माँ ने एक गहरी सांस ली और आगे कहा, “प्रियल एक ऐसे घर से आई है जहाँ उसने कभी तवे को छुआ तक नहीं था। वह चाहती तो अपनी नौकरी और आधुनिकता का हवाला देकर कह सकती थी कि खाना बनाने के लिए कोई रसोइया रख लिया जाए। लेकिन उसने यह रास्ता नहीं चुना। वह इस परिवार को अपना मानकर, अपनी हर नाकामी के बावजूद रोज़ सुबह उठकर प्रयास कर रही है ना? वह पूरी निष्ठा से सीखना चाह रही है। ऐसे में बेटा, यदि तुम्हारे पिता की तरह मैं भी उसकी कमियाँ निकालने लगूँ, उसकी गलतियों पर ताने कसने लगूँ, तो उसका मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा। उसका मन रसोई और इस परिवार दोनों से खट्टा हो जाएगा।”
हरिश्चंद्र वर्मा, जो राज्य के लेखा विभाग से वरिष्ठ अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके जीवन का हर कोना हिसाब-किताब के पन्नों की तरह सीधा, सुलझा हुआ और अनुशासन के कड़े नियमों में बंधा था। मेज पर रखी पानी की सुराही से लेकर सुबह के नाश्ते के समय तक, हर चीज़ अपनी जगह पर सटीक होनी चाहिए थी। उनके ठीक विपरीत थीं उनकी धर्मपत्नी, कस्तूरी देवी। वे सौम्यता, धैर्य और असीम वात्सल्य की मूरत थीं। घर के जिस अनुशासन से परिवार के लोग कभी-कभार सहम जाया करते थे, कस्तूरी देवी का स्नेह उसी घर को एक सुकून भरी छाँव में बदल देता था।
उनका इकलौता बेटा, समर, एक निजी सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान में सॉफ्टवेयर वास्तुकार था। समर ने अपनी पढ़ाई के दिनों की सहपाठी और लंबे समय से मित्र रही प्रियल से प्रेम विवाह किया था। प्रियल एक बेहद संपन्न और आधुनिक विचारों वाले परिवार की लाडली बेटी थी। उसने कभी रसोई के झंझटों को करीब से नहीं देखा था; उसका अधिकांश जीवन किताबों, लैपटॉप, प्रतियोगिताओं और कार्यालय के प्रेजेंटेशनों के इर्द-गिर्द बीता था। वह जब ब्याह कर ‘सुख-सदन’ में आई, तो उसने मन ही मन यह ठान लिया था कि वह केवल समर की पत्नी बनकर नहीं रहेगी, बल्कि इस पारंपरिक परिवार की आदर्श बहू बनकर दिखाएगी।
शादी के शुरुआती कुछ दिन तो रिश्तेदारों की आवाजाही और दावतों के दौर में बीत गए। लेकिन जैसे ही घर की सामान्य दिनचर्या पटरी पर लौटने लगी, प्रियल के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरी इस घर की पारंपरिक रसोई। हरिश्चंद्र जी के खाने के नियम बड़े सख्त थे। उन्हें मसालों का संतुलन, दाल का गाढ़ापन, और रोटियों का फुलाव बिल्कुल सटीक चाहिए होता था। वे भोजन के मामले में रत्ती भर भी समझौता करने को तैयार नहीं होते थे।
प्रियल सुबह जल्दी उठती, नहा-धोकर पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ रसोई की चौखट लांघती। परंतु जिस हाथ ने अब तक केवल लैपटॉप के की-बोर्ड पर उँगलियाँ चलाई थीं, उनके लिए बेलन संभालना और तवे की आँच को पहचानना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। कभी रोटियाँ गोल बनने के बजाय नक्शा बन जातीं, तो कभी तवे पर ही जलकर कड़क हो जातीं। कभी दाल में नमक ज्यादा हो जाता, तो कभी कढ़ी में हींग का छौंक सही समय पर नहीं लग पाता।
