आज बरखा ने स्वयं अपनी नौकरी छोड़ दी। पति की मृत्यु के बाद उसके सामने दो साल की पाखी और बूढ़े सास ससुर की देखकर और जीवन यापन की समस्या अचानक आकर खड़ी हो गई।
जतिन कानपुर में सुरक्षा कर्मी की नौकरी करता था, जहॉ उसे रहने और खाने के साथ पन्द्रह हजार रुपए मिलते थे। जब तक शादी नहीं हुई थी जतिन तीन हजार रुपए अपने खर्चे के लिये रखकर बाकी अपने माता-पिता को भेज देता था।
गांव में जतिन के पास न अधिक खेती थी और न आजीविका का कोई साधन। इसलिये वह गांव के अपने एक दोस्त के साथ कानपुर आ गया था।
शादी के बाद बरखा जतिन के साथ कानपुर आने को तैयार नहीं हुई – ” अम्मा बाबू बूढ़े और अशक्त होते जा रहे हैं। उन्हें अब सेवा की जरूरत है। अभी तुम कई दोस्तों के साथ मिलकर रहते हो तो पैसे बचाकर घर में भेज देते हो अगर मैं साथ चली गई तो खर्चा बढ जायेगा और तुम घर में पैसे नहीं भेज पाओगे। अभी कुछ पैसे इकट्ठा होने दो।”
” तुम सही कह रही हो। अभी तो मुझे न खाने की चिन्ता है और न रहने की लेकिन तुम्हारे लिये तो मुझे सारी व्यवस्था करनी ही पड़ेगी।”
” इसी लिये कह रही हूॅ कि अभी मुझे ले चलने की बात भूल जाओ और पहले की तरह ही आते रहना, मैं बाबू और अम्मा को अकेले कभी नहीं छोडूंगी।”
बरखा के इस निर्णय से जहॉ अम्मा बाबू खुशी से खिल उठे वहीं जतिन को बरखा पर गर्व होने लगा।
समय जैसे जैसे बीत रहा था बाबू और अम्मा का शरीर अस्वस्थ रहने लगा। अब उनके लिये खेती की देखभाल करना कठिन होता जा रहा था। सबसे दुखद बात थी कि शादी के पॉच वर्ष होने के बाद भी बरखा की गोद सूनी थी। बरखा कहती कुछ नहीं थी लेकिन उसकी ऑखों का निरन्तर बढ़ता सूनापन सास ससुर के हृदय को तड़पाता रहता।
आखिर उन दोनों ने जतिन के साथ मिलकर निर्णय लिया कि वे लोग गांव का घर और खेती बेंचकर कानपुर चलेंगे और पूरा परिवार एक साथ रहेगा।
यह सुनकर बरखा भी बहुत खुश हुई। एक तो पति के सामीप्य और साहचर्य की खुशी, दूसरे पास पड़ोस की स्त्रियां प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसके ” बांझपन ” का ताना देकर उसके हृदय को घायल करती रहती थीं। कानपुर जाकर वह खुद का और जतिन का इलाज भी करवा सकती है।
बाबू ने खेती, मकान और अपनी सारी बचत मिलाकर जतिन को दे दी जिससे वह एक छोटा सा मकान खरीद सके। सबको भी यही उचित लगा, मकान खरीदने के बाद उसने बैंक से ऋण लेकर ऊपर की मंजिल बनवाकर किराये पर दे दी ताकि कुछ अतिरिक्त आय भी होती रहे।
अभाव और कम पैसों में भी वे सब एक साथ रहने के कारण बहुत सुखी थे।
तभी बिना किसी दवा या इलाज के बरखा की कोख ने नव पल्लव के अंकुर की सूचना दी, पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। अम्मा ने बरखा की देखभाल इतने जतन और प्यार से की कि कभी कभी बरखा भी ग्लानि से भर उठती – ” अम्मा, इतनी देखभाल और लाड़ दुलार तो मेरी अपनी मम्मी भी न करतीं।”
