“बहू, आज खाने में क्या बना रही हो?” रसोई के दरवाजे पर खड़ी निर्मला जी ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए अपनी नई-नवेली बहू नंदिनी से पूछा। उनकी आवाज में अधिकार की कड़क भी थी और गृहस्थी के पुराने अनुभवों की ठसक भी।
रसोई के स्लैब पर बिखरी सब्जियों के बीच खड़ी नंदिनी के हाथ एक पल के लिए थम गए। उसके माथे पर पसीने की नन्ही बूंदें चमक रही थीं। उसने धीरे से पलटकर अपनी सास की ओर देखा और एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “मम्मी जी, आज भिंडी की सब्जी और अरहर की दाल बना रही हूँ। पापा जी को भिंडी पसंद है न, और समर्थ के टिफिन के लिए पनीर का पराठा भी सेक दिया है।”
निर्मला जी ने रसोई में अंदर कदम रखा और कड़ाही में झांकते हुए नाक सिकोड़ी। “अरे बहू, कितनी बार कहा है कि समर्थ को दफ्तर के टिफिन में सूखी सब्जी मत दिया करो, गले में अटकती है। और ये भिंडी इतनी मोटी क्यों काटी है? हमारे यहाँ तो बारीक भिंडी कटती है। तुम आजकल की लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई के चक्कर में रसोई के सलीके तो सिखाए ही नहीं जाते।”
नंदिनी ने चुपचाप सिर झुका लिया। उसने कुछ नहीं कहा, बस गैस की आंच धीमी कर दी। यह किसी एक दिन की बात नहीं थी। देहरादून के इस शांत और हवादार घर में ब्याह कर आए उसे छह महीने हो चुके थे, लेकिन रसोई की भाप और तानों की तपिश में उसका हर दिन ऐसे ही पिघलता था।
नंदिनी ने अर्थशास्त्र में एम.ए. किया था। शादी से पहले वह चंडीगढ़ के एक नामी कॉलेज में अतिथि प्रवक्ता के तौर पर पढ़ाती थी। उसकी आंखों में अपने पैरों पर खड़े होने और अपनी एक अलग पहचान बनाने के बड़े सपने थे। लेकिन जब मनोहर जी और निर्मला जी के इकलौते बेटे समर्थ से उसका रिश्ता तय हुआ, तो निर्मला जी ने साफ शब्दों में कहा था कि उनके घर में किसी चीज की कमी नहीं है, बस उन्हें ऐसी बहू चाहिए जो घर को ‘घर’ बनाकर रखे। नंदिनी के माता-पिता ने भी अच्छे और संस्कारी परिवार को देखकर हामी भर दी थी, और नंदिनी ने अपनों की खुशी के लिए अपनी किताबों को एक पुराने ट्रंक में बंद कर दिया था।
सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगाते हुए नंदिनी की नजरें अपने पति समर्थ को तलाश रही थीं। समर्थ अपने कमरे से टाई बांधते हुए बाहर निकला।
“नंदिनी, मेरा नीला वाला रुमाल नहीं मिल रहा, और आज शाम को मेरे दो दोस्त घर आ रहे हैं, तो थोड़ा अच्छा सा डिनर तैयार रखना,” समर्थ ने कुर्सी पर बैठते हुए बिना उसकी तरफ देखे कहा।
“जी, मैं अभी रुमाल लाती हूँ। और शाम के लिए आप बता दीजिए क्या बनाना है, मैं बना दूँगी,” नंदिनी ने चाय का कप उसके आगे रखते हुए धीमे स्वर में कहा।
तभी मनोहर जी अखबार पढ़ते हुए वहां आए। “अरे भाई, हमारी बहू के हाथ में तो जादू है। जो भी बनाएगी, समर्थ के दोस्त उंगलियां चाटते रह जाएंगे,” मनोहर जी ने स्नेह से कहा। ससुर जी के इन दो मीठे बोलों से नंदिनी के सूखे मन को थोड़ी राहत मिली, लेकिन निर्मला जी ने तुरंत टोक दिया, “अजी, आप तो बस तारीफ के पुल बांधा कीजिए। अभी कल ही दाल में नमक कम था, वो तो मैंने समय रहते देख लिया वरना आपकी बीपी की दवाई के साथ बेस्वाद खाना ही गले उतारना पड़ता।”
मनोहर जी ने चश्मे के ऊपर से पत्नी को देखा और मुस्कुराकर बोले, “निर्मला, बच्ची है, धीरे-धीरे सब सीख जाएगी। तुम भी जब इस घर में आई थीं, तो पहली बार खीर में चीनी की जगह नमक डाल दिया था, याद है न?”
