दहलीज़ के दो तराज़ू

 वंदना ने आलोक की ओर मुड़कर कहा, “और आलोक, आप? आप दिन-रात मेहनत करके बैंक में अपनी जान खपाते हैं। घर का हर खर्चा, माताजी-पिताजी की हर दवाई का बिल आप भरते हैं। लेकिन इस घर में आपकी कोई कद्र नहीं है। कद्र सिर्फ दामाद जी की है क्योंकि वे कभी-कभार आकर मुस्कुरा देते हैं। अगर बेटी का मायके आना इतना ही बड़ा अधिकार है कि उसके सामने बहू का हर हक कुचल दिया जाए, तो मुझे माफ कीजिए, मैं अब इस झूठे दिखावे का बोझ नहीं उठा सकती।”

 रसोई की चारदीवारी में चूल्हे के सामने खड़ी वंदना के माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। एक गैस पर बड़ी कढ़ाई में कचौड़ियां तल रही थीं, दूसरी पर अदरक वाली कड़क चाय उबल रही थी और तीसरे बर्नर पर सांबर खदबदा रहा था। वंदना की उंगलियां बिना रुके बेलन चला रही थीं, पर उसका मन कहीं भीतर बहुत गहरे सन्नाटे में डूबा हुआ था।

शादी के शुरुआती सालों में यह घर उसे अपना लगता था। उसके ससुर त्रिलोकीनाथ जी एक सीधे-सादे और कम बोलने वाले इंसान थे, जबकि उसकी सास प्रभावती देवी का मिजाज घर की पूरी सत्ता अपने हाथ में रखने का था। वंदना का पति आलोक एक निजी बैंक में शाखा प्रबंधक था, जो दिन-रात परिवार की जिम्मेदारियों और ईएमआई के बोझ तले पिस रहा था। सब कुछ सामान्य चल रहा था, जब तक कि त्रिलोकीनाथ जी और प्रभावती देवी ने अपनी सबसे लाडली छोटी बेटी रोहिणी की शादी उसी शहर के दूसरे कोने में करने का फैसला नहीं किया।

पुराने जमाने में प्रभावती देवी की अपनी शादी सौ किलोमीटर दूर हुई थी। वे अक्सर अपनी पुरानी बातें याद करके भावुक हो जाती थीं कि कैसे मायका दूर होने के कारण वे अपने दुख-दर्द मां-बाप से बांट नहीं पाती थीं और ससुराल में हर ज्यादती घूंट पीकर सहनी पड़ती थी। इसलिए उन्होंने रोहिणी के ब्याह के वक्त साफ कह दिया था कि वे अपनी बेटी को इतना दूर नहीं भेजेंगी कि उसकी सिसकियां उन तक न पहुंच सकें। रोहिणी की शादी मात्र पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर एक अच्छे व्यापारी परिवार के लड़के सुमित से तय की गई।

शुरुआत में यह फैसला सबको बहुत व्यावहारिक और सुरक्षित लगा। जब भी रोहिणी को कोई छोटी सी भी शिकायत होती, वह तुरंत स्कूटी उठाकर या सुमित की कार में बैठकर मायके आ जाती। मां-बाप का सीना चौड़ा हो जाता कि उनकी बेटी सुरक्षित है, उस पर कोई आंच नहीं आ सकती। लेकिन धीरे-धीरे इस सुरक्षा की चादर ने उस घर की बहू, यानी वंदना के हिस्से की पूरी धूप छीन ली।

रोहिणी का मायके आना अब कोई सामान्य मुलाकात नहीं रह गया था। वह हर शुक्रवार की शाम अपने पति सुमित, दो शैतान बच्चों और कभी-कभी सुमित के छोटे भाई के साथ ‘शांति निकेतन’ में डेरा डाल देती थी। रविवार की रात तक घर किसी धर्मशाला की तरह बदल जाता। रोहिणी ड्राइंग रूम में सोफे पर पैर पसारकर बैठ जाती, हाथ में मोबाइल होता और मुंह में सास-ससुर की बुराइयां। प्रभावती देवी अपनी बेटी के पल्लू से हवा करतीं, उसके सिर में तेल की मालिश करतीं और कहतीं, “मेरी बच्ची ससुराल में कितना खटती है, यहां आई है तो दो दिन आराम कर ले।”

