तेजस्विनी ने तुरंत अपने चेहरे पर घबराहट और रोने का नाटक किया। वह सिर झुकाए, अपने दुपट्टे के पल्लू को दोनों हाथों में समेटे, कांपते हुए कदमों से रसोई के दरवाजे से बाहर निकली। उसे देखकर नीलिमा जी का कलेजा मुंह को आ गया, वे मन ही मन भगवान से अपनी बेटी की रक्षा की प्रार्थना करने लगीं।
देहरादून की ठंडी शाम में पसीने से तरबतर सत्रह साल की तेजस्विनी जैसे ही अपने ताइक्वांडो प्रशिक्षण केंद्र से घर लौटी, उसके पिता विकास जी के हाथ में रेल के टिकट देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। उसने अपना किट बैग सोफे पर उछाला और खुशी से चहकते हुए अपने पिता के गले लग गई। “सच पापा! क्या हम वाकई इस बार अपनी पुश्तैनी हवेली चंदनपुर जा रहे हैं? ओह, मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है! पूरे दो साल हो गए दादाजी के हाथ के आम खाए, दादी की कहानियां सुने और चाचा-चाची व चिंटू-पिंकी के साथ बाग में धमाचौकड़ी मचाए!”
रसोई से चाय की ट्रे लेकर बाहर आती हुई उसकी मां नीलिमा जी ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और प्यार भरी डांट लगाते हुए बोलीं, “अरी पगली, जरा अपनी उम्र तो देख! बारहवीं कक्षा में आ गई है, अगले साल कॉलेज जाएगी, पर हरकतें अभी भी बिल्कुल छोटे बच्चों जैसी हैं। पहले जा कर हाथ-मुंह धो ले, फिर अपनी खुशी मनाना।”
तेजस्विनी ने मुंह फुलाते हुए अपने पापा की ओर देखा और शिकायत भरे लहजे में बोली, “देखिए न पापा, मम्मी को तो मेरी खुशी भी हजम नहीं होती। वहां गांव में दादी से आपकी सारी शिकायत करूंगी मम्मी, तब पता चलेगा!” उसकी इस मासूम धमकी पर विकास जी और नीलिमा जी दोनों खिलखिला कर हंस पड़े।
विकास जी भले ही नौकरी के सिलसिले में देहरादून में बस गए थे, लेकिन उनकी जड़ें आज भी अपने गांव चंदनपुर में ही जुड़ी थीं। वहां उनके बुजुर्ग माता-पिता, हरिवंश बाबू और गायत्री देवी, छोटे भाई आलोक और उसकी पत्नी रेणुका के साथ संयुक्त परिवार में रहते थे। पिछले दो वर्षों से दफ्तर के काम के दबाव और कुछ स्वास्थ्य कारणों से वे लोग गांव नहीं जा पाए थे। इसलिए इस बार जब गर्मियों की छुट्टियों में जाने का कार्यक्रम बना, तो तेजस्विनी के उत्साह का कोई ठिकाना नहीं था।
निर्धारित दिन पर वे लोग रात की ट्रेन से रवाना हुए और अगली सुबह जब उनकी जीप चंदनपुर की मिट्टीली सड़क से होते हुए बड़ी हवेली के दरवाजे पर रुकी, तो पूरा परिवार बाहर दौड़ पड़ा। दादाजी ने अपनी लाडली पोती को सीने से लगा लिया और दादी ने उसकी नजर उतारी। चाची रेणुका ने आरती की थाली सजाई थी और चचेरे भाई-बहन चिंटू और पिंकी तो तेजस्विनी दीदी के बैग से चॉकलेट निकालने की जुगत में लग गए।
नहा-धोकर और आलू के गरमागरम पराठों व दही का नाश्ता करने के बाद जब पूरा परिवार आंगन में नीम के पेड़ के नीचे चारपाइयों पर बैठा, तो शहर से लेकर गांव तक की ढेर सारी बातें होने लगीं। तभी दादाजी हरिवंश बाबू के चेहरे पर एक गहरी चिंता की लकीर उभर आई। उन्होंने विकास से धीमे स्वर में कहा, “बेटा विकास, तुम लोग आए हो तो मन को बड़ा सुकून मिला, पर इस बार गांव का माहौल पहले जैसा शांत नहीं रहा। पिछले दो महीनों से पास के जंगलों में एक हथियारबंद गिरोह सक्रिय हो गया है।”