हरिश्चंद्र जी भोजन की थाली सामने आते ही अपना चश्मा नाक की नोक पर खिसकाते और हर निवाले के साथ अपनी नाखुशी जाहिर करने का कोई मौका न छोड़ते। पहले ही दिन जब प्रियल ने काँपते हाथों से दाल परोसी, तो हरिश्चंद्र जी ने एक चम्मच चखते ही चम्मच कटोरी में पटक दी। वे गंभीर स्वर में बोले, “यह दाल बनी है या उबले हुए पानी में हल्दी घोल दी गई है? समर, तुम्हारी इस पढ़ी-लिखी पत्नी को क्या इतना भी नहीं सिखाया गया कि हमारे घर में भोजन सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, संतुष्टि के लिए किया जाता है? ऐसा बेस्वाद भोजन तो गले से नीचे उतरना मुश्किल है।”
प्रियल के गाल शर्म और दुख से लाल हो गए। उसकी आँखों के कोरों में आँसू छलकने को बेताब थे, पर उसने किसी तरह खुद को संभालते हुए सिर झुका लिया। वह रसोई की ओर भागी ताकि अपनी आँखों की लाचारी किसी को दिखा न सके।
उसी मेज पर बैठी कस्तूरी देवी ने बिना किसी हिचकिचाहट के दाल का एक निवाला अपने मुँह में रखा। उन्होंने न तो कोई त्यौरी चढ़ाई और न ही कोई असंतोष प्रकट किया। उन्होंने बहुत ही शांत भाव से कहा, “हरिश्चंद्र जी, दाल पकने में थोड़ी कसर भले रह गई हो, पर खुशबू बहुत अच्छी आई है। जीरे और धनिये का संतुलन बहुत सुंदर रखा है बहू ने। पहली बार इतने बड़े पतीले में दाल बनाना कोई आसान काम नहीं होता।”
इतना कहकर कस्तूरी देवी ने पूरी कटोरी दाल प्रेम से समाप्त की। इसके बाद वे चुपचाप रसोई में गईं, जहाँ प्रियल स्लैब को पकड़े अपने आँसू पोंछ रही थी। कस्तूरी देवी ने बिना कोई उपदेश दिए, प्रियल के कंधे पर अपना ममतामयी हाथ रखा। प्रियल ने घबराकर पीछे देखा, तो कस्तूरी देवी ने एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “मेरी बच्ची, जब दाल में पानी ज्यादा लग रहा हो, तो आँच को थोड़ी देर धीमा करके उसे उबलने देना चाहिए, ताकि दाल और पानी एक रस हो जाएं। आओ, आज मैं तुम्हें बताती हूँ कि तड़के में लहसुन और हींग कब डालना चाहिए।”
कस्तूरी देवी ने प्रियल को डांटने या ताना मारने के बजाय एक माँ की तरह उसका हाथ पकड़कर उसे सही तरीका सिखाया। प्रियल का मन इस व्यवहार से कृतज्ञता से भर गया।
किंतु यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था। अगले दिन प्रियल ने भरवां करेले बनाए। हरिश्चंद्र जी ने जैसे ही एक टुकड़ा मुँह में रखा, उनका चेहरा तमतमा उठा। “कड़वा! इतना कड़वा करेला तो जानवर भी न खाएं! कस्तूरी, इसे बताओ कि करेलों को छीलकर नमक के पानी में रखा जाता है। यह क्या अनाड़ीपन है? दिन भर कंप्यूटर पर काम करने का क्या यही नतीजा है कि एक वक्त का ढंग का खाना भी नहीं मिल सकता?” हरिश्चंद्र जी ने थाली सरका दी और उठ खड़े हुए।
प्रियल का आत्मविश्वास डगमगा गया। उसे लगा कि वह कभी इस परिवार की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाएगी। लेकिन कस्तूरी देवी ने उस दिन भी थाली में रखा करेला बिना किसी शिकायत के खाया। उन्होंने पति के जाने के बाद प्रियल से कहा, “सब्जी थोड़ी कड़वी रह गई, लेकिन मसालों की खुशबू बता रही है कि तुमने मेहनत बहुत की है। अगली बार करेलों को नमक लगाकर धूप में रख देना, सारा कड़वापन निकल जाएगा। कोई बात नहीं, गिरते हैं शहसवार ही मैदाने-जंग में।”
कस्तूरी देवी का यह व्यवहार रोज़ का नियम बन गया था। जहाँ हरिश्चंद्र जी हर निवाले में कमी निकालते, वहीं कस्तूरी देवी हमेशा मौन रहकर वह भोजन बड़े आदर और प्रेम से ग्रहण करतीं और बाद में अकेले में जाकर प्रियल को समझातीं कि अगली बार इसे और बेहतर कैसे किया जा सकता है।