निर्मला जी का चेहरा तमतमा गया। “आप तो बस पुरानी बातें लेकर बैठ जाइए। मेरे जमाने की बात और थी, तब हम सास के आगे जुबान नहीं खोलते थे और रसोई को ही अपना मंदिर समझते थे।”
समर्थ अपना नाश्ता खत्म कर टिफिन बैग में रखते हुए उठ खड़ा हुआ। नंदिनी को उम्मीद थी कि शायद समर्थ आज शाम के काम में थोड़ी मदद की बात कहेगा या कम से कम यह पूछेगा कि वह सारा काम अकेले कैसे संभालेगी, लेकिन वह रोज की तरह “शाम को मिलते हैं” कहकर दरवाजे से बाहर निकल गया।
दोपहर तक घर का सारा काम समेटने के बाद नंदिनी अपने कमरे में आई। शरीर थकान से चूर था, लेकिन मन की थकान शरीर से कहीं ज्यादा थी। उसने अलमारी के कोने में रखे अपने उस पुराने ट्रंक को देखा। नंदिनी ने धीरे से ट्रंक खोला। उसमें रखी अर्थशास्त्र की किताबों से एक जानी-पहचानी खुशबू आ रही थी—वह खुशबू जो उसे उसके अस्तित्व का एहसास कराती थी। उसने अपनी गोल्ड मेडल की सर्टिफिकेट पर हाथ फेरा। एक गर्म आंसू उसकी आंख से टपका और सर्टिफिकेट की लेमिनेशन पर गिरकर फैल गया।
क्या उसकी सारी मेहनत, रात-रात भर जागकर की गई पढ़ाई, और उसके सपने सिर्फ इसलिए थे कि वह यह तय कर सके कि भिंडी गोल कटनी है या लंबी? वह घर के काम का सम्मान करती थी, उसे अपने सास-ससुर और पति की सेवा करने में कोई गुरेज नहीं था, लेकिन इस सेवा के बदले जो तिरस्कार और अपनी पहचान खोने का दर्द मिल रहा था, वह उसे भीतर ही भीतर खोखला कर रहा था।
शाम को समर्थ के दोस्त आए। नंदिनी ने पूरे मन से कड़ाही पनीर, दाल मखनी, जीरा राइस, नान और गुलाब जामुन बनाए थे। वह रसोई में पसीने से तर-बतर होकर गरम रोटियां सेक रही थी और बाहर ड्राइंग रूम से ठहाकों की आवाजें आ रही थीं।
“यार समर्थ, भाभी के हाथ के खाने ने तो फाइव स्टार होटल को भी फेल कर दिया! क्या लाजवाब स्वाद है,” समर्थ के दोस्त विकास ने तारीफ करते हुए कहा।
समर्थ ने गर्व से सीना फुलाते हुए कहा, “अरे भाई, ट्रेनिंग किसकी है? मम्मी ने नंदिनी को छह महीने में एकदम परफेक्ट हाउसवाइफ बना दिया है। अब तो इसे रसोई के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है।”
रसोई के दरवाजे पर गरम नान की प्लेट लिए खड़ी नंदिनी के कदम वहीं जम गए। ‘अब तो इसे रसोई के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है’—पति के ये शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गए। जिस इंसान के लिए उसने अपने करियर की आहुति दे दी, वह उसके इस त्याग को उसकी ‘सीमा’ और अपनी ‘उपलब्धि’ बता रहा था।
उस रात जब सब सो गए, नंदिनी बालकनी में अकेली खड़ी देहरादून की ठंडी हवा में सांस लेने की कोशिश कर रही थी। तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट हुई। उसने मुड़कर देखा तो ससुर मनोहर जी खड़े थे।
“बेटा, अभी तक सोई नहीं?” मनोहर जी ने कोमल स्वर में पूछा।
नंदिनी ने जल्दी से अपनी आंखें पोंछ लीं। “बस पापा जी, नींद नहीं आ रही थी। आपको कुछ चाहिए था क्या? पानी लाऊँ?”
