अन्विता कुछ बोलने ही वाली थी कि चहक ने उसके होंठों पर उंगली रख दी और बोली, “आज आप कुछ नहीं बोलेंगी दीदी। आज तक आपने माँ और पापा बनकर मेरा भविष्य संवारा है, अब आपकी इस छोटी बहन की बारी है। अब मैं कमाऊंगी और आप सिर्फ अपने कैनवास पर अपने सपनों के रंग भरेंगी।”
यह सुनकर बरामदे में बैठे नाना मनोहर लाल जी और नानी सावित्री देवी की आंखें छलक उठीं। दोनों ने हाथ जोड़कर ऊपर आसमान की ओर देखा, मानो अपनी दिवंगत बेटी और दामाद से कह रहे हों—“देखो, तुम्हारी बेटियों का संस्कार और प्रेम आज जीत गया।”
अन्विता जब छह साल की थी, तब मालती ने एक दिन उसके नन्हे हाथों को अपने पेट पर रखकर कहा था, “अन्विता बेटा, जल्दी ही तुम्हारे साथ खेलने के लिए एक नन्हा मेहमान आने वाला है।” उस दिन से अन्विता ने अपने सारे खिलौने संभाल कर रखने शुरू कर दिए थे। वह रोज स्कूल से आकर अपनी माँ के पास बैठ जाती और पेट से कान लगाकर सुनने की कोशिश करती कि अंदर से कोई आवाज आ रही है या नहीं। जब चहक का जन्म हुआ, तो अस्पताल के कमरे में सबसे ज्यादा चहकने वाली अन्विता ही थी। नन्ही सी गुड़िया जैसी बहन को देखकर उसने अपनी माँ से कहा था, “माँ, यह तो बिल्कुल परी जैसी है, मैं इसे कभी रोने नहीं दूँगी।”
वक्त के साथ दोनों बहनें बड़ी होने लगीं। अन्विता में गजब की गंभीरता और कलात्मकता थी। उसे बचपन से ही चित्रकारी (पेंटिंग) का जुनून की हद तक शौक था। कैनवास पर जब उसकी उंगलियां और ब्रश चलते, तो बेजान रंग भी बोल उठते थे। आलोक जी ने बेटी के इस हुनर को पहचाना और उसे देहरादून की सबसे अच्छी आर्ट एकेडमी में दाखिला दिला दिया। वहीं छोटी बहन चहक अपने नाम की तरह ही चंचल, हाजिरजवाब और पढ़ाई में बेहद कुशाग्र थी। उसे किताबों और विज्ञान के प्रयोगों से गहरा लगाव था।
दोनों बहनों का रिश्ता अनोखा था। कभी चहक अन्विता के रंगों की डिब्बियां छुपा देती, तो कभी अन्विता चहक की चोटी खींचकर भाग जाती। लेकिन अगर स्कूल में किसी ने चहक को कुछ कह दिया, तो अन्विता दुर्गा बनकर खड़ी हो जाती थी। और जब अन्विता देर रात तक कैनवास पर झुकी रहती, तो नन्ही चहक अपनी गुल्लक के पैसे निकाल कर उसके लिए चॉकलेट ले आती, ताकि उसकी दीदी को थकान न हो। आलोक और मालती अपनी दोनों बेटियों के इस अगाध प्रेम को देखकर फूले नहीं समाते थे। उन्हें लगता था कि दुनिया की सारी खुशियां उनके आंगन में सिमट आई हैं।
परंतु नियति को शायद यह मुस्कान रास नहीं आई। अन्विता तब कॉलेज के अंतिम वर्ष में थी और फाइन आर्ट्स की पढ़ाई कर रही थी, जबकि चहक ने अभी दसवीं कक्षा में कदम रखा ही था। एक बरसात की शाम आलोक और मालती किसी पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए शिमला गए हुए थे। पहाड़ों पर तेज बारिश के कारण भूस्खलन हुआ और उनकी कार गहरी खाई में जा गिरी। एक ही झटके में अन्विता और चहक के सिर से माता-पिता का साया उठ गया।
जिस घर में सुबह रंगों और हंसी की बौछार होती थी, वहां सफेद सन्नाटा पसर गया। तेरहवीं के बाद जब जिम्मेदारी लेने की बात आई, तो आलोक जी के भाइयों और परिवार वालों ने कन्नी काट ली। किसी ने अपने बच्चों की पढ़ाई का बहाना बनाया, तो किसी ने आर्थिक तंगी का। दो अनाथ लड़कियों का बोझ उठाने को कोई तैयार न था।
