गुप्त दायित्व की छांव

 सुधा नाम की उस महिला की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह हाथ जोड़कर बोलीं, “दीदी, अगर आप हर महीने अपनी पेंशन का एक-एक पैसा यहाँ न भेजतीं, तो पिछले साल ही यह केंद्र बंद हो गया होता। मास्टर जी (मेरे ससुर जी) ने अपने रिटायरमेंट के पैसे से यह जमीन इस उम्मीद के साथ खरीदी थी कि यहाँ किसी गरीब का भविष्य संवरेगा। उनके जाने के बाद आपने जिस तरह इस दीये को बुझने नहीं दिया, वह कोई देवी ही कर सकती है।”

  मेरा नाम नेहा है और मेरी शादी को पूरे सात बरस बीत चुके थे। मेरे पति कुणाल एक नामी बैंक में उप-प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे, जबकि मैं घर से ही बच्चों के लिए हाथ से बने खिलौनों और सजावटी सामानों का ऑनलाइन व्यवसाय संभालती थी। हमारे परिवार में हम दोनों के अलावा कुणाल की माँ, यानी मेरी सास, सुमित्रा जी थीं। सुमित्रा जी की उम्र पैंसठ के करीब रही होगी। उनके बाल पूरी तरह चांदी जैसे सफेद हो चुके थे, लेकिन उनकी चाल-ढाल में एक अजीब सा ठहराव और गरिमा थी।

मेरे ससुर जी एक सरकारी स्कूल में प्रधानाचार्य रहे थे। उनके निधन को लगभग चार वर्ष हो चुके थे। उनके जाने के बाद सरकार की ओर से माँ जी को हर माह एक अच्छी-खासी पारिवारिक पेंशन मिलती थी। आर्थिक दृष्टिकोण से हमारे घर में किसी प्रकार का अभाव नहीं था। कुणाल का वेतन पूरे घर की गृहस्थी, राशन, बिजली-पानी के बिल और बचत के लिए पर्याप्त था। माँ जी की दवाइयों से लेकर उनके छोटे-मोटे कपड़ों और चश्मे तक का सारा खर्च कुणाल पहली तारीख को ही अलग निकालकर रख देते थे।

सुमित्रा जी का स्वभाव बिल्कुल निष्कलंक और सीधा था। न उन्हें सोने-चांदी के गहनों की कोई चाह थी, न कभी रेशमी साड़ियों की फरमाइश। सुबह सवेरे उठकर भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना करना, छत पर रखे तुलसी और चमेली के पौधों की निराई-गुड़ाई करना, दोपहर में कोई धार्मिक ग्रंथ पढ़ना और शाम को बालकनी में बैठकर शांत भाव से सड़क पर आते-जाते लोगों को देखना—यही उनकी दिनचर्या का दायरा था। कभी किसी बात पर शिकायत नहीं, कभी घर के किसी फैसले में दखलअंदाजी नहीं।

लेकिन इस सीधे-सादे जीवन के बीच एक ऐसी बात थी, जो बीते एक साल से मेरे मन में काँटे की तरह चुभ रही थी।

हर महीने की पहली तारीख को दोपहर बारह बजे तक माँ जी के बैंक खाते में पेंशन की रकम जमा होने का संदेश कुणाल के फोन पर आ जाता था। अमूमन यह रकम अट्ठाईस से तीस हजार रुपये के बीच होती थी। और ठीक उसी दिन, दोपहर का खाना समाप्त होते ही, माँ जी अपना पुराना भूरे रंग का सूती थैला उठातीं और बिना किसी को बताए चुपचाप घर से निकल जाती थीं।

शुरुआत के महीनों में मुझे लगा कि शायद वह अपने किसी पुराने पहचान वाले से मिलने जाती होंगी या मंदिर के किसी अनुष्ठान में भाग लेने जाती होंगी। लेकिन हर महीने ठीक उसी दिन, उसी समय जाना और फिर ठीक शाम छह बजे घर लौटना, कोई साधारण संयोग नहीं हो सकता था।

एक दिन जब वह अपनी चादर ओढ़कर निकलने लगीं, तो मैंने आगे बढ़कर पूछा, “माँ जी, क्या बैंक जाना है? अगर नकदी निकालनी हो तो कुणाल शाम को आते समय एटीएम से निकाल लाएंगे। आपको इस दोपहर की धूप में जाने की क्या ज़रूरत है?”

