सुधा भाभी ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, “तो निखिल की सजा तुम उस बूढ़ी मां को दोगी मोनिका? जिस मां ने तुम्हारे और तुम्हारे बेटे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अपना मकान और अपनी सारी जमा-पूंजी तुम्हारे नाम कर दी, आज तुमने उसी के लिए दो रोटी और एक गिलास पानी तक बंद कर दिया? याद रखना, तुम्हारा बेटा अंश यह सब अपनी आंखों से देख रहा है। कल को जब तुम बूढ़ी होगी और तुम्हारे घुटने काम नहीं करेंगे, तब यही अंश तुम्हें भी इसी तरह नीचे के कमरे में बंद कर देगा, क्योंकि तुम उसे यही सिखा रही हो!”
देहरादून की शांत वादियों में बसी ‘वसंत विहार’ कॉलोनी की तीसरी गली में आज करीब बीस दिनों के बाद मेरे कदम पड़े थे। पिछले तीन हफ्तों से मेरे घर में मेरे छोटे भाई और उसके परिवार का आना हुआ था, तो मेहमाननवाजी और घर की व्यस्तताओं के चलते मैं अपनी शाम की सैर और अपनी सबसे अजीज ‘तिवारी काकी’ से मिलने का नियम निभा नहीं पाई थी। आज जब घर में शांति हुई, तो शाम की चाय पीने के बाद मेरा मन बेचैन हो उठा कि चलकर देखूं, काकी कैसी हैं।
तिवारी काकी, यानी सरस्वती देवी, उम्र में मुझसे कोई बीस-पच्चीस साल बड़ी थीं, लेकिन हमारे बीच का रिश्ता किसी सहेली से कम नहीं था। उनके बरामदे में पड़ी बेंत की कुर्सियों पर अक्सर मोहल्ले की दो-चार औरतों की बैठकी जमती थी। काकी की बातों में जीवन का ऐसा गहरा अनुभव और मिठास होती थी कि कोई भी इंसान अपना बड़े से बड़ा दुख भूलकर वहां से मुस्कुराता हुआ लौटता था।
गली के मोड़ से ही काकी का दो मंजिला मकान दिखाई देने लगा। हल्के पीले रंग का वह मकान बाहर से जितना सुंदर था, उसके पीछे सरस्वती काकी के संघर्ष की कहानी उतनी ही गहरी थी। काकी के पति सेना की सप्लाई कोर में एक छोटे से पद पर थे। उनकी ड्यूटी हमेशा सरहद के पास या दूसरे राज्यों में रहती थी। घर में काकी और उनका इकलौता बेटा निखिल ही रहते थे।
पति की तनख्वाह इतनी नहीं थी कि किराए के मकान में रहकर बेटे को अच्छे स्कूल में पढ़ाया जा सके और भविष्य के लिए कुछ जोड़ा भी जा सके। लेकिन सरस्वती काकी मिट्टी की नहीं, फौलाद की बनी थीं। उन्होंने अपने खर्चों को समेटकर पाई-पाई जोड़ी। जब इस कॉलोनी में सस्ते प्लॉट कट रहे थे, तो उन्होंने साहस करके जमीन का एक टुकड़ा खरीदा। जब मकान बनना शुरू हुआ, तो पैसे बचाने के लिए उन्होंने किसी ठेकेदार को काम नहीं दिया। खुद सिर पर दुपट्टा बांधकर धूप में खड़ी रहतीं, राजमिस्त्रियों के साथ ईंटें गिनतीं, तराई करतीं और शाम को घर आकर चूल्हा-चौका भी संभालतीं। उन्होंने कभी घर में झाड़ू-पोछे या बर्तन के लिए कामवाली नहीं लगाई।
आज से बारह साल पहले जब अचानक दिल का दौरा पड़ने से काका जी का निधन हुआ, तब भी काकी टूटी नहीं। उन्होंने अपनी छोटी-सी पेंशन और अपने हौसले से निखिल की परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी। निखिल पढ़ने में ठीक था, उसे एक अच्छी ऑटोमोबाइल स्पेयर पार्ट्स बनाने वाली कंपनी में मार्केटिंग की नौकरी मिल गई। समय के साथ निखिल की शादी मोनिका से हुई। मोनिका पढ़ी-लिखी थी, उसने एम.ए. और बी.एड. किया हुआ था। काकी ने अपनी पुरानी जान-पहचान और सिफारिशें लगाकर मोनिका की शहर के एक प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका की नौकरी भी लगवा दी। जब घर में पोते ‘अंश’ का जन्म हुआ, तो काकी की खुशियों का ठिकाना न रहा।
