भीतर का कोहरा

अनिकेत सन्न रह गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमेशा सहमी रहने वाली मल्लिका कभी इस तरह पलटवार करेगी। अनिकेत ने धमकियाँ देने की कोशिश की कि वह उसे समाज में बदनाम कर देगा, लेकिन मेधा और उनकी टीम के कड़े रुख और पुलिस की कानूनी चेतावनी ने अनिकेत की सारी हेकड़ी पल भर में निकाल दी

 संगमरमर के फर्श पर क्रिस्टल के झूमर की चमक और ब्राण्डेट परफ्यूम की महक से पूरा ड्राइंगरूम महक रहा था। उस रविवार संध्या को ‘मल्लिका’ ने अपने घर पर एक विशेष पार्टी का आयोजन किया था। शहर की जानी-मानी और संभ्रांत महिलाओं का जमावड़ा था। इम्पोर्टेड क्रॉकरी में तरह-तरह के विदेशी व्यंजन सजे हुए थे, और दो प्रशिक्षित वेटर मेहमानों की खातिरदारी में लगातार मुस्तैद थे।

मल्लिका की सहेलियाँ और आस-पड़ोस की कुलीन महिलाएँ उसके जीवन की भव्यता को देखकर मुग्ध थीं। सोफे पर बैठीं उसकी खास सहेली ‘नताशा’ ने अपनी प्लेट मल्लिका की तरफ बढ़ाई और तारीफों के पुल बांधते हुए बोली—

“मल्लिका यार, तुम्हारी इस पार्टी का कोई जवाब नहीं! क्या सजावट है, क्या अंदाज़ है! और सच कहूँ तो तुमने वाकई किस्मत पाई है। तुम्हारे पति ‘अनिकेत’ कितने सुलझे हुए और केयरिंग इंसान हैं। सुबह-शाम बस तुम्हारी फिक्र में लगे रहते हैं, जैसे कोई रानी बनाकर रखा हो तुम्हें।”

पास बैठी दूसरी महिला ‘ऋचा’ ने भी तुरंत हामी भरी, “हाँ यार मल्लिका! हम सब तो बस देखती रह जाती हैं। ऐसा पति और ऐसा आलीशान घर मिलना हर किसी के भाग्य में कहाँ होता है।”

मल्लिका ने हमेशा की तरह अपने होंठों पर एक बहुत सधी हुई, नपी-तुली और सुंदर सी मुस्कान सजा ली। उसने सहजता से कहा, “अरे, तुम सब भी ना… ऐसा कुछ नहीं है, बस सबका प्यार है।”

तभी बातचीत के बीच में नताशा की नज़र मल्लिका के चेहरे पर पड़ी। उसने गौर किया कि मल्लिका ने अंदर ड्राइंगरूम की तेज़ रोशनी और पार्टी के माहौल के बावजूद एक बहुत ही स्टाइलिश ब्लैक-फ्रेम वाला डार्क सनग्लासेस पहन रखा था। नताशा ने थोड़ा हैरान होते हुए टोक दिया—

“अरे मल्लिका! एक बात बताओ, घर के अंदर इस पार्टी में और इस खूबसूरत लाइटिंग के बीच तुमने ये काला चश्मा क्यों पहना हुआ है? कोई नया फैशन ट्रेंड है क्या?”

उस पल के लिए मल्लिका के भीतर जैसे कुछ टूट सा गया। उसके पैर के नीचे की ज़मीन जैसे एक सेकेंड के लिए खिसक गई। लेकिन उसने अपनी घबराहट को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया। वह एक पल को ठिठकी, खुद को संभाला, और फिर उसी सधी हुई मुस्कान के साथ बोली—

“अरे कुछ नहीं यार… बस सुबह से आँखों में थोड़ा भारीपन और दर्द था। मुझे लगा कि कहीं कोई इन्फेक्शन या आई फ्लू न हो जाए, इसलिए डॉक्टर ने एहतियात के तौर पर चश्मा लगाने को कहा है ताकि किसी और को न फैले।”

सबकी हँसी गूँजी और बात आई-गयी हो गई। किसी ने गहराई से यह जानने की कोशिश नहीं की कि उस चश्मे के पीछे क्या छिपा है। पार्टी रात के ग्यारह बजे तक चली। एक-एक करके सभी मेहमान विदा हो गए। वेटर भी समेटकर जा चुके थे। कोठी के विशाल कमरे में अचानक एक सन्नाटा पसर गया, जो किसी भारी चट्टान की तरह मल्लिका के सीने पर आ बैठा था।