एक दिन रविवार की दोपहर थी। हरिश्चंद्र जी दोपहर की नींद ले रहे थे और प्रियल रसोई की सफाई में व्यस्त थी। समर काफी दिनों से इस पूरे घटनाक्रम को चुपचाप देख रहा था। उसे अपनी पत्नी के संघर्ष और पिता की लगातार की जाने वाली टोकाटाकी के बीच अपनी माँ का यह शांत और अगाध धैर्य बहुत हैरान कर रहा था।
समर अपने कमरे से निकलकर दालान में आया, जहाँ कस्तूरी देवी तुलसी के पौधे के पास बैठकर अपनी माला फेर रही थीं। समर अपनी माँ के पास जाकर फर्श पर बैठ गया और उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
समर ने अत्यंत उत्सुकता और आदर भरे स्वर में पूछा, “माँ, मैं काफी दिनों से एक बात देख रहा हूँ और आज खुद को रोक नहीं पाया। पापा हर रोज़ प्रियल के हाथ से बने खाने पर कोई न कोई कड़ी टिप्पणी करते हैं, उसकी कमियाँ गिनाते हैं, कभी-कभी तो काफी कड़वे शब्द भी कह जाते हैं। प्रियल अभी सीख रही है, उसका खाना वाकई कई बार बिगड़ जाता है। पर माँ, तुम कभी कुछ नहीं कहतीं? तुम बिना किसी शिकायत के हर अधपकी रोटी और बेस्वाद सब्जी को ऐसे खा लेती हो जैसे वह छप्पन भोग हो। और फिर चुपचाप जाकर उसे प्यार से सिखाती भी हो। आखिर क्यों माँ? तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आता?”
कस्तूरी देवी ने अपनी माला फेरना बंद किया। उन्होंने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा और उनके चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक, शांत और गंभीर मुस्कान तैर गई जो केवल जीवन के गहरे अनुभवों की भट्टी में तपकर ही आ सकती है।
कस्तूरी देवी ने बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “समर बेटा, भोजन सिर्फ चूल्हे पर चढ़ी हाँडी और मसालों का जोड़ नहीं होता। भोजन एक जीवित तपस्या है। मुझे बहुत अच्छे से पता है कि जब कोई स्त्री सुबह अपनी नींद त्यागकर, पसीने से लथपथ होकर रसोई की तपती आँच के सामने खड़ी होती है, तो वह उसमें सिर्फ अनाज नहीं डालती, बल्कि अपना पूरा परिश्रम, अपना गहरा समर्पण और अपने पूरे परिवार को खुश करने की निष्कपट लगन झोंक देती है।”
माँ ने एक गहरी सांस ली और आगे कहा, “प्रियल एक ऐसे घर से आई है जहाँ उसने कभी तवे को छुआ तक नहीं था। वह चाहती तो अपनी नौकरी और आधुनिकता का हवाला देकर कह सकती थी कि खाना बनाने के लिए कोई रसोइया रख लिया जाए। लेकिन उसने यह रास्ता नहीं चुना। वह इस परिवार को अपना मानकर, अपनी हर नाकामी के बावजूद रोज़ सुबह उठकर प्रयास कर रही है ना? वह पूरी निष्ठा से सीखना चाह रही है। ऐसे में बेटा, यदि तुम्हारे पिता की तरह मैं भी उसकी कमियाँ निकालने लगूँ, उसकी गलतियों पर ताने कसने लगूँ, तो उसका मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा। उसका मन रसोई और इस परिवार दोनों से खट्टा हो जाएगा।”
समर अपनी माँ की बातों को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। कस्तूरी देवी ने स्नेह से समझाते हुए कहा, “किसी इंसान को बेहतर बनाने के लिए उसकी गलतियों का ढिंढोरा पीटना काफी नहीं होता, मेरे बच्चे। किसी को संवारने के लिए उसे उपाय बताने होते हैं, उसका हाथ थामकर रास्ता दिखाना होता है। आलोचना करना दुनिया का सबसे आसान काम है, लेकिन हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना ही असली साधना है।”