छोटे भाई आलोक ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “हां भैया, वो लुटेरे बड़े ही बेरहम हैं। आधी रात को या ढलती शाम को किसी भी संपन्न किसान या व्यापारी के घर में घुस जाते हैं। पुलिस चौकी यहां से पंद्रह किलोमीटर दूर है, जब तक पुलिस को खबर लगती है, वे अपना काम करके जंगल में गायब हो जाते हैं। पिछले हफ्ते ही मुखिया जी के घर के बगल में लूट हुई, उनके बड़े बेटे ने रोकने की कोशिश की तो उन दरिंदों ने उसके पैर में गोली मार दी। तब से सूरज ढलते ही पूरे गांव में सन्नाटा पसर जाता है, सब अपने दरवाजे-खिड़कियां बंद करके दुबक जाते हैं।”
जब गांव में औरतों और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर भी बातें होने लगीं, तो दादी गायत्री देवी ने तेजस्विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “इसीलिए मैं तो कहती थी विकास कि इस लड़की को वो हाथ-पैर चलाने वाला खेल सिखाने के बजाय सिलाई-कढ़ाई और रसोई का काम सिखाते, तो ससुराल में काम आता। भला लड़कियों को पहलवानी करने की क्या जरूरत है?”
विकास जी ने मुस्कुराते हुए अपनी मां का हाथ थामा और गर्व से कहा, “मां, आज के जमाने में बेटियों को रसोई के साथ-साथ अपनी रक्षा करना भी आना चाहिए। मेरी तेजस्विनी किसी बेटे से कम नहीं है, यह ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट है।” दादी ने होंठ बिचकाते हुए बात टाल दी, पर तेजस्विनी ने मन ही मन मुस्कुराकर अपने पापा को देखा।
शुरुआती चार-पांच दिन तो पलक झपकते ही बीत गए। दिन भर गांव की पगडंडियों पर घूमना, आम के बगीचे से कच्ची कैरियां तोड़ना, कुएं के ठंडे पानी से नहाना और पड़ोस की काकी-ताइयों से मिलना—गांव का वह निश्छल प्रेम शहर की भागदौड़ से कोसों दूर था। वहां हर घर अपना लगता था और हर बुजुर्ग अपने दादा-दादी जैसे।
घटना वाले दिन भी तेजस्विनी अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ दिन भर बगीचे में खेलने के बाद शाम होने से पहले ही हवेली लौट आई थी। शाम के करीब सात बजे थे। बाहर अंधेरा घिरने लगा था। आलोक चाचा ने हवेली का मुख्य भारी लकड़ी का दरवाजा बंद किया, लेकिन शायद जल्दीबाजी में लोहे की बड़ी कुंडी ठीक से फंस नहीं पाई और अधखुली रह गई।
आंगन के बड़े बरामदे में पूरा परिवार बैठा बातें कर रहा था। तभी ठंडी हवा का एक झोंका आया, तो दादाजी ने कहा, “अरे भाई, मौसम बड़ा सुहाना हो रहा है। अगर इस वक्त अदरक और इलायची वाली कड़क चाय मिल जाती, तो मजा आ जाता।”
रेणुका चाची उठने ही वाली थीं कि तेजस्विनी तुरंत बोल पड़ी, “अरे चाची, आप बैठिए न! आज आप सबको देहरादून वाली स्पेशल मसाला चाय मैं बनाकर पिलाती हूं, और साथ में गरमागरम पकौड़े भी तल दूंगी।” सब उसकी इस बात पर हंस पड़े और तेजस्विनी गुनगुनाती हुई आंगन के कोने में बनी बड़ी सी रसोई में चली गई।