लेकिन उस ‘आराम’ की पूरी कीमत वंदना को चुकानी पड़ती थी। सुबह का नाश्ता हर किसी की फरमाइश के हिसाब से अलग-अलग बनता था—दामाद जी के लिए पोहा और कचौड़ी, बच्चों के लिए पास्ता, ससुर जी के लिए बिना तेल की रोटी और रोहिणी के लिए डोसा। वंदना दिनभर चाय के प्याले धोने, गीले तौलिये समेटने और बच्चों के बिखेरे खिलौनों को उठाने में लगी रहती। किसी ने कभी एक गिलास पानी खुद उठकर नहीं पिया। रोहिणी के आते ही घर के सारे कायदे बदल जाते थे।

सबसे ज्यादा तकलीफ वंदना को तब होती जब उसके अपने दस साल के बेटे आरव के साथ फर्क किया जाता। रोहिणी के बेटे चिंटू और पिंकी जब घर आते, तो प्रभावती देवी का प्यार सातवें आसमान पर पहुंच जाता। वे फ्रिज से काजू-बादाम, मेवे और महंगे फल निकालकर नाती-नातिनों की प्लेटों में भर देतीं। लेकिन अगर वहीं पास खड़ा आरव एक सेब उठाने के लिए हाथ बढ़ाता, तो प्रभावती देवी तुरंत टोक देतीं, “आरव, हाथ पीछे करो! मेहमानों को खाने दो पहले। तुम तो यहीं रहते हो, रोज खाते हो।”

आरव सहमकर पीछे हट जाता और अपनी मां के आंचल में छिपने की कोशिश करता। वंदना का दिल उस वक्त तार-तार हो जाता था। वह सोचती कि क्या नाती-नातिन ही अपने खून होते हैं और पोता बहू का बच्चा होने की वजह से पराया हो जाता है?

बात सिर्फ काम और बच्चों के भेदभाव तक सीमित नहीं थी। आर्थिक मोर्चे पर भी घर का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था। घर का राशन, माता-पिता की महंगी दवाइयां, बिजली का बिल और हर महीने का खर्च आलोक की तन्ख्वाह से निकलता था। आलोक हर महीने बजट बनाने के लिए सिर पकड़कर बैठता था। जब भी त्रिलोकीनाथ जी को किसी बड़े डॉक्टर को दिखाना होता, तो आलोक ही छुट्टी लेकर अस्पताल की लाइन में लगता और बिल चुकाता।

मगर जब समाज या रिश्तेदारों के बीच बात निकलती, तो प्रभावती देवी गर्व से सिर उठाकर कहतीं, “हमारे लिए तो सब कुछ हमारी बेटी रोहिणी और दामाद सुमित ही करते हैं। पिछले हफ्ते सुमित ही तो हमारे लिए फल और मिठाई का डिब्बा लेकर आए थे। दामाद हो तो ऐसा, हमारे एक फोन पर दौड़ा चला आता है।”

आलोक खामोशी से अपनी थाली में सिर झुकाए रोटी चबाता रहता। वंदना देखती कि उसके पति की आंखों में एक गहरा दर्द तैर जाता था, लेकिन मर्यादा के कारण वह कुछ नहीं कहता था। जिस बेटे ने अपना पसीना बहाकर, अपनी ख्वाहिशों को मारकर मां-बाप की हर जरूरत पूरी की, उसका नाम तक लेने में माता-पिता को संकोच होता था, और जो दामाद महीने में एक बार दो सौ रुपये के फल लेकर औपचारिकता निभाने आता था, उसकी तारीफों के पुल बांधे जाते थे।

