अपनापन या सिर्फ़ ज़रूरत का हिसाब?

 “अरे रहने दे बहू!” निर्मला देवी ने हाथ झटकते हुए बात काट दी, “अपनी दीदी की इतनी ही सगी बन रही है तो साफ-साफ कह दे उनसे कि या तो इंटरनेट से मंगवा लें, या फिर जब खुद कभी यहां आएं तो अपनी पसंद से खरीद लें। दूसरों की फरमाइशें पूरी करने के लिए मैं अपनी कमर नहीं तुड़वा सकती। बच्चे की मां है तू, थोड़ा घर में टिकना सीख।”

तन्वी के स्वाभिमान को आज बहुत गहरी चोट लगी थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपने हाथ में पकड़े फोन को देखा और वहीं खड़े-खड़े नंबर मिलाया।

  तन्वी ने चूल्हे की आंच धीमी की और ट्रे में दो प्याले चाय के सजाकर बैठक की ओर बढ़ गई। वहां तख्त पर बैठीं उसकी सास निर्मला देवी अपनी माला फेर रही थीं, और पास ही सोफे पर ससुर रमेश चंद्र जी अखबार के पन्नों में खोए हुए थे। तन्वी का ढाई साल का बेटा आरव फर्श पर बिछे कालीन पर अपनी छोटी-छोटी लाल-पीली गाड़ियों से खेल रहा था।

“मम्मी जी, चाय ले लीजिए,” तन्वी ने बड़ी विनम्रता से मेज पर प्याला रखते हुए कहा। फिर उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए थोड़ी झिझक के साथ बात आगे बढ़ाई, “मम्मी जी, आज पापा जी की आंखों की जांच की रिपोर्ट लानी है और साथ ही बिजली के दफ्तर जाकर पिछले महीने के बिल का हिसाब भी ठीक करवाना है। आदित्य को तो बैंक से आज बिल्कुल भी छुट्टी नहीं मिल पाएगी, तो मैंने सोचा कि दोपहर में मैं ही जाकर ये दोनों काम निपटा आऊंगी।”

निर्मला देवी ने माला को माथे से लगाया और थैली में रखते हुए तुरंत सहमति में सिर हिलाया, “हां-हां बहू, यह तो बहुत अच्छा सोचा तूने। तेरे पापा जी से तो अब सरकारी दफ्तरों की लंबी कतारों में खड़ा नहीं हुआ जाता। तू ही हो आ, काम भी समय पर निपट जाएगा।”

तन्वी ने आरव की तरफ देखते हुए कहा, “जी मम्मी जी, पर अस्पताल और बिजली घर दोनों शहर के दूसरे कोने में हैं। वहां भीड़ भी बहुत रहती है और आते-आते मुझे शाम के चार बज जाएंगे। मैं सोच रही थी कि लौटते वक्त सेक्टर की बड़ी मंडी से महीने भर का सूखा राशन और ताज़ी सब्जियां भी लेती आऊंगी। अब इतनी भागदौड़ में आरव को साथ ले जाना बहुत मुश्किल हो जाएगा, वह धूप और भीड़ में चिड़चिड़ा हो जाता है।”

तन्वी की बात पूरी होने से पहले ही निर्मला देवी के चेहरे पर स्नेह उमड़ आया। उन्होंने चाय की चुस्की लेते हुए बड़े ही दुलार से आरव को देखा और बोलीं, “अरे पगली, तू आरव की चिंता क्यों करती है? मैं हूं ना घर पर! दादी-पोता मिलकर दोपहर भर खूब खेलेंगे। मैं इसे समय पर खिचड़ी खिलाकर सुला दूंगी। तू बिल्कुल बेफिक्र होकर जा और तसल्ली से घर के सारे काम निपटा कर आ।”

सास की यह बात सुनकर तन्वी के मन को बड़ा सुकून मिला। उसे लगा कि वह कितनी खुशकिस्मत है जो उसे इतना सहयोग करने वाली सास मिली हैं। वह दोपहर की धूप में निकली, दो घंटे बिजली के दफ्तर के चक्कर काटे, फिर अस्पताल से ससुर जी की रिपोर्ट ली और अंत में दोनों हाथों में राशन के भारी थैले लटकाए जब घर लौटी, तो पसीने से तरबतर थी। घर आकर उसने देखा कि आरव आराम से सो रहा था। तन्वी ने बिना एक पल आराम किए तुरंत रसोई संभाली और रात के खाने की तैयारी में जुट गई।