अम्मा उसके सिर पर हाथ फेरने लगती – ” अरे बिटिया, तुमने भी इतने वर्षों तक हम लोगों के लिए पति के साथ रहने की इच्छा को छोड़कर हमारी सेवा की है।”
पाखी के जन्म के बाद तो उसकी नन्हीं शरारतों और किलकारियों में परिवार जैसे सुख के सागर में गोते लगाने लगा लेकिन बढते खर्चे के कारण बरखा चिन्तित रहने लगी – ” तुम कहो तो मैं भी कुछ काम कर लूॅ। वैसे मैं अधिक पढी लिखी नहीं हूॅ लेकिन कोई काम तो मिल ही जायेगा। आखिर तुम कितनी मेहनत करोगे, पाखी जैसे जैसे बड़ी होगी उसके खर्चे बढ़ेंगे। समय के साथ अम्मा बाबू की दवाइयों के खर्चे भी बढ़ेंगे। हम उन्हें पौष्टिक आहार भी नहीं दे पा रहे हैं।”
” तुम सही कह रही हो लेकिन अभी पाखी बहुत छोटी है, अकेले अम्मा सारा दिन सम्हाल नहीं पायेंगी। कुछ दिन जैसे तैसे गुजारा कर लो, जब पाखी स्कूल जाने लगेगी तब तक मैं तुम्हारे लिये चार- पॉच घंटे वाला काम ढूंढ दूंगा जिससे तुम घर और काम दोनो देख सको।”
बरखा को जतिन की बात सही लगी। सचमुच वह बूढ़े सास ससुर के सहारे सारा दिन के लिए अपनी दुधमुंही बच्ची छोड़ कर कैसे जा सकती है?
लेकिन इस सुखी परिवार को किसी की नजर लग गई। एक दिन जीता जागता जतिन शव के रूप में वापस आया। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि अभी एक घंटे पहले तो जतिन से बरखा से कहा था – ” आज तनख्वाह मिली है, आज खाना मत बनाना, मैं खाना लेता आऊंगा।”
बरखा मुस्कुरा दी। वह जानती थी कि पूरा महीना बहुत सम्हलकर और पैसे बचाकर चलने वाला जतिन आज दरियादिल बन जाता है और किसी सस्ते ढाबे से खाना लाकर पूरे परिवार की दावत करता है।
अपने परिवार के साथ बैठकर खुशी खुशी खाना खाने की कल्पना में डूबे जतिन की साइकिल को कौन ट्रक ड्राइवर टक्कर मारकर भाग गया, पता ही नहीं चला।
पीछे से आने वाले बाइक सवार ने जब जतिन को इस तरह सड़क के किनारे पड़े देखा तो पहले तो उसे यही लगा कि शराब के नशे में बेसुध कोई शराबी है लेकिन जब उसने जतिन के पास जाकर देखा तो जतिन की सांसें बंद हो चुकी थीं। तब उसने जतिन की वर्दी के ऊपर उसकी एजेंसी का नाम देखकर एजेंसी में फोन किया।
बेटे की अर्थी को कंधा देने से बड़ा दुख शायद कुछ नहीं होता। बरखा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह बेटे की मृत्यु से जर्जर हो चुके बूढ़े सास ससुर को सम्हाले, दो वर्ष की अबोध पाखी को या खुद को।
उसके मम्मी पापा उसे और पाखी को मायके ले जाना चाहते थे, उन्होंने अम्मा बाबू के सामने हाथ जोड़कर कहा – ” अभी मेरे अंदर इतनी ताकत है कि हम अपनी बिटिया और नातिन को पाल पोस सकते हैं। आप लोग इसे जाने की आज्ञा दीजिए। इतनी छोटी सी उम्र में इस पर इतना बड़ा पहाड़ जैसा दुख आ गया है।”
