प्रतीक ने मेरा हाथ पकड़ लिया, “घबराओ मत… देखो सब ठीक ही होगा… वैसे जो होना होता है वो तो…”
“चुप रहो तुम… जो होना होता है… जानती हूँ मैं भी कि जो होना होता है वही होता है। तुम्हारे साथ शादी होना थी हो गयी… घरवालों को हमारा बहिष्कार करना था, कर दिया… सोम को यह बीमारी होनी थी हो गयी… तुम्हें शहर के सबसे पॉश इलाक़े में सबसे ख़ूबसूरत घर बनाना था बना लिया… सबसे महँगी कार लेनी थी ले ली… पर मैं इस ‘होने’ की दुनिया से अलग हूँ। मेरे सामने इससे भी विराट आसमान था इससे भी गहरा समुंदर… मुझे इस पिंजरे से बाहर जाने दो,” मैं चीखना चाहती थी पर न जाने कैसे मेरे होश ने मुझे संभाल लिया और मैं अपनी रीती आँखों से सिर्फ़ ज़मीन देखती रह गयी।
कभी-कभी मुझे लगता है कि यदि सपनों का अस्तित्व न होता तो आदमी को ज़िंदगी के भ्रमों को फ़ेस करने की आदत ही न पड़ती। पलंग, जिस पर सोम लेटा हुआ टी.वी. देख रहा था, के पास ही मैं सोफ़े पर बैठी थी। मेरी झपकी लग गयी थी शायद या यूँ ही आँखें मींचे कुछ सोच रही थी? आजकल तो सोचने और सपने में कोई फ़र्क़ ही नहीं लगता। सोचते-सोचते सपना देखने लगती हूँ और सपने? अजीब चीज़ होते हैं ये, पहाड़ों पर बेमक़सद दौड़ाते, कभी नदी के इस पार से उस किनारे को दिखाते तरसाते, या किसी अनजाने गाँव की सँकरी कच्ची गलियों और कभी शहर की रंग बिरंगी चकाचौंध में अपने हाथ में हाथ लिये डोलते फिरते हैं।
सपनों की इस तिलस्मी यात्रा से लौटने के बाद मैं अक्सर ख़ुद को बेहद थका और ठगा सा महसूस करती हूँ। तो क्या इस थकान से उबरने के लिए सोना ही छोड़ दूँ? ये सपने किसी के बस में आने वाले हैं, क्या कि इन्हें मुट्ठी में दबोच लूँ या चूहेदानी में कुलबुलाते चूहों की तरह छोड़ आऊँ किसी बीहड़ जंगल में? नहीं… सब फ़ालतू की बातें हैं… सच तो यह है कि मुझे सपने अक्सर डराते रहे हैं, ऐसे सपने जिनकी नींद को टूटना नहीं आता।
तुम भी तो मेरी ज़िंदगी का एक सपना ही थे प्रतीक। एक ऐसा ख़ूबसूरत सपना जिसमें सरोवर थे, फूलों भरी घाटी सायेदार दरख़्तों से भरी, एक ओर हरे-भरे पहाड़ नदियाँ खेत… बस हम दोनों… हाथ में हाथ लिये… आगे सपनों के फूलों भरे रास्ते पर चलते और पीछे उम्मीदों सी लंबी सड़क को पार करते हुए… मैं और तुम। तुम्हें याद है प्रतीक तुमने कहा था कि, “अब भी सोच लो तनु, शादी एक बंधन है इसमें न बँधने से कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह बँधकर टूटना होता है।” और मैं इस “टूटने” की वजह हम दोनों में ढूँढ़ ही नहीं पायी थी!
तुम थे ही इतने अच्छे प्रतीक! और मैं? मैं तो क्या तुम्हें दुनिया की किसी लड़की में कोई खोट दिखा ही नहीं कभी। बस चाहते थे तुम मुझे, पर तुम कभी ठीक से बता नहीं पाये कि क्यूँ चाहते हो मुझे? जब भी मैं मज़ाक़ में तुमसे यह प्रश्न करती तुम या तो “पता नहीं” कहकर टाल जाते या हम दोनों ख़ूब हँसते। तुम बिल्कुल बुद्धू हो यार… माइ इन्नोसेंट बेबी। और मैं तुमसे लिपट जाती। तुम मुझे अपनी बाँहों के घेरे में भर लेते।
तुम्हें मैंने वरण किया था अपनी मर्ज़ी से, मेरे अपनों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जो मेरे शुभचिंतक थे। दोस्त से पति बने तुम यानी प्रतीक शाह सी.ए., एक नैतिकतावादी, डायनेमिक, हैंडसम पर्सनैलिटी थे। उस वक़्त दुनिया की सबसे ख़ुशनसीब लड़की थी मैं और उसके बाद जब सोमित्र यानी सोम पैदा हुआ तब तो… लग रहा था कि अब ईश्वर ने सब दे दिया। कुछ नहीं चाहिए। हम दोनों ने जल्द ही अपना अलग एक शानदार फ़्लैट ख़रीद लिया था। अब हमें किसी अपने की न मोहताज़ी थी न ज़रूरत।
हर व्यक्ति के सपने का एक रंग होता है… शोहरत का, धन संपत्ति का या संतानों के उज्ज्वल भविष्य का। मेरे सपने बहुरंगी थे जैसे किसी अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति के होते हैं, पर ये मैंने कभी बताया नहीं, ना ही तुमने पूछा। यूँ भी तुमने कहा था, “नौकरी की तुम्हें क्या ज़रूरत है, नौकरी तो वो लेडीज़ करती हैं जिन्हें पैसे की ज़रूरत होती है या घर से बाहर निकलने का बहाना चाहिए। तुम्हें ना पैसे की ज़रूरत है ना ऐसे बहाने खोजने की। जब जहाँ जाना हो जाओ। स्वयंसेवी संस्था ज्वाइन कर लो, किसी लेडीज़ क्लब या लेखक संघ की सदस्या बन जाओ।”