रसोई में जाकर उसने चूल्हे पर एक तरफ चाय का पतीला चढ़ाया और दूसरी तरफ कड़ाही में पकौड़ों के लिए सरसों का तेल गरम होने रख दिया। बाहर बरामदे में ठहाकों की आवाज गूंज रही थी। तभी अचानक हवेली का मुख्य दरवाजा एक जोरदार धमाके के साथ खुला और अगले ही पल ‘ठांय’ की एक कानफाड़ू आवाज से पूरी हवेली दहल उठी।
बरामदे में बैठी महिलाओं की चीख निकल गई। सामने काले कपड़ों में लिपटे और चेहरे पर काला नकाब बांधे चार हट्टे-कट्टे बदमाश खड़े थे। उनके हाथों में देसी कट्टे और चमकते हुए बड़े-बड़े छुरे थे। उनमें से जो सबसे लंबा और खूंखार दिख रहा था, उसने अपनी बंदूक की नाल छत की ओर से हटाकर सीधे हरिवंश दादाजी के सीने पर तान दी और गरजते हुए बोला, “अगर किसी ने भी अपनी जगह से हिलने की कोशिश की या आवाज निकाली, तो इस बुड्ढे की लाश यहीं बिछा दूंगा! चुपचाप सब अपने मोबाइल फोन इस झोले में डाल दो और एक कोने में घुटनों के बल बैठ जाओ!”
डर के मारे सबके हाथ-पैर कांपने लगे। विकास जी और आलोक चाचा ने आगे बढ़ने की कोशिश की, तो दूसरे बदमाश ने चिंटू की गर्दन पर छुरा रख दिया। “खबरदार! हीरो बनने की कोशिश मत करना, वरना इस बच्चे की सांसें यहीं थम जाएंगी।” मजबूर होकर विकास जी और आलोक को पीछे हटना पड़ा। लुटेरों ने सबके फोन छीनकर एक तरफ फेंक दिए।
रसोई की जालीदार खिड़की के पीछे अंधेरे में खड़ी तेजस्विनी अपनी सांसें रोके यह पूरा खौफनाक मंजर देख रही थी। एक पल के लिए तो उसका दिल भी तेजी से धड़का, लेकिन अगले ही पल उसके वर्षों के मार्शल आर्ट प्रशिक्षण ने उसके डर पर काबू पा लिया। उसके गुरुजी की सिखाई बात उसके कानों में गूंजी— ‘संकट के समय सबसे बड़ा हथियार तुम्हारा शांत दिमाग और आसपास की चीजें होती हैं।’
उसने तुरंत फोन करने के लिए अपनी जेब टटोली, पर उसे याद आया कि उसका फोन तो बाहर तख्त पर ही छूट गया था। बाहर बदमाशों का सरदार रेणुका चाची और नीलिमा जी पर चिल्ला रहा था, “ए औरतों! जो भी गहने पहने हैं, सब उतारो और तिजोरी की चाबी निकालो! जल्दी करो, हमारे पास वक्त कम है!”
तेजस्विनी ने रसोई के चारों ओर नजर दौड़ाई। चूल्हे पर कड़ाही में तेल खौल रहा था, पास ही मसालों के बड़े-बड़े डिब्बे रखे थे और कोने में दादी का लोहे का भारी चिमटा और कपड़े धोने की मजबूत मोगरी (थापी) रखी थी। उसके दिमाग में बिजली की गति से एक योजना बनी। उसने चुपके से लाल मिर्च के डिब्बे और गरम मसाले के डिब्बे को मिलाकर अपनी दोनों मुट्ठियों और दुपट्टे के पल्लू में भर लिया।
वह दबे पांव रसोई के दरवाजे की ओर बढ़ ही रही थी कि अचानक अंधेरे में उसका पैर स्टील की एक खाली थाली पर पड़ गया। ‘छन-न-न’ की तेज आवाज ने सन्नाटे को चीर दिया।
चारों बदमाशों की नजरें एक साथ रसोई की तरफ घूमीं। सरदार ने अपने एक साथी को इशारा किया और दहाड़ा, “अबे देख, रसोई में कौन छुपा है? ए छोकरी! बाहर निकल, वरना वहीं आकर भून दूंगा!”