ऐसे कठिन समय में मालती के माता-पिता—मनोहर लाल जी और सावित्री देवी—अपनी नातिनों की ढाल बनकर खड़े हुए। मालती उनकी इकलौती संतान थी। बूढ़े नाना-नानी के पास अपनी बेटी के जाने का असीम दुख था, लेकिन उन्होंने अपने आंसू पोंछे और दोनों बच्चियों को अपने सीने से लगा लिया। मनोहर लाल जी उन्हें लेकर अपने शहर ऋषिकेश आ गए।
मनोहर लाल जी एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक थे। उनकी पेंशन इतनी ही थी कि दो वक्त की रोटी और दवाइयों का खर्च सम्मानजनक तरीके से चल सके। आलोक जी की जो थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी और बीमा की रकम मिली थी, मनोहर लाल जी ने उसे दोनों बच्चियों के नाम से बैंक में फिक्स डिपॉजिट कर दिया, ताकि भविष्य में उनकी उच्च शिक्षा में कोई बाधा न आए।
देहरादून का अपना घर छूट गया और उसके साथ ही छूट गई अन्विता की आर्ट एकेडमी। ऋषिकेश के छोटे से घर में आने के बाद अन्विता अचानक से बहुत बड़ी हो गई। उसने अपने आंसू भीतर ही कहीं जज्ब कर लिए थे, क्योंकि वह जानती थी कि अगर वह टूटी, तो छोटी चहक और बूढ़े नाना-नानी बिखर जाएंगे।
स्नातक की परीक्षा पास करते ही अन्विता ने अपने कैनवास, ब्रश और रंगों को एक पुराने लोहे के संदूक में बंद किया और काम की तलाश शुरू कर दी। एक बड़े शहर के फाइन आर्ट्स कॉलेज से उसे मास्टर्स करने का बुलावा आया था, जो उसका सबसे बड़ा सपना था, लेकिन उसने वह पत्र बिना किसी को दिखाए फाड़कर फेंक दिया। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह अपनी महंगी पढ़ाई का खर्च उठा पाती। अब उसका एक ही लक्ष्य था—अपनी छोटी बहन चहक को इस काबिल बनाना कि उसे कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।
अन्विता को ऋषिकेश के एक प्राइवेट स्कूल में आर्ट और क्राफ्ट के साथ-साथ प्राथमिक कक्षाओं को पढ़ाने की नौकरी मिल गई। वेतन बहुत अधिक नहीं था, लेकिन घर के खर्च में नाना जी को काफी सहारा मिल गया। स्कूल से लौटने के बाद अन्विता घर के कामों में नानी का हाथ बंटाती और शाम को आसपास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती। रात को जब सब सो जाते, तो वह पत्राचार (प्राइवेट) से अपनी आगे की पढ़ाई के लिए किताबें खोलकर बैठ जाती।
कई बार आधी रात को पढ़ते-पढ़ते उसकी नजर कोने में रखे उस लोहे के संदूक पर पड़ जाती। वह उठती, संदूक खोलती और अपने सूखे पड़े रंगों और ब्रशों को हथेलियों से सहलाती। उसकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक कर उन ब्रशों पर गिर जाते। उसे अपने माता-पिता की बहुत याद आती। वह सोचती, “काश! आज पापा और माँ होते, तो मेरी प्रदर्शनियां लग रही होतीं। मेरे रंग भी दुनिया देख रही होती।” लेकिन अगले ही पल वह सोती हुई चहक का मासूम चेहरा देखती, अपनी आंखें पोंछती और संदूक बंद कर वापस अपनी किताबों में डूब जाती।