मुझे इस घर में किसी चीज़ की ना मनाही थी ना टोका टाकी… जो खाऊँ, जो पहनूँ जैसे चाहूँ रहूँ। हाँ, पर कभी-कभी मुझे स्कूल का एक प्रकरण याद आता था, स्कूल में एक निबंध लिखने को दिया गया था — शायद आठवीं, नवीं क्लास में पूछा गया था, “जीवन में क्या बनना चाहते हो?” मुझे बहुत देर तक लगता रहा था कि इस टॉपिक में “क्या” दो बार होना चाहिए था।
देखो, फिर सोचने लगी… अतीत की नदी में उतरने के लिए बस एक नाव चाहिए मुझे तो।
फ़िलहाल… एक पत्रिका मेरी गोद में खुली रखी है पढ़े जाने का इंतज़ार करती हुई और मैं बिलास आँखें मींचे पड़ी हूँ… डॉक्टर कहते हैं तुम्हें “इन्स्योमीनिया” यानी नींद न आने की बीमारी हो गयी है। पर मैं कहती हूँ नहीं… मैं सोचने ज़्यादा लगी हूँ…
“मामा, पानी” सोम ने आँखें मींचे ही कहा।
मैंने उठकर सोम को पानी दिया, शायद विचारों की अर्ध होशी में पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया था। जब-जब सोम के पास आती हूँ कोई तारा सा टूटता लगता है मन के आकाश का, वही तारा जो पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा चमकीला था। मैंने सोम की कुनमुनाहट सुनी और पानी का गिलास उसके ऊपर गिर गया। अचानक मैं तंद्रा से जैसे जागी।
“मम्मी… मेरे हाथ ग्लास नहीं पकड़ पाते ना?” उसने निरीहता से कहा।
मैं जैसे आकाश से गिरी धम्म से, ख़ुद पर बेहद कोफ़्त हुई कि मैं क्यूँ भूल जाती हूँ बार-बार कि सोम की उँगलियाँ इतनी टेढ़ी हो गयी हैं कि वह कोई चीज़ पकड़ नहीं पाता।
“सॉरी बेटा… मैंने कातर दृष्टि से उसे देखा वह उदास और दुखी लगा।”
“इट्स ऑल राइट मामा।” उसने कहा, “देखो तुम्हें ही दिक्कत हो गयी ना अब साफ़ करना पड़ रहा है सब,” उसने मुझ पर तरस खाते हुए कहा।
जब हाथ पैर अशक्त करने थे तो क्यूँ बनाया इसे इतना सहृदय और समझदार?
मैंने ऊपर की ओर देखा जैसे कोई अदृश्य शक्ति सचमुच ही मेरी शिकायत सुनने बैठी है और वो जादुई छड़ी घुमायेगी और सोम… मेरा प्यारा बेटा फिर से पहले जैसा हो जायेगा। जैसे बचपन में दादी “करवा चौथ” की कहानी माँ को सुनाती थीं कि “जैसे ही उसने व्रत करना शुरू किया उसके शरीर का कोढ़ ठीक होता गया और वह बिल्कुल स्वस्थ हो गयी।” मैंने उसके कपड़े बदले और उसे अपने हाथों से पानी पिलाकर लिटा दिया।
सोम फिर टकटकी लगाये छत की ओर देखने लगा जैसे कि अब वो प्रायः करता है, मैंने उसे रोका भी नहीं हालाँकि पहले मैं उसे इस तरह देखकर उसका मन बहलाने के उपक्रम करती थी। उसे कहानी सुनाती, कभी लोरी, कभी कोई घटना… पर अब मैं कुछ नहीं करती। देखने देती हूँ उसे यूँ ही टकटकी बाँधे छत की ओर। बस अपनी नज़रें हटा लेती हूँ वहाँ से और किसी काम में व्यस्त हो जाती हूँ।
कभी-कभी ज़िंदगी मन भर का पत्थर बन जाती है जो उम्र के सीने पर रखी रहती है चट्टान की तरह और हम लाख चाहने पर भी हिलने-डुलने लायक़ भी शेष नहीं बचते। आदमी को ख़ुद की नज़रों में निरीह कर देना ईश्वर प्रदत्त सबसे क्रूरतम कठोरता है।
कितने संतुष्ट और संपन्न थे हम तीनों एक दूसरे से और ख़ुद से। सोम यानी सोमित्र कुमार, मेरा और प्रतीक का बेटा… कितना प्यारा गोल-मटोल था वो सात वर्ष तक! हड्डियों की इस भयानक बीमारी से पहले सामान्य बच्चों से भी अधिक होशियार और स्वस्थ। अचानक उसके हाथ पैर मुड़ने शुरू हो गये थे। जब डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने इसे एक ‘रेयर बीमारी’ बताया था।
अस्पतालों से लेकर प्राइवेट डॉक्टरों और चिकित्सा की किताबें छान मारने से लेकर पैथियों को खोजने तक सब आज़माने के बाद अंततः मैंने अपने अतीत में देखे गये सारे सपनों में गिरह बाँध दी थी। सोम की बीमारी के सामने हम दोनों विवश थे। क्या-क्या उपाय नहीं किये हमने झाड़-फूँक से लेकर फ़िज़ियोथेरेपी तक जिसने जो कहा, फिर धीरे-धीरे मन को काबू करने की कला सीखते हुए सोम को गोद में लेकर चलना शुरू किया और फिर बहुत भारी मन से उसके लिए एक व्हील चेयर ला दी गयी।