“नहीं बेटा, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस यह कहने आया था कि आज शाम खाने की मेज पर समर्थ ने जो कहा, शायद उसे वह नहीं कहना चाहिए था,” मनोहर जी ने रेलिंग का सहारा लेते हुए कहा। “मैं देख रहा हूँ नंदिनी, तुम इस घर में आने के बाद से अपनी मुस्कान कहीं भूल गई हो। एक पिता होने के नाते मैं तुम्हारी आंखों का वह सूनापन पढ़ सकता हूँ, जिसे शायद मेरी पत्नी और मेरा बेटा अपनी गृहस्थी की चकाचौंध में देख नहीं पा रहे हैं।”
ससुर जी की इतनी गहरी और संवेदनशील बात सुनकर नंदिनी का बांध टूट गया। वह सिसक पड़ी। “पापा जी, मुझे घर का काम करने या आप लोगों की सेवा करने से कोई शिकायत नहीं है। यह मेरा अपना परिवार है। लेकिन क्या एक बहू होने का मतलब यह है कि मैं इंसान ही न रहूँ? मेरी अपनी कोई सोच, कोई हुनर, कोई अस्तित्व ही न रहे? मम्मी जी को लगता है कि मेरी पढ़ाई-लिखाई व्यर्थ है, और समर्थ को लगता है कि मैं सिर्फ रसोई के लिए ही बनी हूँ।”
मनोहर जी ने उसके सिर पर हाथ रखा। “बेटा, निर्मला दिल की बुरी नहीं है। उसने अपनी पूरी जिंदगी अपनी सास के कड़े अनुशासन में इसी रसोई में गुजार दी। उसने कभी बाहर की दुनिया देखी ही नहीं, इसलिए उसे लगता है कि रसोई पर राज करना ही एक औरत की सबसे बड़ी ताकत है। वह अपनी असुरक्षा और अपने पुराने अनुभवों को तुम पर थोप रही है। लेकिन समय बदलता है, और उसे बदलने के लिए किसी न किसी को पहल करनी पड़ती है। तुम अपनी किताबों को धूल मत जमने दो बेटा।”
ससुर जी के इन शब्दों ने नंदिनी के भीतर एक नई ऊर्जा फूंक दी। अगले कुछ दिन सामान्य तरीके से बीते, लेकिन नंदिनी ने अब मन ही मन तय कर लिया था कि वह घुट-घुट कर नहीं जिएगी, बल्कि अपने हुनर से अपनी जगह बनाएगी। उसने खाली समय में अपने फोन और लैपटॉप पर आर्थिक मामलों पर लेख लिखना और ऑनलाइन कोचिंग के लिए कंटेंट तैयार करना शुरू कर दिया, वह भी घर के किसी काम में कोई कमी छोड़े बिना।
लेकिन कहते हैं न, जब तक परीक्षा की घड़ी न आए, किसी की असली कीमत पहचानी नहीं जाती।
कुछ हफ्तों बाद, एक दोपहर निर्मला जी को अचानक तेज चक्कर आया और वह रसोई के फर्श पर ही गिर पड़ीं। घर में उस समय सिर्फ नंदिनी थी। उसने बिना घबराए तुरंत पड़ोसियों की मदद से निर्मला जी को अस्पताल पहुंचाया और मनोहर जी व समर्थ को फोन किया। डॉक्टर ने बताया कि निर्मला जी का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत बढ़ गया था और साथ ही घुटनों की पुरानी समस्या के कारण उन्हें कम से कम एक महीने के पूर्ण विश्राम की आवश्यकता है।
निर्मला जी जब घर लौटीं, तो वह बिस्तर से उठने की स्थिति में भी नहीं थीं। जिस रसोई और घर की चाबियों को वह अपनी कमर से बांधकर घूमती थीं, आज वह सब उनसे छूट गया था। शुरू के दो-तीन दिन तो निर्मला जी बिस्तर पर लेटे-लेटे ही चिल्लाती रहीं— “नंदिनी, मंदिर में दीया जलाया कि नहीं? दूध वाले का हिसाब डायरी में लिख लेना! अरे, पौधों में पानी कौन डालेगा?”
