आखिर कब तक चुप रहोगे – मंजू ओमर

फोन की घंटी बजी इंदु जी ने फोन उठाया हेलो बेटी सौम्या, मां कैसी हो क्या हो रहा है खाना-वाना खा लिया कि नहीं।अभी नहीं बेटा तेरे भैया भाभी और चिंटू बाहर खाना खाने गए हैं ।।

और आप लोग का खाना, बेटा वह भाभी आती है तो देखती हूँ कि  क्या बनाती है माँ क्या  अभी तक भाभी आप लोगों पर खाने पीने का ध्यान नहीं रखती क्या नहीं बेटा रखती है लेकिन वह सब काम अपनी मर्जी से करती है जब वह लोग बाहर जा रहे थे खाना खाने का आप लोगों को खाना बना कर रख जाते सौम्या बोली कोई बात नहीं बेटा नहीं देख लेती हूं कुछ बना लेती हूं। 

              तभी चिंटू हाथ में एक पैकेट पकड़ा हुआ दादी के पास आया, दादी दादी यह देखो मैं क्या लाया हूं ,क्या है बेटा आप दोनों का खाना,,खाना हम लोग होटल में खाने गए थे ना तो मम्मी ने पापा से कहा मम्मी पापा के लिए खाना पैक करवा दो अब घर जाकर खाना कौन बनाएगा।

तुम लोगोंने  क्या खाना खाया मेरा बच्चा हम लोगों ने बिरयानी, आप लोगों के लिए पैक करने को,बोला दो प्लेट फिर  एक प्लेट कर दिया है प्लेट  2 तो ज्यादा हो जाएगा । वह फिर वह भी कैंसिल कर दिया क्योंकि नहीं  खा सकता था इतनी सारी मेरी प्लेट में बहुत सारा बचा हुआ था।

तो उसी को पहले से पैक करने को कहा बैरे ने कहा मैं नहीं पैक सकता जूठा हो गया  है तो मम्मी ने कहा मैं खुद ही पैक करूंगी तुम बस मेरे को पैक करने का डिब्बा दे दो,फिर मम्मी ने हमारी प्लेट में जो बचा था वह सब और अपनी और पापा की प्लेट मे जो बचा था  वो भी  पैक कर दिया । ।वही आप दोनों के लिए खाने के लिए ले आए हैं । और कह रही थी अब खाना बनाने से छुट्टी मिला यह दे देंगे अम्मा बापू जी को खाने को अच्छा और इंदु और प्रकाश जी एक का मुंह देखने लगे। 

               तभी सौम्या का पापा को फोन आया और पापा कैसे हैं ठीक हूं बेटा। खाना खाया अभी की नहीं तेरी भाभी और भैया ने होटल से झूठी बिरयानी लाए हैं खिलानको झूठी बिरयानी हां वही जो लोग खा रहे थे और जो प्लेट में खाने में बच गया था वही सब पैक करा कर हम दोनों को खाने के लिए है ।

अच्छा हां बेटा पापा का आप कब तक चुप रहोगे कुछ ना बोलोगेr आखिरकार भैया की मनमानियां बढ़ती ही जाएगी प्रकाश जी चुपचाप  सुन रहे थे,,कि पापा हां सुन रहा हूं बेटा तो पापा आप कब तक चुप रहेंगे भाभी भैया के गलत व्यहार पर फिर बोलते क्यों नहीं आप खुद भी नहीं बोलते और मां को भी कुछ कहने से रोक देते हैं। 

                  ठीक है बेटा अभी पूछता हूँ तेरे भाई को बुला कर। अच्छा जरा जोर से डांटना कि ये क्या बदतमीजी है। क्या अब हम लोगो की यही औकात रह गई है कि तुम लोग अपना जूठा खाना लाओगे हम लोगो के लिए। 

        बाहर से खाना खाने के बाद बेटा आशीष और बहू हंसते हुए अपने कमरे मे चले गए। और फिर कुछ देर बाद जब पानी पीने को कमरे से बाहर निकले तो देखा मम्मी पापा अभी तक वही बैठे है और खाने का पैकेट वैसे ही रखा है। और पापा माँ से कह रहे थे कि सुनो धीरे धीरे रसोई मे जाओ थोड़ी सी खिचड़ी या चार पराठे बना लो अचार से खा लैगें।

लेकिन ये जूठी क्या कहते है इसे बिरयानी वो नहीं खायेगें। तभी इंदु जी बोली हां ठीक है बना लाती हूँ। माँ पापा की बात सुनकर आशीष पास आया क्या मम्मी पापा आप लोग कब से यही बैठे है इतनी देर हो गई। वो बिरयानी लाकर दी थी खाया क्यों नहीं। देखो बेटा ये बिरयानी फिरयानी तो हमने कभी खाई ना है नाम सुनकर ही अजीब सा लग रहा है।

और बेटा इतना मान सम्मान तो नहीं गिर गया है कि तुम सबकी और बहू की झूठी बिरयानी प्लेट का बचा हुआ अब हम लोग खायेगें। रहने दे यदि हम दो बुड्ढे बुढियों का दो रोटी बनाना इतना भारी पड रहा है तो मै अपने आप बना लूगीं इंदु जी बोली। खिचड़ी या चार पराठे बस अचार से खा लेगे। 