अब वह बिल्कुल पराश्रित है। यह वही बेटा है जिसके पैदा होने से सात वर्ष तक मैंने हर माँ की तरह उसके इंजीनियर या डॉक्टर, उसकी शादी और फिर उन दोनों की छत्र-छाया में हम दोनों के बुढ़ापा काट देने का सपना संजो लिया था। अजीब है यह एहसास भी कि गोद का शिशु माँ को उसके बुढ़ापे तक के लिए आश्वस्त कर देता है और माँ की आँखों में सपने चहलक़दमी करने लगते हैं।
जीवन ने अचानक एक ज़बरदस्त तब्दीली का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। प्रतीक घर के उत्तरदायित्व भूल जाने की हद तक नौकरी के प्रति जुनूनी हो गये थे। सौ वे रात देर से आते। उस वक़्त उनके सामने अपने दुख दर्द लेकर बैठना मुझे औचित्यहीन लगता था। घर में रहकर हर वक़्त सोम के अतीत को याद करना और भविष्य की चिंता में डूब जाना बस इतना ही अर्थ रह गया था मेरे लिए दिन रात का। पूरा दिन मेरे लिए एक थका देने वाली पहाड़ की चढ़ाई होती थी जैसे, जिसे रात की कुछ घंटों की नींद में ही ठौर मिलता था।
एक दिन लेकिन चमत्कार हो गया, एक सपना कहीं से उड़ता हुआ आया, मेरी खुली पलक की जंगल पर बैठ गया। अचानक मेरे सामने इच्छाओं का एक विशाल समंदर लहलहाने लगा, किनारों पर उम्मीदों की रेत के कण चमकने लगे, मैंने करवट बदली… मैंने महसूस किया कि मैं सचमुच ज़िंदा हूँ।
हुआ यूँ कि उस दिन जब सोम आँखें मींचे पड़ा हुआ था पलंग पर और मैं उसके पास सोफ़े पर बैठी थी। कुछ सन्नाटे जो मुझसे लिपटे रहते थे वो मुझे घेरे ऊँघ रहे थे। मैं ऊब की गहरी खाई में बैठी कोई पत्रिका उलट-पुलट रही थी। एक कहानी पढ़ी। लेखक का नाम-पता कहानी के नीचे ही दिया गया था। यूँ ही उसे फ़ोन लगा दिया।
“क्या मैं संभव श्रीवास्तव से बात कर सकती हूँ?” मैंने कहा।
“जी हाँ संभव श्रीवास्तव ही बोल रहा हूँ।” मैं कुछ देर चुप रही।
“मैं तान्या बोल रही हूँ, आपकी कहानी पढ़ी, अच्छी लगी।” मैंने तत्परता से कहा।
“धन्यवाद जी, इस प्रोत्साहन के लिए।” लेखक ने उत्साहित होकर कहा, “पूछ सकता हूँ कि कहाँ से बोल रही हैं आप?”
“जी मेरठ से”, मैंने कहा।
“अच्छा अच्छा… मैं देहली से।”
“जी हाँ पढ़ा अभी…” कुछ औपचारिक बातचीत के बाद मैंने शुक्रिया कहकर फ़ोन ऑफ़ कर दिया।
ना जाने क्यूँ मुझे बातचीत के इस छोटे से टुकड़े के दौरान लगा जैसे मैंने अरसे बाद किसी गहरी अँधेरी खोह से निकल कर बाहर की रोशन दुनिया देखी है, एक ऐसी दुनिया जिसका सोम की बीमारी और मेरे अतीत से जुड़ी किसी ‘कठोर देने’ वाली घटना से अलग भी कोई वजूद है। कुछ जुगनुओं को अपने साथ ले गयी हूँ फिर उसी अँधेरी खोह में मुट्ठी में भींचे।
“मामा, मुझे बाहर जाना है,” सोम ने निरीह नज़रों से देखा। मैंने उसे व्हील चेयर पर बिठाया और लॉन में ले गयी। बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। सोम के चेहरे पर मुस्कुराहट की एक रोशनी कौंधी और बुझ गयी।
“बेटा, पापा आने वाले हैं। तुम यहाँ बैठकर यह देखो मैं सैलेड बना आऊँ?” मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
सोम ने हाँ में सर हिलाया और फिर खेल देखने में मस्त हो गया। मैं भीतर चली गयी।
अचानक सोम की ज़ोर से चीखने की आवाज़ से मैं भीतर से दौड़ी आयी। देखा, सोम कुर्सी के नीचे औंधा पड़ा रो रहा था, एक छोटा बच्चा एक पतंग लिये खड़ा है, डरा हुआ सा। पतंग जो कहीं से कटकर आयी थी।
“आंटी मैंने तो…” बच्चा रुआँसा होकर अपराधी भाव से बोला।
“डोंट वरी,” मैंने उसके गाल पर हाथ फेरते हुए कहा।
“यह पतंग तुम ले जाओ…” मैंने उसे पतंग देते हुए कहा।
“नहीं भैया को दे दो”… कहकर वो बच्चा पतंग सोम की गोद में रखकर चला गया।
बच्चा क्या जाने कि उसने पतंग को वहाँ छोड़कर एक विशाल ख़ूबसूरत आसमान उतार दिया है सोम के सपनों की बंजर धरती पर। सोम लगातार रो रहा था, मैंने डॉक्टर सनानी को फ़ोन किया। वही सोम का इलाज कर रहे थे और प्रतीक के अच्छे मित्र भी थे। हॉस्पिटल से घर जाते हुए वह सोम को देखने आये।
उन्होंने कहा, “आपको इसे अकेले छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। इतने दिन की मेहनत और इलाज सब बेकार हो गया।” वे कुछ नाराज़ हुए और “कल इसे हॉस्पिटल लाना पड़ेगा।” कहकर डॉक्टर सनानी चले गये।
प्रतीक जब घर लौटे और जब उन्हें पता चला तो उन्होंने मुझे उलाहना देते हुए कहा, “मैं तुम पर भरोसा करके बच्चे को तुम्हारे पास छोड़ जाता हूँ, और तुम? यार कैसी माँ हो तुम?”