सुमित्रा जी ने अपने चश्मे के पीछे से मुझे देखा, उनके होठों पर एक हल्की, रहस्यमयी मुस्कान उभरी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “नहीं बहू, बैंक का कोई काम नहीं है। बस एक ज़रूरी काम निपटाने जाना है।”

मैंने सहजता से पूछा, “तो क्या मैं आपके साथ चलूँ? कैब बुक कर देती हूँ, आराम से चली जाइएगा।”

उन्होंने सिर हिलाते हुए बड़े प्यार से मना कर दिया, “नहीं बेटा, तू अपना काम कर। मुझे देर नहीं होगी, शाम की चाय के वक्त तक लौट आऊँगी।”

और वह चली गईं।

शाम को सवा छह बजे जब वह लौटीं, तो उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा एक गहरा, शांत सुकून था। उन्होंने अपना वह पुराना थैला हॉल के किनारे रखे गोल मेज पर रख दिया और हाथ-मुँह धोने चली गईं। मैंने चाय का कप मेज पर रखा, तो अनायास ही मेरी नजर उस थैले पर पड़ी। थैले की ज़िप खुली हुई थी। भीतर उनका पुराना चमड़े का बटुआ आधा खुला पड़ा था। कौतूहलवश मेरी निगाह उस बटुए के अंदर झांक गई। बटुआ पूरी तरह खाली था। उसमें केवल भगवान की एक छोटी सी तस्वीर और कुछ पुराने बिल के टुकड़े रखे थे।

उस रात जब कुणाल सो गए, तो मेरे मन में बेचैनी का बवंडर उठने लगा। तीस हजार रुपये कोई छोटी रकम नहीं होती। हमारे समाज में जहाँ बुजुर्ग अपनी पेंशन को बुढ़ापे का सहारा मानकर बैंक में सहेज कर रखते हैं, एफडी करवाते हैं, वहाँ माँ जी हर महीने इतनी बड़ी रकम एक ही दिन में कहाँ और क्यों उड़ा देती थीं? क्या वह किसी ढोंगी तांत्रिक के चक्कर में पड़ गई हैं? या फिर कोई ऐसा व्यक्ति है जो उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है या भावनात्मक रूप से ठग रहा है?

अगले महीने की पहली तारीख को मैंने फिर से बातचीत का सिरा पकड़ा। जब वह तैयार होकर निकलीं, तो मैंने उनके सामने चाय का प्याला रखते हुए कहा, “माँ जी, हर महीने आपकी पूरी पेंशन आ जाती है, लेकिन महीने के दूसरे दिन आपके बटुए में सौ रुपये भी नहीं दिखते। आप इतने पैसे कहाँ खर्च कर देती हैं?”

उन्होंने चाय का घूंट भरा और धीमे से बोलीं, “खर्च नहीं करती बहू, जहाँ सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, वहाँ पहुँचा देती हूँ।”

“माँ जी, हमारे घर में किसी चीज़ की कमी तो नहीं है। अगर आपको किसी चीज़ की ज़रूरत हो, या किसी को दान देना हो, तो आप हमसे खुलकर कह सकती हैं। क्या आप हमें पराया समझती हैं?” मैंने थोड़ी शिकायत भरे लहजे में कहा।

माँ जी ने मुस्कुराते हुए मेरी हथेली पर हाथ रखा, “तू तो बहुत समझदार है नेहा। कुछ कर्ज ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान जीते-जी चुका देना चाहता है ताकि जाते वक्त रूह पर कोई बोझ न रहे। वक्त आने पर सब समझ जाएगी।”

उनका यह गोल-मोल जवाब मुझे कतई संतुष्ट नहीं कर सका। उल्टा मेरे मन का संदेह और गहरा हो गया। मुझे लगा कि शायद माँ जी अपने किसी मायके वाले को चोरी-छिपे आर्थिक मदद दे रही हैं, या फिर कहीं कोई ऐसा राज़ है जिसे वह हम दोनों से छिपा रही हैं। यह बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी। क्या एक परिवार में ऐसी गोपनीयता होनी चाहिए? अगर कल को कोई कानूनी या आर्थिक उलझन खड़ी हो गई, तो जवाबदेह कौन होगा?