           चला जाता नहीं है लेकिन खाना खुद बनाने की पड़ी है आशीष बोला। अरे ये बिरयानी भी तो एक तरह से खिचड़ी ही है खा क्यों नहीं लेते। तब प्रकाश जी बोले खा तो लेता बेटा अगर अलग से पैक कराया होता, लेकिन चिटूं ने बताया कि तुम लोग अपनी प्लेट का बचा हुआ खाना तुम लोग पैक कराकर लाए हो। तो मुझे बहुत खराब लगा, अब तो मै  नहीं खाऊंगा। तेरी माँ बनाएगी तभी खाऊंगा। 

            क्या हो गया पापा आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं पहले तो आप नहीं बोलते थे ऐसा। बेटा मेरे न बोलने काही नतीजा है। घर मे लड़ाई झगड़े ं हो इसलिए चुप रहता था। सोचता था जैसा चल रहा है चलने दो। लेकिन तुम दोनों ने तो हद ही कर दी है मेरे वजूद को मिटा देने पर ही तुल गए हो, तो बस अब नहीं होगा ये मनमानी।

बहू इतनी मनमानी करती है हमलोगों के साथ क्यों की तुम्हारी माँ काम कर सकने मे असमर्थ है इसलिए। लेकिन बेटा अब नहीं थोड़ा बहुत तो काम कर ही लेती है और नहीं तो मै मदद करवा दूगां उसका। कल से मेरा और अपनी माँ का खाना मत बनवाना कोई जरूरत नहीं है मै और तेरी माँ जैसे तैसे कर लेगें, जा तू अपनी बीबी के साथ खुश रह। 

                 लेकिन पिता जी अलग अलग दो जगह खाना बनेगा तो कितना खर्चा होगा वो कौन उठाऐगा। तो ऐसा कर रसोई अलग अलग कर ले तू अपना खर्चा उठा और हम दोनों अपना खर्चा उठा लेगे। बाप बेटे की बातें सुनकर बहू भी कमरे से बाहर आ गई। क्या हो रहा हे ये सब मम्मी पापा आप लोग बिना मतलब के क्लैश किए रहते हो,

ये नहीं है कि चुपचाप पडे रहे जो भी जैसा भी मिल रहा है उसमें खुश रहे। हाँ बहू अभी तक तो तेरे पापा चुप ही रहते थे और मुझे भी चुप रहने को कहते थे। लेकिन अब हम लोग अपनी बची खुची जिंदगी अपने हिसाब से बिताएगें। हमारी पेशन आती है थोड़ी है तो क्या हम उसी मे गुजारा कर लेगे। 

            आज तो तेरी रसोई मे खाना बना ले रही है तेरी माँ लेकिन कल से मेरे कमरे के बाहर जो थोड़ा सा बरामदा है वही पर अपने रसोई का इंतजाम कर लेता हूँ अब बेटा तुम लोगो को तकलीफ नही दूगां। सुनकर बेटा बहू चुप हो गए और अपने कमरे मे चले गए।

दूसरे दिन इंदु जी ने अपनी बेटी सौम्या को फोन किया उसे बुलाया और सारी बात बताई। तो वो खुश हो गई बहुत अच्छा किया मम्मी पापा ये तो बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था। पापा जहाँ इज्जत न हो वहाँ क्या रहना। मै आपकी रसोई सेट कर देती हूँ। हाँ बेटी कर दे और कुछ बाजार से राशन लाकर सौम्या ने सब सेट कर दिया। 

      अब इंदु और प्रकाश जी मिल कर अपना खाना बना लेते और मन से खाते और खुश रहते। उन्हें देख देखकर बहू कुढती रहती। और शिकायत करती आशीष से कि अच्छी खासी पेंशन हम लोगो को मिल जाती थी अब वो भी चली गई हाथ से। तो ये सब तुम्हारी ही तो गलती से हुआ न आशीष बोला।

तुम मम्मी पापा का ध्यान ही नहीं रखती थी। इतना समझाता था तुम्हे तब भी तुम हमे ही चुप करा देती थी तो कब भुगतों। आप तो सारा ठीकरा मेरे ही सिर पर फोड दे रहे है, हाँ तो गलत क्या कह रहा हूँ घर के बड़े बुजुर्गों की जिम्मेदारी तो घर की औरतों पर ही होता है न। न तो तुम जूठी बिरयानी ले आती न ये सब नाटक होता। 

         इधर दोनों पति पत्नी खुश रहने लगे, कोई बहुत सारे व्यंजन नहीं चाहिए होते बुढापे में सिंपल सा दाल रोटी या रोटी सब्जी बन जाता बस वही बहुत था। अपमान तो नहीं सहना पड रहा था।

आज प्रकाश जी ने इंदु जी से कहा सुनो चार पराठे सेंक लो अरे नहीं तुम ज्यादा देर खडी नहीं हो सकती तो बैठे बैठे आटा मल के  बस बेल दो मै सेंक दूगां। और पास वाली दुकान से थोड़ा सा दही ले आता हूँ उसी से पराठे खा लेगे। 

       पराठे दही खाकर दोनों आराम से लेटे थे तभी प्रकाश जी ने कहा इंदु मैरी ही गलती थी, न तुम्हे बोलने देता था और न मै किसी बात का विरोध करता था। इससे उनकी मनमानी बढ़ गई थी और अपना अपमान सहते रहते थे। बेटी सौम्या के कहने पर कि पापा आखिर कब तक चुप रहोगे तो मैंने आज बोल ही दिया।

और उसका नतीजा अच्छा ही निकला। जो कुछ भी हुआ सही हुआ। हाँ जी आप सही कह रहे है। हर बात पर चुप रहना मन को बहुत तकलीफ देता है। हाँ सही है, और कब बातें करते करते दोनों सो गए गहरी नींद मे पता ही न चला। 

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

10 अक्टूबर

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