वह अपनी उदासी को कभी चेहरे पर नहीं आने देती थी। सुबह होते ही वह फिर से वही हंसमुख और मजबूत बड़ी दीदी बन जाती। लेकिन चहक अब बच्ची नहीं रही थी। वह अपनी दीदी के इस मौन त्याग को देख भी रही थी और महसूस भी कर रही थी। उसने कई बार रात के अंधेरे में दीदी को संदूक के पास बैठकर सिसकते हुए देखा था। चहक अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े मुट्ठियां भींच लेती और मन ही मन संकल्प लेती कि वह अपनी दीदी के इस बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देगी।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा। चहक ने बारहवीं की परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया और इसके तुरंत बाद उसने देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा भी शानदार रैंक से उत्तीर्ण कर ली। उसे पुणे के एक शीर्ष संस्थान में कंप्यूटर साइंस के लिए चुना गया था।
घर में खुशी का माहौल था, लेकिन साथ ही एक गहरी चिंता भी थी। पुणे जैसे बड़े शहर में रहने और चार साल की इंजीनियरिंग की फीस का खर्च बहुत भारी था। फिक्स डिपॉजिट की रकम पर्याप्त नहीं पड़ रही थी। चहक ने जाने से मना कर दिया और कहा, “मैं यहीं किसी लोकल कॉलेज से बीएससी कर लूँगी, मैं आप लोगों पर और बोझ नहीं डाल सकती।”
तब अन्विता ने पहली बार चहक को डांटा। उसने नाना-नानी के साथ बैठकर पूरी रात हिसाब लगाया। अन्विता ने अपने सोने के वो कंगन, जो उसकी माँ ने उसके भविष्य के लिए बनवाए थे, बैंक में गिरवी रख दिए। इसके अलावा उसने एक स्थानीय कोचिंग सेंटर में भी पढ़ाने का काम ले लिया। उसने चहक का हाथ पकड़कर कहा, “तेरी उड़ान में पैसों की कमी कभी दीवार नहीं बनेगी चहक। तू बस अपने सपने पूरे कर, क्योंकि तेरे सपनों में ही मेरे और माँ-पापा के सपने जिंदा हैं।”
चहक भारी मन और भीगी आंखों से पुणे चली गई। वहां जाकर उसने जैसे खुद को किताबों में झोंक दिया। जब हॉस्टल की बाकी लड़कियां वीकेंड पर घूमने जातीं या पार्टियां करतीं, तब चहक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई करती या फ्रीलांस कोडिंग के छोटे-मोटे प्रोजेक्ट्स करके अपना जेबखर्च खुद निकालती, ताकि दीदी को कम से कम पैसे भेजने पड़ें।
इधर ऋषिकेश में अन्विता दिन-रात मेहनत कर रही थी। नाना-नानी की उम्र बढ़ रही थी, उनकी सेहत भी अब अक्सर नासाज रहती। अन्विता ने एक बेटे की तरह अपने बूढ़े नाना-नानी की सेवा की और एक माँ की तरह दूर बैठी अपनी बहन की हर जरूरत का ख्याल रखा। उसने अपनी जवानी के सबसे खूबसूरत साल जिम्मेदारियों की भट्टी में तपा दिए, लेकिन उफ तक नहीं की।
चार साल का समय बीत गया। चहक की मेहनत रंग लाई। कॉलेज के अंतिम वर्ष में ही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) ने कैंपस प्लेसमेंट के जरिए चहक को बहुत बड़े पैकेज पर नौकरी ऑफर की। जब चहक को नियुक्ति पत्र (Offer Letter) मिला, तो उसके हाथ कांप रहे थे। उसने फोन पर यह बात किसी को नहीं बताई, क्योंकि वह यह खुशी अपनी दीदी की आंखों में देखकर महसूस करना चाहती थी।
दो दिन बाद चहक बिना बताए अचानक ऋषिकेश पहुंची। आंगन में तुलसी के चौरे के पास बैठी नानी और बरामदे में अखबार पढ़ते नाना जी उसे देखकर चौंक गए। तभी स्कूल से थकी-हारी अन्विता घर लौटी। उसके कंधे पर भारी बैग था और चेहरे पर धूप की तपन।
चहक दौड़कर गई और अन्विता के गले से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगी। अन्विता घबरा गई, “क्या हुआ मेरी बच्ची? तबीयत तो ठीक है? ऐसे अचानक कैसे आ गई?”