इस बात को अभी चार-पांच दिन ही बीते थे। शुक्रवार की सुबह तन्वी के फोन की घंटी बजी। उधर से उसकी बचपन की सबसे पक्की सहेली मानसी की आवाज आई। मानसी के छोटे भाई का आज विवाह था और उसने तन्वी को बहुत मनुहार करके बुलाया था। तन्वी के मन में भी उत्साह जाग उठा। शादी के बाद से घर-गृहस्थी और फिर आरव के जन्म के बाद से वह किसी भी समारोह में खुलकर शामिल नहीं हो पाई थी।

शाम को जब उसने रसोई का सारा काम समेट लिया, रोटियां बनाकर डिब्बे में रख दीं और दाल-सब्जी ढक दी, तब वह निर्मला देवी के कमरे में गई।

“मम्मी जी, आज रात मानसी के भाई की शादी है। आदित्य कह रहे थे कि वे दफ्तर से सीधे वहीं पहुंच जाएंगे और मुझे साथ ले लेंगे। पर वहां बैंक्वेट हॉल में तेज संगीत और काफी भीड़भाड़ होगी। आरव अभी छोटा है, इतनी रात को शोर-शराबे में वह घबरा जाता है और रोने लगता है। मैंने आपका और पापा जी का खाना परोसने के लिए तैयार रख दिया है और आरव का दूध भी उबाल दिया है। अगर आप दो-तीन घंटे के लिए आरव को…”

तन्वी की बात अभी अधूरी ही थी कि निर्मला देवी के माथे पर बल पड़ गए। उनके चेहरे की वह ममतामयी मुस्कान गायब हो गई जो चार दिन पहले बिजली के बिल और अस्पताल की रिपोर्ट के वक्त दिखी थी।

“ठहर जा बहू! कहीं तू आरव को मेरे भरोसे छोड़कर शादी में जाने की तो नहीं सोच रही?” निर्मला देवी ने अपने घुटनों पर हाथ फेरते हुए थोड़ा सख्त लहजे में कहा, “देख तन्वी, अब मेरी उम्र हो गई है। दिन भर के बाद शाम को मेरे घुटनों में जान नहीं बचती। मुझे साढ़े आठ बजे अपनी दवा लेकर नौ बजे तक हर हाल में बिस्तर पर लेटना होता है। अब इस बुढ़ापे में मैं इस चंचल बच्चे के पीछे-पीछे भागूं या अपनी सेहत देखूं? और वैसे भी, शादी-ब्याह के घर में जाने के बाद वक्त का कोई ठिकाना रहता है भला? तुम लोग गप्पें मारने बैठ जाओगे और यहां मेरी नींद खराब होगी। ना बाबा ना, हम औरतों का जन्म ही त्याग और जिम्मेदारी के लिए हुआ है। हमने भी तो तुम्हारे पति और ननद को अपनी गोद में लादकर ही सारी दुनियादारी निभाई है। बच्चा पैदा किया है तो उसे हर जगह साथ लेकर जाना सीखो।”

सास के इन तीखे शब्दों ने तन्वी के सारे उत्साह पर पानी फेर दिया। उसने बिना कोई बहस किए चुपचाप सिर झुका लिया। उसने अपनी भारी बनारसी साड़ी वापस अलमारी में टांग दी और एक साधारण सा सलवार-सूट पहन लिया, ताकि बच्चे को संभालने में आसानी रहे।

