रिश्तों की गुनगुनी धूप

 नंदिनी उन्हें गायत्री अम्मा के पास ले गई। साफ-सुथरी हल्के गुलाबी रंग की साड़ी और गर्म कार्डिगन पहने, धुले हुए सफेद बालों में कंघी किए गायत्री अम्मा धूप में बैठी दो छोटी बच्चियों को कहानी सुना रही थीं। उनके चेहरे पर कल रात वाली दहशत और लाचारी की जगह एक गहरा सुकून था। उनके पास ही मेज पर आरव की बनाई पेंटिंग और उनके पति की पुरानी तस्वीर रखी थी, जो अनिरुद्ध कल रात उनकी संदूकची में से लाए थे।

  स्नेहा  सेक्टर-35 के एक म्यूजिक और पेंटिंग इंस्टिट्यूट के बाहर अपने आठ साल के बेटे आरव की क्लास खत्म होने का इंतजार कर रही थी। उसके आसपास कई और माता-पिता भी अपनी गाड़ियों में हीटर चलाकर या बाहर खड़े होकर गर्म कॉफी की चुस्कियां लेते हुए अपने बच्चों की राह देख रहे थे।

तभी इंस्टिट्यूट की घंटी बजी और रंग-बिरंगे जैकेट व टोपे पहने बच्चों की टोली चहकती हुई बाहर निकली। आरव अपने हाथ में अपनी बनाई हुई पेंटिंग लहराता हुआ दौड़कर स्नेहा के गले लग गया। ‘मम्मा, देखो आज मैंने पहाड़ों और सूरज की पेंटिंग बनाई! सर ने मुझे स्टार भी दिया,’ आरव की मासूम चहचहाहट ने उस ठिठुरती शाम में भी गर्माहट घोल दी। स्नेहा ने प्यार से उसके गाल चूमे, उसका मफलर ठीक किया और उसका हाथ थामकर पास के ही अपने अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स की ओर पैदल ही चल पड़ी। घर मुश्किल से पांच मिनट की दूरी पर था।

आरव पूरे रास्ते अपनी क्लास के किस्से सुनाता चल रहा था, लेकिन कॉलोनी के मुख्य मोड़ पर बने फल के ठेले के पास पहुंचकर स्नेहा के कदम अचानक ठिठक गए। स्ट्रीट लाइट की पीली मद्धम रोशनी में उसने देखा कि एक बेहद बुजुर्ग महिला, जिनकी उम्र शायद पचहत्तर या अस्सी के पार रही होगी, कचरे के डिब्बे के पास गिरे हुए कुछ दबे-कुचले केलों और सेब के टुकड़ों को अपने मैले पल्लू में समेट रही थीं। उन्होंने इस कड़ाके की ठंड में केवल एक फटी हुई सूती साड़ी और एक बेहद पतला, जगह-जगह से उधड़ा हुआ स्वेटर पहन रखा था। उनके नंगे पैर ठंड से नीले पड़ चुके थे और पूरे शरीर में एक अजीब सी कंपकंपी थी।

अभी डेढ़ महीने पहले ही अपनी मां को कैंसर के हाथों खो चुकी स्नेहा का कलेजा मुंह को आ गया। अपनी मां के अंतिम दिनों की लाचारी और पीड़ा अभी भी उसकी आंखों में ताज़ा थी। वह आरव का हाथ पकड़े उन बुजुर्ग महिला के पास गई और बड़े ही कोमल स्वर में बोली, ‘अम्मा जी, इसे छोड़ दीजिए… ये खराब हो चुके हैं। आपको भूख लगी है क्या?’