आखिरकार, इस रहस्य की तह तक जाने के लिए मैंने एक ऐसा कदम उठाने का निर्णय लिया जो शायद मर्यादा के खिलाफ था, लेकिन मेरी बेचैनी के आगे मर्यादा हार चुकी थी।

अगले महीने की एक तारीख को जब कैलेंडर का पन्ना पलटा, तो मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। दोपहर ठीक दो बजे, माँ जी ने अपना वही भूरा थैला उठाया, पैरों में सादी चप्पलें पहनीं और बाहर निकल गईं। उनके निकलते ही मैंने अपने चेहरे पर दुपट्टा लपेटा, कुणाल की पुरानी स्कूटी की चाबी उठाई और चुपचाप उनके पीछे चल पड़ी।

माँ जी मुख्य सड़क तक पैदल गईं और वहाँ से एक ऑटो रिक्शा में बैठ गईं। मैंने सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए अपनी स्कूटी उनके ऑटो के पीछे लगा दी। शहर के चौड़े रास्तों को पार करते हुए वह ऑटो धीरे-धीरे पुराने और संकरे इलाकों की तरफ मुड़ने लगा। यह शहर का एक बेहद साधारण, मजदूर वर्ग का इलाका था, जहाँ छोटी-छोटी दुकानें और तंग गलियाँ थीं।

करीब पैंतालीस मिनट के सफर के बाद ऑटो एक पुराने, आधे-अधूरे बने दोमंजिला मकान के सामने रुका। माँ जी ऑटो से उतरीं, किराया दिया और उस मकान के लोहे के जंग लगे गेट की तरफ बढ़ गईं। गेट के ऊपर एक साधारण सा बोर्ड टंगा था, जिस पर नीले पेंट से लिखा था—’उम्मीद बाल गृह एवं सिलाई प्रशिक्षण केंद्र’।

मैं थोड़ी दूरी पर एक नीम के पेड़ की ओट में स्कूटी खड़ी करके छिप गई। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आखिर यह जगह क्या थी? माँ जी का यहाँ क्या नाता हो सकता था?

मैं दबे पाँव उस गेट के करीब पहुँची। बाउंड्री की दीवार थोड़ी टूटी हुई थी, जहाँ से भीतर का दृश्य साफ दिखाई दे रहा था। अंदर एक बड़ा सा बरामदा था, जहाँ आठ-दस सिलाई मशीनें रखी थीं और कुछ गरीब युवतियां ध्यान लगाकर कपड़ा सीना सीख रही थीं। दूसरे कोने में एक दरी बिछी थी, जहाँ करीब पंद्रह-बीस छोटे बच्चे, जिनकी उम्र पाँच से दस वर्ष के बीच रही होगी, कॉपी-किताबें खोले बैठे थे।

जैसे ही माँ जी ने आंगन में कदम रखा, एक चालीस-पैंतालीस वर्ष की महिला, जो संभवतः उस केंद्र की संचालिका थीं, दौड़कर बाहर आईं। उनके चेहरे पर माँ जी को देखकर ऐसी श्रद्धा और आदर का भाव उभरा जैसे किसी मंदिर में देवता के दर्शन हो गए हों।

“अरे सुमित्रा दीदी! आ गईं आप? हम बस आपका ही इंतजार कर रहे थे,” उस महिला ने आगे बढ़कर माँ जी के पैर छुए।

माँ जी ने झट से उन्हें उठाया और गले लगा लिया। फिर उन्होंने अपने थैले में से लिफाफा निकाला और उस महिला के हाथों में थमा दिया।