…प्रतीक सोम के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले।
जैसे सोम केवल उनका बेटा है और मैं उसकी लापरवाह केयर टेकर। मेरे मलालों में एक अहसास अब यह भी शामिल हो रहा था कि सोम जैसे-जैसे पराश्रित होता जा रहा था प्रतीक कुछ ज़्यादा ही घर से बाहर रहने लगे थे। बात-बात में चिड़चिड़ाते।
मैं पूरे दिन उदास रही। मुझे लग रहा था जैसे किसी बीहड़ द्वीप पर बिल्कुल अकेली निस्पंद खड़ी हूँ। ख़ुश्क हवाओं के बीच। घबराहट होने लगी… अचानक मेरी उँगलियाँ मोबाइल के नंबर पर फिसलने लगीं।
मैंने कुछ अंकों को दबाया… वहाँ से “हैलो” एक आवाज़ उभरी।
“संभव हैं?” मैंने यूँ ही पूछ लिया और पूछने के बाद मुझे अहसास हुआ कि यह एक नितांत मूर्खतापूर्ण प्रश्न था — “हाँ हाँ! अरे तान्या तुम?”
उधर से संभव की आवाज़ आयी। वही आत्मीयता और सुकून से भरी।
“बस यूँ ही, बहुत काम था तो थोड़ा फ़्री हुई थी अभी, सोचा आपको फ़ोन लगा लूँ?” मैंने बिना कुछ सोचे समझे कहा।
“अच्छा किया… मैं भी अभी ही आया हूँ। बस चाय बनाकर बालकनी में लाया और यहाँ खड़ा होकर चाय पी रहा हूँ। तुम कैसी हो?”
संभव आप से तुम पर आ गया था।
कुछ देर मैं खड़ी रही किंकर्तव्यविमूढ़ सी। कैसे बताऊँ तुम्हें प्रतीक कि बात सोम को डॉक्टर के यहाँ ले जाने की नहीं बल्कि सोम का निरीह चेहरा न देख पाने की है। तुमने तो हज़ार बहाने खोज लिये हैं सोम से आँखें न मिला पाने के, पर मैं? सोम, जो मुझे हर बार ही अपने बचपन में ले जाता है। जब वह हँसता खेलता, गोल मटोल बच्चा था। स्कूल जाता था बस में, खिड़की पर बैठ मुझे बाय करता था, खिलौनों की ज़िद करता था… अब? अब वह ख़ुद जानता है, सब समझता है सबकी तकलीफ़… कोई ज़िद नहीं करता, न नाराज़ होता किसी बात पर। बस पलंग पर लेटा छत को देखता रहता है। न जाने क्या सोचता हुआ और मैं उसे देखते हुए देखती रहती हूँ अपनी उन आँखों से जिन्होंने आँखों को दिल का रास्ता दिखा दिया है।
ड्राइवर ने कार दरवाज़े पर लगा दी थी। सोम रोये जा रहा था। ज़िद कर रहा था अस्पताल न जाने की। वह डरने लगा था अस्पताल जाने से। अस्पताल में घुसते ही डरते हुए इधर-उधर देखने लगता। डॉक्टर, नर्सों को देख वह मुझसे चिपक जाता और उनकी तरफ़ से मुँह फेर लेता। उसे जबरन ले जाया जाता तो वो सुबकने लगता।
अब हम दिल्ली में थे, अस्पताल आ गया था। डॉक्टर ने चेक करके कहा कि संभवतः भीतरी रक्त रिसाव होने लगा है। इस डीजीज़ में हड्डियाँ बहुत कमज़ोर हो जाती हैं। हो सकता है कोई फ्रैक्चर हो! इसलिए थोड़े चेक-अप के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। एक ऑपरेशन भी करना पड़ सकता है। ऑपरेशन मेजर है, पर डरने की बात नहीं।
प्राइवेट रूम में शिफ्ट होने के बाद मैंने प्रतीक को फ़ोन पर सोम के भर्ती कर लिये जाने की सूचना दी।
प्रतीक ने निर्भीकता से कहा, “कोई बात नहीं… तुम देखो उसे… ए.टी.एम. कार्ड तो है ना तुम्हारे पास… अस्पताल के बगल में ही ए.टी.एम. है, जितने पैसों की ज़रूरत हो निकाल लेना। मैं रात में आऊँगा।”
आधी रात थी। मैं और सोम अस्पताल के चौथे मंज़िल के प्राइवेट रूम में थे। उसे फ्रैक्चर नहीं हुआ था पर ऑपरेशन होना था। प्रतीक का न कोई फ़ोन आया था न वे ख़ुद आये। मेरा भी मन नहीं हुआ फ़ोन करने का। कोई लाभ भी नहीं था, जानती थी कि ऑफिस की ज़िम्मेदारियों में घर भूल जाना उनके स्वभाव का एक हिस्सा है।
अस्पताल रोशनी से नहाया हुआ था, दवाइयों की गंध फैली हुई थी रोशनी की तरह। नर्सों की आवाजाही और बगल के किचन जिसमें मरीज़ों का खाना बनता था, में से बर्तनों की खड़खड़ाहट अब भी आ रही थी। पर ना जाने क्यों फिर भी यहाँ दमघोंटू सन्नाटे ही पसरे रहते हैं या महसूस होते हैं। सोम की आँखें फिर छत पर टंग गयी थीं और मैं फिर निराशा से भर गयी। मैं सोम की बग़ल में लेट गयी और हौले-हौले उसका माथा सहलाने लगी।
“मामा वो ही राजकुमारी वाली कहानी सुनाओ ना, जिसकी जान तोते में थी।” सोम ने कहा।
मैं कहानी सुनाने लगी। मैंने हँसकर कहा, “राजकुमारी की जान तोते में बसती थी, पता है राजकुमारी का नाम क्या था?”