अचानक अपनेपन से भरे ये शब्द सुनकर बुजुर्ग महिला ने सहमते हुए ऊपर देखा। उनकी आंखों में मोतियाबिंद की सफेदी झलक रही थी और चेहरे की गहरी झुर्रियों में अथाह दुख छिपा था। स्नेहा की आवाज़ में छुपी करुणा ने उनके सब्र का बांध तोड़ दिया। उनके हाथ से वे सड़े हुए फल छूट गए और वे फूट-फूटकर रो पड़ीं। कांपते हुए होंठों से वे बड़ी मुश्किल से बोल पाईं, ‘बिटिया… चार दिन से पेट में अन्न का एक दाना नहीं गया है। ठंड से शरीर अकड़ रहा है, लेकिन पेट की आग तो ठंड से भी बड़ी होती है न…’

आरव ने अपनी मम्मा की ओर देखा और अपनी जेब से चॉकलेट निकालकर अम्मा की तरफ बढ़ा दी। स्नेहा की आंखें डबडबा गईं। उसने तुरंत अपनी गर्म शॉल उतारी और अम्मा के कांपते कंधों पर डाल दी। अम्मा ने रोते हुए बताया कि उनका नाम गायत्री है। करीब तीन हफ्ते पहले उनके पति रामस्वरूप जी का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनकी कोई संतान नहीं थी। दोनों पति-पत्नी पुरानी मंडी के पीछे एक छोटी सी कोठरी में रहकर कागज के लिफाफे बनाते थे और उसी से अपना पेट पालते थे। पति के जाने के बाद मकान मालिक ने किराया न दे पाने के डर से कोठरी खाली करवा ली और उनका थोड़ा-बहुत सामान बाहर फेंक दिया। आंखों से कम दिखने और जोड़ों के दर्द के कारण वे कोई काम भी नहीं कर पा रही थीं। दो दिन तक तो किसी तरह गुरुद्वारे के लंगर में चली गईं, लेकिन फिर बुखार और कमजोरी ने ऐसा घेरा कि सड़क के किनारे बने पुराने बस शेड के नीचे पड़ी रहीं। आज जब भूख बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो रेंगते हुए यहां तक चली आईं।

तभी अपार्टमेंट के गेट पर तैनात बुजुर्ग गार्ड हरबंस सिंह जी वहां आ गए। उन्होंने अम्मा की हालत देखी तो तुरंत अपनी चौकी से स्टूल लाकर उन्हें बिठाया और अपनी थर्मस से गर्म चाय एक गिलास में डालकर उन्हें दी। स्नेहा को गायत्री अम्मा के चेहरे में हूबहू अपनी दिवंगत मां की छवि दिखाई दे रही थी—वही शांत चेहरा, वही ममतामयी पर बेबस आंखें। उसका मन गवाही नहीं दे रहा था कि वह इस हाड़ कंपाती रात में उन्हें वापस सड़क पर मरने के लिए छोड़ दे।

स्नेहा ने तुरंत अपने पति अनिरुद्ध को फोन लगाया, जो उस वक्त ऑफिस से घर के लिए निकल ही रहे थे। उसने रुंधे गले से सारी बात बताई। अनिरुद्ध एक सुलझे हुए और व्यावहारिक इंसान थे। उन्होंने कहा, ‘स्नेहा, मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ रहा हूं, पर आजकल शहर में कई तरह के गिरोह भी सक्रिय हैं जो भावनाओं का फायदा उठाते हैं। तुम एक काम करो, गार्ड भैया की मदद से अम्मा को सोसाइटी के कम्युनिटी हॉल के वेटिंग रूम में बिठाओ, वहां हीटर चल रहा है। मैं बस पंद्रह मिनट में पहुंचता हूं, फिर देखते हैं कि सही और सुरक्षित रास्ता क्या हो सकता है।’

स्नेहा ने हरबंस जी की मदद से अम्मा को सहारा दिया और कम्युनिटी हॉल के गर्म कमरे में ले जाकर सोफे पर बिठाया। फिर वह आरव को लेकर तेजी से अपने फ्लैट में गई। आरव के कपड़े बदलकर उसे दूध दिया और रसोई में जाकर अम्मा के लिए गरमा-गरम खिचड़ी, दलिया, एक थर्मस में गर्म दूध और अपनी मां का एक पुराना पर बिल्कुल साफ ऊनी शॉल और मोज़े निकाले।

जब वह थाली लेकर वापस कम्युनिटी हॉल पहुंची और अपने हाथों से अम्मा को गर्म मोज़े पहनाए, तो गायत्री अम्मा ने उसके हाथ पकड़कर चूम लिए। गरमा-गरम खिचड़ी का पहला निवाला मुंह में जाते ही उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। वे भरे गले से बोलीं, ‘बिटिया, इस कलयुग में जहां सगे खून के रिश्ते भी मुंह मोड़ लेते हैं, वहां तुम किसी फरिश्ते की तरह आई हो। अगर आज तुम न मिलतीं, तो शायद यह रात मेरी आखिरी रात होती।’