काकी हमेशा कहती थीं, “प्रभा, भगवान ने पति का साथ जल्दी छीन लिया, पर औलाद के रूप में मुझे हीरा दिया है। अब तो बस पोते को बड़ा होते देखना है।”
लेकिन इंसान जो सोचता है, नियति के पन्नों पर हमेशा वैसा लिखा नहीं होता। कुछ साल पहले निखिल की कंपनी ने उसका तबादला गुवाहाटी कर दिया। यह खबर सुनते ही घर में हलचल मच गई। मोनिका अपनी जमी-जमाई स्कूल की नौकरी छोड़ना नहीं चाहती थी, चौदह साल के हो चुके अंश की पढ़ाई का भी सवाल था, और सबसे बड़ी बात—काकी अपने इकलौते बेटे को इतनी दूर भेजकर अकेली कैसे रहतीं?
काकी ने तुरंत फैसला लिया। उन्होंने निखिल से कहा, “बेटा, इतनी दूर परदेस में जाकर नौकरी करने से अच्छा है कि तू यहीं अपना काम शुरू कर ले। तुझे गाड़ियों के सामान की अच्छी समझ है, हम यहीं मुख्य बाजार में स्पेयर पार्ट्स की अपनी दुकान खोल लेते हैं।”
दुकान खोलने के लिए पंद्रह-बीस लाख रुपयों की जरूरत थी। काकी ने एक पल भी अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचा। पति के फंड का जो पैसा बैंक में सुरक्षित रखा था, अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी और यहां तक कि अपनी शादी के जो सोने के कंगन और हार उन्होंने बुरे वक्त के लिए संभाल कर रखे थे—सब कुछ बेचकर उन्होंने निखिल को मुख्य बाजार में एक बड़ी और भरी-पूरी दुकान खुलवा कर दे दी।
शुरुआत के कुछ महीने तो सब ठीक चला। मोनिका सुबह स्कूल चली जाती, अंश अपने स्कूल और कोचिंग में व्यस्त रहता, और निखिल दुकान पर बैठता। घर का सारा काम—सुबह का नाश्ता बनाने से लेकर शाम की रसोई तक—काकी खुशी-खुशी खुद संभालती थीं, ताकि कामकाजी बहू को आराम मिले।
पर कहते हैं न, खाली दिमाग और बिना मेहनत के मिली दौलत इंसान को भटका देती है। नौकरी में निखिल के ऊपर बॉस का दबाव रहता था, समय की पाबंदी थी। लेकिन अपनी दुकान का मालिक बनते ही वह आजाद हो गया। बाजार में उसकी दुकान के पास ही कुछ ऐसे आवारा किस्म के व्यापारियों का उठना-बैठना था, जो शाम होते ही दुकान के शटर आधे गिराकर शराब की महफिलें जमाते थे।
निखिल पहले भी कभी-कभार कंपनी की पार्टियों में थोड़ी-बहुत शराब पी लेता था, लेकिन वह शौकिया था। पर दुकान के एक पड़ोसी ‘रंजीत’ के साथ उसकी ऐसी छनी कि शाम की वह एक-दो पैग की आदत देखते ही देखते दोपहर से शुरू होने लगी। शराबी दोस्तों की मंडली को एक ऐसा मुर्गा मिल गया था, जिसकी जेब में रोज नकद पैसा आता था। वे लोग निखिल की झूठी तारीफ करके उसे चने के झाड़ पर चढ़ाते और निखिल गल्ले से पैसे निकालकर रोज महंगी शराब और कबाब की पार्टियां देने लगा।
काकी नीचे की मंजिल के कमरे में रहती थीं, और निखिल-मोनिका ऊपर की मंजिल पर। काकी को तो भनक भी नहीं लगी कि जिस दुकान के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व लुटा दिया, वह दुकान अब दुकान नहीं, बल्कि अय्याशी का अड्डा बन चुकी है।
पानी सिर से ऊपर तब गुजरा, जब एक रात निखिल घर ही नहीं लौटा। अगली सुबह बाजार के किसी दुकानदार ने फोन करके बताया कि निखिल अपनी दुकान के बाहर नाली के पास बेसुध पड़ा है। जब उसे घर लाया गया, तो पता चला कि नशे की हालत में कोई उसकी जेब से बटुआ, महंगा मोबाइल और हाथ की सोने की अंगूठी उतार ले गया था। इसके कुछ ही दिनों बाद, वह किसी ढाबे पर पीकर सो गया और कोई उसकी नई मोटरसाइकिल ही चुराकर ले गया।
