए। “प्रणाम अंकल जी, प्रणाम आंटी जी! मुझे माफ कीजिएगा, एक जरूरी मीटिंग की वजह से आने में थोड़ी देर हो गई,” कमिश्नर साहब ने बड़ी विनम्रता से कहा।
उमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए उन्हें गले लगा लिया, “अरे विवेक बेटा, तुम आए यही हमारे लिए बहुत बड़ी बात है। आओ, दुल्हन को आशीर्वाद दो।”
स्टेज पर जाकर कमिश्नर साहब ने मुनिया के सिर पर हाथ रखा और फिर माइक हाथ में लेकर वहां मौजूद सभी लोगों से मुखातिब हुए, “देवियों और सज्जनों, आज मैं यहाँ एक पुलिस कमिश्नर के तौर पर नहीं, बल्कि इस घर के बड़े बेटे और इस प्यारी सी बच्ची के बड़े भाई के रूप में आया हूँ। शायद आप में से बहुत कम लोग जानते होंगे कि आज मेरे कंधे पर यह जो आईपीएस की वर्दी है, यह सिर्फ और सिर्फ उमाकांत अंकल की देन है। आज से पंद्रह साल पहले, मैं इसी प्रयागराज के एक छोटे से कमरे में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था। मेरे पिताजी एक मामूली किसान थे। अचानक पिताजी का देहांत हो गया और मेरी पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई। मेरे पास परीक्षा का फॉर्म भरने और किताबें खरीदने तक के पैसे नहीं थे। तब किसी के जरिए मैं उमाकांत अंकल से मिला था। इन्होंने बिना किसी जान-पहचान के, सिर्फ मेरी लगन देखकर मेरी पूरी पढ़ाई का खर्च उठाया। जब मैंने पैसे लौटाने की बात कही, तो इन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा था—’बेटा, यह कर्ज नहीं है, यह समाज की अमानत है। जिस दिन काबिल बन जाना, किसी और जरूरतमंद की मदद कर देना।'”
कमिश्नर साहब की आवाज भावुक हो गई, “अंकल जी अपनी पेंशन का एक बड़ा हिस्सा हर महीने अनाथ बच्चों की शिक्षा और गरीब बेटियों के विवाह में लगाते हैं, लेकिन कभी अपने बाएं हाथ को भी पता नहीं चलने देते कि दाएं हाथ ने क्या दान किया। बंसीलाल काका, आप बहुत भाग्यशाली हैं कि आपकी बेटी का कन्यादान उमाकांत अंकल जैसे देवता के आँगन में हो रहा है। और हाँ…” कमिश्नर साहब ने दूल्हे और उसके पिता की तरफ तीखी नजरों से देखते हुए कहा, “यह मेरी मुंहबोली बहन है। ससुराल में इसे कभी किसी चीज की कमी या कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। मैं हर त्योहार पर अपनी बहन से मिलने इसके ससुराल आया करूँगा।”
कमिश्नर साहब की बात सुनकर दूल्हे के पिता के हाथ-पांव फूल गए। उन्होंने तुरंत जेब से वह डेढ़ लाख रुपये का लिफाफा निकाला, जो उमाकांत जी ने थोड़ी देर पहले बंसीलाल के जरिए उन्हें भिजवाया था, और कांपते हाथों से उमाकांत जी के सामने रखते हुए बोले, “बाबूजी, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हमें क्षमा कर दीजिए। हमें एक रुपया भी नहीं चाहिए। जिस घर की बेटी के पीछे आप जैसे महात्मा और कमिश्नर साहब जैसे भाई खड़े हों, वह बेटी खुद हमारे घर के लिए सबसे बड़ा धन है। हम मुनिया को पलकों पर बिठाकर रखेंगे।”
पूरा आँगन तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। बंसीलाल की आँखों से खुशी के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
लेकिन इस वक्त सबसे बड़ा तूफान कोने में खड़े सिद्धार्थ, तरुण और दोनों बहुओं के भीतर चल रहा था। जिस पिता को वे लोग ‘महान बनने का ढोंग करने वाला’, ‘पैसा पानी में बहाने वाला’ और ‘सठियाया हुआ बुढ़ऊ’ समझ रहे थे, उस पिता का कद समाज की नजरों में कितना ऊँचा था, यह देखकर वे शर्म से जमीन में गड़ गए। रोहिणी और नंदिनी को अपनी रसोई वाली बातें याद आ रही थीं और ग्लानि से उनका सिर झुक गया था। उन्हें समझ आ गया कि उनके सास-ससुर का आपसी प्रेम कोई छिछोरापन नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की पवित्रता थी, जो उन्हें इस उम्र में भी दूसरों के दुख बांटने की शक्ति देती थी।
सुबह तड़के जब मुनिया की विदाई हो गई और सारे मेहमान चले गए, तो उमाकांत जी और गौरी देवी थककर आँगन में अपनी उन्हीं बेंत की कुर्सियों पर बैठे थे। तभी सिद्धार्थ, तरुण, रोहिणी और नंदिनी वहां आए। चारों की आँखें नम थीं।
सिद्धार्थ और तरुण बिना कुछ कहे अपने पिता के घुटनों के पास जमीन पर बैठ गए और उनके पैरों पर अपना सिर रख दिया। सिद्धार्थ फफक कर रो पड़ा, “पापा, हमें माफ कर दीजिए! हम पैसों की चकाचौंध में इतने अंधे हो गए थे कि अपने ही पिता के भीतर बैठे भगवान को नहीं पहचान पाए। हम तिजोरी में बंद कागज के नोटों को ही अपनी विरासत समझ बैठे थे, जबकि आपकी असली विरासत तो वह इज्जत और दुआएं हैं, जो आज हमने अपनी आँखों से देखीं।”
बड़ी बहू रोहिणी ने गौरी देवी के गले लगकर रोते हुए कहा, “मम्मी जी, हम बहुत छोटे दिल के निकले। हमने आपके और पापा जी के पवित्र प्रेम का भी मजाक उड़ाया और आपकी नेकी पर भी सवाल उठाए। हो सके तो अपनी इन नादान बहुओं को माफ कर दीजिए। आज से इस घर में वही होगा जो आप दोनों चाहेंगे।”
उमाकांत जी की आँखों से भी स्नेह के आँसू छलक पड़े। उन्होंने दोनों बेटों को कंधे से पकड़कर उठाया और सीने से लगा लिया। गौरी देवी ने दोनों बहुओं के माथे चूम लिए।
उमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए अपनी पत्नी की ओर देखा और माहौल को हल्का करते हुए बोले, “देखा लाजो… मेरा मतलब गौरी! मैं कहता था न कि हमारे बच्चे बुरे नहीं हैं, बस दुनियादारी की धूल उनकी आँखों पर जम गई थी। आज वह धूल साफ हो गई।”
गौरी देवी ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा, “हाँ जी, अब चलिए आराम कीजिए, वरना आपकी यह मधुबाला चाय बनाते-बनाते थक जाएगी!”
इस बात पर चारों बच्चे खिलखिला कर हँस पड़े। प्रयागराज की उस पुरानी कोठी का आँगन एक बार फिर से प्रेम, सम्मान और अपनत्व की खुशबू से महक उठा था।
क्या आपके विचार से भी माता-पिता द्वारा कमाए गए संस्कार और पुण्य, बैंक बैलेंस से कहीं बड़ी विरासत होते हैं? उमाकांत जी और गौरी देवी के इस फैसले पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं!
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