इसी बीच अनिरुद्ध भी वहां पहुंच गए। उन्होंने आते ही अपनी सोसाइटी की वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष कर्नल मेहरा और दो अन्य सदस्यों को भी वहां बुला लिया था। अम्मा की जर्जर हालत, उनके फटे हुए कपड़े और चेहरे की सच्चाई देखकर अनिरुद्ध का संशय भी पिघल गया। कर्नल मेहरा ने अम्मा से बातचीत की तो पता चला कि वे किसी प्रकार का कोई छलावा नहीं कर रही हैं, बल्कि वाकई नियति की मारी हुई एक बेसहारा औरत हैं। फिर भी, तसल्ली के लिए अनिरुद्ध और सोसाइटी के एक सदस्य गाड़ी लेकर पुरानी मंडी के पीछे उस गली में गए, जिसका जिक्र अम्मा ने किया था। वहां के दुकानदारों ने पुष्टि की कि वाकई रामस्वरूप काका और गायत्री अम्मा पिछले बीस सालों से वहां लिफाफे बनाकर इज्जत की रोटी खा रहे थे, और पति की मौत के बाद लालची मकान मालिक ने उन्हें बेदखल कर दिया था। सड़क के कोने पर अम्मा की एक टूटी हुई संदूकची और कुछ बर्तन अब भी लावारिस पड़े थे। अनिरुद्ध ने वह संदूकची अपनी गाड़ी की डिक्की में रख ली, क्योंकि उसमें शायद अम्मा की यादें और उनके पति की तस्वीर थी।

वापस आकर जब अनिरुद्ध ने सबको सच्चाई बताई, तो कम्युनिटी हॉल में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि गायत्री अम्मा के स्थायी आश्रय का क्या प्रबंध किया जाए? किसी के भी छोटे फ्लैट में उन्हें हमेशा के लिए रखना व्यावहारिक रूप से कठिन था, और उन्हें किसी सरकारी रैन बसेरे की भीड़ में छोड़ना कोई नहीं चाहता था।

तभी स्नेहा के दिमाग में एक कौंध हुई। उसे अपनी कॉलेज की सीनियर और करीबी दोस्त नंदिनी का ख्याल आया, जो पंचकूला के पास ‘आंचल छांव’ नाम से एक बेहद प्रतिष्ठित संस्था चलाती थी। यह संस्था केवल एक वृद्धाश्रम नहीं थी, बल्कि बेसहारा बुजुर्गों और अनाथ बच्चों का एक साझा घर था, जहां बुजुर्गों को बच्चों का बचपन मिलता था और अनाथ बच्चों को दादा-दादी का प्यार। स्नेहा ने बिना देर किए नंदिनी को फोन लगाया और पूरी स्थिति विस्तार से समझाई। नंदिनी ने तुरंत कहा, ‘स्नेहा, तुम बिल्कुल चिंता मत करो। आज रात भले ही काफी हो गई है, लेकिन मैं अभी आश्रम की एम्बुलेंस वैन और एक नर्स को भेज रही हूं। अम्मा को इस ठंड में कहीं और भटकने की जरूरत नहीं है।’

करीब एक घंटे के भीतर संस्था की वैन सोसाइटी के गेट पर आ गई। इस एक घंटे के दौरान सोसाइटी की महिलाओं ने मिलकर अम्मा के लिए चार जोड़ी नए गर्म सूट, साड़ियां, कंबल, एक नया बिस्तर और फल-मेवे इकट्ठे कर दिए थे। कर्नल मेहरा ने अपनी तरफ से उनकी दवाइयों के लिए कुछ आर्थिक सहायता संस्था के नाम चेक के रूप में दी। आरव ने अपनी बनाई हुई वह पहाड़ों और उगते सूरज वाली पेंटिंग अम्मा के हाथों में थमाते हुए कहा, ‘दादी, ये आपके नए कमरे के लिए है।’