सोम मेरी तरफ़ जिज्ञासा भरी नज़रों से देखने लगा। मैंने कहा, “राजकुमारी का नाम था मम्मी, वो मेरा वाक्य पूरा करते हुए बोला, ‘और तोते का नाम सोम।’” वह और मैं हँसने लगे। मैंने हँसकर उसको सीने से चिपका लिया।
…अपने मन की उथल-पुथल को मैंने अपने विवेक से कसकर जकड़ रखा था। थोड़ी देर में कहानी पूरी होने से पहले ही सोम गहरी नींद में सो चुका था। मैं उठ गयी।
रात गहरा रही थी। मेरा सर दर्द से फट रहा था। “ऑपरेशन मेजर है… लेकिन घबराने की बात नहीं।” डॉक्टर के शब्द गूँज रहे थे मेरे कानों में। मेरे भीतर एक तूफ़ान उठने लगा था, उथल-पुथल मची हुई थी और मैं इस बात को महसूस कर रही थी कि भीतर के तूफ़ान को थामे ‘बाहर’ से शांत बने रहना कितना कठिन और बोझिल होता है।
…शायद मैं चीखने लगूँ या मेरे मस्तिष्क की तड़कती नसें फट जायें… मैं देर तक सोचती रही कि इस वक़्त किस ‘अपने’ से बात करूँ जो मेरे मन के हाहाकार से मुझे कुछ पलों को निजात दिला सके, और दूर-दूर तक सोचने के बाद अंततः इसी निर्णय पर पहुँची कि, “कोई नहीं है, ऐसे आधी रात में फ़ोन?… सब भीतर ही भीतर गलियाँ देंगे मुझे कि आधी रात में फ़ोन करने की क्या ज़रूरत थी, और बाहर से, उन्हीं से कुछ सांत्वना में पगे शब्द बोल दे… नहीं… नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकती। वैसे भी सब ‘बाहर’ ही तो रहते हैं! एक बार प्रतीक को? मैं सिहर गयी भीतर ही भीतर। प्रतीक का क्रोध से भरा चेहरा और फटकार… नहीं फिर नहीं…”
मैं उठ बैठी। बेचैनी बुरी तरह घेरने लगी मुझे। मैं कमरे से बाहर निकल आयी। मेरे माथे पर पसीने की बूँदें छलछला आयी थीं। कॉरिडोर सुनसान था जब मैं अस्पताल के उस प्राइवेट रूम से बाहर निकली सिवाय उस दुबली-पतली साउथ इंडियन नर्स के जो हाथ में ब्लड प्रेशर का इंस्ट्रूमेंट लेकर किसी मरीज़ के कमरे में जा रही थी। मैं नर्सों के कमरे के बाहर बिछी काली पत्ती हुई लोहे की कुर्सी पर बैठ गयी जो विजिटर्स रूम का एक हिस्सा था। कभी-कभी हमारे सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है और हमारी इंद्रियाँ हावी हो जाती हैं हमारी सोच पर। हम वह कर बैठते हैं जो सोचे समझे हमें नहीं करना चाहिए।
मेरी उँगलियाँ फिर होशोहवास खो मोबाइल पर फिसलने लगी थीं।
“हैलो”…
“अरे तान्या तुम?… इतनी रात गये?… सोयी नहीं?” संभव की आवाज़ थी।
“जी नींद नहीं आ रही थी सिर दर्द था…”
“अच्छा किया… मैं भी अभी लिख ही रहा था कुछ… दिन में तो समय मिलता नहीं… वैसे भी मुझे रात सुकून भरी लगती हैं इसलिए रात में ही लिखाई-पढ़ाई होती है।” संभव ने कहा, वह बहुत नॉर्मल लग रहा था। न आश्चर्य, न बेचैनी, और न कोई उत्सुकता।
“सिर दर्द की कोई दवा ली तुमने?” संभव ने बहुत आत्मीयता से पूछा।
“नहीं…”
“अरे क्यूँ? घर में दवा नहीं है?”
मैंने फिर बिना सोचे समझे त्वरित उत्तर दिया… “जी हाँ दवा नहीं है।”
“फिर?” वो कुछ देर चुप रहा फिर बोला, “लेट जाओ सोने की कोशिश करो।”
“लेटकर तो घबराहट होती है।” मैंने बच्चों जैसे कहा।
“नहीं-नहीं लेट जाओ।” …उसके स्वर में फ़िक्र और अधिकार दोनों थे।
मैं सोफ़े पर लेट गयी। “अब सोने की कोशिश करो,” उसने कहा।
लेटकर न जाने क्यूँ मुझे लगा कि मेरे सिर पर हल्के-हल्के कोई हाथ फेर रहा है। उसके बाद एक शून्य…
“मामा हम हॉस्पिटल से कब जायेंगे घर?” मैं चौंक कर उठ गयी, सोफ़े पर बैठ गयी। चिड़ियों की चहचहाहट और बाहर पदचाप की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं… सुबह हो चुकी थी। मुझे कुछ वक़्त लगा यह स्वीकारने या महसूस करने में कि मैं अस्पताल में हूँ… यानी पिछला सफ़र एक गहरी नींद के शहर में था। ताज़गी और उत्पुल्लता के चिह्न मेरे चेहरे पर उग आये थे। याद नहीं कि कितने दिनों, बल्कि महीनों के बाद मैं इतनी गहरी नींद सोयी थी। मैंने सोम को प्यार किया, उसके गाल पर चुम्मी ली, “बस बेटा जल्दी ही।” अचानक याद आया आज तो सोम का ऑपरेशन है?… मैं फिर बुझ गयी। मेरे चेहरे पर वही पहले वाली कालिमा पुत गयी… हड़बड़ाकर एक बार प्रतीक को फिर फ़ोन लगाया।
“हाँ बोलो तान्या”, प्रतीक ने कहा।
“रात तीन बजे फ़्री हुआ मीटिंग से। आज मैंने उन्हें बोल दिया कि मैं नहीं आ पाऊँगा… बस अभी फ्रेश होकर आता हूँ?”