घर में रोज क्लेश होने लगा। दुकान में माल खत्म हो गया था और उधार देने वाले तगादा करने घर आने लगे थे। मजबूरन मोनिका को स्कूल से आने के बाद शाम को दुकान पर बैठना पड़ा ताकि थोड़ा-बहुत जो बचा है, उसे संभाला जा सके। लेकिन निखिल की लत अब बीमारी बन चुकी थी। उसे बस नशा चाहिए था। काकी जब अपनी पेंशन के पैसों में से उसे घर का बिजली-पानी का बिल भरने या राशन लाने के लिए पैसे देतीं, तो वह उन पैसों की भी शराब पी जाता।
इस बर्बादी का सबसे बुरा असर घर के रिश्तों पर पड़ा। मोनिका, जो पहले काकी का सम्मान करती थी, अब दिन-रात काकी को ही ताने मारने लगी। वह चिल्लाकर कहती, “सब आपका ही किया-धरा है! आपने ही अपने लाडले को सिर पर चढ़ाया था। अच्छी-भली गुवाहाटी में नौकरी कर रहा था, आपके मोह ने उसे यहां रोककर शराबी बना दिया। मैं इस नर्क में अपनी और अपने बेटे की जिंदगी बर्बाद नहीं करूंगी!”
एक दिन तो हद ही हो गई। निखिल ने नशे में मोनिका के स्कूल के रखे हुए पैसे चुरा लिए। गुस्से और अवसाद में आकर मोनिका ने अपने कमरे में जाकर नींद की ढेर सारी गोलियां खा लीं। गनीमत रही कि पोते अंश ने समय रहते देख लिया और पड़ोसियों की मदद से उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जिससे उसकी जान बच गई।
इस घटना ने सरस्वती काकी को अंदर से तोड़कर रख दिया। जो औरत पूरे मोहल्ले को हंसाती थी, अब वह अपने कमरे के कोने में बैठकर चुपचाप आंसू बहाती रहती। मोनिका अस्पताल से लौटी तो उसने काकी से पूरी तरह बोलचाल बंद कर दी। उसने ऊपर की मंजिल पर अपना अलग चूल्हा बसा लिया।
इसी बीच, मोहल्ले के कुछ समझदार लोगों ने काकी को आगाह किया, “चाची, मकान अभी भी निखिल के नाम पर है। जिस तरह वह नशे में धुत रहता है, किसी दिन कोई शराब की बोतल के बदले उससे कोरे स्टाम्प पेपर पर अंगूठा लगवा लेगा और आप लोग सड़क पर आ जाएंगे।”
काकी डर गईं। उन्होंने निखिल को जब थोड़ा होश में देखा, तो रो-धोकर और कसम देकर मकान की रजिस्ट्री बहू मोनिका और पोते अंश के नाम करवा दी। अपने पास जो थोड़ा-बहुत एफडी का पैसा बचा था, वह भी पोते के भविष्य के नाम कर दिया। काकी ने सोचा था कि शायद इस त्याग से बहू का दिल पसीजेगा और वह समझेगी कि सास उसके और उसके बेटे के साथ है।
लेकिन हुआ ठीक उल्टा! मकान और पैसा हाथ में आते ही मोनिका के तेवर और बदल गए। अब काकी उसके लिए सिर्फ एक बोझ थीं। उम्र के इस पड़ाव पर चिंता और गम ने काकी के शरीर को घेर लिया। उनके घुटनों का गठिया इतना बढ़ गया कि उनका बिना सहारे के उठना-बैठना भी दूभर हो गया।
जो काकी कभी पूरे घर को बनाकर खिलाती थीं, आज उनके दोनों घुटने सूजे रहते थे। ऊपर से बहू के पकाने की खुशबू आती थी, पर मोनिका या पोता अंश कभी नीचे झांककर यह भी नहीं पूछते थे कि “दादी, आपने कुछ खाया या नहीं?” काकी अपनी छोटी-सी पेंशन के पैसों से गली के कोने वाले परचून की दुकान के लड़के को फोन करके थोड़ा-सा आटा, दलिया और दवाई मंगवा लेतीं और घिसटते हुए खुद ही अपने लिए एक-दो रोटी सेंक लेतीं।
इन्हीं सब विचारों में खोई हुई मैं जब काकी के घर के लोहे के गेट के पास पहुंची, तो देखा कि बाहर का दरवाजा खुला था, लेकिन काकी के कमरे में अंधेरा था।
मैंने आवाज लगाई, “काकी… ओ सरस्वती काकी! कहां हो आप?”
