दिलों की डोर

  “दीदी, सच कहूँ तो इन दस दिनों में मुझे समझ आया कि घर में बड़ों का होना कितनी बड़ी दौलत है। जब से हम यहाँ आए हैं, माँ-बाबूजी के सामने होने से सारे काम कितने सलीके से हो गए। बच्चे भी अपनी मनमानियाँ छोड़कर बड़ों के पास बैठना सीख रहे हैं। उस पुराने मकान में मैं नासमझी में सोचती थी कि माँ-बाबूजी हमारे ऊपर पहरा दे रहे हैं, पर सच तो यह है कि उनका साया ही हमारी सबसे बड़ी ढाल था। शादी के बाद अब माँ-बाबूजी को हमारे साथ ही रहने देना, मैं अब कभी शिकायत नहीं करूँगी।”

  सुमित्रा हाथ में चाय की केतली थामे लिविंग रूम में आई और अपने पति आलोक को चाय का कप बढ़ाते हुए बोली, “अरे सुनिए, कब से देख रही हूँ आप उसी फ़ाइल में सिर गड़ाए बैठे हैं। चाय ठंडी हो रही है। इंटीरियर वाले से बात हो गई क्या? वो ऊपर वाली रसोई की चिमनी और अलमारियों का काम परसों तक पूरा करने को कह रहा था ना?”

आलोक ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराए, “हाँ सुमित्रा, बात तो हो गई है। मिस्त्री कह रहा था कि ऊपर का मॉड्यूलर किचन दो दिन में एकदम तैयार हो जाएगा। बस तुम्हारे चुने हुए टाइल्स लग जाएं, फिर शौर्य और तान्या का नया फ़्लोर पूरी तरह सज जाएगा। पर सच कहूँ, मन में एक अजीब सी कसक उठ रही है।”

सुमित्रा ने गहरी साँस ली और सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई। शौर्य उनका इकलौता बेटा था, जिसकी शादी अगले महीने तय हुई थी। आलोक और सुमित्रा ने यह मकान पंद्रह साल पहले बनवाया था। नीचे तीन बड़े कमरे, खुला आँगन और विशाल रसोई थी। ऊपर की मंज़िल पर भी दो कमरे बने थे, जो अब तक या तो मेहमानों के लिए इस्तेमाल होते थे या बच्चों के खेलने के लिए। लेकिन शादी तय होते ही सुमित्रा की सहेलियों और रिश्तेदारों ने उसे समझाना शुरू कर दिया था कि आज के ज़माने में बहू-बेटे को शुरुआत से ही आज़ादी देनी चाहिए, अलग फ़्लोर और अलग रसोई बना दो ताकि रोज़-रोज़ की खटपट न हो और रिश्ते लंबे समय तक मधुर बने रहें।

सुमित्रा का मन भी इसी सोच में बह गया था। हालाँकि उसका अपना अतीत कुछ और ही कहानी कहता था। तीस साल पहले सुमित्रा जब ब्याह कर आई थी, तब आलोक अपने दो भाइयों, माता-पिता और एक अविवाहित बहन के साथ पुराने पुश्तैनी मकान में एक ही छत के नीचे रहते थे। उस चार कमरों के पुराने मकान में खुशियों की कभी कमी नहीं थी। त्योहारों पर पूरा घर मेला बन जाता था। जेठानी प्रमिला और देवरानी ललिता के साथ रसोई में काम करते हुए हँसी-ठिठोली चलती रहती थी।

पर जैसे-जैसे समय बीता, तीनों भाइयों के बच्चे बड़े होने लगे। आलोक के बड़े भाई प्रभात का बेटा गौरव जब बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहा था, तब उसने एक दिन अपनी माँ प्रमिला से तंग आकर कहा था, “मम्मी, घर में दिन भर इतना शोर रहता है। कभी चाचा जी के बच्चे कूद रहे हैं, कभी बुआ के गाने चल रहे हैं। मैं पढ़ाई बैठक में करूँ या दालान में? मेरा कोई निजी कोना ही नहीं है जहाँ बैठकर शांति से पढ़ सकूं। ऐसे तो मेरे नंबर अच्छे नहीं आएँगे।”