उस दिन भी स्थिति असहनीय हो गई थी। रविवार का दिन था और रोहिणी का परिवार पिछले तीन दिनों से वहीं टिका हुआ था। दोपहर के खाने के बाद वंदना की कमर दर्द के मारे दोहरी हो रही थी। वह रसोई समेटकर कमरे में पंखे के नीचे दस मिनट के लिए लेटी ही थी कि बाहर से प्रभावती देवी की तेज आवाज आई, “अरे बहू! कहां सो गई? दामाद जी को शाम की चाय चाहिए और साथ में गरम पकौड़े बना दो। रोहिणी कह रही थी कि उसका सिर भारी हो रहा है, उसके लिए भी अदरक वाली चाय जल्दी ले आओ।”

वंदना ने आंखें मूंद लीं। उसके पैरों में जान नहीं बची थी। वह धीरे से उठी और बाहर आई। उसने बहुत संयत स्वर में कहा, “मां जी, सुबह से मैं एक पल के लिए भी नहीं बैठी हूं। मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही, कमर में बहुत तेज दर्द है। क्या रोहिणी आज चाय खुद बना सकती है? वह तो रसोई का रास्ता जानती ही है।”

यह सुनते ही जैसे घर में कोई विस्फोट हो गया। प्रभावती देवी की भृकुटियां तन गईं, “क्या कहा तुमने? मेरी बेटी यहां कोई नौकरानी बनकर आई है क्या? वह ससुराल में दिन-रात काम करती है, दो दिन मायके सुख की सांस लेने आई है और तुम उससे चाय बनवाओगी? कैसी बहू हो तुम, जरा सी सेवा करते हुए तुम्हारी नानी मरती है!”

रोहिणी भी सोफे से उठकर तमतमाते हुए बोली, “भाभी, अगर आपको मेरा आना इतना ही अखरता है तो साफ कह दीजिए। मैं तो अपने बाप के घर आई हूं, आपके घर नहीं। मां-बाप ने मुझे पास में इसलिए ब्याहा था ताकि मैं जब चाहूं यहां आ सकूं। आप हमें नीचा दिखाने की कोशिश मत कीजिए।”

दामाद सुमित भी अपनी नाराजगी जताते हुए अखबार पटककर खड़ा हो गया और व्यंग्य से बोला, “लगता है हमारे आने से यहां लोगों को तकलीफ होती है। चलिए रोहिणी, सामान पैक करो, हम अपने घर ही चलते हैं।”

घर में एक अजीब सा तनाव फैल गया। तभी बाहर से आलोक और त्रिलोकीनाथ जी अंदर दाखिल हुए। घर का माहौल देखकर आलोक का माथा ठनका। प्रभावती देवी तुरंत आंसुओं का सैलाब बहाते हुए बोलीं, “देख आलोक, तेरी इस महारानी ने मेरी बेटी और दामाद का कैसा अपमान किया है। बेटी मायके आई तो इससे एक कप चाय नहीं बनाई गई। कह रही है कि रोहिणी खुद बनाए।”

आलोक ने वंदना की तरफ देखा। वंदना की आंखों से लगातार आंसू गिर रहे थे, लेकिन उसका चेहरा इस बार अपराधबोध से नहीं, बल्कि एक गहरी पीड़ा और स्वाभिमान से भरा था। वह जमीन की तरफ नहीं, बल्कि सीधे आलोक की आंखों में देख रही थी।

वंदना ने कांपती आवाज में, मगर बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “आलोक, आज फैसला कर ही लीजिए। क्या यह घर सिर्फ मेरी जिम्मेदारियों का दायरा है या मेरे आत्मसम्मान का भी कोई मोल है? मैं इस घर की बहू बनकर आई थी, कोई खरीदी हुई दासी नहीं। जब से शादी हुई है, मैंने कभी अपने मायके जाकर हफ्तों तक आराम नहीं फरमाया क्योंकि मुझे सिखाया गया था कि ससुराल ही मेरा पहला कर्तव्य है। लेकिन यहां? रोहिणी दीदी हफ्ते में चार दिन अपने पूरे परिवार के साथ यहां रहती हैं, हुक्म चलाती हैं और मैं सुबह से रात तक उनकी सेवा में खटती रहूं। अगर मैं एक दिन अपनी थकान का इजहार कर दूं, तो मैं कुलच्छनी हो जाती हूं?”

प्रभावती देवी चिल्लाईं, “वह बेटी है इस घर की!”

“हां मां जी, वह बेटी है,” वंदना ने पलटकर कहा, “और मैं भी किसी की बेटी हूं! क्या मेरी मां का कलेजा नहीं दुखता होगा जब वह सोचती होगी कि उनकी पढ़ी-लिखी बेटी ससुराल में सिर्फ एक मुफ्त की रसोइया बनकर रह गई है? आपने अपनी बेटी को पास में इसलिए ब्याहा ताकि वह ससुराल में न पिसे, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा कि अपनी बेटी को आराम देने के लिए आप दूसरे की बेटी को उसी चक्की में दिन-रात पीस रही हैं? आपके नाती-नातिन आपके कलेजे के टुकड़े हैं, लेकिन मेरा बेटा आरव आपके लिए पराया हो गया? उसके हिस्से का प्यार, उसके हिस्से के फल सब आप छीन लेती हैं। क्यों? सिर्फ इसलिए कि उसकी मां बहू है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित और रोहिणी के चेहरे का रंग उड़ गया था।

वंदना ने आलोक की ओर मुड़कर कहा, “और आलोक, आप? आप दिन-रात मेहनत करके बैंक में अपनी जान खपाते हैं। घर का हर खर्चा, माताजी-पिताजी की हर दवाई का बिल आप भरते हैं। लेकिन इस घर में आपकी कोई कद्र नहीं है। कद्र सिर्फ दामाद जी की है क्योंकि वे कभी-कभार आकर मुस्कुरा देते हैं। अगर बेटी का मायके आना इतना ही बड़ा अधिकार है कि उसके सामने बहू का हर हक कुचल दिया जाए, तो मुझे माफ कीजिए, मैं अब इस झूठे दिखावे का बोझ नहीं उठा सकती।”

वंदना ने अपने आंसू पोंछे और मुड़कर अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए।

तभी त्रिलोकीनाथ जी, जो अब तक हमेशा चुप रहते थे, आगे आए। उनकी आवाज में एक ऐसा वजन था जिसने सबको अपनी जगह पर थाम दिया। उन्होंने प्रभावती देवी की तरफ देखा और बेहद गंभीर स्वर में बोले, “प्रभावती, बस करो। आज बहू ने जो कहा है, वह कड़वा है, लेकिन सोलह आने सच है।”

प्रभावती देवी अवाक रह गईं, “आप… आप बहू का पक्ष ले रहे हैं?”

“मैं बहू का नहीं, सच का पक्ष ले रहा हूं,” त्रिलोकीनाथ जी ने कहा। फिर वे रोहिणी की तरफ मुड़े, “रोहिणी बेटी, हमने तुम्हारी शादी पास में इसलिए की थी ताकि तुम किसी मुसीबत में अकेली न पड़ो। हमने तुम्हें मायके की सुरक्षा की छांव दी थी, लेकिन तुमने उस छांव को अपना विश्रामगृह और अपनी भाभी के लिए धूप बना दिया। तुम यहां आती हो, अच्छी बात है, लेकिन क्या तुमने कभी सोचा कि जिस घर में तुम दो दिन रानी बनकर हुक्म चलाती हो, उस घर की बहू पूरे हफ्ते एक दिन भी चैन से नहीं बैठ पाती? क्या कभी तुमने रसोई में जाकर वंदना से पूछा कि ‘भाभी, लाओ आज खाना मैं बना देती हूं, तुम थोड़ा आराम कर लो’? नहीं पूछा। क्योंकि तुम्हारे मन में यह गलतफहमी बैठ गई कि मायका सिर्फ तुम्हारा अधिकार है और बहू का सिर्फ कर्तव्य।”

त्रिलोकीनाथ जी ने फिर दामाद सुमित की तरफ देखा, “और दामाद जी, मान-सम्मान मांगने से नहीं मिलता, कमाने से मिलता है। आलोक इस घर की नींव है, वह चुप रहता है इसका मतलब यह नहीं कि उसके आत्मसम्मान पर चोट नहीं लगती।”