कुछ राहत की साँस ली मैंने।
प्रतीक आ चुके थे, ऑपरेशन ज़रूरी था आज ही। प्रतीक निश्चिंत थे और दौड़-दौड़ कर सभी औपचारिकताएँ पूरी कर रहे थे अस्पताल की। मैं चुपचाप बैठी थी सोम के सिरहाने।
“मामा फिर क्या हुआ उस राजकुमारी का? जिसकी जान तोते में थी?… मैं तो सो ही गया था जब आप कहानी सुना रही थीं।” …सोम हँसकर बोला। वह अस्पताल में होते हुए भी अस्पताल का होना भूल गया था जिससे वह सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ खाता है। कल का रोना भूल वह हँस रहा था। शायद मेरा निकट होना उसे सुकून देता है, काश मैं भी उस सुकून को महसूस कर पाती… आज सोम का ऑपरेशन है उसे यह नहीं पता। वह तो ऑपरेशन का मतलब भी नहीं जानता। मैं क्यूँ नहीं हूँ सोम जैसी, क्यूँ जानती हूँ हर चीज़ का मतलब? और क्यूँ नहीं हूँ इतनी ‘मज़बूत’ प्रतीक की तरह जो ‘जो होना होगा… होगा… हमारे हाथ में कुछ भी नहीं।’ के दर्शन के साथ निश्चिंत ज़िंदगी जीते हैं?
सोम को स्ट्रेचर पर ऑपरेशन रूम तक ले जाया जा रहा था। आज उसने कुछ नहीं खाया था डॉक्टरों ने मना किया था। मुझे याद आया मैंने भी तो कुछ नहीं खाया कब से? मुझे तो यह भी याद नहीं। बस कल जब कमज़ोरी बहुत लग रही थी, तब एक सेब और मोनैको के दो बिस्किट भर खाये थे और जब मैं खा क्या बस निगल रही थी पेन उसी वक़्त कानपुर से प्रतीक के बड़े भाईसाहब का फ़ोन आया था।
“प्रतीक ने बताया सोम के अस्पताल में भर्ती होने की ख़बर… बहुत बुरा लगा। बहू ध्यान रखना उसका… अभी बच्चों की परीक्षा का समय है तो आ तो नहीं पायेंगे… लेकिन ज़रूरी हो तो बुलाने में भी संकोच मत करना… पैसों की ज़रूरत हो तो बताओ जितने भी चाहिए… आख़िर घरवाले ही तो काम आते हैं ना ऐसे वक़्त…”
“नहीं भैया ज़रूरत नहीं है अभी… प्रतीक हैं ना… ज़रूरत होगी तो ज़रूर कहेंगे।” मैंने फ़ोन रख दिया।
…ज़रूरत?… अकेलापन सहसा और गहरा गया।
नर्स एक फ़ॉर्म लेकर आयी थी।
“इसे पढ़ लीजिए मैडम और साइन कर दीजिए।”
मेरे हाथ काँप रहे थे। फ़ॉर्म में लिखा एक-एक शब्द मुझे डरा रहा था। मैंने बिना उसे पूरा पढ़े जल्दी से साइन कर दिये और नर्स वह फ़ॉर्म ले गयी।
स्ट्रेचर पर सोम को ऑपरेशन थियेटर तक ले जाया जा रहा था। थियेटर के सामने पहुँचकर सोम रो रहा था चीख-चीख कर। क्या यह वही सोम है जिसे सबके सामने रोने में हमेशा शर्म आती थी और जो छिपकर दरवाज़े या मेरे दुपट्टे की आड़ में रोता था। कहता था, “मामा रोते में मेरा फ़ेस बहुत हॉरीबल दिखता है।” अब मेरी तरह उसकी दुनिया भी ढह धरती से परे होती जा रही थी?