लेकिन नंदिनी ने एक बार भी माथे पर शिकन नहीं आने दी। वह सुबह पांच बजे उठती, घर की सफाई करती, सास-ससुर के लिए दलिया और परहेजी खाना बनाती, समर्थ का टिफिन तैयार करती, निर्मला जी को समय पर दवाइयां देती, उनके पैरों की मालिश करती और घर के सारे हिसाब-किताब भी देखती।
इसी बीच, घर पर एक और संकट आन पड़ा। मनोहर जी ने अपने रिटायरमेंट के पैसों से एक छोटे से व्यवसाय में अपने एक पुराने परिचित के साथ साझेदारी की थी। एक शाम मनोहर जी और समर्थ बेहद परेशान हालत में घर लौटे। ड्राइंग रूम में दोनों के चेहरे उतरे हुए थे।
निर्मला जी भी सहारे से उठकर बाहर आईं। “क्या हुआ जी? आप दोनों इतने परेशान क्यों हैं?”
मनोहर जी ने सिर पकड़कर बैठते हुए कहा, “निर्मला, हमारे साझेदार ने अकाउंट्स में भारी गड़बड़ी कर दी है। टैक्स विभाग से नोटिस आया है और बैंक वाले भी लोन की कागजी कार्रवाई को लेकर अड़ गए हैं। हमारे चार्टर्ड अकाउंटेंट ने हाथ खड़े कर दिए हैं क्योंकि पुराने बिल और बैलेंस शीट में बहुत उलझन है। अगर तीन दिन के भीतर सही ऑडिट रिपोर्ट और आर्थिक ब्योरा पेश नहीं किया गया, तो हमारी जमा-पूंजी भी डूब जाएगी और भारी जुर्माना अलग से लगेगा।”
समर्थ ने झुंझलाते हुए कहा, “पापा, मुझे तो कॉमर्स और इकोनॉमिक्स के ये पेचीदा नियम समझ ही नहीं आते। मैं तो इंजीनियरिंग की लाइन का आदमी हूँ। समझ नहीं आ रहा कि इतनी जल्दी किस एक्सपर्ट को पकड़ें, सब लाखों की फीस मांग रहे हैं।”
पूरे घर में सन्नाटा पसर गया। निर्मला जी की आंखों में आंसू आ गए। जिंदगी भर की कमाई डूबने का डर सबको सता रहा था।
तभी रसोई से चाय की ट्रे लेकर निकली नंदिनी ने शांत स्वर में कहा, “पापा जी, अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मैं एक बार वो सारी फाइलें और बैलेंस शीट देख सकती हूँ?”
समर्थ ने चौंककर कहा, “नंदिनी, तुम? यह घर के राशन का हिसाब नहीं है। यह कंपनी के ऑडिट, टैक्सेशन और आर्थिक नीतियों का मामला है। तुम इसमें क्या समझोगी?”