तेजस्विनी ने तुरंत अपने चेहरे पर घबराहट और रोने का नाटक किया। वह सिर झुकाए, अपने दुपट्टे के पल्लू को दोनों हाथों में समेटे, कांपते हुए कदमों से रसोई के दरवाजे से बाहर निकली। उसे देखकर नीलिमा जी का कलेजा मुंह को आ गया, वे मन ही मन भगवान से अपनी बेटी की रक्षा की प्रार्थना करने लगीं।
“मालिक… मुझे मत मारिए… मैं तो चाय बना रही थी…” तेजस्विनी ने सिसकते हुए कहा और धीरे-धीरे चलते हुए उन बदमाशों के बिल्कुल करीब पहुंच गई। चारों बदमाश उसे एक डरी-सहमी मामूली लड़की समझकर लापरवाह हो गए और अपनी बंदूकें नीचे करके उस पर हंसने लगे। उनमें से एक बदमाश ने आगे बढ़कर तेजस्विनी का हाथ पकड़ने की कोशिश करते हुए कहा, “अरे वाह सरदार, यह तो बड़ी सुंदर चिड़िया है…”
बस, यही वह पल था जिसका तेजस्विनी को इंतजार था! जैसे ही वह बदमाश करीब आया, तेजस्विनी की झुकी हुई आंखें किसी बाघिन की तरह चमक उठीं। उसने पलक झपकते ही अपने दुपट्टे में छुपाए दोनों हाथ हवा में लहराए और पूरी ताकत से तीखी लाल मिर्च और गरम मसाले का पाउडर उन चारों बदमाशों की आंखों में झोंक दिया!
“आह! मर गए रे! मेरी आंखें!” एक साथ चारों बदमाशों की दर्दनाक चीखें गूंज उठीं। मिर्च की भयानक जलन से वे पागलों की तरह अपनी आंखें मलने लगे।
इससे पहले कि वे संभल पाते या अंधाधुंध गोली चलाते, तेजस्विनी ने हवा में एक ऊंची छलांग लगाई और ताइक्वांडो की ‘राउंडहाउस किक’ (घूमकर मारी गई लात) सीधे सरदार के हाथ और जबड़े पर जड़ दी। कट्टे के हाथ से छूटकर दूर गिरते ही सरदार मुंह के बल जमीन पर आ गिरा।
दूसरा बदमाश जिसने छुरा पकड़ रखा था, उसने अंदाज से हवा में छुरा लहराया, लेकिन तेजस्विनी ने फुर्ती से नीचे झुकते हुए रसोई के दरवाजे के पास रखी लकड़ी की भारी मोगरी उठाई और पूरी ताकत से उसके घुटनों और कलाई पर दे मारी। हड्डी टूटने की आवाज के साथ वह बदमाश भी जमीन पर लोटने लगा।
अपनी बेटी का यह रौद्र और अद्भुत रूप देखकर विकास जी और आलोक चाचा में भी बिजली सी दौड़ गई। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर बाकी के दो तिलमिलाते हुए बदमाशों को दबोच लिया और उनकी जमकर धुनाई कर दी। तेजस्विनी ने फुर्ती से तीसरे बदमाश की गर्दन को अपने पैरों के दांव में फंसाकर उसे चित कर दिया।
तब तक चिंटू और दादाजी आंगन में गाय बांधने वाली मोटी रस्सियां ले आए। सभी ने मिलकर चारों घायल और कराहते हुए बदमाशों को आंगन के पिलर से कसकर बांध दिया। विकास जी ने तुरंत अपना फोन उठाया और पुलिस अधीक्षक को सारी घटना की जानकारी दी।