“मामा तुम भी चलो ना अंदर!” उसने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया था। मुझे लग रहा था मेरे मुँह के अंदर ज़ुबान ही नहीं है, या मैं भाषा ही भूल चुकी हूँ।
प्रतीक ने उसका हाथ छुड़ाते हुए कहा, “बेटा तुम अंदर जाओ मामा अभी आती है…” और कुछ लोग उसे ऑपरेशन थियेटर के भीतर ले गये थे। कुछ ही देर में ऑपरेशन थियेटर के दरवाज़े के ऊपर लगी ग्रीन लाइट जल गयी थी। मैं वापस आकर धम्म से बाहर पड़ी बेंच पर बैठ गयी।
प्रतीक ने मेरा हाथ पकड़ लिया, “घबराओ मत… देखो सब ठीक ही होगा… वैसे जो होना होता है वो तो…”
“चुप रहो तुम… जो होना होता है… जानती हूँ मैं भी कि जो होना होता है वही होता है। तुम्हारे साथ शादी होना थी हो गयी… घरवालों को हमारा बहिष्कार करना था, कर दिया… सोम को यह बीमारी होनी थी हो गयी… तुम्हें शहर के सबसे पॉश इलाक़े में सबसे ख़ूबसूरत घर बनाना था बना लिया… सबसे महँगी कार लेनी थी ले ली… पर मैं इस ‘होने’ की दुनिया से अलग हूँ। मेरे सामने इससे भी विराट आसमान था इससे भी गहरा समुंदर… मुझे इस पिंजरे से बाहर जाने दो,” मैं चीखना चाहती थी पर न जाने कैसे मेरे होश ने मुझे संभाल लिया और मैं अपनी रीती आँखों से सिर्फ़ ज़मीन देखती रह गयी।
ऑपरेशन थियेटर के बाहर बैठना निषेध था इसलिए मैं और प्रतीक वापस प्राइवेट रूम में आ गये। तभी एक नर्स दौड़ी हुई आयी… “सर ख़ून की ज़रूरत पड़ सकती है, मैडम का तो उस दिन टेस्ट किया था मैच करता। आप अपना करवाइए या कोई इंतज़ाम… क्योंकि अभी यहाँ ‘ओ’ पॉज़िटिव कम एवलेबल है। एहतियात के लिए कुछ स्टोर करना ज़रूरी है।” कहकर वह चली गयी। प्रतीक उसके पीछे-पीछे चले गये।
सन्नाटे कुछ इस क़दर घनीभूत हो रहे थे मेरे चारों ओर कि कान सुन्न से पड़ गये थे। कुछ सूझ ही नहीं रहा था क्या करूँ? मेडिकल साइंस ने इतनी तरक़्क़ी कर ली पर वह अभी तक ऐसी कोई दवा क्यूँ नहीं ईजाद कर पाया कि आदमी अपना अतीत, दुख, चिंताएँ सब भुला दे… हमेशा के लिए! बेचैनी और उदासी उन सन्नाटों के साथ मिलकर मुझे बुरी तरह झकझोरने लगी।
मैं प्राइवेट रूम की खिड़की की सीखचे कसकर पकड़े हुए खड़ी थी जैसे बस अभी गश खाकर गिरने ही वाली हूँ। मोबाइल की घंटी बज रही थी। प्रतीक का फ़ोन था।
“मैं ब्लड के लिए कुछ इंतज़ाम कर रहा हूँ तुम रेस्ट कर लेना कल से सोयी नहीं होगी।”
“कल से?” मैं हँस दी एक फीकी सी हँसी। और क्या कहा तुमने प्रतीक रेस्ट? क्या इतनी बेफ़िक्री और तटस्थता हो सकती है मनुष्य के इस जीवन में? मैं सोचने लगी। इस वक़्त दुनिया में सबसे ज़्यादा अज़ीज़ मेरे बेटे सोम का ऑपरेशन चल रहा है और मैं रेस्ट? तुम जानते हो प्रतीक कितनी रातें मैंने आँखों में काटी हैं बैठे-बैठे? प्रतीक पर गुस्सा नहीं बल्कि कभी-कभी रश्क होता है… स्मृति में सोम की निरीह आँखें मेरे सामने झपझपाने लगीं।
कमरे में घुटन होने लगी थी। खिड़की के बाहर दुनिया के कारोबार चल रहे थे और खिड़की के भीतर एक घना सन्नाटा पसरा हुआ था दीवारों से टकराता हुआ। मेरा मन मानो एक आँधी हो गया था, बवंडर की तरह घूम रहा था दीवारों के बीच टकराता हुआ। मैं फिर अपने होशोहवास खोने लगी। मोबाइल पर वही एक नंबर जो हमेशा मैं एक बेहोशी में डायल करती थी।
“हल्लो तान्या… तुम्हें ही याद कर रहा था मैं।” संभव की ख़ूब उत्साह से भरी आवाज़ सुनायी दी।
“अरे क्यूँ?” मैंने अपने भाव छिपाने की कोशिश करते हुए कहा।
“अरे आज एक किताब पूरी की हेमिंग्वे की, ‘एक्रॉस द रिवर एंड इन्टू द ट्रीज’ सोचा तुम्हें भी पढ़ने के लिए दूँगा। इस पुस्तक में उसने अपनी भावी मृत्यु की कल्पना की है। इट्स फैंटास्टिक यार…”
“ओह मृत्यु?” मेरे मुँह से अचानक निकला।
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “क्यूँ मृत्यु दुख का विषय है? तुम अवसादित होती हो इससे?” स्ट्रेंज… मुझे तो लगता है कि मृत्यु एक ऐसी स्लेट है जिस पर हम अपना अतीत पोंछकर एक नये ताज़ातरीन अध्याय की शुरुआत करते हैं। मेरे लिए तो यह एक बेहद रोमांचकारी विषय है… एक उत्सव की तरह, यू नो अ फ़ेस्टिवल ऑफ़ डेथ… एकरसता और पीड़ाएँ थका नहीं देतीं हमें?”
“दुनिया के सारे पुरुष एक जैसे होते हैं…” मैंने मन ही मन कहा।
अस्पताल के बाहर इतनी सामान्य दुनिया का अस्तित्व भी है कोई। यह तो मैं भूल ही गयी थी।
“जी, ज़रूर पढ़ूँगी।” मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। “संभव… मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।”
अचानक मेरे इस वाक्य पर वो थोड़ा सहम सा गया। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने पूछा, “मतलब?”
“बहुत अकेली हूँ… घबराहट बहुत हो रही है… लग रहा है कोई तूफ़ान आने वाला है… और मुझे बहाकर ले जाने वाला है।”
“अरे क्या हुआ? कुछ ख़ास हुआ क्या?” संभव कुछ परेशान सा दिख रहा था।
“तान्या मैं इस वक़्त ऐसी जगह हूँ जहाँ से आना मुश्किल होगा, वरना ज़रूर आ जाता। लेकिन फिर भी बताओ क्या हुआ तान्या?”