अंदर से कोई आवाज नहीं आई, बस एक हल्की-सी कराहने की आवाज सुनाई दी। मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़क उठा। मैं तेजी से अंदर कमरे में गई और लाइट जलाई। सामने का दृश्य देखकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
काकी अपने बिस्तर पर एक मैली-सी चादर ओढ़े पड़ी थीं। उनका चेहरा बुखार से तवे की तरह लाल हो रहा था, होंठ सूखकर पपड़ी बन चुके थे और पास की मेज पर पानी का गिलास खाली पड़ा था। मैंने दौड़कर उनका माथा छुआ—हाथ रखते ही ऐसा लगा जैसे किसी जलती हुई भट्टी को छू लिया हो!
“हे भगवान! काकी, आपको तो बहुत तेज बुखार है! ये कब से है?” मैंने घबराते हुए पूछा।
काकी ने बड़ी मुश्किल से अपनी आंखें खोलीं। मुझे देखते ही उनकी सूनी आंखों से आंसू की दो बूंदें लुढ़ककर तकिए पर गिर गईं। उन्होंने कांपती और लड़खड़ाती आवाज में कहा, “प्रभा… तू आ गई बेटी? आज… आज चौथा दिन है। बदन टूट रहा है, उठा नहीं गया तो तीन दिन से सिर्फ पानी पीकर पड़ी हूं। कल से तो पानी भी खत्म हो गया…”
मेरी आंखों में खून उतर आया। मैंने ऊपर की छत की तरफ देखा, जहां से टीवी चलने और हंसने की हल्की आवाजें आ रही थीं। मैंने गुस्से से पूछा, “काकी, ऊपर मोनिका और अंश को नहीं पता कि आप चार दिन से भूखी-प्यासी बुखार में सड़ रही हैं? निखिल कहां है?”
काकी ने अपनी आंखें मूंद लीं और फुसफुसाते हुए बोलीं, “छोड़ न प्रभा… किससे शिकायत करूं? अपना ही सिक्का खोटा निकला। उन लोगों ने चार दिन से नीचे कदम नहीं रखा। सोचते होंगे बुढ़िया अपने कमरे में पड़ी होगी। अब तो भगवान बस उठा ले मुझे…”
मुझसे अब एक पल भी सहन नहीं हुआ। मैं तुरंत बाहर निकली और काकी के बगल वाले घर में रहने वाले वर्मा जी की पत्नी, सुधा भाभी को आवाज लगाई। सुधा भाभी और उनके पति बहुत ही नेक दिल इंसान थे। जब उन्हें पता चला कि काकी चार दिन से इस हाल में हैं, तो सुधा भाभी फौरन अपने घर से गरम दूध, मूंग की दाल की पतली खिचड़ी और साफ चादर लेकर दौड़ी आईं। वर्मा जी ने तुरंत अपने पारिवारिक डॉक्टर को फोन करके घर बुला लिया।
हमने मिलकर काकी के कपड़े बदले, उनका बिस्तर साफ किया और उन्हें सहारा देकर थोड़ी-सी खिचड़ी और दवा खिलाई। डॉक्टर साहब ने जांच करके बताया कि कमजोरी और बुखार की वजह से इन्फेक्शन बढ़ गया है, अगर एक-दो दिन और ध्यान नहीं दिया जाता तो कुछ भी हो सकता था। उन्होंने काकी को ग्लूकोज की बोतल चढ़ा दी।
काकी को जब थोड़ी राहत मिली और वे सो गईं, तो मेरे अंदर का ज्वालामुखी फूट पड़ा। मैंने सुधा भाभी से कहा, “भाभी, सहन करने की भी एक हद होती है। आज अगर हम लोग चुप रह गए, तो कल को ये लोग काकी को मरने के लिए छोड़ देंगे और दुनिया के सामने घड़ियाली आंसू बहाएंगे। आज मुझे ऊपर जाना ही होगा।”