चहक ने अपने आंसू पोंछे, बैग से अपना नियुक्ति पत्र निकाला और अन्विता के कदमों में रखकर उसके पैर छू लिए। अन्विता ने जब वह पत्र पढ़ा, तो उसकी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। उसने चहक को गले से लगा लिया।
शाम को जब सब साथ बैठे, तो चहक अपने कमरे में गई और एक बड़ा सा गिफ्ट पैक लेकर आई। उसने वह पैक अन्विता के हाथों में थमा दिया। अन्विता ने जब उसे खोला, तो वह दंग रह गई। उसमें दुनिया के सबसे बेहतरीन ब्रांड के एक्रिलिक और ऑयल पेंट्स, तरह-तरह के ब्रश और रोल किए हुए बड़े कैनवास थे।
अन्विता ने प्रश्नसूचक नजरों से चहक की ओर देखा। चहक ने अपनी दीदी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और भर्राई हुई आवाज में कहा, “दीदी, आज से आपकी स्कूल और कोचिंग की नौकरी से हमेशा के लिए छुट्टी। पिछले छह सालों से आपने अपने सपनों का गला घोंटकर मुझे सांसें दी हैं। मैंने रात के अंधेरे में आपको उस लोहे के संदूक के पास रोते हुए देखा है दीदी। मेरी पढ़ाई के दौरान मैंने जो भी स्कॉलरशिप और फ्रीलांसिंग से पैसे बचाए थे, उससे मैंने यह रंग खरीदे हैं और साथ ही देहरादून की उसी आर्ट एकेडमी में आपके एडवांस्ड डिप्लोमा की फीस भी जमा कर दी है।”
अन्विता कुछ बोलने ही वाली थी कि चहक ने उसके होंठों पर उंगली रख दी और बोली, “आज आप कुछ नहीं बोलेंगी दीदी। आज तक आपने माँ और पापा बनकर मेरा भविष्य संवारा है, अब आपकी इस छोटी बहन की बारी है। अब मैं कमाऊंगी और आप सिर्फ अपने कैनवास पर अपने सपनों के रंग भरेंगी।”
यह सुनकर बरामदे में बैठे नाना मनोहर लाल जी और नानी सावित्री देवी की आंखें छलक उठीं। दोनों ने हाथ जोड़कर ऊपर आसमान की ओर देखा, मानो अपनी दिवंगत बेटी और दामाद से कह रहे हों—“देखो, तुम्हारी बेटियों का संस्कार और प्रेम आज जीत गया।” नाना जी ने दोनों बहनों के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया कि उनका यह अटूट स्नेह जन्म-जन्मांतर तक ऐसा ही बना रहे।
चहक की नौकरी नोएडा में थी, लेकिन उसने कंपनी से बात करके शुरुआती कुछ महीनों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ ले लिया, ताकि वह घर की व्यवस्था संभाल सके। अन्विता ने हिचकिचाते हुए ही सही, पर चहक की जिद के आगे हार मान ली। जब छह साल बाद अन्विता ने पहली बार हाथ में ब्रश पकड़ा और कैनवास पर पहला स्ट्रोक लगाया, तो उसे लगा जैसे उसके सूखे हुए प्राणों में फिर से हरियाली लौट आई हो।
चहक दिन भर लैपटॉप पर अपना ऑफिस का काम करती और अन्विता अपने कैनवास में डूबी रहती। एक दिन चहक ने दिल्ली में होने वाली एक राष्ट्रीय स्तर की चित्रकला प्रदर्शनी और प्रतियोगिता (National Art Exhibition) के बारे में पढ़ा। उसने चुपचाप अन्विता का नाम उसमें दर्ज करवा दिया और आकर कहा, “दीदी, आपके पास तीन महीने हैं। इस प्रतियोगिता का विषय है—’मौन बलिदान’। आपको इसके लिए पेंटिंग बनानी है और मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी दीदी ही जीतेगी।”