निर्मला जी ने भी दबी जुबान में कहा, “हाँ बहू, मर्दों के काम में दखल मत दो, वैसे ही सब परेशान हैं।”
लेकिन मनोहर जी ने समर्थ को हाथ के इशारे से रोका। “समर्थ, तुम भूल रहे हो कि तुम्हारी पत्नी अर्थशास्त्र में गोल्ड मेडलिस्ट है और उसने कॉलेज में फाइनेंस और इकोनॉमिक्स पढ़ाया है। नंदिनी बेटा, ये लो सारी फाइलें। अब डूबते को तिनके का सहारा ही सही।”
नंदिनी ने उस रात अपनी रसोई का काम जल्दी समेटा, निर्मला जी को दवाई देकर सुलाया और फिर डाइनिंग टेबल पर सारी फाइलें और अपना लैपटॉप लेकर बैठ गई। रात के दो बजे जब निर्मला जी की नींद खुली और वह पानी पीने के लिए कमरे से बाहर आईं, तो उन्होंने देखा कि डाइनिंग टेबल पर पीली रोशनी के नीचे नंदिनी चश्मा लगाए बेहद गंभीरता से लैपटॉप पर कुछ टाइप कर रही थी और उसके चारों तरफ कागजों का ढेर लगा था।
निर्मला जी ने पहली बार अपनी बहू के चेहरे पर वह तेज और आत्मविश्वास देखा, जो रसोई के धुएं में कभी दिखाई नहीं देता था। नंदिनी केवल एक चूल्हा फूंकने वाली औरत नहीं थी, वह ज्ञान और समझ से भरी एक पढ़ी-लिखी युवती थी। निर्मला जी चुपचाप वापस अपने कमरे में चली गईं, लेकिन आज उनके मन में हलचल मची हुई थी।
लगातार दो रातों की कड़ी मेहनत के बाद, नंदिनी ने न केवल साझेदार द्वारा की गई हेराफेरी के सारे सबूत खातों से ढूंढ निकाले, बल्कि टैक्स विभाग के नोटिस का एक सटीक और कानूनी तौर पर मजबूत जवाब भी तैयार कर दिया। तीसरे दिन, जब मनोहर जी और समर्थ के साथ नंदिनी बैंक के अधिकारियों और टैक्स कमिश्नर के सामने गई, तो उसकी स्पष्ट बातचीत, आर्थिक नियमों की गहरी समझ और सटीक आंकड़ों को देखकर अधिकारी भी दंग रह गए।
बैंक मैनेजर ने मनोहर जी से हाथ मिलाते हुए कहा, “शर्मा जी, आप बहुत किस्मत वाले हैं कि आपके घर में इतनी काबिल इकोनॉमिस्ट हैं। इन्होंने जिस तरह से आपके बिजनेस के घाटे को रिकवर करने का फाइनेंशियल मॉडल पेश किया है, हम न केवल आपका लोन री-स्ट्रक्चर कर रहे हैं, बल्कि आपके गलत साझेदार के खिलाफ भी कार्रवाई में मदद करेंगे।”
बाहर निकलते समय समर्थ का सिर शर्म और गर्व के मिले-जुले भाव से झुका हुआ था। गाड़ी में बैठते ही उसने नंदिनी का हाथ अपने हाथों में लिया और धीरे से कहा, “मुझे माफ कर दो नंदिनी। मैं तुम्हारी डिग्रियों को सिर्फ कागज का टुकड़ा समझता रहा। आज तुमने सिर्फ पापा की जमा-पूंजी ही नहीं बचाई, बल्कि मेरी आंखों पर बंधी अहंकार की पट्टी भी खोल दी।”
नंदिनी की आंखें भर आईं, पर आज ये आंसू दुख के नहीं, अपने स्वाभिमान की जीत के थे।
शाम को जब वे घर पहुंचे, तो मनोहर जी ने चहकते हुए निर्मला जी को सारी बात बताई। निर्मला जी सोफे पर बैठी चुपचाप सब सुन रही थीं। नंदिनी ने हमेशा की तरह अपना बैग रखा और दुपट्टा संभालते हुए रसोई की तरफ बढ़ने लगी।
“बहू, आज शाम के खाने में क्या बनाऊँ?” उसने रसोई की दहलीज पर कदम रखते हुए आदतन पूछा।
तभी पीछे से निर्मला जी की आवाज आई, “रुक जाओ बहू!”