अनिकेत अपने स्टडी रूम से बाहर निकला। उसने एक ठंडी और उलाहना भरी नज़र मल्लिका पर डाली और बिना कुछ कहे अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गया। मल्लिका ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए और अपने कमरे के ड्रेसिंग टेबल के सामने आकर खड़ी हो गई। उसने अपने हाथ काँपते हुए आगे बढ़ाए और वह काला चश्मा धीरे से अपनी आँखों से उतार दिया।

आईने में जो अक्स दिखाई दिया, वह किसी को भी दहलाने के लिए काफी था। मल्लिका की दोनों आँखें बुरी तरह सूजी हुई थीं, पलकें लाल थीं और गालों पर सूखे हुए आँसुओं की परोपरी लकीरें साफ नज़र आ रही थीं। लेकिन असली दर्द उसकी आँखों में नहीं था। असली दर्द तो उस कृत्रिम मुस्कान में था, जिसे उसे समाज के सामने, अपनी सहेलियों के सामने और इस तथाकथित सभ्य दुनिया के सामने हर रोज़ एक मुखौटे की तरह पहनना पड़ता था।

मल्लिका की शादी को अभी बमुश्किल तीन साल हुए थे। बाहर से अनिकेत एक सफल उद्यमी, दिखने में बेहद हैंडसम और शहर के संभ्रांत वर्ग का चहेता इंसान था। लेकिन चार दीवारों के भीतर अनिकेत का दूसरा ही रूप था—एक ऐसा क्रूर और अहंकारी इंसान, जो मल्लिका के आत्मसम्मान को रोज थोड़े-थोड़े हिस्से में काटता था। अनिकेत को बात-बात पर शक करने की बीमारी थी। मल्लिका किसी से हँसकर बात कर ले, फोन पर किसी रिश्तेदार से लंबी बात हो जाए या वह अपनी किसी सहेली से मिलने चली जाए, तो अनिकेत का पारा सातवें आसमान पर पहुँच जाता था।

पिछले हफ्ते ही जब मल्लिका ने अपनी एक पुरानी सहेली की शादी में जाने की इच्छा जताई थी, तो अनिकेत ने सरेआम उसे बेल्ट से मारा था और धमकी दी थी कि अगर उसने अपनी हदें लांघने की कोशिश की, तो उसके परिवार को बर्बाद कर देगा। मल्लिका के माता-पिता बहुत ही सीधे-साधे और वृद्ध लोग थे, जिन्हें वह किसी भी सूरत में तनाव नहीं देना चाहती थी। उसने सोचा था कि शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा, वह अपने सहनशील स्वभाव से अनिकेत का दिल जीत लेगी। पर वह गलत थी। ज़ुल्म सहने से ज़ालिम का हौसला और बढ़ जाता है, यह कड़वा सच मल्लिका को हर दिन घुट-घुट कर जीने पर मजबूर कर रहा था।

रात के सन्नाटे में मल्लिका फूट-फूटकर रोई। उसके पास रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। वह खुद से सवाल करती—”क्या एक औरत की ज़िंदगी बस इसी पाखंड के लिए बनी है कि वह अंदर से टूट चुकी हो, पर बाहर से एक सुखी वैवाहिक जीवन का नाटक करती रहे? क्या समाज की नज़र में अपनी इज्जत बचाने की कीमत अपनी जान का सौदा करके चुकानी पड़ती है?”

अगली सुबह सूरज की किरणें हमेशा की तरह खिड़की से अंदर आईं। अनिकेत अपने ऑफिस के लिए निकल चुका था। कोठी में फिर से वही सन्नाटा था। मल्लिका उठी, उसने आईने में खुद को देखा। उसकी सूजी हुई आँखें आज भी दर्द बयां कर रही थीं। लेकिन इस बार उस दर्द के साथ आँखों में एक अजीब सी चमक और जिद भी थी। वह अब इस घुटन भरे जीवन को और अधिक नहीं खींचना चाहती थी।

मल्लिका ने अपना फोन उठाया और सबसे पहले अपनी सबसे पुरानी और समझदार दोस्त ‘मेधा’ का नंबर डायल किया, जो एक महिला अधिकार संगठन से जुड़ी हुई थीं। मल्लिका ने बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना डरे, अपने ऊपर हुए हर जुल्म की दास्तान मेधा को कह सुनाई। फोन के दूसरी तरफ मेधा की आवाज़ में एक चट्टान जैसी मजबूती थी—”मल्लिका, बहुत सह लिया तूने। अब और नहीं! मैं अभी अपनी टीम के साथ तेरे पास आ रही हूँ।”