“सुधा, यह इस महीने का राशन, बच्चों की स्टेशनरी और इन बच्चियों के सिलाई के धागे-कपड़ों का खर्च है। इसमें पिछले महीने की फीस की कमी भी पूरी हो जाएगी,” माँ जी ने बेहद सहजता से कहा।

सुधा नाम की उस महिला की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह हाथ जोड़कर बोलीं, “दीदी, अगर आप हर महीने अपनी पेंशन का एक-एक पैसा यहाँ न भेजतीं, तो पिछले साल ही यह केंद्र बंद हो गया होता। मास्टर जी (मेरे ससुर जी) ने अपने रिटायरमेंट के पैसे से यह जमीन इस उम्मीद के साथ खरीदी थी कि यहाँ किसी गरीब का भविष्य संवरेगा। उनके जाने के बाद आपने जिस तरह इस दीये को बुझने नहीं दिया, वह कोई देवी ही कर सकती है।”

माँ जी ने बड़े स्नेह से उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “सुधा, यह तो मेरा फर्ज है। मास्टर जी का शरीर भले ही चला गया हो, लेकिन उनकी सोच तो इसी आँगन में सांस ले रही है। जब तक मेरी सांसें चल रही हैं और यह पेंशन आ रही है, तब तक यहाँ किसी बच्चे की पढ़ाई नहीं रुकेगी और न ही किसी असहाय बेटी का हुनर अधूरा रहेगा। मेरे घर में तो कुणाल और नेहा सब संभाल ही लेते हैं, मुझे किस चीज़ की कमी है? असली ज़रूरत तो इन बच्चों को है।”

उसी समय चार-पाँच छोटे बच्चे दौड़ते हुए आए और “दादी जी! दादी जी!” कहकर माँ जी के पैरों से लिपट गए। माँ जी ने थैले के दूसरे हिस्से से कुछ संतरे और बिस्कुट के पैकेट निकाले और उन बच्चों में बांटने लगीं। बच्चों के चेहरों पर जो निश्छल, पवित्र मुस्कान थी, उसने उस पूरे परिवेश को किसी तीर्थ स्थल जैसा बना दिया था।

दीवार की ओट में खड़ी मैं यह सब देख रही थी। मेरे पैरों तले की ज़मीन जैसे खिसक चुकी थी। मेरी आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। मेरे मन में जो शंकाओं, तानों और अविश्वास का मैल जमा था, वह उस दृश्य की पवित्रता के आगे पूरी तरह धुल चुका था। मुझे अपने ही विचारों पर इतनी घिन आ रही थी कि मैं चाहकर भी खुद से नज़रें नहीं मिला पा रही थी।

मैं जिस औरत को खर्चीली, रहस्यमयी या किसी धोखे का शिकार समझ रही थी, वह वास्तव में दर्जनों अनाथ और गरीब बच्चों के जीवन का सहारा बनी हुई थीं। मेरे ससुर जी का वह सपना, जिसके बारे में हम कभी जान ही नहीं पाए, उसे माँ जी अपने आंचल की छांव में चुपचाप सींच रही थीं—बिना किसी दिखावे के, बिना किसी अहसान के और बिना किसी गुरूर के।

मैं चुपचाप वहाँ से पीछे हटी, अपनी स्कूटी उठाई और रोते हुए घर लौट आई। पूरे रास्ते मेरे कानों में माँ जी के वे शब्द गूंज रहे थे—’कुछ पैसे ऐसे होते हैं जिन्हें खर्च नहीं किया जाता, सही जगह पहुँचाया जाता है।’

शाम को जब छह बजे मुख्य द्वार खुला और माँ जी थके हुए कदमों से भीतर आईं, तो मैं बालकनी में नहीं, सीधे दरवाजे पर उनका इंतजार कर रही थी। उनके चेहरे पर वही अलौकिक सुकून था।

उन्होंने अपना थैला मेज पर रखा और अपनी चप्पलें उतारीं। मैं आगे बढ़ी, बिना एक शब्द बोले सीधे उनके चरणों में झुक गई और उनके दोनों पैरों को पकड़कर फूट-फूट कर रोने लगी।

माँ जी घबरा गईं। उन्होंने तुरंत मुझे कंधों से पकड़कर उठाया, “अरे नेहा! क्या हुआ बेटी? तबीयत तो ठीक है? कुणाल से कोई बात हो गई क्या? रो क्यों रही है?”