मैं और सुधा भाभी गुस्से में तमतमाते हुए सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गए और जोर से दरवाजा खटखटाया। दरवाजा पंद्रह साल के अंश ने खोला। अंदर सोफे पर मोनिका बैठी कॉपियां चेक कर रही थी और कोने के कमरे में निखिल सिर पकड़कर बैठा था—शायद आज उसके पास पीने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए वह होश में था।
मुझे और सुधा भाभी को इस तरह अचानक देखकर मोनिका खड़ी हो गई, “अरे आंटी, आप लोग? क्या हुआ?”
मैंने बिना किसी भूमिका के सीधा सपाट वार किया, “मोनिका, तुम्हें और निखिल को जरा भी शर्म बची है या वह भी बेचकर खा गए हो? नीचे जिस मां ने अपना खून-पसीना एक करके यह छत तुम्हारे सिर पर दी, वह चार दिन से भूखी-प्यासी 103 डिग्री बुखार में तप रही है! डॉक्टर का कहना है कि अगर आज इलाज नहीं मिलता तो उनकी जान जा सकती थी। तुम एक शिक्षिका हो मोनिका, स्कूल में बच्चों को क्या यही संस्कार सिखाती हो कि बूढ़ी सास को नीचे के कमरे में मरने के लिए छोड़ दो?”
मेरी आवाज इतनी तेज और कड़वी थी कि निखिल और अंश भी बाहर आ गए। मोनिका का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने अपनी सफाई में कहना चाहा, “वो… मुझे लगा अम्मा ठीक होंगी, वो खुद ही अपना कर लेती हैं। और मैं क्या-क्या देखूं आंटी? इस शराबी आदमी ने मेरी जिंदगी नर्क बना रखी है…”
सुधा भाभी ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, “तो निखिल की सजा तुम उस बूढ़ी मां को दोगी मोनिका? जिस मां ने तुम्हारे और तुम्हारे बेटे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अपना मकान और अपनी सारी जमा-पूंजी तुम्हारे नाम कर दी, आज तुमने उसी के लिए दो रोटी और एक गिलास पानी तक बंद कर दिया? याद रखना, तुम्हारा बेटा अंश यह सब अपनी आंखों से देख रहा है। कल को जब तुम बूढ़ी होगी और तुम्हारे घुटने काम नहीं करेंगे, तब यही अंश तुम्हें भी इसी तरह नीचे के कमरे में बंद कर देगा, क्योंकि तुम उसे यही सिखा रही हो!”
ये शब्द सुनते ही अंश की आंखें भर आईं और मोनिका सन्न रह गई।
फिर मैंने निखिल की तरफ मुड़कर कहा, “और निखिल, तुम पर तो थूकने का भी मन नहीं करता! जिस मां ने अपने हाथों के कंगन बेचकर तुम्हें दुकान खुलवाई ताकि तुम उसकी आंखों के सामने रहो, तुमने उसी मां को जीते-जी मार दिया? नीचे जाकर देखो अपनी मां की हालत! पराये पड़ोसी आकर उन्हें दलिया खिला रहे हैं और तुम दोनों ऊपर एसी चलाकर बैठे हो! धिक्कार है ऐसी औलाद पर!”