दो घंटे के भीतर मेधा अपनी दो महिला सहयोगियों और एक लीगल काउंसलर के साथ मल्लिका के घर पर मौजूद थी। उन्होंने मल्लिका के शरीर पर पड़े ज़ख्मों की तस्वीरें और मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित किए। जब दोपहर को अनिकेत अचानक किसी मीटिंग से घर वापस लौटा और उसने घर में मेधा और कानूनी कागज़ात देखे, तो उसका चेहरा गुस्से से पीला पड़ गया।

अनिकेत ने अपनी आदत के मुताबिक चिल्लाना शुरू किया, “यह सब क्या ड्रामा है मल्लिका? घर की बात बाहर ले जाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? अभी इसी वक्त इन औरतों को बाहर निकालो वरना…”

इस बार मल्लिका ने अपनी नज़रें झुकाई नहीं। वह अपनी जगह से उठी, पूरी ताकत और गरिमा के साथ सीधी खड़ी हुई और अनिकेत की आँखों में आँखें डालकर बहुत शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोली—

“बस अनिकेत! बहुत हो गया तुम्हारा यह आतंक और खोखला डर। आज तक मैंने जो भी किया, इस घर की मर्यादा और समाज की लाज बचाने के लिए किया, पर तुमने मेरी इस सहनशीलता को मेरी कमजोरी समझ लिया। अब यह ड्रामा और पाखंड बंद करो। मैं इस नरक से आज ही बाहर निकल रही हूँ।”

अनिकेत सन्न रह गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमेशा सहमी रहने वाली मल्लिका कभी इस तरह पलटवार करेगी। अनिकेत ने धमकियाँ देने की कोशिश की कि वह उसे समाज में बदनाम कर देगा, लेकिन मेधा और उनकी टीम के कड़े रुख और पुलिस की कानूनी चेतावनी ने अनिकेत की सारी हेकड़ी पल भर में निकाल दी।

उसी शाम मल्लिका अपना ज़रूरी सामान और अपने आत्मसम्मान का बैग लेकर उस कोठी से हमेशा के लिए बाहर निकल आई। उसके माता-पिता जब बेटी की इस हालत से वाकिफ हुए, तो वे टूट गए, लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को गले से लगा लिया और उसकी ढाल बनकर खड़े हो गए।

यह कानूनी लड़ाई लंबी थी, समाज के कुछ दबी जुबान से ताने कसने वाले लोग भी थे, जो पूछते थे—”अरे, सब कुछ तो था, फिर तलाक क्यों ले लिया?” पर इस बार मल्लिका ने किसी की परवाह नहीं की। उसने अपने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उसने अपनी रुकी हुई प्रोफेशनल पढ़ाई को फिर से शुरू किया और कुछ ही महीनों में एक प्रतिष्ठित संस्था में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में अपनी नई शुरुआत की।

वक्त किसी के लिए नहीं रुकता। धीरे-धीरे वे काले दिन मल्लिका की ज़िंदगी से पीछे छूटने लगे। आज उस घटना को बीते हुए पूरे तीन साल हो चुके हैं। मल्लिका अब किसी के रहमोकरम पर जीने वाली या डर-डर कर मुस्कुराने वाली कमज़ोर लड़की नहीं है। वह अपने शहर में महिलाओं के सशक्तिकरण और घरेलू हिंसा के खिलाफ कानूनी जागरूकता फैलाने वाली एक प्रेरणादायक शख्सियत बन चुकी है।

आज शाम जब मल्लिका अपने दफ्तर से लौटकर अपने नए, छोटे लेकिन सुकून भरे आशियाने की बालकनी में खड़ी होकर चाय की चुस्की ले रही थी, तो उसके चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह किसी बनावटी चश्मे के पीछे छिपी हुई नहीं थी, बल्कि उसके भीतर की सच्ची आज़ादी और आंतरिक संतोष का प्रमाण थी। उसने साबित कर दिया कि दर्द चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अगर इंसान खुद के लिए खड़ा होने की हिम्मत जुटा ले, तो ज़िंदगी का हर अंधकार एक नए सवेरे में बदल सकता है।

एक सवाल आप सभी पाठकों से:

क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में आज भी महिलाओं को “लोग क्या कहेंगे” के डर से अपनी खुशियों और आत्मसम्मान का गला घोंटने के लिए मजबूर किया जाता है? मल्लिका के इस साहसी कदम पर आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें!

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