अम्मा बाबू के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। कुछ ही दिनों में उन दोनों की उम्र जैसे बीस बीस साल बढ़ गई थी। अम्मा तो कुछ नहीं बोलीं लेकिन उन्होंने पाखी को अपने सीने से भींच लिया और निरीह ऑखों से बरखा और उसके मम्मी-पापा की ओर देखने लगीं।
थोड़ी देर के मौन के बाद बाबू ही बोले – ” जैसा आप लोग और बरखा उचित समझें। मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।”
तभी बरखा बोल पड़ी – ” इन लोगों ने भी तो अपना जवान बेटा खोया है। इस बूढ़े बाप ने अपने ही बेटे की चिता को मुखाग्नि दी है, इस मॉ ने अपनी कोख का अंश खोया है, फिर आप सबको मेरा और पाखी का ही दुख क्यों दिखाई दे रहा है। आप लोगों को क्यों नहीं समझ में आ रहा है कि मेरे और पाखी के चले जाने के बाद कैसे जियेंगें ये लोग? इन लोगों के पास तो दो रोटी का भी सहारा नहीं है।”
” लेकिन बरखा हम तो तुम्हारे भले के लिये ही कह रहे हैं। कैसे कटेगी इतनी बड़ी जिन्दगी?” इस बार बरखा की मम्मी बोलीं
” कट जायेगी मम्मी। इन लोगों ने हमेशा मुझे अपनी बेटी माना है। जतिन से अधिक प्यार दिया है तो इनका अभी बेटा मरा है, बेटी अभी जिन्दा है। मैं इन्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी। जतिन मुझ पर अम्मा बाबू और पाखी की जिम्मेदारी छोड़ कर गये हैं और मैं उनकी सौंपी जिम्मेदारी आखिरी सांस तक निभाऊंगी।”
बरखा के मायके वालों ने उसे बहुत समझाया, यहॉ तक बाद में अम्मा भी कहने लगीं – ” हम लोग की जिन्दगी अब बची ही कितनी है। हमारी चिन्ता छोड़ कर चली जाओ इनके साथ। हम दोनों किसी तरह अपनी सांसें पूरी कर लेंगे। बस, कभी कभी मिलने आ जाना, पाखी को लेकर।” अम्मा फूट फूटकर रोने लगी – ” मेरी तो किस्मत ही फूटी है, वरना बुढ़ापे में उसके हाथ से मुखाग्नि लेने की बजाय तुम्हारे बाबू को उसे मुखाग्नि क्यों देनी पड़ती? उसके कंधों पर श्मशान तक जाने की सोचते थे हम दोनों और ईश्वर ने यह दिन दिखा दिया।”
बाबू भी रोने लगे – ” इनके साथ चली जाओ बिटिया। ये तुम्हारे मॉ बाप हैं , तुम्हारे लिये सही सोच रहे हैं।”
बरखा अम्मा से लिपट गई – ” अम्मा क्या जतिन के जाते ही मैं और पाखी इतने पराये हो गये कि आप लोग भी सबकी बातों में आकर हमें अपने से अलग करना चाहते हैं।”
अम्मा ने बरखा को और कसकर अपने से लिपटा लिया – ” ईश्वर साक्षी है कि हम दोनों ने तुम्हें कभी बहू माना ही नहीं है। तुम और पाखी तो जान हो हमारी। तुम्हारे जाने के बाद हम जल बिना मछली की तरह तड़पते हुए दिन बितायेंगे लेकिन दिल पर पत्थर रखकर तुम्हारी भलाई के लिए तुम्हें जाने के लिए कह रहे हैं।”
” मैं आप दोनों को छोड़कर कभी नहीं जाऊंगी। आप मुझे और अपनी पोती को अपने प्यार और ममता से वंचित नहीं कर सकते।”