मैंने हाथ जोड़कर कहा, “माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत छोटी सोच वाली इंसान हूँ। मैंने आप पर शक किया। मैंने सोचा कि आप अपनी पेंशन किसी गलत जगह या हमसे छिपाकर खर्च कर रही हैं। आज दोपहर मैं आपके पीछे ‘उम्मीद केंद्र’ तक गई थी। मैंने अपनी आँखों से सब देख लिया।”

माँ जी स्तब्ध रह गईं। उनके चेहरे पर पहले तो संकोच का भाव आया, लेकिन फिर एक असीम वात्सल्य की लहर दौड़ गई। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मुझे अपने सीने से लगा लिया।

“पगली, इसमें रोने की क्या बात है? तू मेरी बहू है, इस घर की लक्ष्मी है। अगर तेरे मन में सवाल आया तो यह स्वाभाविक था। मैंने तुझसे और कुणाल से इसलिए छिपाया क्योंकि दान और सेवा का ढिंढोरा पीटने से उसका पुण्य खत्म हो जाता है। और फिर, मुझे डर था कि कहीं तुम दोनों यह न सोचो कि माँ इस उम्र में यह क्या झंझट पाल रही है।”

तभी दरवाजे की घंटी बजी और कुणाल दफ्तर से लौटे। हम दोनों को इस हाल में देखकर वह हैरान रह गए, “क्या बात है? आज सास-बहू के बीच इतना भावुक माहौल क्यों है?”

मैंने आगे बढ़कर कुणाल को सारी सच्चाई बयां कर दी। ससुर जी के अधूरे सपने और माँ जी के उस गुप्त तप की कहानी सुनकर कुणाल की आँखें भी भीग गईं। वह जाकर अपनी माँ के गले लग गए।

कुणाल ने रुंधे गले से कहा, “माँ, बाबूजी के जाने के बाद आपने अकेले इतना बड़ा बोझ उठाया और हमें भनक तक नहीं लगने दी? क्या हम इतने गैर थे?”

माँ जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, यह बोझ नहीं, मेरे जीने का मकसद था। जब मैं उन बच्चों की आँखों में उम्मीद देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि तुम्हारे बाबूजी मेरे पास ही खड़े मुस्कुरा रहे हैं।”

उस शाम हमारे घर की हवा पूरी तरह बदल गई थी।

मैंने माँ जी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और कहा, “माँ जी, अब से आपकी पेंशन सिर्फ अकेले आपकी नहीं रहेगी। उस केंद्र की जिम्मेदारी अब हम तीनों की होगी। हर महीने की पहली तारीख को आप अकेले नहीं जाएंगी, हम तीनों साथ चलेंगे। और सिलाई केंद्र की उन लड़कियों द्वारा बनाए गए सामान को मैं अपने ऑनलाइन स्टोर के ज़रिए बेचूँगी, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।”

सुमित्रा जी की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उन्होंने हम दोनों को अपने बाहों के घेरे में समेट लिया। उस शाम घर के हर कोने में जो शांति और आत्मीयता फैली थी, वह किसी भी सांसारिक दौलत से कहीं बढ़कर थी। रिश्तों की डोर केवल खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के त्याग और उच्च विचारों के सम्मान से मजबूत होती है।

पाठकों के लिए विचार:

क्या हमारे बड़े-बुजुर्गों का यह गुप्त त्याग आज के दिखावे भरे दौर में समाज के लिए एक आईना नहीं है? अगर आपके परिवार में भी किसी ने ऐसा निस्वार्थ काम किया हो, तो हमें नीचे कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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