जब वह और आदित्य शादी में पहुंचे, तो वही हुआ जिसका तन्वी को डर था। तेज ढोल-नगाड़ों और रोशनी की चकाचौंध से आरव बुरी तरह डर गया। उसने रोना शुरू किया तो चुप होने का नाम ही नहीं लिया। मानसी जब स्टेज से उतरकर अपनी सहेली से मिलने आई, तब भी तन्वी कोने में खड़ी रोते हुए आरव को कंधे से लगाए थपकी दे रही थी। आदित्य ने भी बच्चे को लेने की कोशिश की, लेकिन आरव मां का आंचल छोड़ने को तैयार ही नहीं था। न तन्वी अपनी सहेली से चार बातें कर सकी, न ही उसने खाने की एक प्लेट तक छुई। महज पैंतालीस मिनट में ही आदित्य और तन्वी को भूखे पेट समारोह से वापस लौटना पड़ा। रास्ते भर तन्वी खिड़की से बाहर देखती रही और उसकी आंखों की कोरों में नमी तैरती रही। घर लौटकर उसने चुपचाप ठंडी रोटी अचार के साथ खाई और सो गई।

वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा। करीब एक हफ्ते बाद एक सुबह नाश्ते की मेज पर निर्मला देवी ने खुद ही बात छेड़ी।

“तन्वी, इस रविवार को हमारे कुलगुरु के आश्रम में बड़ा सत्संग है। वहां के बाद मुझे तुम्हारे पापा जी को लेकर वैद्य जी के पास भी जाना है, पर मेरे पैरों में सूजन है तो मुझसे आश्रम की भीड़ और फिर वैद्य जी के यहां का इंतजार सहन नहीं होगा। एक काम करना, कल शनिवार है तो तू ही पापा जी को ऑटो से वैद्य जी के पास ले जाना, उनकी नाड़ी दिखवाकर महीने भर का चूर्ण और काढ़ा बनवा लाना। और आते वक्त आश्रम से प्रसाद की पेटी भी लेती आना।”

तन्वी ने परांठे पर घी लगाते हुए शांत स्वर में पूछा, “ठीक है मम्मी जी, मैं चली जाऊंगी। पर आरव को कौन देखेगा? वैद्य जी के यहां तो बहुत भीड़ होती है।”

निर्मला देवी ने तुरंत हंसते हुए हाथ हवा में लहराया, “अरे, कैसी बातें करती है बहू! घर में इसकी दादी जिंदा बैठी है न! अपने पोते के साथ तो मेरा वक्त ऐसे कट जाता है कि पता ही नहीं चलता। यह तो मेरे बुढ़ापे की लाठी है। तू इसकी फिक्र बिल्कुल मत कर, मैं इसे कहानी सुनाकर अपने पास ही रखूंगी।”

तन्वी ने एक गहरी सांस ली। उसके मन में एक कड़वाहट सी घुलने लगी थी, लेकिन घर की शांति बनाए रखने के लिए उसने फिर से होंठ सी लिए। वह शनिवार को गई और चार घंटे धूप में भटककर ससुर जी की दवाइयां और आश्रम का काम पूरा करके आई।

इसके ठीक तीन दिन बाद की बात है। दोपहर का समय था। आरव सो रहा था और निर्मला देवी आंगन में बैठकर स्वेटर बुन रही थीं। तन्वी उनके पास आकर बैठी।

“मम्मी जी, एक छोटा सा काम था,” तन्वी ने कहा, “दीदी ने फोन किया था। अगले हफ्ते उनके ससुराल में एक पूजा है, तो उन्हें यहां के पुराने बाजार की प्रसिद्ध फुलकारी वाली दुपट्टे और कुछ सूट चाहिए थे। उन्होंने कहा है कि जो कारीगरी हमारे यहां के बाजार में मिलती है, वैसी वहां नहीं मिलती। बाजार यहां से बस बीस मिनट की दूरी पर है। अगर आप सिर्फ एक घंटे के लिए आरव का ध्यान रख लें, तो मैं फटाफट जाकर दीदी की पसंद का सामान ले आऊं और आज शाम की डाक से भिजवा भी दूं।”

बस, इतना सुनना था कि निर्मला देवी ने सलाइयां गोद में पटक दीं और चश्मे के ऊपर से तन्वी को घूरकर देखा।