कस्तूरी देवी की आँखें अतीत के झरोखों में झांकने लगीं। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “जब मैं नई-नई ब्याह कर इस घर में आई थी, तब मुझे भी कहाँ आता था सब कुछ? तुम्हारी दादी बहुत कड़े मिज़ाज की थीं। मेरे बनाए भोजन में रोज़ खोट निकलती थी। रोज़ ताने सुनने पड़ते थे कि कैसे माँ-बाप ने बेटी को कुछ सिखाकर नहीं भेजा। उन तानों से मेरी आत्मा तक काँप उठती थी। पर जानते हो, तब मुझे किसने संभाला था? तुम्हारे दादा जी ने। तुम्हारे दादा जी रोज़ मेज पर बैठते, तुम्हारी दादी के तानों के बीच मेरी बनाई कच्ची-पक्की रोटियों को बड़े चाव से खाते और कहते कि ‘बहू ने बड़ी लगन से बनाई है, थोड़े दिन में सब सीख जाएगी।’ तुम्हारे दादा जी के उस मौन सहयोग और संबल ने ही मुझे एक टूटी हुई बहू से इस घर की मजबूत गृहिणी बनाया था।”
कस्तूरी देवी ने समर की आँखों में देखते हुए कहा, “बेटा, आज ज़िंदगी ने मुझे उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज मेरे पास पूरा अधिकार और मौका है कि मैं अपनी सास की तरह प्रियल की बुराई करूँ, अपनी सत्ता दिखाऊँ, या फिर अपने ससुर की तरह उसका संबल और सहयोग बनूँ। और मैंने सहयोग करना चुना है। कटुता को आगे बढ़ाना बहुत आसान होता है, लेकिन उस परंपरा को प्यार से तोड़ देना ही बड़प्पन है।”
माँ ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, “वैसे भी बेटा, सोच कर देखो, एक दाना गेहूँ या एक मुट्ठी दाल हमारी थाली तक पहुँचने में कितने किसानों की धूप-बारिश की मेहनत लगी होती है, कितने व्यापारियों और मजदूरों का पसीना बहा होता है। और अंत में उस अन्न को हमारे सामने परोसने वाली उस स्त्री का समर्पण लगा होता है। ऐसे में यदि खाने में नमक थोड़ा कम या ज्यादा हो भी जाए, तो उस पर कलह करने के बजाय मैं तो परमात्मा को दोनों हाथ जोड़कर धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने हमारे भाग्य में यह अन्न लिखा और हमें भरपेट भोजन दिया। मेरे लिए ईश्वर का वह प्रसाद और उसे बनाने वाले का प्रेम ही सबसे महत्वपूर्ण होता है, बाकी कमियाँ तो बिल्कुल गौण हैं।”
माँ की यह बात केवल एक माँ का उत्तर नहीं थी, बल्कि यह जीवन जीने का वह सर्वोच्च दर्शन था जिसने पूरे घर के वातावरण को एक अव्यक्त, दिव्य सुगंध से भर दिया। समर की आँखें भर आईं। उसने झुककर अपनी माँ के चरण स्पर्श किए।
परंतु उन दोनों को यह नहीं पता था कि रसोई के दरवाजे की ओट में खड़ी प्रियल और अपने कमरे से पानी पीने निकले हरिश्चंद्र जी ने यह पूरी बातचीत अपने कानों से सुन ली थी।
प्रियल के गालों पर अश्रुधारा बह रही थी, पर ये आँसू किसी अपमान या पीड़ा के नहीं थे; ये आँसू उस असीम कृतज्ञता के थे जिसने उसके दिल की हर झिझक, हर संकोच और हर डर को एक झटके में धो दिया था। उसने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसे सास के रूप में साक्षात माँ मिल गई है।