आखिर बरखा के माता-पिता नाराज होकर यह कहते हुए चले गये कि जब पछताना तब रोते हुए हमारे पास मत आना।
अब घर में तीन टूटे जर्जर व्यक्ति और एक अबोध बच्चा था। अब आजीविका की विकराल समस्या मुंह खोले उन सबके सामने खड़ी थी। जतिन की एजेंसी ने कुछ पैसे देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। किराए के कुछ पैसों से पूरी गृहस्थी का खर्चा तो नहीं चलाया जा सकता था। एक तसल्ली थी कि उनके पास सिर छुपाने के लिये अपनी छत थी।
बरखा को समझ में नहीं आ रहा था कि केवल बारहवीं तक पढ़ी हुई उसे नौकरी कौन देगा? फिर वह सारा दिन के लिये घर छोड़कर जा भी नहीं सकती। दुख और जवान बेटे की मृत्यु से जर्जर अम्मा बाबू के लिए पूरे दिन एक छोटे बच्चे की देखभाल कर पाना असंभव था।
एक दिन मुहल्ले की एक स्त्री ने उसे बताया कि वह घरों में खाना बनाने का काम करती है। अगर बरखा चाहे तो वह उसे भी खाना बनाने का काम दिलवा सकती है। पहले तो अम्मा बाबू सुनते ही रोने लगे – ” हे भगवान! यही दिन देखने के लिए जिन्दा रखा था कि हमारी बहुरिया दूसरे के घर में जाकर चाकरी करे और रोटी बनाये।”
लेकिन बरखा ने उन्हें समझा बुझाकर राजी कर लिया – ” काम कोई भी बुरा नहीं होता। अपने घर से ज्यादा दूर भी नहीं है। पैदल जाऊंगी तो भी पन्द्रह मिनट की रास्ता है। सुबह सात बजे जाऊंगी और खाना बनाकर आ जाऊंगी।
एक चाभी मेरे पास रहेगी, शाम का खाना मैं पॉच बजे बनाकर लौट आऊंगी।”
” लेकिन तुम कभी बाहर निकली नहीं हो। दुनियादारी तुम्हें आती नहीं है। यह दुनिया तुम्हारे जैसी लड़कियों के लिए बहुत खराब है। कुछ ऊंच नीच हो गई तो भगवान के यहां जाकर हम अपने बेटे को क्या मुंह दिखायेंगे?”
बरखा ने एक नजर अपने सास ससुर पर डाली और पाखी को उठाकर गोद में उठा लिया – ” इस पाखी की सौगंध है कि जिस दिन मेरे आत्मसम्मान और इज्जत पर बात आयेगी, कभी कोई समझौता नहीं करूंगी। यह शरीर जतिन की अमानत है और चिता तक वैसा ही लेकर जाऊंगी।”
बरखा को वैसे भी खाना बनाना बहुत अच्छा लगता। जब वह पारंपरिक खाना बनाती तो शिल्पी और माणिक बहुत खुश होते। बहुत से व्यंजनों के तो उन्हें नाम भी नहीं मालूम थे। शिल्पी जान बूझकर खाना थोड़ा अधिक बनवाती ताकि बचा खाना बरखा घर ले जा सके। जब उन्हें देर से आना होता या पार्टी वगैरह में जाना होता, वे बरखा को फोन करके बता देते।
शिल्पी और माणिक के बच्चे दूसरे शहर में पढ़ते थे। जब बच्चे आते तो काम थोड़ा बढ जाता लेकिन बरखा को उससे कोई शिकायत नहीं थी, मेहनत से वह कभी जी नहीं चुराती थी। उस घर से उसे अक्सर अपने, अम्मा और कभी कभी बाबू के कपड़े भी मिल जाते थे।
रविवार को शिल्पी के कहने पर वह पाखी को भी ले जाती और जब लौटती पाखी की तमाम सामानों से उसका झोला भरा रहता।