प्रमिला उस समय बेटे पर झुँझला पड़ी थी कि हम सब भी तो इसी घर में पढ़-लिखकर बड़े हुए हैं, पर कमरे के बाहर खड़े दादाजी यानी आलोक के पिता जी, जिन्हें सब बाबूजी कहते थे, उन्होंने पोते की यह बात सुन ली थी। बाबूजी बहुत दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने देखा कि परिवार बढ़ रहा है और पुराने मकान में अब जगह की तंगी होने लगी है। कल को बच्चों के रिश्ते आएँगे, सबकी अपनी ज़रूरतें होंगी। अगर वे ख़ुद आगे बढ़कर कोई हल नहीं निकालेंगे तो बहुओं के मन में कड़वाहट घुलेगी।

इसलिए बाबूजी ने अपने जीवनभर की जमा-पूंजी और ज़मीन का हिस्सा करके तीनों बेटों को बुलाकर समझाया कि अब समय आ गया है कि वे अलग-अलग अपना आशियाना बना लें। उन्होंने कहा था कि अलग रहने का मतलब अलग होना नहीं, बल्कि प्यार को बनाए रखने के लिए फासले तय करना है। साल भर के भीतर आलोक और उनके बड़े भाई प्रभात ने पास ही के इलाके में अपने-अपने मकान बना लिए।

किंतु सबसे छोटे भाई मयंक और उनकी पत्नी ललिता को बाबूजी और माँ जी ने अपने साथ पुराने पुश्तैनी मकान में ही रखा। मयंक सबसे छोटे थे और माँ-बाबूजी का उन पर विशेष स्नेह था। शुरुआत में तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे ललिता के मन में एक हीनभावना घर करने लगी। उसे लगता कि बड़े दोनों जेठ और जेठानियाँ अपने-अपने घरों के मालिक हैं, अपनी मर्ज़ी से उठते-बैठते हैं, बाहर खाते-घूमते हैं। जबकि वह और मयंक हमेशा माँ-बाबूजी की छत्रछाया में दबे रहते हैं। हर चीज़ के लिए पूछना पड़ता है, हर काम नियम-कायदों से करना पड़ता है।

यह असंतोष तब खुलकर सामने आ गया जब मयंक की बड़ी बेटी रिया कॉलेज जाने के लिए तैयार होकर निकली। रिया ने आधुनिक ढंग के कपड़े पहने थे और हल्का मेकअप किया हुआ था। दादी ने उसे दरवाज़े पर ही देख लिया और सहज भाव से टोक दिया, “अरे रिया बिटिया, कॉलेज जा रही हो या किसी ब्याह-शादी में? इतनी तड़क-भड़क के साथ पढ़ने कौन जाता है? ज़रा सादगी से रहा करो।”

रिया ने मुँह बनाकर पैर पटकते हुए कहा, “दादी, ज़माना बदल चुका है। अब कॉलेज में कोई साधारण कुर्ती पहनकर नहीं जाता। आप हमेशा पुराने ज़माने की बातें लेकर बैठ जाती हैं।”

ललिता जो पास ही खड़ी थी, तुरंत बोल पड़ी, “माँ जी, आप मेरी ही औलादों में हर बात पर मीन-मेख निकालती हैं। ज़रा देखिए जेठानी जी की बेटियों को, वे अपनी मर्ज़ी से जीती हैं, क्योंकि उनके सिर पर कोई दिन-रात टोकने वाला नहीं बैठा। मेरी ही किस्मत फूटी है जो यहाँ हर बात का हिसाब देना पड़ता है।”

उस दिन घर में अजीब सी उदासी छा गई थी। बाबूजी ने ललिता को कुछ नहीं कहा, पर उनकी आँखों में एक गहरी चिंता तैर गई थी।

शादी की तैयारियों के सिलसिले में अगले दिन आलोक और सुमित्रा माँ-बाबूजी के पास पहुँचे। शादी की पत्रिकाएँ आ चुकी थीं। बातों-बातों में सुमित्रा ने गर्व से बताया, “बाबूजी, शौर्य की शादी के लिए ऊपर की मंज़िल पर पूरी अलग रसोई और सेटअप करवा दिया है। तान्या आधुनिक विचारों की लड़की है। हमने सोचा कि क्यों न उसे पूरी तरह आज़ाद रखा जाए। वे दोनों ऊपर अपने मनमुताबिक रहें, जब मर्ज़ी हो खाना बनाएँ या बाहर खाएँ। नीचे हमारे साथ कोई रोक-टोक न महसूस हो।”