अन्विता का आत्मविश्वास इतने सालों में थोड़ा डगमगा गया था, लेकिन चहक उसके पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही। उसने अन्विता को हर पल प्रोत्साहित किया। अन्विता ने अपने दिल के सारे जज्बात, अपने माता-पिता की यादें, नाना-नानी का संघर्ष और अपनी बहन के प्रति अपने असीम प्रेम को कैनवास पर उकेर दिया। उसने एक ऐसी पेंटिंग बनाई जिसमें एक सूखा हुआ पेड़ अपनी ही टहनियों की छांव से एक नन्हे पौधे को कड़ी धूप से बचा रहा था, और उस नन्हे पौधे के फूल सूखे पेड़ की जड़ों में जीवन रस टपका रहे थे।
दिल्ली में प्रतियोगिता का अंतिम दिन था। देश भर से नामी कलाकार आए थे। जब परिणाम घोषित हुआ, तो प्रथम पुरस्कार के लिए ‘अन्विता’ का नाम पुकारा गया। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मंच पर जाकर जब अन्विता ने ट्रॉफी और चेक थामा, तो उसकी नजरें सामने दर्शक दीर्घा में बैठी चहक और नाना-नानी पर टिकी थीं।
माइक हाथ में लेते ही अन्विता का गला भर आया। उसने कहा, “यह जीत मेरी नहीं है। मेरे हाथ में तो ब्रश थामने की ताकत भी नहीं बची थी। यह जीत मेरी छोटी बहन चहक की है, जिसने अपनी बड़ी बहन के टूटे हुए पंखों को अपनी कामयाबी की हवा दी और मुझे फिर से उड़ना सिखाया।” नीचे खड़ी चहक की आंखों से गर्व के आंसू बह रहे थे। यह दिन वास्तव में उन दोनों बहनों के निस्वार्थ प्रेम और त्याग की जीत का दिन था।
इस जीत के बाद अन्विता के लिए कला जगत के दरवाजे खुल गए। उसकी पेंटिंग्स बड़े-बड़े आर्ट गैलरी में बिकने लगीं। कुछ समय बाद, जब दोनों बहनें अपने-अपने पैरों पर पूरी तरह खड़ी हो गईं, तो नाना-नानी ने सुयोग्य वर देखकर दोनों का विवाह अच्छे और संस्कारी परिवारों में कर दिया। चहक और अन्विता के पतियों ने भी दोनों बहनों के इस पवित्र रिश्ते का हमेशा सम्मान किया।
अपनी दोनों नातिनों को अपने-अपने घरों में सुखी और संपन्न देखकर, मनोहर लाल जी और सावित्री देवी ने भी संतोष की सांस ली और कुछ वर्षों के अंतराल में अपनी जीवन यात्रा पूरी कर शांति से परलोक सिधार गए।
आज भी अन्विता और चहक के बीच का वह बंधन वैसा ही अटूट है। त्योहार हो या कोई छुट्टी, दोनों के परिवार साथ ही समय बिताते हैं। जब दोनों बहनें अपने-अपने बच्चों को बिठाकर अपने बचपन की शरारतें और संघर्ष के दिनों की कहानियां सुनाती हैं, तो बच्चों की आंखें भी आश्चर्य और आदर से फैल जाती हैं। आज भी अगर अन्विता को छींक आती है, तो मीलों दूर बैठी चहक का फोन तुरंत आ जाता है। दोनों में आज भी एक-दूसरे की जान बसती है। ईश्वर करे, त्याग और समर्पण की नींव पर टिका इन दोनों बहनों के स्नेह का यह पावन बंधन युगों-युगों तक ऐसे ही महकता रहे।
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मूल लेखिका : नीरजा नामदेव