नंदिनी ठिठक कर मुड़ी। निर्मला जी धीरे-धीरे छड़ी के सहारे चलती हुई रसोई के दरवाजे तक आईं। उनके चेहरे पर आज वह पुरानी कड़क नहीं, बल्कि एक अजीब सी नर्मी और पश्चाताप का भाव था।
निर्मला जी ने नंदिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “आज तुम रसोई में नहीं जाओगी। आज खाना समर्थ और इसके पापा मिलकर बनाएंगे, और मैं कुर्सी पर बैठकर इन्हें बताऊँगी कि भिंडी कैसे काटनी है।”
पूरे घर में एक सुखद आश्चर्य फैल गया। समर्थ और मनोहर जी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।
निर्मला जी का गला भर आया। उन्होंने नंदिनी के गाल पर हाथ फेरते हुए कहा, “मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने अपनी पूरी जिंदगी इस रसोई की चारदीवारी को ही अपनी दुनिया समझा, और अज्ञानतावश तुझे भी इसी पिंजरे में कैद करना चाहा। मुझे डर लगता था कि अगर तू बाहर निकलेगी, तो मेरा घर बिखर जाएगा। लेकिन आज मेरी आंखें खुल गईं। जिस बेटी ने घर की रसोई से लेकर बाहर की कचहरी तक मेरे परिवार की लाज बचाई, उसके हुनर को चौके-बर्तन में बांधकर मैंने बहुत बड़ा पाप किया है।”
“ऐसा मत कहिए मम्मी जी, आप बड़ी हैं…” नंदिनी ने उन्हें गले लगाते हुए कहा।
“नहीं बहू, आज मुझे बोलने दे,” निर्मला जी ने आंसू पोंछते हुए कहा। “कल सुबह जब तू मुझे दवाई दे रही थी, तब मैंने तेरे फोन पर देहरादून के महिला कॉलेज का वह ईमेल देखा था, जिसमें तुझे प्रोफेसर की नौकरी के लिए इंटरव्यू का बुलावा आया है। तूने मेरे डर से और घर की जिम्मेदारियों की वजह से उसे मना करने का मन बना लिया था न?”
नंदिनी ने आश्चर्य से सास की ओर देखा।
निर्मला जी मुस्कुराईं और अपनी कमर से बंधा चाबियों का गुच्छा निकालकर डाइनिंग टेबल पर रखते हुए बोलीं, “घर किसी एक की कुर्बानी से नहीं, सबके सहयोग से चलता है। सोमवार को तेरा इंटरव्यू है, और तू वहां जरूर जाएगी। अब से इस रसोई में सिर्फ बहू का पसीना नहीं बहेगा, हम सब मिलकर हाथ बटाएंगे। जा, अपने कमरे में जा और अपने इंटरव्यू की तैयारी कर।”
नंदिनी ने जब अपने ससुर और पति की ओर देखा, तो दोनों के चेहरों पर गर्व और सहमति की मुस्कान थी। रसोई की वही दहलीज, जो कल तक नंदिनी को उसके सपनों की कब्रगाह लगती थी, आज उसके नए भविष्य और सम्मान की पहली सीढ़ी बन चुकी थी। उस शाम रसोई से भले ही थोड़ी जली हुई रोटियों की महक आ रही थी, लेकिन घर के आंगन में रिश्तों की जो मिठास घुली थी, उसका स्वाद दुनिया के हर पकवान से बढ़कर था।
आपकी क्या राय है?
क्या आज भी हमारे समाज में पढ़ी-लिखी बहुओं के हुनर को केवल रसोई की दहलीज तक सीमित कर दिया जाता है? क्या एक परिवार को खुशहाल बनाने के लिए केवल बहू का ही त्याग जरूरी है, या पूरे परिवार का साथ? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके एक कमेंट से समाज की सोच को नई दिशा मिल सकती है!
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