मेरा दिल बैठने लगा, किसी अनहोनी के पूर्वानुमान की अनुभूति हो रही हो जैसे।
अचानक होश आया मुझे। मैंने बात बदलते हुए कहा, “संभव क्या कोई ऐसी किताब है जो हमें अतीत से विलग कर सकती है? हम सिर्फ़ भविष्य के बारे में सोचें…?” मैं पागल हो चुकी थी शायद। मेरा विवेक मेरे होशोहवास की सीमा तोड़कर एक हहराती हुई नदी में तब्दील हो रहा था। धीरे-धीरे ऐसी नदी जिसके किनारे ढह रहे थे। बिना कुछ जवाब पाये मैंने फ़ोन स्विच ऑफ़ कर दिया।
सोम का ऑपरेशन फ़िलहाल सफल रहा पर वह अब भी बेहोश था और ऑपरेशन थियेटर से उसे आई.सी.यू. में शिफ्ट कर दिया गया था। मैंने मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया। एक नर्स ने कहा अब आप लोग बच्चे को देख सकते हैं आई.सी.यू. में जाकर… पर मैंने मना कर दिया। प्रतीक ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा। मैं सोम को भले ही हँसते-खेलते ना देख पाऊँ, भले ही उसे अपनी आँखें छतों, दीवारों पर टिकाये देखती रहूँ पर बेहोश… नहीं बिल्कुल नहीं देख सकती उसे।
हमें पता चला कि मुंबई के बच्चों के डॉक्टर डिंगरा जिन्हें सोम को दिखाने हम कब से मुंबई जाने का प्लान बना रहे थे वे यहाँ दिल्ली में ही हैं और आज यहाँ इस अस्पताल में आने वाले हैं। हालाँकि उन्हें दिखाने वालों की बहुत भीड़ थी लेकिन प्रतीक ने भागदौड़ करके उनका एपॉइंटमेंट ले लिया था। सोम आई.सी.यू. में था। प्रतीक ने उसकी सारी रिपोर्ट्स डॉक्टर डिंगरा को दिखायीं। प्रतीक और मैं डॉक्टर डिंगरा के केबिन में थे। हमें ये जानकर अवर्णनीय ख़ुशी हुई कि सोम पूरी तरह ठीक न होकर भी अस्सी प्रतिशत तक ठीक हो सकता है। स्कूल जा सकता है। अपने काम ख़ुद कर सकता है। डॉक्टर ने बताया कि हालाँकि बीमारी रेयर है पर अब इस पर काफ़ी रिसर्च के बाद इलाज खोज लिया गया है।
अचानक मुझे लगने लगा कि मेरे जीवन के आसपास खड़ी हो गयी बदकिस्मती की ऊँची दीवारें सहसा ढह रही हैं और मेरे सामने भी दूर तक फैला मैदान और ख़ूबसूरत बग़ीचे हैं।
अचानक फ़ोन की घंटी बज उठी, “हैलो!” वहाँ से संभव की आवाज़ आयी। कुछ पल मुझे ख़ुद को संयत करने में लगे।
“जी अभी थोड़ी व्यस्त हूँ बाद में फ़ोन करती हूँ।” मैंने कहा और फ़ोन रख दिया। यह संभव की ओर से मुझे किया गया पहला फ़ोन था।
“तान्या ज़िंदगी में पहली बार थोड़ा नर्वस हो रहा हूँ, तुमसे बात करना चाहता हूँ…” संभव का एस.एम.एस. आया। मैंने सरसरी निगाह से पढ़ा और फ़ोन रख दिया।
डॉक्टर डिंगरा के फ़ोन की घंटी बज रही थी। उन्होंने इशारे से प्रतीक से कहा कि वो कुछ देर बाहर बैठें… हम दोनों बाहर आ गये। पैसेज में काफ़ी भीड़ थी। लोग डॉक्टर डिंगरा से एपॉइंटमेंट लेकर अपने नंबर का इंतज़ार कर रहे थे, मैं और प्रतीक वहीं बेंच पर बैठ गये। वहाँ सीरियस मरीज़ों की हालत देखकर मन ख़राब हो गया। आठ-नौ स्ट्रेचर रखे थे जिन पर गंभीर मरीज़ ज़्यादातर बेहोशी की अवस्था में पड़े थे। ख़ून, ग्लूकोज़, ऑक्सीजन की नलियाँ उनके अंगों पर लगी थीं और उनके रिश्तेदारों के चेहरों पर गहन उदासी और दुख के भाव थे।
“डॉक्टर हैं ना केबिन में?” लड़के ने जो प्रतीक की बग़ल में बैठा था प्रतीक से पूछा।
और फिर बातचीत होने लगी उनमें। लड़के के सामने व्हील चेयर पर एक बहुत दुबली पतली औरत अर्ध मूर्छित अवस्था में बैठी हुई थी जिसकी नाक में नली लगी हुई थी और ग्लूकोज़ की बोतल भी लटकी हुई थी। व्हील चेयर के पास एक नर्स खड़ी थी। लड़के ने बताया यह उसकी पत्नी है। एक तीन साल का बेटा भी। दो साल पहले बाइक दुर्घटना में पत्नी को चोट आयी थी। उसे रीढ़ की हड्डी में चोट लगी थी, पता चला मेलाइटिस हो गया है। यानी स्पाइनल कॉर्ड का डैमेज। अब वह ज़िंदगी भर चल नहीं पायेगी। कल उसे ख़ून की उल्टी हुई थी। डॉक्टर ने कहा था कि अचानक ख़ून की उल्टी होना ख़तरनाक होता है इसमें।”
“ओह वेरी सैड…” प्रतीक ने कहा।
लड़का उदास-सी हँसी हँसने लगा बोला, “नो नो दिस इज लाइफ़… यह मेरी ज़िम्मेदारी है, इसने मेरा हाथ थामा था… तब क्या पता था… कोई बात नहीं… चलता है… और फिर जो होना होता है सर वो तो…” मैंने अचानक उसकी ओर मुड़कर देखा, तभी…
“मिस्टर संभव श्रीवास्तव”… पियून ने आवाज़ लगायी… “आपको डॉक्टर बुला रहे हैं…”
लड़का पत्नी की व्हील चेयर लेकर भीतर केबिन में चला गया।
लेखिका: वंदना शुक्ल