हम दोनों अपनी बात कहकर नीचे आ गए।
सन्नाटा इतना गहरा था कि सुई गिरने की भी आवाज आती। ठीक पांच मिनट बाद, सीढ़ियों से तेज कदमों की आवाज आई। सबसे पहले पोता अंश दौड़ता हुआ नीचे आया और दादी के बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठकर रोने लगा, “दादी… मुझे माफ कर दो दादी, मैं ऊपर पढ़ाई में इतना बिजी हो गया कि आपको देखने भी नहीं आया।”
पीछे-पीछे निखिल और मोनिका भी नीचे आए। जब निखिल ने अपनी मां के सूखे चेहरे और हाथ में लगी ग्लूकोज की सुई को देखा, तो उसके अंदर का सोया हुआ इंसान और बेटा जैसे किसी गहरी नींद से जाग उठा। नशे की धुंध छंट चुकी थी और सामने कड़वी सच्चाई खड़ी थी।
निखिल जमीन पर काकी के पैरों के पास गिर पड़ा और फूट-फूटकर बच्चों की तरह रोने लगा, “मां… ओ मां! मुझे जूते मारो मां, पर ऐसे चुप मत रहो! मैं राक्षस बन गया था मां। मैंने तुम्हारी मेहनत, तुम्हारे गहने, तुम्हारी इज्जत—सब मिट्टी में मिला दी। आज अगर प्रभा आंटी नहीं आतीं, तो मैं अपनी ही मां का कातिल बन जाता!”
मोनिका भी दरवाजे के पास खड़ी अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछ रही थी। सुधा भाभी की उस बात ने—कि कल को उसका बेटा भी उसके साथ यही करेगा—मोनिका के अहंकार को चूर-चूर कर दिया था। वह आगे बढ़ी और काकी के हाथ को अपने हाथों में लेकर बोली, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं निखिल के गुस्से में इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल ही गई कि इस घर में सबसे ज्यादा दुख तो आपने ही झेला है। आज से आप नीचे अकेली नहीं रहेंगी, और न ही अलग खाना बनेगा।”
काकी की बंद आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन इस बार वे आंसू दुख के नहीं, बल्कि अपने बिखरे हुए परिवार के वापस जुड़ने के थे। उन्होंने अपना कांपता हुआ हाथ उठाकर निखिल और मोनिका के सिर पर रख दिया।
उस रात ने तिवारी परिवार की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। अगले ही दिन निखिल ने खुद आगे बढ़कर शहर के नशा मुक्ति केंद्र (Rehabilitation Centre) में जाने का फैसला किया। उसने अपने सारे शराबी दोस्तों के नंबर ब्लॉक कर दिए और दुकान की चाबी मोनिका को सौंप दी।
तीन महीने बाद जब निखिल नशा मुक्ति केंद्र से पूरी तरह स्वस्थ होकर लौटा, तो वह फिर से वही पुराना, जिम्मेदार निखिल बन चुका था। उसने सबसे पहले अपनी दुकान से होने वाली कमाई से काकी के दोनों घुटनों का ऑपरेशन करवाया।
आज जब मैं शाम को काकी के घर जाती हूं, तो नजारा बिल्कुल बदला हुआ होता है। बरामदे में बेंत की कुर्सी पर काकी बैठती हैं, मोनिका रसोई से सबके लिए अदरक वाली चाय बनाकर लाती है, और निखिल शाम को ठीक आठ बजे दुकान बढ़ाकर अपनी मां के पास आकर बैठता है और पूरे दिन का हिसाब देता है। एक पड़ोसी के छोटे से हस्तक्षेप और सच के आईने ने एक टूटते हुए घर और एक मां के बुढ़ापे को फिर से खुशियों से भर दिया था।
दोस्तों, आजकल के इस भागदौड़ और स्वार्थ भरे दौर में अक्सर माता-पिता अपना सब कुछ बच्चों के नाम कर देते हैं और बाद में खुद एक-एक रोटी और दवा के लिए मोहताज हो जाते हैं। क्या आपको लगता है कि माता-पिता को जीते-जी अपनी सारी संपत्ति बच्चों के नाम कर देनी चाहिए? और अगर आपके आस-पास भी किसी बुजुर्ग के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा हो, तो क्या एक पड़ोसी के नाते हमें आवाज उठानी चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
मूल लेखिका : मंजू ओमर