तीन साल बीत गए। पाखी अब पास के एक स्कूल में जाने लगी। एक दिन शिल्पी ने बताया कि उसके जेठ जिनका अपनी पत्नी से तलाक हो गया है का ट्रान्सफर हो गया है और अब वह इन लोगों के साथ ही रहेंगे। शिल्पी ने यह भी कहा कि तुम चिन्ता मत करना मैं तुम्हारा वेतन बढ़ा दूंगी।
बरखा ने सोचा माणिक का बड़ा भाई उन्हीं की तरह सज्जन होगा।
सौनिक आ गये तो शिल्पी और माणिक बहुत खुश हुये – ” आपके आने से थोड़ी चहल पहल रहेगी।”
अब बरखा को अपने काम पर अधिक समय देना पड़ता था। सौनिक को सप्ताह में केवल तीन दिन ऑफिस जाना होता था, बाकी दिन वह घर से ही काम करता था। जब वह घर पर रहता तो उसे दोपहर को गर्म खाना खिलाने के बाद ही वह घर लौट पाती।
बरखा की सामान्य जिन्दगी में बदलाव आ गया लेकिन सबसे ज्यादा वह परेशान थी माणिक और शिल्पी की अनुपस्थिति में सौनिक की द्विअर्थी बातों से। उसका मन करता कि वह शिल्पी को इस बारे में बताये लेकिन सौनिक कह देगा कि वह तो सामान्य बात करता है, गन्दगी खुद बरखा के मन में है जो वह उसकी बात का गलत मतलब निकालती है।
अकेले घर में सौनिक के साथ कुछ घंटे ही रहना उसे भारी पड़ता। कई बार मन करता कि काम छोड़ दे लेकिन उसकी मजबूरियां आड़े आ जातीं। इधर बरखा के चुप रहने से सौनिक की हिम्मत बढ़ रही थी।
वह बहाने से बरखा को स्पर्श कर लेता। इस संबंध में उसने शिल्पी से कहा तो उसने हंसकर बात टाल दी – ” दादा बहुत अच्छे हैं। जब से मैं ब्याह कर आई हूॅ, मुझे छोटी बहन की तरह स्नेह करते हैं। जरूर तुम्हें कोई भ्रम हुआ होगा, वह ऐसे नहीं हैं।”
बरखा और शिल्पी के बीच की यह बात सोनिक ने सुन ली। इसलिए जब दूसरे दिन सब चले गए तो मुस्कराता हुआ बरखा के सामने आकर खड़ा हो गया – ” देख लिया नतीजा मेरे विरुद्ध कहकर? कोई तुम्हारी बात मानेगा ही नहीं।”
बरखा को लगा कि अगर आज वह डर गई तो सौनिक का साहस और बढ़ जायेगा। इसलिए उसने सौनिक को घूरते हुए कहा – ” हम मेहनत की कमाई खाने वाले लोग हैं साहब, आत्मसम्मान को बेचने के बदले मैं मर जाना पसंद करूंगी। इसलिए मेरे आत्मसम्मान को छूने की भी कोशिश मत करना, वरना अब किसी से शिकायत करने नहीं जाऊंगी, परिणाम तुम्हें भुगतना पड़ेगा।”
सौनिक चुपचाप कमरे में चला गया। उस दिन से उसने बरखा से बोलना ही छोड़ दिया। बरखा को लगा कि बात खतम हो गई, अब सौनिक उसे परेशान नहीं करेगा। अब वह सौनिक को खाना देने उसके कमरे में नहीं जाती थी बल्कि हॉटकेस में भरकर डाइनिंग टेबल पर रख देती थी।
शायद बरखा भूल गई कि हारा हुआ दुश्मन और कुचला नाग अधिक खतरनाक होता है।
शुरू में बरखा सतर्क रहती थी लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते गए बरखा भी निश्चिन्त हो गई।