“एक घंटा? सच बताना तन्वी, क्या तुझे अपने दुधमुंहे बच्चे को छोड़कर बाजारों में भटकने में कोई खास आनंद आता है? जब देखो, इसे मेरे पल्ले बांधकर बाहर निकलने का कोई न कोई बहाना ढूंढती रहती है! क्या मेरे भरोसे इसे जन्म दिया था? और आजकल के जमाने में कौन धूप में दुकानों की खाक छानता है? दिन भर तो तेरे फोन पर ऑनलाइन सामान की गाड़ियां आती रहती हैं, आज ऐसा कौन सा अनोखा सामान खरीदना है जो घर बैठे नहीं आ सकता? मेरी कमर में सुबह से ही चसक उठ रही है, मुझसे नहीं संभलेगा यह बच्चा।”

तन्वी ने बहुत धीमे स्वर में समझाने की कोशिश की, “मम्मी जी, मैं अपने घूमने के लिए नहीं जा रही। दीदी ने बहुत उम्मीद से मंगवाया है। ऑनलाइन वैसी असली कारीगरी वाली चीज नहीं मिलती और वहां के दुकानदार बिना देखे सही कपड़ा नहीं देते। बस एक घंटे की ही तो बात है…”

“अरे रहने दे बहू!” निर्मला देवी ने हाथ झटकते हुए बात काट दी, “अपनी दीदी की इतनी ही सगी बन रही है तो साफ-साफ कह दे उनसे कि या तो इंटरनेट से मंगवा लें, या फिर जब खुद कभी यहां आएं तो अपनी पसंद से खरीद लें। दूसरों की फरमाइशें पूरी करने के लिए मैं अपनी कमर नहीं तुड़वा सकती। बच्चे की मां है तू, थोड़ा घर में टिकना सीख।”

तन्वी के स्वाभिमान को आज बहुत गहरी चोट लगी थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपने हाथ में पकड़े फोन को देखा और वहीं खड़े-खड़े नंबर मिलाया।

“हेलो… हां नीतू दीदी, नमस्ते,” तन्वी ने अपनी आवाज को सामान्य रखने की पूरी कोशिश करते हुए कहा, “दीदी, मुझे माफ कर दीजिएगा, मैं आज बाजार जाकर आपके लिए दुपट्टे और सूट नहीं ला पाऊंगी। वो असल में आरव को अकेले छोड़ना मुश्किल है और मम्मी जी की तबीयत…”

“हैं? क्या कहा? नीतू का फोन है क्या?” निर्मला देवी के कान तुरंत खड़े हो गए। उन्होंने अपनी बुनाई एक तरफ फेंकी और तन्वी के हाथ से लगभग फोन छीनने के अंदाज में बीच में ही टोकते हुए जोर से बोलीं, “अरे रुक-रुक बहू! नीतू से मना क्यों कर रही है? कह दे उससे कि तू अभी जा रही है बाजार! बात करा मेरी मेरी बेटी से!”

तन्वी ने आश्चर्य से अपनी सास को देखा और फोन पर कहा, “दीदी, मैं आपको थोड़ी देर में फोन करती हूं,” और उसने कॉल काट दिया।

निर्मला देवी के चेहरे के भाव पल भर में बदल चुके थे। उनकी कमर की चसक गायब हो गई थी और आवाज में गजब की फुर्ती आ गई थी। वे लगभग डांटते हुए बोलीं, “अरे तन्वी, तू भी न पूरी बावली है! पहले साफ-साफ नहीं बता सकती थी कि मेरी बेटी नीतू ने सामान मंगवाया है? मुझे तो लगा कि तेरी अपनी बड़ी बहन प्रिया की फरमाइश आई है! अब खड़ी-खड़ी मेरा मुंह क्या ताक रही है? जा, जल्दी से अलमारी से पैसे निकाल और बाजार जा, वरना शाम को अच्छी दुकानें बंद हो जाएंगी और मेरी बच्ची का मन टूट जाएगा। आरव उठ भी गया तो मैं संभाल लूंगी, तू चिंता मत कर!”

तन्वी के पांव जैसे जमीन में गड़ गए। वह अपलक अपनी सास के बदलते हुए रंग को देख रही थी। आज उसके सब्र का बांध टूट गया। सालों से जो बातें वह घर की मर्यादा के नाम पर अपने सीने में दफन करती आ रही थी, आज वे शब्द बनकर उसके होंठों पर आ गईं। उसकी आवाज में न तो कोई चीख थी और न ही कोई बदतमीजी, बस एक गहरा दर्द और ठहराव था।

“क्यों मम्मी जी? नाम बदलते ही आपकी कमर का दर्द कैसे गायब हो गया?” तन्वी ने सीधे निर्मला देवी की आंखों में देखते हुए पूछा, “जब तक आपको लगा कि वह मेरी बहन प्रिया है, तब तक मैं एक गैर-जिम्मेदार मां थी जिसे बच्चे को छोड़कर घूमने में मजा आता है। और जैसे ही आपको पता चला कि वह आपकी बेटी नीतू दीदी हैं, तो अचानक आरव को संभालना आपके लिए आसान हो गया?”

निर्मला देवी थोड़ा सकपका गईं, “अरे… वो तो नीतू इस घर की बेटी है न, उसका हक बनता है…”

“और मैं कौन हूं मम्मी जी?” तन्वी की आंख से एक आंसू ढलक कर उसके गाल पर आ गिरा, जिसे उसने तुरंत अपनी हथेली से पोंछ लिया, “मैं जब इस घर की दहलीज लांघकर आई थी, तो मैंने अपनी मां और आप में रत्ती भर का फर्क नहीं समझा। मैंने नीतू दीदी को हमेशा अपनी सगी बहन प्रिया के बराबर ही मान दिया। पर आपने मुझे क्या दिया? सिर्फ जरूरत और मतलब का एक कच्चा हिसाब? जब पापा जी की अस्पताल की रिपोर्ट लानी हो, बिजली के दफ्तर की लाइन में लगना हो, मंडी से दस किलो राशन का बोझ उठाकर लाना हो, या आश्रम और वैद्य जी के चक्कर काटने हों—तब तो आप एक पल में आरव की सबसे प्यारी दादी बन जाती हैं! तब न आपकी उम्र आड़े आती है, न आपके घुटनों का दर्द और न ही आपकी सोने की समय-सारणी। लेकिन जैसे ही बात मेरी किसी छोटी सी खुशी, मेरी सहेली की शादी, या मेरे मायके से जुड़े किसी काम की आती है, तो अचानक यह ढाई साल का बच्चा आपके लिए बोझ बन जाता है?”

बैठक के दरवाजे के पास खड़े रमेश चंद्र जी भी अपनी छड़ी के सहारे रुक गए थे और चुपचाप बहू की बातें सुन रहे थे। निर्मला देवी के पास कोई जवाब नहीं था, उनकी नजरें धीरे-धीरे झुकने लगी थीं।

तन्वी ने कांपते स्वर में अपनी बात जारी रखी, “मम्मी जी, समाज में चार औरतें जब बैठती हैं तो बड़ी आसानी से कह देती हैं कि शादी के बाद बेटा बदल गया, या आजकल की बहुएं बड़ी मतलबी और तेज होती हैं, सास-ससुर की सेवा नहीं करतीं। पर क्या कभी किसी ने अपने गिरेबान में झांककर यह देखा है कि एक सीधी-सादी लड़की को मतलबी बनाता कौन है? जब एक बहू देखती है कि ससुराल में उसकी कद्र सिर्फ तब तक है जब तक वह घर के काम का बोझ ढो रही है, और उसकी अपनी भावनाओं, उसके मायके और उसकी खुशियों का यहां कोई मोल नहीं है—तब उसके अंदर का समर्पण भी धीरे-धीरे मरने लगता है। अगर आप बहू को सिर्फ अपने मतलब और अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करेंगी, तो एक दिन मजबूर होकर वह भी सिर्फ मतलब का ही रिश्ता निभाना सीख जाएगी। कोई भी लड़की अपना घर-बार छोड़कर ससुराल में हिसाब-किताब करने नहीं आती मम्मी जी, वह अपना एक नया परिवार बसाने आती है। पर जब हर कदम पर उसे यह एहसास दिलाया जाए कि ‘मेरी बेटी’ और ‘तेरी बहन’ के नियम अलग-अलग हैं, तो वह किस हक से आपको अपनी मां कहे? आखिर ऐसे एकतरफा और मतलबी रिश्तों की नींव पर कोई गृहस्थी कब तक टिक सकती है?”

कमरे में एकदम सन्नाटा पसर गया। दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही थी। निर्मला देवी को लग रहा था जैसे किसी ने उनके सामने एक बड़ा सा आईना रख दिया हो, जिसमें उन्हें अपना ही स्वार्थ साफ-साफ दिखाई दे रहा था। उन्हें याद आया कि कैसे उस रात तन्वी शादी से भूखे पेट लौट आई थी और कैसे वे खुद अपने काम के वक्त तन्वी को धूप में भेज देती थीं। रमेश चंद्र जी ने भी एक गहरी सांस ली और पत्नी की ओर देखकर बोले, “निर्मला, बहू का एक-एक शब्द सच है। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। हम बड़ों को ही अपने आचरण से छोटों के दिल में जगह बनानी पड़ती है।”

तन्वी ने अपने आंसू पोंछे और अपनी भावनाओं पर काबू पाते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिएगा मम्मी जी, अगर मेरी किसी बात से आपका दिल दुखा हो। पर आज अगर मैं चुप रह जाती, तो शायद मेरे मन की यह गांठ कभी न खुलती। मैं जा रही हूं बाजार, नीतू दीदी का सामान लेकर अभी आती हूं।”

तन्वी जैसे ही मुड़कर मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी, निर्मला देवी ने अपनी जगह से उठकर उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी आंखों में पछतावे के आंसू चमक रहे थे।

“रुक जा तन्वी…” निर्मला देवी की आवाज भर्राई हुई थी। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछीं और तन्वी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “माफी तो मुझे मांगनी चाहिए मेरी बच्ची। उम्र के साथ मेरी आंखों पर खुदगर्जी की ऐसी पट्टी बंध गई थी कि मुझे तेरा त्याग और तेरी थकान दिखी ही नहीं। मैं यह भूल ही गई थी कि तू भी किसी की लाडली बेटी है। आज तूने मुझे बोलकर बहुत बड़ा गुनाह करने से बचा लिया, वरना मैं तो अनजाने में ही अपने इतने सुंदर परिवार में दरार डाल रही थी।”

निर्मला देवी ने अपनी अलमारी खोली और उसमें से कुछ पैसे निकालकर तन्वी की हथेली पर रखते हुए मुस्कुराकर कहा, “सुन बहू, जब बाजार जा ही रही है, तो नीतू के साथ-साथ प्रिया के लिए भी वैसा ही एक सुंदर सा फुलकारी का सूट खरीद लेना। कह देना कि यह चंडीगढ़ वाली मौसी जी ने आशीर्वाद के तौर पर भेजा है। और हां, बाजार के कोने पर जो महिलाओं का ब्यूटी पार्लर है न, वहां भी होती आना। मैं देख रही हूं, पिछले दो महीनों से घर और बच्चे की जिम्मेदारियों में तूने खुद की तरफ ध्यान ही नहीं दिया है। आराम से दो-तीन घंटे लगाकर आना, बाहर की चाट-पकौड़ी भी खा लेना। आरव की तरफ से बिल्कुल निश्चिंत रह। और मेरी पुरानी बातों को दिल से निकाल देना… सास हूं न, थोड़ी बहुत बड़बड़ाने की पुरानी आदत है, पर अब से इस घर में बेटी और बहू के लिए दो अलग तराजू नहीं होंगे।”

सास के मुंह से अपनी बहन प्रिया के लिए इतना अपनापन और खुद के लिए ऐसी परवाह सुनकर तन्वी का सारा दुख कपूर की तरह उड़ गया। उसके चेहरे पर एक खिली हुई मुस्कान तैर गई और उसने आगे बढ़कर निर्मला देवी को कसकर गले से लगा लिया। आंगन में खिली दोपहर की धूप अब पहले से कहीं ज्यादा गुनगुनी और सुहानी लग रही थी, क्योंकि आज उस घर में सिर्फ काम का नहीं, बल्कि दिलों का रिश्ता जुड़ चुका था।

क्या आपको भी लगता है कि ससुराल में अक्सर बेटी और बहू के लिए अलग-अलग नियम बनाए जाते हैं? तन्वी ने अपनी सास से जो कहा, क्या वह सही था? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें!

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 मूल लेखिका : रोनिता कुंडू 

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