बाबूजी ने चश्मा ठीक किया और सुमित्रा की ओर बहुत गंभीरता से देखा। उन्होंने बड़े शांत स्वर में कहा, “सुमित्रा बहू, ये तुम क्या कर रही हो? अभी तो बच्ची घर में कदम भी नहीं रखी और तुमने पहले ही उसे अलग करने की दीवार खड़ी कर दी? शादी का मतलब केवल दो शरीरों का मिलना नहीं होता, दो परिवारों और संस्कारों का जुड़ना होता है। नई बहू को जब तक तुम अपने साथ नहीं रखोगी, उसे इस घर की परंपराएँ, खान-पान की आदतें और आपस का प्यार कैसे समझ आएगा? तुम तीनों देवरानी-जेठानी तो बरसों तक एक साथ रहीं, एक-दूसरे का सुख-दुख बाँटा, और अब अपने बेटे-बहू को आते ही अलग फ़्लोर थमा रही हो?”

सुमित्रा झेंपते हुए बोली, “बाबूजी, आजकल का माहौल ऐसा ही है। लोग कहते हैं कि अगर बच्चों को अपनी मर्ज़ी से जीने की आज़ादी न दो तो वे घुटन महसूस करते हैं। अगर सास-बहू एक ही रसोई में रहें तो बर्तन खटकते ही हैं।”

बाबूजी ने सिर हिलाया और कहा, “सुमित्रा, आज़ादी और बेपरवाही में बहुत फ़र्क होता है बेटी। अगर बच्चों को शुरू से ही बिल्कुल अलग रहने की आदत डाल दी जाए, तो वे धीरे-धीरे बड़ों की उपस्थिति को ही बंधन समझने लगते हैं। उनका दायरा सिर्फ़ अपने कमरे और अपनी ज़रूरतों तक सिमट जाता है। पड़ोसियों के साथ औपचारिकता निभाई जाती है, पर परिवार में अपनत्व और ज़िम्मेदारी सिखाई जाती है। जब तुम और प्रभात की बहू अलग हुए थे, तब मैंने देखा था कि तुम दोनों घर-गृहस्थी और परिवार के मूल्यों को अच्छी तरह समझ चुकी थीं। मुझे तुम पर भरोसा था कि तुम अगली पीढ़ी को वही सीख दोगी। पर ललिता थोड़ी कच्ची थी, इसलिए मैंने उसे अपने पास रखा ताकि वह परिवार की डोर को संभालना सीखे।”

बाबूजी की बातों ने आलोक और सुमित्रा दोनों के दिल में एक हलचल मचा दी। वे घर लौट आए, पर बाबूजी के शब्द सुमित्रा के कानों में गूँजते रहे—”अगर बच्चों को अलग रहने की आदत पड़ जाए, तो वे बड़ों को बंधन समझने लगते हैं।”

शादी की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। शादी से दस दिन पहले ही आलोक और सुमित्रा जाकर माँ-बाबूजी को अपने घर ले आए ताकि वे हर रस्म में सामने रह सकें। घर में रौनक आ गई थी। मयंक और ललिता भी बच्चों के साथ वहीं आ गए थे।

धूमधाम से शौर्य और तान्या का विवाह संपन्न हुआ। विदाई के बाद जब तान्या घर आई, तो सुमित्रा ने उसका स्वागत पूरी आत्मीयता से किया। अगले दिन सुबह तान्या की ‘पहली रसोई’ की रस्म होनी थी। रिवाज के अनुसार नई बहू पहले दिन मीठा बनाती थी। सुमित्रा ने पहले सोचा था कि यह रस्म ऊपर वाले नए किचन में करवाई जाए ताकि तान्या को लगे कि यह उसका अपना साम्राज्य है।

लेकिन सुबह-सुबह जब सब लोग उठे, तो सुमित्रा ने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। सुमित्रा नीचे वाली मुख्य रसोई में गई। उसने माँ जी की आरामदायक कुर्सी रसोई के एक कोने में लगवा दी। हलवे के लिए सूजी, घी, मेवे और चीनी सलीके से सजाकर रख दिए।