अगले दिन रविवार था, इसलिए सुबह-सुबह स्नेहा, अनिरुद्ध और आरव अपनी कार से अम्मा का हालचाल लेने ‘आंचल छांव’ आश्रम पहुंचे। वहां का दृश्य देखकर उन तीनों का मन खिल उठा। शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में बना वह आश्रम किसी सुंदर रिसॉर्ट जैसा शांत और स्वच्छ था। धूप खिली हुई थी और हरे-भरे लॉन में कई बुजुर्ग धूप सेंक रहे थे, जबकि छोटे-छोटे बच्चे उनके आसपास गेंद से खेल रहे थे। वहीं एक तरफ छोटा सा डिस्पेंसरी रूम था, और दूसरी तरफ एक वर्कशॉप जहां बुजुर्ग अपनी पसंद के हिसाब से बागवानी, सिलाई या मोमबत्ती बनाने जैसे हल्के-फुल्के काम कर रहे थे।

नंदिनी उन्हें गायत्री अम्मा के पास ले गई। साफ-सुथरी हल्के गुलाबी रंग की साड़ी और गर्म कार्डिगन पहने, धुले हुए सफेद बालों में कंघी किए गायत्री अम्मा धूप में बैठी दो छोटी बच्चियों को कहानी सुना रही थीं। उनके चेहरे पर कल रात वाली दहशत और लाचारी की जगह एक गहरा सुकून था। उनके पास ही मेज पर आरव की बनाई पेंटिंग और उनके पति की पुरानी तस्वीर रखी थी, जो अनिरुद्ध कल रात उनकी संदूकची में से लाए थे।

स्नेहा को देखते ही अम्मा उठ खड़ी हुईं और अपनी बांहें फैला दीं। स्नेहा दौड़कर उनके गले लग गई—उसे लगा जैसे आज वह सचमुच अपनी मां के सीने से लगी है। महीनों से उसके भीतर जो खालीपन और शोक का गुबार जमा था, वह अम्मा की ममतामयी थपकी पाकर शांत हो गया।

जब वे लोग विदा लेने लगे, तो गायत्री अम्मा ने स्नेहा और अनिरुद्ध के सिर पर अपने कांपते हाथ रखे और स्नेह से भीगी आवाज़ में कहा, ‘मेरी बच्ची, भगवान तेरा आंगन हमेशा खुशियों से महकाए रखे। कल शाम जब मैं सड़क पर पड़ी थी, तो लग रहा था कि भगवान ने भी मुझसे मुंह मोड़ लिया है, पर तुझे भेजकर उसने साबित कर दिया कि वह खुद नहीं आ सकता तो फरिश्ते भेज देता है। तूने मुझे सिर्फ रोटी और छत नहीं दी, मुझे मेरा खोया हुआ सम्मान और जीने की वजह लौटाई है।’

स्नेहा ने अम्मा के पैर छुए और वादा किया कि वह हर रविवार आरव और अनिरुद्ध के साथ उनसे मिलने आया करेगी। वापस लौटते समय कार में बैठी स्नेहा ने अपने पर्स से अपनी मां की छोटी सी तस्वीर निकाली। धूप की एक सुनहरी किरण कार के शीशे से छनकर उस तस्वीर पर पड़ रही थी। स्नेहा को लगा जैसे उसकी मां तस्वीर में से मुस्कुराते हुए कह रही हों—’मेरी बेटी ने आज मेरा मान रख लिया।’

ठंड अब भी वही थी, लेकिन स्नेहा के दिल के भीतर रिश्तों की एक ऐसी गुनगुनी धूप खिल चुकी थी, जिसकी गर्माहट अब जीवन भर रहने वाली थी।

हमारे आसपास अक्सर ऐसे कई बेबस चेहरे होते हैं जिन्हें किसी बड़े दान की नहीं, बल्कि सिर्फ थोड़े से वक्त, सम्मान और संवेदनशीलता की जरूरत होती है। अगर आप स्नेहा की जगह होते, तो उस ठिठुरती शाम में आपका पहला कदम क्या होता? क्या आपने भी कभी किसी अजनबी की मदद करके ऐसा आत्मिक सुकून महसूस किया है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें, आपके एक कमेंट से कई और लोगों को नेकी की राह पर चलने की प्रेरणा मिल सकती है।

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