करीब सात महीने बाद बरखा रसोई में खाना बना रही थी कि पीछे से आकर सौनिक ने उसे अपनी बाहों में भर लिया – ” आज तो तुम्हें अपना बनाकर रहूंगा। आत्मसम्मान की बहुत बड़ी बड़ी बातें करती थीं ना, आज देखता हूॅ कि तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी? आज तुम्हारे साथ अपनी मनमानी भी करूंगा और झूठा आरोप लगाकर नौकरी से भी निकलवाऊंगा।”
बरखा एक पल के लिये तो हतप्रभ रह गई लेकिन तुरन्त अपने को सम्हाल कर पलटी और एक जोरदार लात सौनिक के दोनों पैरों के बीच नाजुक अंग पर मार दी। दर्द से बिलबिलाता हुआ सौनिक फर्श पर लोटने लगा। बरखा आगे बढ़ी, रसोई में रखा तेजधार वाला चाकू उसने हाथ में उठा लिया। सौनिक के बाल पकड़कर सीधा करते हुये बहुत क्रूर स्वर में उसने कहा – ” जिसके घमंड में मुझ पर अपनी मर्दानगी दिखाने चले थे, आज मैं तुम्हारा वह अंग ही तुमसे छीन लूंगी।” इस समय उसके भीतर जैसे साक्षात चंडी का प्रवेश हो गया था।
सौनिक का पूरा शरीर पसीने से भीग गया। उसकी रूह तक कॉप गई। थर-थर कॉपते हुये उसने बड़ी मुश्किल से अपने दोनों हाथ जोड़ दिये – ” बहन, माफ कर दो। आज के बाद किसी भी स्त्री की ओर ऑख उठाकर नहीं देखूंगा।”
” अब बहन याद आ रही है। अभी थोड़ी देर में ही तुम्हें मुझमें अपनी अम्मा भी नजर आने लगेगी।”
” सच कहता हूॅ कि मैं इस घर से अभी चला जाऊंगा और कभी वापस नहीं आऊंगा।”
” तुम यहां रहो या जाओ लेकिन आज मैं तुम्हें ऐसा सबक सिखाऊंगी कि तुम्हें जिन्दगी भर याद रहेगा। ” और उसने चाकू का भरपूर वार उसके चेहरे पर करके एक गहरी लकीर बना दी। सौनिक की दर्दभरी चीख गूंज गई
” यह घाव भर जायेगा सौनिक बाबू लेकिन जब भी यह निशान देखोगे, अपना आज का कुकृत्य याद आ जायेगा।”
डर और दहशत से सौनिक बेहोश हो गया। फिर उसने शिल्पी को फोन किया – ” भाभी, आपके जेठ की बुरी नजर के बारे में आपसे कहा था लेकिन आपने नहीं सुना था। आकर सम्हाल लो, वरना तुम लोगों के लौटने तक मर जायेगा। अब मैं तुम्हारे घर कभी नहीं आऊंगी। सौनिक से पूॅछ लेना कि उसकी ऐसी हालत क्यों हुई?”
” ऐसा क्या हो गया बरखा? तुम इतने गुस्से में क्यों हो? मैं और माणिक अभी आ रहे हैं। तुम कहीं मत जाना।”
” अब मैं इस घर में एक पल नहीं रुक सकती और आप लोगों के लिए भी यही उचित रहेगा कि आप दुबारा मुझसे न मिलें। “
” लेकिन बरखा, मेरी बात तो सुनो।”
” मेरे पास कहने के लिये कुछ नहीं है, सौनिक को देखकर आपको खुद समझ आ जाएगा। इतना समझ लीजिए कि सौनिक ने मेरे आत्मसम्मान को नष्ट करने का प्रयास किया है और मैंने उसे पूरे जीवन के लिए सबक सिखा दिया है।”
उसके कदम बड़ी दृढ़ता से अपने घर की ओर बढ़ रहे थे।उसे खुद पर गर्व था। काम तो बहुत मिल जायेंगे। अभी वह घर में जाकर कह देगी कि शिल्पी और माणिक का अचानक ट्रान्सफर हो गया है।
बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर