मैली चादर की सुनहरी सिलाई

 शादी के ठीक तीन दिन बाद, जब सुनैना पहली बार अपने पति अनिरुद्ध के साथ उस घर की दहलीज पर पहुंची, तो उसके मन में एक आधुनिक, सजावटी संसार की कल्पना तैर रही थी। वह इंदौर के एक खाते-पीते और आधुनिक सोच वाले परिवार में पली-बढ़ी थी। उसे चमक-दमक, करीने से सजी अलमारियां और हर चीज़ में एक सलीका देखने की आदत थी।

घर में अनिरुद्ध के अलावा केवल उसकी माँ, सुमित्रा जी थीं। सुमित्रा जी की कमर झुक चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियों का जाल था और उनकी दाहिनी आंख की पलकें अक्सर झपकी रहती थीं, जिससे उनकी दृष्टि कुछ कमजोर जान पड़ती थी। उनकी उंगलियों के पोर काले, खुरदुरे और अजीब तरह से मुड़े हुए थे। वे जब भी कोई बर्तन उठातीं या कप थामतीं, तो उनकी उंगलियां अनियंत्रित होकर थरथराने लगती थीं।

गृहप्रवेश की रस्में पूरी होने के बाद, तीसरे पहर जब घर के बाकी मेहमान विदा हो गए, तो सुमित्रा जी संदूक के पास बैठीं। उन्होंने बहुत ही जतन से एक पुराना, पीला पड़ा ताला खोला और भीतर से मटमैले रंग की, खद्दर के मोटे कपड़े से बनी एक बड़ी सी रज़ाई या चादर जैसी पोटली निकाली। उस चादर पर जगह-जगह हाथ से किए गए रफ़ू के निशान थे, कुछ धागे उधड़े हुए थे और उसके कोनों पर गहरे मटमैले धब्बे पड़े थे।

सुमित्रा जी अपने लड़खड़ाते कदमों से चलकर सुनैना के पास आईं। उनके चेहरे पर एक ममतामयी मुस्कान थी, जिसने उनकी झुर्रियों को और गहरा कर दिया था। उन्होंने वह पुरानी, भारी चादर सुनैना की गोद में रख दी।

“बहू,” सुमित्रा जी ने कांपती आवाज़ में कहा, “यह सिर्फ सूत का टुकड़ा नहीं है। यह मेरे ससुर जी के ज़माने की पहचान है। जब मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी, तो मेरी सास ने इसे मेरे सिर पर ओढ़ाया था और कहा था कि यह घर की लाज और बरकत की चादर है। आज से मेरे गृहस्थी की डोर तेरे हाथों में है। इस चादर को हमेशा अपनी अलमारी में सबसे आगे रखना और जब भी घर में कोई नया काम शुरू हो, इसे बिछाकर भगवान का भोग लगाना। इसी में हमारी खुशहाली बंधी है।”

सुनैना ने जब अपनी रेशमी बनारसी साड़ी की गोद में उस धूल भरी, बदरंग और अजीब सी गंध वाली चादर को देखा, तो उसके चेहरे पर घिन की लकीरें खिंच गईं। उसने उंगलियों के पोरों से चादर को ऐसे छुआ, मानो किसी कीड़े को छू रही हो। वह मन ही मन बुदबुदाई कि गाँव-देहात की इन अनपढ़ औरतों को क्या कभी सफाई और स्वच्छता का अर्थ समझ नहीं आता? इतनी मैली और घिनौनी चीज़ को कोई अपनी नई-नवेली बहू को पहली विदाई में कैसे सौंप सकता है?

उसने उस वक्त तो किसी तरह एक नकली मुस्कान बिखेर दी और चादर को एक तरफ रख दिया। लेकिन जैसे ही सुमित्रा जी दोपहर की नींद लेने अपने कमरे में गईं, सुनैना ने उस पुरानी चादर को एक पुराने प्लास्टिक के थैले में ठूंस दिया। उसने उसे अलमारी में रखने के बजाय, स्टोर रूम की सबसे ऊंची, जाले लगी परछत्ती के अंधेरे कोने में फेंक दिया, जहाँ घर का कबाड़ सड़ता रहता था। उसने बाज़ार से मंगवाए हुए मखमली, सुगंधित और डिज़ाइनर बेडस्प्रेड अपने कमरे में सजा लिए।

अगले कुछ हफ़्तों में जब भी घर में कोई पूजा होती या शाम की आरती के बाद जब सब आंगन में बैठते, तो सुमित्रा जी दीवार का सहारा लेकर खड़ी होतीं और धीमी आवाज़ में पूछतीं, “बहू, क्या तूने मंदिर के आगे वो पुरानी चादर नहीं बिछाई? जब वो बिछती थी, तो पूरा घर एक अलग ही सुकून से भर जाता था… मुझे कुछ खाली-खाली सा लगता है।”

सुनैना हर बार मुंह बिचका लेती। एक दिन जब अनिरुद्ध भी वहीं बैठा चाय पी रहा था, तो सुनैना का सब्र टूट गया। उसने चाय की प्याली मेज़ पर पटकी और तल्ख आवाज़ में बोली, “माँ जी! आप हर बात में अपनी वही पुरानी, सड़ी-गली बातें क्यों दोहराती रहती हैं? ज़माना कहाँ से कहाँ पहुंच गया है और आप अभी भी उस बदबूदार, कीटाणुओं से भरी फटी चादर के पीछे पड़ी हैं! आजकल बाज़ार में एंटी-बैक्टीरियल और साफ-सुथरे कपड़े मिलते हैं। आपके उस मैले कपड़े को छूने से भी एलर्जी हो जाए। आप चुपचाप अपना ध्यान रखिए और मेरे सलीके में हर रोज़ नुक्ताचीनी मत किया कीजिए!”

सुमित्रा जी का चेहरा उतर गया। उन्होंने उम्मीद भरी नज़रों से अपने बेटे अनिरुद्ध की तरफ देखा। अनिरुद्ध शहर की बड़ी आईटी कंपनी में एक ऊंचे पद पर था। उसे लगा कि सुनैना सही कह रही है; पुराने ज़माने के लोग बेकार की चीज़ों से भावनात्मक रूप से चिपक जाते हैं और स्वच्छता का ध्यान नहीं रखते।

अनिरुद्ध ने अपनी माँ से रूखे स्वर में कहा, “हाँ माँ, सुनैना बिल्कुल ठीक कह रही है। अब हम आधुनिक शहर में रहते हैं। आप उस फटे-पुराने कपड़े को लेकर रोज़-रोज़ घर में किचकिच मत किया कीजिए। जो चीज़ पुरानी हो गई, उसे छोड़ना सीखिए।”

सुमित्रा जी ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं। उनकी कांपती उंगलियों ने अपनी सादी धोती का पल्लू कसकर पकड़ लिया। उन्होंने उस दिन के बाद से कभी उस चादर का नाम नहीं लिया। वे चुपचाप अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी रहतीं, बाहर पारिजात के झड़ते फूलों को देखतीं और जो रूखा-सूखा खाना उन्हें परोस दिया जाता, उसे बिना किसी शिकायत के खा लेतीं। सुनैना ने घर का सारा नक्शा बदल दिया था; हर तरफ महंगे परदे, चमकते टाइल्स और सुगंधित मोमबत्तियां थीं, लेकिन उस घर की आत्मा जैसे कहीं खो गई थी।

करीब तीन साल बीत गए। इस दौरान सुमित्रा जी का स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरता गया, पर उन्होंने कभी किसी से अपनी तकलीफ नहीं कही। वे किसी बोझ की तरह एक कोने में सिमट कर रह गई थीं। एक रात, जब शहर में मूसलाधार बारिश हो रही थी, सुमित्रा जी की सांसें उखड़ने लगीं। जब तक अनिरुद्ध और सुनैना डॉक्टर को बुलाते, तब तक उनकी नाड़ी शांत हो चुकी थी। वे नींद में ही इस दुनिया से विदा हो गई थीं।

पूरे रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार किया गया। तेरहवीं बीत जाने के बाद, जब घर खाली हो गया, तो सुनैना ने सुमित्रा जी के कमरे की सफाई करने का फैसला किया। वह चाहती थी कि उस पुराने कमरे को तोड़कर एक आधुनिक होम-थिएटर या गेस्ट रूम बना दिया जाए। सामान समेटते वक्त उसे स्टोर रूम की परछत्ती याद आई। उसने अनिरुद्ध से कहा कि ऊपर जो कबाड़ पड़ा है, उसे उतारकर सीधे कचरे वाली गाड़ी में फेंक दिया जाए।

अनिरुद्ध ने सीढ़ी लगाकर उस परछत्ती से धूल भरा प्लास्टिक का थैला नीचे उतारा। थैला खोलते ही वही पुरानी, मटमैली खद्दर की चादर बाहर आ गिरी। वर्षों की धूल और जालों की वजह से वह और भी बदरंग लग रही थी।

सुनैना ने अपनी नाक पर रुमाल रखा और चिढ़कर कहा, “देखा आपने? मैंने कहा था न कि यह सिर्फ कबाड़ है। इतने साल से यह यहाँ सड़ रही थी। इसे सीधे बाहर कूड़ेदान में फेंक आइए, नहीं तो पूरे घर में धूल फैल जाएगी।”

अनिरुद्ध ने चादर को समेटने के लिए जैसे ही अपने दोनों हाथों में उठाया, उसे उस मोटे खद्दर के बीच में कुछ बहुत भारी और सख्त महसूस हुआ। चादर का एक सिरा जो सिला हुआ था, वह पुराना होने के कारण खुल गया था। अनिरुद्ध ने कौतूहलवश उस खुले हुए सिरे में हाथ डाला। उसका हाथ किसी मखमली थैली और कागज़ात के पुलिंदे से टकराया।

“सुनैना, रुको… इसके अंदर कुछ है,” अनिरुद्ध की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।

उसने चादर को आंगन के फर्श पर बिछाया और उसके मुड़े हुए अस्तर को धीरे-धीरे उधेड़ना शुरू किया। जैसे-जैसे धागे खुलते गए, दोनों की आंखें फटी की फटी रह गईं।

उस फटी और बदरंग चादर की दोहरी परतों के भीतर कोई साधारण कपड़ा नहीं था। उसके बीच में बहुत ही करीने से सिली हुई कई थैलियां थीं। उन थैलियों में सोने के पुराने भारी कंगन, एक नवलखा हार, कई पुश्तैनी जेवर और बैंक के कुछ सावधि जमा (एफडी) के प्रमाण पत्र रखे थे, जिनकी कीमत लाखों में थी। साथ ही, बीच में एक पुराने वसीयतनामे के कागजात थे, जिस पर भोपाल के सबसे महंगे इलाके में स्थित एक व्यावसायिक ज़मीन का मालिकाना हक दर्ज था।

कागज़ात के सबसे ऊपर, कांपते हाथों से नीली स्याही में लिखी हुई एक चिट्ठी रखी थी। स्याही कहीं-कहीं आंसुओं की बूंदों से फैल चुकी थी। अनिरुद्ध ने कांपती उंगलियों से उस चिट्ठी को उठाया और पढ़ना शुरू किया:

“मेरे प्यारे अनिरुद्ध और मेरी लाडली बहू सुनैना,

जब तुम्हारे बाबूजी का साया हमारे सिर से उठा था, तब अनिरुद्ध सिर्फ सात साल का था। तुम्हारे बाबूजी के हिस्से की ज़मीन पर उनके कुछ रिश्तेदारों ने कर्ज़ का बहाना बनाकर कब्ज़ा कर लिया था। मैं एक अनपढ़ औरत थी, जो केवल कसीदाकारी और खद्दर की सिलाई जानती थी। उस ज़मीन को वापस छुड़ाने और अनिरुद्ध को शहर के सबसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने के लिए, मैंने दिन देखा न रात… मैंने भोपाल की बड़ी दुकानों के लिए भारी ज़री और पत्थर की नक्काशी वाले लहंगों पर रात के अंधेरे में बारीक सुई से काम किया।

लगातार पंद्रह साल तक पत्थरों को तराशते और सुई के बारीक धागों को पिरोते-पिरोते मेरी आंखों की रोशनी धुंधली पड़ गई और भारी औजार थामते-थामते मेरी उंगलियों के पोर टेढ़े हो गए। मेरी उंगलियां कांपने लगीं क्योंकि उनकी नसें हमेशा के लिए खिंच चुकी थीं। लेकिन मुझे इसका कोई दुख नहीं था, क्योंकि उसी सिलाई की कमाई से मैंने अपने पति की खोई हुई ज़मीन का मुकदमा जीता और अपने बेटे को इस काबिल बनाया कि वह सिर उठाकर समाज में जी सके।

बहू, जब तू इस घर में आई थी, तो मेरे पास तुझे देने के लिए कोई नया, चमचमाता तोहफा नहीं था। मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई यही थी—तेरे ससुर की वापस जीती हुई ज़मीन और मेरी मेहनत से बचाए हुए ये गहने। मैंने इस पुरानी चादर के भीतर वो सब कुछ इसलिए सिलकर रखा था ताकि चोर-उचक्कों की नज़र न पड़े और मेरी बहू खुद जब इसे खोले, तो उसे अपनी सास के संघर्ष और उसके आशीर्वाद का अहसास हो।

मैंने चाहा था कि तू इसे अपने हाथों से छुए, इसके धागों को महसूस करे… लेकिन शायद मेरे कांपते हाथों की बदसूरती और इस चादर के मैलेपन ने तुझे डरा दिया। मुझे माफ़ कर देना बहू, अगर मेरी इस अनपढ़ सोच ने तेरे सलीके को ठेस पहुंचाई हो। मैं तो बस अपनी पूरी ज़िंदगी की बरकत तुझे सौंपकर अपनी आंखें मूंदना चाहती थी। यह सब तुम्हारा है, मेरे बच्चों। खुश रहना।”

चिट्ठी पूरी होते-होते अनिरुद्ध के गले से एक चीख निकल गई। वह घुटनों के बल उसी पुरानी चादर पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा।

“माँ! ओ माँ! हमने यह क्या कर दिया…” अनिरुद्ध अपने सीने को पीट रहा था, “जिस माँ ने अपनी आंखों की रोशनी खोकर, अपने हाथों की नसें तोड़कर मुझे इस कुर्सी तक पहुंचाया, मैंने उसी माँ के कांपते हाथों को लाचार और फूहड़ समझ लिया! मैंने उसकी पूरी ज़िंदगी की तपस्या को एक झटके में नकार दिया!”

सुनैना वहीं चौखट के पास पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी। उसके पैरों तले से जैसे पूरी कायनात खिसक चुकी थी। उसके दिमाग में वे सारे मंज़र बिजली की तरह कौंधने लगे—जब उसने सुमित्रा जी के हाथ से पानी का लोटा झटक दिया था क्योंकि उनके हाथ कांपते थे; जब उसने उन्हें डांटा था कि वे उस चादर की बात न करें; जब उसने उस औरत को ‘कीटाणुओं से भरी’ कहकर अपमानित किया था, जिसने अपनी पूरी देह को गलाकर उनके लिए यह ऐशो-आराम का साम्राज्य खड़ा किया था।

सुनैना ने आगे बढ़कर उस मैली, पुरानी चादर को अपने दोनों हाथों में उठा लिया। उसने उस चादर को अपने सीने से चिपका लिया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जिस चादर की गंध से उसे कभी घिन आती थी, आज उसी चादर में से उसे अपनी माँ के पसीने, उसकी ममता और उसके बेपनाह त्याग की खुशबू आ रही थी।

“मैं कितनी अंधी थी अनिरुद्ध…” सुनैना हिचकियों के बीच बोली, “मैं बाज़ार के नकली चमक-धमक को सलीका समझती रही, और जो औरत हमारे लिए अपनी हड्डियों को गला रही थी, उसे मैं पिछड़ा समझ बैठी। काश… काश मैं एक बार, सिर्फ एक बार माँ जी के उन कांपते हाथों को अपने माथे से लगा पाती! काश मैं उनके चरणों में गिरकर अपने उस घमंड की भीख मांग पाती!”

लेकिन समय का पहिया कभी पीछे नहीं घूमता। सुमित्रा जी जा चुकी थीं। घर में रखी वे तमाम महंगी और आधुनिक चीज़ें, वे मखमली परदे और चमचमाते कालीन, उस मैली चादर के आगे बेहद तुच्छ, बेजान और खोखले लग रहे थे।

उस रात न तो अनिरुद्ध सोया और न ही सुनैना। दोनों ने मिलकर उस चादर को बहुत ही सम्मान के साथ झाड़ा। सुनैना ने अपनी अलमारी से अपनी सबसे कीमती, रेशमी लाल चुनरी निकाली और उस पुरानी खद्दर की चादर को उस चुनरी में लपेटकर घर के मंदिर में, भगवान की मूरत के ठीक नीचे स्थापित कर दिया।

अगले कुछ दिनों में सुनैना के भीतर एक गहरा परिवर्तन आ चुका था। उसका अहंकार, उसकी आधुनिकता का झूठा घमंड हमेशा के लिए भस्म हो चुका था। उसने महसूस किया कि सिर्फ पश्चाताप के आंसुओं से माँ जी की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी; उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तब मिलेगी जब उनकी मेहनत और त्याग को किसी सार्थक उद्देश्य में बदला जाए।

अनिरुद्ध और सुनैना ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने उस वसीयत वाली ज़मीन और गहनों को किसी विलासिता में खर्च करने के बजाय, उसी ज़मीन पर एक विशाल संस्थान की नींव रखी। उस संस्थान का नाम उन्होंने रखा—‘सुमित्रा सेवा सदन’।

यह कोई साधारण वृद्धाश्रम या दफ्तर नहीं था। यह बेसहारा, वृद्ध और हुनरमंद महिलाओं के लिए एक केंद्र था। सुनैना ने खुद अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर उस केंद्र की ज़िम्मेदारी संभाली। वहाँ उन बुजुर्ग और जरूरतमंद महिलाओं को लाया गया, जिनके हाथों में हुनर तो था लेकिन उम्र या बीमारी के कारण समाज ने उन्हें ठुकरा दिया था। वहाँ पारंपरिक कसीदाकारी, हाथ से बुने जाने वाले खद्दर और पारंपरिक शिल्पकला का काम शुरू किया गया।

सुनैना रोज़ सुबह वहाँ जाती। जब भी कोई बुजुर्ग महिला कांपते हाथों से सुई में धागा पिरोने की कोशिश करती और नहीं कर पाती, तो सुनैना खुद उनके पास बैठती, बड़े प्यार से उनके कांपते हाथों को चूमती और कहती, “माँ, लाइए… धागा मैं पिरो देती हूँ, आप सिर्फ अपनी ममता से इसे सींचिए।” वह हर बुजुर्ग महिला में अपनी सास, सुमित्रा जी की छवि देखती थी।

कुछ ही वर्षों में उस संस्थान ने सैकड़ों बेसहारा माताओं को न केवल आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि उन्हें समाज में एक गहरा सम्मान भी दिलाया। सुनैना और अनिरुद्ध के जीवन में अब कोई खोखलापन नहीं था। उनके घर में जब एक नन्ही बेटी ने जन्म लिया, तो सुनैना ने बाज़ार का कोई महंगा कपड़ा लाने के बजाय, मंदिर में रखी उसी पुरानी खद्दर की चादर का एक टुकड़ा लिया और अपनी नवजात बच्ची को सबसे पहले उसी में लपेटा।

उसने अपनी बेटी के माथे को चूमते हुए कहा, “मेरी बच्ची, यह सिर्फ कपड़ा नहीं है… यह तेरी दादी का वो त्याग और आशीर्वाद है, जिसकी बदौलत आज हम जिंदा हैं। ज़िंदगी में कभी किसी की सादगी और उसकी झुर्रियों को उसकी कमजोरी मत समझना।”

घर के आंगन में पारिजात के फूल आज भी झड़ रहे थे, लेकिन अब उस घर की हवा में घिन या अहंकार का कोई नामोनिशान नहीं था; वहाँ केवल कृतज्ञता, सेवा और बुजुर्गों के प्रति उस असीम आदर की खुशबू थी, जो पीढ़ियों को तार देती है।

दोस्तों, हमारे बड़े-बुजुर्गों की पुरानी आदतें, उनके पुराने बक्से या उनके कांपते हुए हाथ हमें कभी-कभी आज के आधुनिक दौर में अनुपयोगी या पुराने लग सकते हैं। लेकिन क्या हम कभी यह समझने की कोशिश करते हैं कि उन कांपते हाथों ने हमारे वर्तमान को संवारने के लिए अपने अतीत में कितना बोझ उठाया होगा? क्या आपके घर में भी कोई ऐसी पुरानी याद या बुजुर्गों की दी हुई कोई ऐसी सीख है, जिसे आपने समय रहते पहचाना? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें।

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