गोलियों और शोरगुल की आवाज सुनकर आस-पड़ोस के गांव वाले भी लाठी-डंडे और मशालें लेकर हवेली की तरफ दौड़े चले आए। जब उन्होंने हवेली के आंगन में उन खूंखार बदमाशों को बंधे हुए देखा, जिनके खौफ से पूरा इलाका कांपता था, तो सब दंग रह गए।
आधे घंटे के भीतर पुलिस की तीन गाड़ियां सायरन बजाती हुई वहां पहुंच गईं। थानेदार साहब ने जब सुना कि शहर से आई एक सत्रह साल की लड़की ने अपनी सूझबूझ और मार्शल आर्ट के दम पर इस इनामी गिरोह को धूल चटाई है, तो उन्होंने तेजस्विनी को सैल्यूट किया। पुलिस बदमाशों को गिरफ्तार करके ले गई।
उनके जाने के बाद दादी गायत्री देवी रोते हुए आगे बढ़ीं और तेजस्विनी के दोनों हाथों को चूमते हुए बोलीं, “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची! मैं तो तुझे बस रसोई तक सीमित रखना चाहती थी, पर आज तेरी इसी विद्या ने हमारे पूरे खानदान की जान और इज्जत बचाई है। तू तो साक्षात मां दुर्गा का रूप है!”
अगले दिन सुबह चंदनपुर की पंचायत के मैदान में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। आस-पास के पांच गांवों के लोग उस बहादुर बेटी को देखने के लिए उमड़ पड़े थे। मंच पर जिले के पुलिस कप्तान और गांव के सरपंच ने तेजस्विनी को ‘वीरता पुरस्कार’ और इक्यावन हजार रुपये की सम्मान राशि भेंट की। उसे गेंदे और गुलाब की मालाओं से लाद दिया गया।
इसी मौके पर गांव के सरपंच ने घोषणा की कि अब गांव के स्कूल में हर लड़की को आत्मरक्षा और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण दिया जाएगा, और इसकी शुरुआत खुद तेजस्विनी करेगी। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा आसमान गूंज उठा।
समारोह के अंत में विकास जी मंच पर आए। गर्व और खुशी के आंसुओं से उनकी आंखें भीगी हुई थीं। उन्होंने अपनी फूलों से लदी बेटी के माथे को चूम लिया और रुंधे हुए गले से माइक पर कहा, “लोग कहते हैं कि बेटे कुल का दीपक होते हैं, पर मेरी बेटी तो सूरज है जिसने हमारे पूरे गांव के अंधेरे को मिटा दिया। तेजस्विनी, तू सिर्फ मेरी बेटी नहीं, मेरा गुरूर और मेरा स्वाभिमान है!”
तेजस्विनी ने झुककर अपने माता-पिता और दादा-दादी के चरण स्पर्श किए। आज उसने साबित कर दिया था कि यदि बेटियों को सही शिक्षा के साथ-साथ आत्मरक्षा के पंख दिए जाएं, तो वे न केवल अपनी, बल्कि पूरे समाज की ढाल बन सकती हैं।
दोस्तों, क्या आप भी मानते हैं कि आज के समय में हर माता-पिता को अपनी बेटियों को पढ़ाई और घर के काम के साथ-साथ मार्शल आर्ट्स और आत्मरक्षा (Self-Defense) की ट्रेनिंग जरूर दिलानी चाहिए? तेजस्विनी की इस बहादुरी पर आप क्या कहना चाहेंगे? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें!
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मूल लेखिका : आरती झा ‘आद्या’