वहीं दूसरी ओर, हरिश्चंद्र जी के कदम वहीं जम गए थे। जीवन भर नियमों, हिसाब-किताब और कठोरता की चादर ओढ़े रहने वाले उस सख्त इंसान के भीतर एक गहरा मंथन चल रहा था। उन्हें अपनी माँ का वह कठोर स्वभाव याद आ गया, और अपने स्वर्गीय पिता का वह मौन वात्सल्य भी याद आ गया। उन्हें यह अहसास हुआ कि जीवन हिसाब की बहीखाता नहीं है जहाँ हर भूल पर लाल स्याही से निशान लगाया जाए; जीवन तो एक ऐसा बाग है जहाँ कमजोर पौधों को डांटकर नहीं, बल्कि खाद और पानी देकर सींचा जाता है। उनकी आँखों में भी पश्चाताप की एक अनकही नमी तैर गई।
शाम का समय हुआ। प्रियल ने फिर से हिम्मत जुटाई। आज उसने कस्तूरी देवी के बताए अनुसार बेसन के गट्टे की सब्जी और गरमा-गरम रोटियाँ बनाई थीं।
रात के भोजन की मेज सजी। हरिश्चंद्र जी अपनी नियत कुर्सी पर आकर बैठे। प्रियल ने काँपते हाथों से उनके आगे थाली रखी। थाली में सजी कटोरी से भाप उठ रही थी। प्रियल एक तरफ सिर झुकाए सहमी सी खड़ी हो गई, उसे लग रहा था कि आज फिर कोई न कोई नुक्ताचीनी सुनने को मिलेगी।
हरिश्चंद्र जी ने कटोरी की ओर देखा। उन्होंने गट्टे का एक टुकड़ा तोड़ा, रसे में डुबोया और धीरे से मुँह में रखा। पूरा कमरा एकदम शांत था। कस्तूरी देवी और समर भी सांस रोके हरिश्चंद्र जी के चेहरे के भाव देख रहे थे।
हरिश्चंद्र जी ने पहला निवाला चबाया। उनके चेहरे की सख्त लकीरें धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगीं। उन्होंने थाली से नजर उठाकर प्रियल की ओर देखा, जो डर के मारे अपनी उँगलियाँ मरोड़ रही थी।
हरिश्चंद्र जी ने एक अत्यंत धीमी, लेकिन गहरी और स्नेहिल आवाज़ में कहा, “बहू…”
प्रियल सिहर उठी, “जी… जी पापा जी?”
“नमक थोड़ा सा कम है…” हरिश्चंद्र जी बोले।
प्रियल का दिल बैठ गया, उसने सोचा कि आज फिर सब खराब हो गया। वह तुरंत बोली, “माफ कीजिए पापा जी, मैं अभी दूसरा…”
“पूरी बात तो सुनो बहू,” हरिश्चंद्र जी ने उसे बीच में ही रोकते हुए एक ऐसी आत्मीय मुस्कान बिखेरी जो इस घर ने कई सालों से उनके चेहरे पर नहीं देखी थी। उन्होंने आगे कहा, “नमक थोड़ा कम जरूर है, पर गट्टे इतने मुलायम बने हैं और तरी का स्वाद इतना लाजवाब है कि आज मुझे अपनी माँ के हाथ के बने खाने की याद आ गई। बहुत स्वादिष्ट बना है। आज से तुम्हारे पापा जी के भोजन की जिम्मेदारी तुम्हारी ही रहेगी।”
यह सुनते ही कमरे का सन्नाटा एक जादुई खुशी में बदल गया। प्रियल की आँखें भर आईं, उसने तुरंत झुककर अपने ससुर के पैर छुए। हरिश्चंद्र जी ने अपना हाथ उसके सिर पर रखकर सच्चा आशीर्वाद दिया।
कस्तूरी देवी ने अपने पति की ओर देखा और हरिश्चंद्र जी ने अपनी पत्नी की ओर। दोनों की आँखों में एक दूसरे के प्रति एक मौन आभार था। घर की चौखट पर जो कड़वाहट और डर की छाया थी, वह हमेशा के लिए मिट चुकी थी। उस रात ‘सुख-सदन’ की रसोई से केवल भोजन की नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, समझदारी और अटूट पारिवारिक प्रेम की वह महक उठी जिसने उस घर को स्वर्ग बना दिया था।
अक्सर हम अपने घरों में कमियाँ ढूँढने को ही सुधार का एकमात्र रास्ता मान लेते हैं, जबकि किसी की मेहनत और नीयत को सराहा जाए तो बड़ी से बड़ी कमी भी अपने आप दूर हो जाती है। क्या हमारे घरों में बहुओं को एक बेटी की तरह सीखने और संवरने का वही अवसर और स्नेह मिलना चाहिए जिसकी वे हकदार हैं? इस विषय पर आपके विचार क्या हैं, हमें अपनी राय जरूर लिखकर साझा करें।
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मूल लेखिका : रेनू अग्रवाल