रोहिणी का सिर शर्म से झुक गया। उसने कभी इस नजरिए से सोचा ही नहीं था। वह हमेशा यही मानती रही कि मायके में उसका हक सबसे पहला है, पर उसने कभी यह नहीं देखा कि उसके उस ‘हक’ के नीचे उसकी भाभी का पूरा वजूद कुचला जा रहा था। सुमित भी नजरें चुराने लगा।

त्रिलोकीनाथ जी वंदना के कमरे के दरवाजे पर गए और बोले, “बहू, बाहर आओ।”

वंदना बाहर आई, उसकी आंखें अभी भी भीगी हुई थीं। त्रिलोकीनाथ जी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटी, आज तक जो हुआ, उसके लिए तुम्हारा यह ससुर तुमसे माफी मांगता है। हमने अपनी बेटी की फिक्र में यह भुला दिया कि हमारे घर में भी किसी की लाडली बेटी बहू बनकर आई है। यह घर जितना आलोक और रोहिणी का है, उतना ही तुम्हारा भी है। आज के बाद इस घर में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।”

प्रभावती देवी भी अपनी जगह जड़ खड़ी थीं। पति की बातों ने उनके अंदर की उस मां को झकझोर दिया था जो बेटी के मोह में अंधी होकर एक दूसरी बेटी के साथ अन्याय कर रही थी। उन्हें याद आया कि जब वे खुद नई-नई बहू बनकर आई थीं, तो ननंदों के आने पर उन्हें कैसा महसूस होता था। वे धीरे-धीरे वंदना के पास आईं और उसके कांपते हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।

“मुझे माफ कर दे बहू,” प्रभावती देवी का गला रुंध गया, “मैं बेटी के लाड़ में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तेरी थकान, तेरा दर्द और तेरे बच्चे का चेहरा दिखाई ही नहीं दिया। तूने सही कहा, तू भी तो किसी की बेटी है। अगर मैं अपनी बेटी के लिए ससुराल में सुख मांगती हूं, तो मुझे भी अपनी बहू को वही सुख और सम्मान देना चाहिए।”

रोहिणी आगे बढ़ी और उसने वंदना के कंधे पर हाथ रखा, “भाभी… मुझे माफ कर दीजिए। मुझे सच में कभी एहसास नहीं हुआ कि मेरे आने से आपके ऊपर कितना बोझ पड़ता था। मैं अपने आराम में इतनी खो गई थी कि आपका दर्द देख ही नहीं पाई। अब ऐसा कभी नहीं होगा।”

उस दिन ‘शांति निकेतन’ की दीवारें एक बहुत बड़े बदलाव की गवाह बनीं। शाम की चाय वंदना ने नहीं, बल्कि रोहिणी और प्रभावती देवी ने मिलकर बनाई। सबने एक साथ बैठकर चाय पी। उस दिन कोई मेहमान नहीं था और कोई सेवादार नहीं था; सब एक परिवार थे।

वक्त बदला और उस घर की आबोहवा भी बदल गई। रोहिणी अब भी मायके आती थी, लेकिन अब उसका आना किसी उत्सव की तरह होता था, किसी बोझ की तरह नहीं। जब भी वह आती, रसोई में वंदना का हाथ बंटाती, दोनों मिलकर हंसते-खिलखिलाते हुए काम करतीं। प्रभावती देवी अब आरव और रोहिणी के बच्चों में कोई फर्क नहीं करती थीं; दोनों को बराबर प्यार और दुलार मिलता था। आलोक के त्याग और मेहनत को भी वह सम्मान मिलने लगा जिसका वह हकदार था।

उस दिन एक परिवार बिखरने से बच गया क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि रिश्तों की गाड़ी तभी सही चलती है जब तराजू के दोनों पलड़े बराबर हों। बेटी को मायके का संबल जरूर मिलना चाहिए, लेकिन उस संबल की कीमत ससुराल में बहू के आंसुओं से कभी नहीं चुकानी चाहिए।

क्या आपको भी लगता है कि बेटी के अधिकारों और बहू के सम्मान के बीच यह संतुलन आज के हर परिवार में होना जरूरी है? क्या आपके आसपास भी कभी ऐसा असंतुलन देखने को मिला है? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!