कमला ताई की इस तीखी और कड़कड़ाती आवाज़ ने आँगन में खिलखिलाती हुई शाम को जैसे एक पल में बर्फ की तरह जमा दिया। सुरेश बाबू के हाथ में पकड़ा चाय का प्याला काँप उठा, और उनके घुटनों के पास बैठी उनकी लाडली बेटी अवनि के चेहरे की सारी चमक अचानक कहीं गायब हो गई।
सुरेश बाबू एक सेवानिवृत्त कॉलेज प्रोफेसर थे और उनकी पत्नी, सुधा जी, एक बेहद शांत और ममतामयी गृहिणी थीं। उनकी इकलौती संतान थी अवनि। आज घर में शादी की शहनाइयाँ बजने में महज़ बीस दिन बाकी थे। पूरे घर में रंग-रोगन हो चुका था, गेंदे के फूलों की लड़ियाँ दरवाज़ों पर झूल रही थीं, और रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो गया था।
अवनि तेईस साल की एक बेहद ज़िंदादिल, हँसमुख और कला प्रेमी लड़की थी। उसने संगीत में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया था और सितार के तारों से जब वह सुर छेड़ती थी, तो लगता था जैसे हवा भी ठहरकर उसे सुन रही हो। सुरेश बाबू के लिए अवनि सिर्फ उनकी बेटी नहीं, बल्कि उनके जीने की वजह थी। उन्होंने अवनि की परवरिश किसी राजकुमारी की तरह नहीं, बल्कि एक आज़ाद पंछी की तरह की थी। अवनि को बारिश में भीगना पसंद था, तो सुरेश बाबू खुद छतरी छोड़कर उसके साथ आँगन में आ जाते थे। उसे देर रात तक छत पर बैठकर रियाज़ करना पसंद था, तो पापा उसके लिए अदरक वाली चाय बनाकर ले आते थे। उस घर में अवनि के ठहाकों से ही सुबह होती थी और उसकी मीठी तानों से ही रात ढलती थी।
लेकिन पिछले दस दिनों से इस घर की हवा में एक अजीब सा तनाव घुल गया था। वजह थीं सुरेश बाबू की बड़ी भाभी, यानी अवनि की कमला ताई। सुरेश बाबू के बड़े भाई के निधन के बाद कमला ताई ही परिवार की सबसे बड़ी बुजुर्ग थीं। वे हरिद्वार में रहती थीं और अवनि की शादी की तैयारियों की देखरेख करने के लिए एक महीना पहले ही देहरादून आ गई थीं। कमला ताई दिल की बुरी नहीं थीं, लेकिन वे उस पुराने समाज की प्रतिनिधि थीं जहाँ लड़कियों की हँसी, उनके कपड़ों और उनके चलने-फिरने के ढंग से खानदान की इज़्ज़त नापी जाती थी। उनका मानना था कि लड़की कच्ची मिट्टी की तरह होती है, जिसे शादी से पहले ही ससुराल के साँचे में ढाल देना चाहिए, वरना बाद में वह टूट जाती है।
आते ही कमला ताई ने घर की कमान अपने हाथों में ले ली थी। शुरुआती दो-तीन दिन तो अवनि को ताई जी की बातें मज़ाक लगीं, लेकिन धीरे-धीरे ताई जी के नियम-कायदे किसी अदालती फरमान की तरह उस पर थोपे जाने लगे।
तीन दिन पहले की ही बात है। सुबह के नौ बजे थे। अवनि अपने ढीले-ढाले पजामे और टी-शर्ट में, बालों का एक बेतरतीब सा जूड़ा बनाए, गुनगुनाती हुई सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी। उसके हाथ में उसका सितार था।
“अरी अवनि! यह क्या भेष बना रखा है तूने?” कमला ताई ने आँगन में मटर छीलते हुए अपनी भौंहे चढ़ाकर कहा। “घर में टेंट वाले, हलवाई और रिश्तेदार आ-जा रहे हैं, और तू यह लड़कों जैसे कपड़े पहनकर घूम रही है? जा, जाकर कोई ढंग का सलवार-सूट पहन और दुपट्टा सिर पर नहीं तो कम से कम गले में तो डाल। अब तू कोई दुधमुंही बच्ची नहीं है, बीस दिन बाद पराये घर जाना है तुझे!”
अवनि के कदम वहीं ठिठक गए। उसने अपनी माँ सुधा की तरफ देखा, जो रसोई के दरवाज़े पर खड़ी बेबसी से मुस्कुरा रही थीं। सुधा जी अपनी जेठानी के सामने कभी ज़ुबान नहीं खोलती थीं।
तभी सुरेश बाबू ने अखबार से नज़रें हटाते हुए बात को संभालने की कोशिश की, “अरे भाभी जी, जाने भी दीजिए। बच्ची अभी सोकर उठी है। और फिर अपने ही घर में तो है, यहाँ कौन सा उसे किसी को दिखावा करना है? ससुराल जाएगी तो पहनेगी ही साड़ी-सूट।”
“तुम चुप रहो सुरेश!” कमला ताई ने हाथ झटकते हुए कहा, “तुम्हारे इसी लाड़-प्यार ने तो इसका दिमाग खराब कर रखा है। ससुराल में कोई इसके नखरे नहीं उठाएगा। वहाँ सुबह पाँच बजे उठकर सास-ससुर के पैर छूने पड़ते हैं, सिर से पल्लू सरक जाए तो ताने सुनने पड़ते हैं। अभी से आदत नहीं डालेगी तो वहाँ जाकर रोएगी और हमारे कुल का नाम डुबोएगी सो अलग।”
अवनि ने उस वक्त कुछ नहीं कहा। उसने चुपचाप अपना सितार कोने में रखा और ऊपर जाकर सूट पहन लिया। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। अगले कुछ दिनों में कमला ताई की टोका-टाकी ने अवनि के चारों तरफ एक अदृश्य घेरा बना दिया।
अवनि अगर दर्जी को ब्लाउज का नाप देते वक्त ज़रा सा हँसकर बात कर लेती, तो ताई जी की आँखें तन जातीं—”लड़कियों को गैर मर्दों से इतना हँस-हँस कर बात नहीं करनी चाहिए।” अगर वह खाने की मेज़ पर पापा की थाली से पनीर का टुकड़ा उठा लेती, तो ताई जी टोक देतीं—”ससुराल में पति और ससुर के खाने के बाद बहू खाती है, यह जूठा करने की आदत छोड़ दे।” यहाँ तक कि उसके सितार बजाने पर भी पाबंदी लगने लगी कि “शादी वाले घर में यह हर वक्त का बजाना शोभा नहीं देता, अब घर-गृहस्थी में मन लगा।”
अवनि अपने ही घर में, अपने ही आँगन में एक अजनबी की तरह महसूस करने लगी थी। उसकी चहकती हुई आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी। वह अपने कमरे में बंद रहने लगी। सुधा जी बेटी का मुरझाया हुआ चेहरा देखतीं तो उनका कलेजा मुँह को आता, लेकिन समाज और लोक-लाज की दुहाई देने वाली जेठानी के आगे वे भी चुप रह जातीं।
और फिर वह शाम आई, जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया।
उस दिन अवनि को संगीत अकादमी से एक पत्र मिला था। उसने कुछ महीने पहले एक राष्ट्रीय स्तर की संगीत प्रतियोगिता में अपनी धुन भेजी थी, और आज उसका परिणाम आया था—अवनि को पूरे राज्य में प्रथम स्थान मिला था। यह खबर पढ़ते ही अवनि के अंदर की पुरानी अवनि जैसे फिर से जी उठी। वह पिछले कई दिनों का सारा तनाव, सारी बंदिशें भूल गई।
वह पत्र हाथ में लिए, दुपट्टा कहीं सोफे पर फेंकते हुए, नंगे पाँव ही दौड़ती हुई बाहर लॉन में भागी, जहाँ सुरेश बाबू अपनी आरामकुर्सी पर बैठे चाय पी रहे थे और पास ही तख्त पर कमला ताई और सुधा जी शादी के कार्डों पर पीले चावल लगा रही थीं।
“पापा! पापा, देखो!” अवनि खुशी से चीखती हुई दौड़ी और सीधे जाकर सुरेश बाबू की कुर्सी के हत्थे पर बैठ गई। उसने पीछे से अपने दोनों हाथ पापा के गले में डाल दिए और उनके गाल पर एक ज़ोरदार चुंबन जड़ दिया। “पापा, मैं जीत गई! मेरी सितार की धुन को पहला इनाम मिला है! पापा, आज तो मैं आपको अपनी पीठ पर बिठाकर पूरे देहरादून का चक्कर लगाऊँगी!”
सुरेश बाबू की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने अपनी बेटी के दोनों हाथ चूम लिए और उसकी पीठ थपथपाते हुए खिलखिलाकर हँस पड़े, “वाह मेरी शेरनी! मुझे पता था मेरी बेटी एक दिन मेरा नाम रोशन करेगी!” बाप-बेटी दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर बच्चों की तरह हँस रहे थे। अवनि पापा के कंधे पर सिर टिकाकर अपने सुनहरे भविष्य के सपने सुनाने लगी।
लेकिन यह पवित्र और निश्छल खुशी कमला ताई की आँखों में काँटे की तरह चुभ गई। उन्होंने शादी के कार्ड ज़ोर से तख्त पर पटके और तमतमाते हुए खड़ी हो गईं।
“बस करो यह तमाशा, अवनि!” कमला ताई की आवाज़ किसी बादल की गरज जैसी थी।
लॉन में अचानक मरघट जैसा सन्नाटा पसर गया। अवनि सहमकर तुरंत पापा की कुर्सी से उठी और दो कदम पीछे हट गई।
कमला ताई कमर पर हाथ रखकर आगे बढ़ीं और अवनि को सिर से पैर तक घूरते हुए बोलीं, “तुझे ज़रा भी शर्म-लिहाज है या सब घोलकर पी गई है? बदन पर दुपट्टा नहीं, पाँव में चप्पल नहीं, और घोड़ी जैसी जवान लड़की ऐसे उछलती हुई आकर बाप के गले में लटक रही है? यह कोई उम्र है बाप की गोद में बैठने की?”
अवनि की आँखों में लबालब आँसू भर आए। उसके हाथ से वह जीत का प्रमाण-पत्र छूटकर हरी घास पर गिर गया।
कमला ताई का गुस्सा यहीं नहीं रुका। उन्होंने सुरेश बाबू की तरफ मुड़कर उंगली उठाते हुए कहा, “क्यों सुरेश, क्या ससुराल में भी यह ऐसे ही अपने ससुर के कंधे पर सिर रखकर बैठेगी और आधी रात को छत पर जाकर सितार बजाएगी? अगर अभी से इसकी लगाम नहीं कसी, तो कल को समधियाने में हमारी पगड़ी उछलते देर नहीं लगेगी! माना कि तेरी इकलौती औलाद है, पर है तो लड़की ही न! पराया धन है यह। आज यहाँ बाप के गले पड़ रही है, कल को ससुराल में भी ऐसी ही बेबाकी दिखाएगी तो लोग थूकेंगे हमारी परवरिश पर। वहाँ ससुर और बहू के बीच एक परदा होता है, एक मर्यादा होती है। इसे अभी से अपनी औकात और अपनी हद में रहना सिखाओ, वरना यह लड़की घर नहीं बसा पाएगी!”
‘पराया धन’, ‘औकात’, ‘हद’—ये शब्द अवनि के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गए। जिस घर की मिट्टी में वह खेली थी, जिस आँगन में उसने चलना सीखा था, आज उसी घर में उसे पराया और बेशर्म कहा जा रहा था। उसे लगा जैसे उसकी सांसें घुट रही हों। उसने अपने दोनों हाथों से अपना मुँह ढका और सिसकियाँ लेते हुए अंदर घर की तरफ भागने लगी।
“ठहरो अवनि! एक कदम भी आगे मत बढ़ाना!”
यह आवाज़ सुरेश बाबू की थी। हमेशा शांत, सौम्य और मुस्कुराते रहने वाले सुरेश बाबू की आवाज़ में आज एक ऐसा रौद्र रूप और ऐसी गंभीरता थी कि न सिर्फ अवनि के कदम रुक गए, बल्कि कमला ताई भी सहम कर एक कदम पीछे हट गईं। सुधा जी ने घबराकर अपने पल्लू का कोना मुँह में दबा लिया।
सुरेश बाबू धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठे। उन्होंने नीचे झुककर घास पर पड़े अवनि के प्रमाण-पत्र को उठाया, उसे बहुत प्यार से अपने माथे से लगाया और फिर चलकर अवनि के पास गए। उन्होंने अवनि का काँपता हुआ हाथ अपने मजबूत हाथों में थामा और उसे वापस लॉन के बीचोबीच लेकर आए।
सुरेश बाबू ने अपनी बड़ी भाभी की आँखों में आँखें डालीं। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरी पीड़ा और एक पिता का अडिग स्वाभिमान था।
उन्होंने बहुत ही सधे हुए, शांत लेकिन सीधे दिल में उतर जाने वाले स्वर में बोलना शुरू किया, “भाभी जी, आज तक आपने इस घर में जो भी कहा, मैंने और सुधा ने उसे बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद समझकर सिर-माथे पर रखा। लेकिन आज बात मेरी बेटी के अस्तित्व और उसके स्वाभिमान की है, इसलिए आज मेरा बोलना बहुत ज़रूरी है।”
कमला ताई ने कुछ कहना चाहा, “देखो सुरेश, मैं तो बस लोक-रीति…”
“लोक-रीति इंसान की खुशी के लिए बनती है भाभी जी, इंसान की सांसें घोंटने के लिए नहीं!” सुरेश बाबू ने बीच में ही अपनी बात रखते हुए कहा। “आपने बिल्कुल सच कहा कि ससुराल में एक मर्यादा होती है। आपने सच कहा कि वहाँ ससुर और बहू के बीच एक दूरी होती है। मुझे भी दुनियादारी की समझ है भाभी जी। मैं जानता हूँ कि आज से बीस दिन बाद जब मेरी यह फूल सी बच्ची उस अनजान घर में जाएगी, तो इसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाएगी। वहाँ इसे हर कदम फूँक-फूँक कर रखना होगा। वहाँ यह सुबह देर तक सो नहीं पाएगी, अपनी मर्जी के कपड़े नहीं पहन पाएगी, और न ही जब मन चाहे तब अपने सितार के तार छेड़ पाएगी। वहाँ इसे हर रोज़ एक परीक्षा देनी होगी—एक अच्छी बहू बनने की, एक आदर्श पत्नी बनने की, और पूरे परिवार को खुश रखने की।”
सुरेश बाबू का गला भर आया। उन्होंने अवनि के कंधे पर अपना हाथ रखा और उसे अपने करीब खींचते हुए कहा, “एक औरत की पूरी उम्र तो वैसे ही दूसरों की उम्मीदों का बोझ ढोते हुए बीत जाती है भाभी जी। लेकिन ज़रा अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए, अगर वह अपने पिता के घर में भी, अपनी माँ की कोख से जन्मे इस आँगन में भी उन बंदिशों का अभ्यास करेगी, तो वह अपने हिस्से की ज़िंदगी कब जिएगी? अगर वह यहाँ भी खुलकर नहीं हँसेगी, तो कहाँ हँसेगी?”
कमला ताई की नज़रें झुक गईं। सुरेश बाबू की बातों में एक ऐसा सच था, जिसका सामना करने की हिम्मत उनमें नहीं हो रही थी।
सुरेश बाबू ने अपनी भीगी हुई पलकों को झपकाते हुए आगे कहा, “आपने पूछा कि क्या वह ससुर के गले पड़ेगी? नहीं भाभी जी, वह ससुर के गले कभी नहीं लग पाएगी, और यही तो सबसे बड़ा दुख है! ससुर चाहे कितना भी भला इंसान क्यों न हो, वह पिता नहीं बन सकता। ससुर के सामने एक बेटी को हमेशा अपने आँसू छुपाने पड़ते हैं, अपनी थकान छुपानी पड़ती है। यह ‘बाप’ का ही कंधा होता है भाभी जी, जिस पर एक बेटी दुनिया भर का बोझ उतारकर बिना किसी डर के रो सकती है, हँस सकती है, और अपनी हर जायज़-नाजायज़ ज़िद मनवा सकती है। वह अपने बाप के गले लग सकती है, ससुर के नहीं! तो फिर क्यों आप उससे उसका यह आखिरी हक भी छीन लेना चाहती हैं?”
लॉन में इतनी खामोशी थी कि पेड़ों से गिरते पत्तों की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी। सुधा जी की आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। आज उनके पति ने वह सब कह दिया था जो एक माँ होने के नाते वे सालों से अपने सीने में दबाए बैठी थीं।
सुरेश बाबू ने कमला ताई के करीब जाकर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और बोले, “भाभी जी, बेटियाँ कोई पराया धन नहीं होतीं, वे तो पिता के आँगन की वह तुलसी होती हैं जो जहाँ जाती हैं, वहीं की हवा को पवित्र कर देती हैं। लेकिन उन्हें इस घर से उखाड़ने से पहले ही उनकी जड़ों को मत काटिए। मायका बेटियों के लिए ससुराल की ट्रेनिंग देने वाला कोई शिविर या जेल नहीं है। मायका तो वह घोंसला है जहाँ से उन्हें इतने हौसले और इतने प्यार के साथ उड़ाया जाता है कि आगे चलकर दुनिया का कोई भी तूफ़ान उनके पंख न तोड़ सके। मैं अपनी बेटी को डरा-धमका कर, उसकी हँसी छीनकर विदा नहीं करूँगा। मैं चाहता हूँ कि जब यह इस दहलीज़ को पार करे, तो इसके पास अपने बचपन और अपनी आज़ादी की इतनी मीठी यादें हों कि ससुराल के किसी भी कठिन पल में यह अकेलापन महसूस न करे। इसे जी लेने दीजिए भाभी जी, यह मेरे घर की रौनक है, कोई बोझ नहीं।”
सुरेश बाबू की आवाज़ काँप रही थी। कमला ताई जैसे पत्थर की मूरत बन गई थीं। उनके देवर के एक-एक शब्द ने उनके अंतर्मन की उन परतों को उधेड़ दिया था, जिन्हें उन्होंने सालों से ‘परंपरा’ के नाम पर ढक रखा था।
कमला ताई की आँखों के सामने अचानक पैंतालीस साल पुराना एक दृश्य घूम गया। जब वे खुद पंद्रह साल की थीं और उनकी शादी तय हुई थी। उनकी दादी और माँ ने भी बिल्कुल यही शब्द कहकर उनसे उनकी गुड़िया छीन ली थी, उनका पेड़ पर चढ़ना बंद करवा दिया था, और उन्हें एक अंधेरे कमरे में बैठकर कढ़ाई-बुनाई करने पर मजबूर कर दिया था। वे पूरी ज़िंदगी यही सोचती रहीं कि शायद लड़कियों की किस्मत में यही लिखा होता है। वे खुद एक पिंजरे में कैद रहीं, और अनजाने में आज अपनी ही फूल सी भतीजी के लिए वैसा ही पिंजरा तैयार कर रही थीं। उन्हें एहसास हुआ कि वे अवनि को ससुराल के लिए तैयार नहीं कर रही थीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास की हत्या कर रही थीं।
कमला ताई के झुर्रियों भरे गालों पर दो गर्म आँसू लुढ़क आए। उनके अंदर का वह कठोर आवरण एक पल में पिघल कर बह गया। वे धीरे-धीरे चलती हुईं अवनि के पास आईं।
अवनि ने डरते हुए अपनी ताई की तरफ देखा। लेकिन इस बार कमला ताई की आँखों में क्रोध नहीं, बल्कि अथाह पश्चाताप और ममता का सागर हिलोरें ले रहा था। कमला ताई ने अपने काँपते हुए हाथों से अवनि का चेहरा थामा, उसके माथे को चूमा और उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया।
“मुझे माफ़ कर दे मेरी लाड़ो…” कमला ताई फूट-फूट कर रो पड़ीं। “मैं अंधी हो गई थी दुनिया की रीति-रिवाजों के आगे। मैंने अपने बीते हुए कल का डर तेरे आज पर थोप दिया। तेरा बाप तो देवता है अवनि, जिसने आज मेरी आँखें खोल दीं। तू पराया धन नहीं है मेरी बच्ची, तू तो इस घर की आत्मा है।”
कमला ताई ने अपने आँचल से अवनि के आँसू पोंछे और सुरेश बाबू के हाथ से वह प्रमाण-पत्र लेकर अवनि को देते हुए मुस्कुराकर बोलीं, “जा, जाकर अपना सितार ले आ। आज पूरी कॉलोनी सुनेगी कि हमारी बेटी ने कितना बड़ा इनाम जीता है। और हाँ, यह सूट-दुपट्टा अगर तुझे चुभ रहा है तो जा, वही अपने आरामदायक कपड़े पहन ले। जब तक तू इस आँगन में है, यहाँ सिर्फ तेरी ही मर्जी चलेगी।”
अवनि को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने खुशी से उछलकर कमला ताई के गले में बांहें डाल दीं। सुरेश बाबू और सुधा जी की आँखों में संतोष के आँसू चमक उठे।
उस शाम के बाद देहरादून के उस घर की फिज़ा ही बदल गई। शादी के बचे हुए बीस दिन किसी उत्सव की तरह बीते। कमला ताई अब अवनि की सबसे बड़ी राज़दार बन गई थीं। जब अवनि देर रात तक सितार बजाती, तो सुरेश बाबू के साथ-साथ कमला ताई भी बैठकर उसकी धुनें सुनतीं और उसके सिर में तेल की मालिश करतीं। संगीत की रात में अवनि ने अपने पापा के साथ-साथ अपनी ताई जी को भी हाथ पकड़कर खूब नचाया।
और फिर विदाई का वह दिन भी आया। अवनि लाल जोड़े में सजी किसी अप्सरा सी लग रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर किसी अनजान डर की परछाई नहीं थी, बल्कि एक गहरी संतुष्टि और आत्मविश्वास की चमक थी। जब वह विदा होने लगी, तो वह अपने पिता के सीने से लगकर खूब रोई—वह रोना किसी बंदिश या खौफ का नहीं था, बल्कि उस असीम प्रेम का था जो उसे इस घर से मिला था।
अवनि के ससुराल वाले भी बहुत सुलझे हुए और संस्कारी लोग थे। जब सुरेश बाबू ने समधी जी के हाथ में अवनि का हाथ सौंपा, तो उन्होंने दहेज के सामान के साथ-साथ अवनि का सितार भी आगे बढ़ाया।
अवनि के ससुर जी ने मुस्कुराते हुए वह सितार थामा और बोले, “भाई साहब, आप निश्चिंत रहिए। आपने हमें अपनी बेटी नहीं, बल्कि अपने घर की रौनक सौंपी है। इसके सितार के तार हमारे घर में भी वैसे ही गूँजेंगे जैसे आपके आँगन में गूँजते थे।”
यह सुनकर कमला ताई ने चैन की सांस ली और अपने देवर की तरफ देखकर गर्व से मुस्कुरा दीं। आज एक पिता के अटूट प्रेम और समझदारी ने न सिर्फ अपनी बेटी के बचपन को बचा लिया था, बल्कि समाज की एक सदियों पुरानी सोच को भी नई दिशा दे दी थी। अवनि जब कार में बैठकर विदा हुई, तो उसे पता था कि वह अपना घर छोड़कर नहीं जा रही है, बल्कि अपने पिता के दिए हुए पंखों से एक नए आसमान को छूने जा रही है, और पीछे जो आँगन छूट रहा है, उसके दरवाज़े उसकी हर मनमानी के लिए ताउम्र खुले रहेंगे।
क्या आपको भी लगता है कि शादी के नाम पर लड़कियों से उनका अल्हड़पन, उनकी हँसी और उनकी आज़ादी छीन लेना गलत है? क्या एक पिता का घर ही बेटी के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित और बेफ़िक्र कोना नहीं होना चाहिए? इस कहानी में सुरेश बाबू और कमला ताई के विचारों के बारे में आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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