जब तान्या तैयार होकर नीचे आई, तो सुमित्रा ने प्यार से उसका हाथ थामा और बोली, “तान्या बेटा, आज तुम्हारी पहली रसोई है। तुम्हारी दादी सास यहाँ बैठी हैं। इनसे बड़ा आशीर्वाद और क्या होगा? आज तुम नीचे वाली रसोई में ही हलवा बनाओगी और माँ जी तुम्हें बताएंगी कि हमारे घर में किसे कितना मीठा पसंद है।”

तान्या के चेहरे पर एक सुंदर सी मुस्कान खिल गई। उसने झुककर दादी सास के पैर छुए। माँ जी ने उसे गले से लगा लिया और कहा, “जीती रहो बिटिया। आओ, मैं तुम्हें बताती हूँ कि शौर्य के बाबूजी को कम मीठा और आलोक को मेवे वाला हलवा पसंद है।”

आलोक पास ही खड़े थे, उन्होंने हैरानी से सुमित्रा को देखा। सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए आलोक से धीमे स्वर में कहा, “सुनिए, ऊपर वाले कमरे में जो तान्या के बैग रखे थे, वो सब मैंने नीचे शौर्य के कमरे में ही रखवा दिए हैं। ऊपर का कमरा सिर्फ़ पढ़ाई और काम के लिए रहेगा। हमारे बच्चे हमारे साथ ही रहेंगे। जब तक हम सब एक थाली में नहीं बैठेंगे, घर घर कैसे बनेगा?”

आलोक की आँखों में संतोष और गर्व के आँसू छलक आए।

उसी समय ललिता, जो पिछले दस दिनों से सुमित्रा के घर में रह रही थी, आगे आई। उसके चेहरे पर एक गहरी समझ और पश्चाताप का भाव था। उसने सुमित्रा का हाथ पकड़ते हुए भावुक आवाज़ में कहा, “दीदी, सच कहूँ तो इन दस दिनों में मुझे समझ आया कि घर में बड़ों का होना कितनी बड़ी दौलत है। जब से हम यहाँ आए हैं, माँ-बाबूजी के सामने होने से सारे काम कितने सलीके से हो गए। बच्चे भी अपनी मनमानियाँ छोड़कर बड़ों के पास बैठना सीख रहे हैं। उस पुराने मकान में मैं नासमझी में सोचती थी कि माँ-बाबूजी हमारे ऊपर पहरा दे रहे हैं, पर सच तो यह है कि उनका साया ही हमारी सबसे बड़ी ढाल था। शादी के बाद अब माँ-बाबूजी को हमारे साथ ही रहने देना, मैं अब कभी शिकायत नहीं करूँगी।”

बाबूजी दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर एक असीम शांति और संतोष की चमक थी। उनकी समझाई बात आज दोनों बहुओं के दिलों में उतर चुकी थी।

आलोक ने आगे बढ़कर बाबूजी के कंधे पर हाथ रखा और हँसते हुए पूछा, “बाबूजी, शादी तो बहुत अच्छे से निपट गई। अब बताइए, ऊपर वाले उस नए फ़्लोर का क्या करें? क्या उसे किसी भले परिवार को किराए पर दे दें?”

बाबूजी ने आलोक की पीठ थपथपाई और स्नेह से बोले, “हाँ आलोक बेटे, किराए पर देना ही सबसे अच्छा रहेगा। पर हाँ, यह फ़ैसला करने से पहले शौर्य और तान्या से भी एक बार ज़रूर पूछ लेना। जब बच्चे बड़े हो जाएं, तो उन पर अपने फ़ैसले थोपने के बजाय उनसे दोस्तों की तरह बात करके राय लेना ही पीढ़ियों के बीच की खाई को पाटने का सबसे सच्चा रास्ता है।”

उस दिन नीचे वाले आँगन में जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर तान्या के हाथ का बना गरमा-गरम हलवा खा रहा था, तो घर की हर दीवार जैसे प्यार और अपनेपन से महक उठी थी। वह मकान अब केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि एक सच्चा परिवार बन चुका था जहाँ निजता से ऊपर अपनों का साथ था।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में हम अक्सर ‘प्राइवेसी’ और ‘स्पेस’ के नाम पर अपने ही प्रियजनों से दूरियाँ बना लेते हैं। लेकिन क्या सचमुच बड़ों की छत्रछाया कोई बंधन होती है, या वह एक ऐसा सुरक्षा चक्र है जो हमें बिखरने से बचाता है? आपके अपने परिवार में इस बारे में क्या राय है—क्या नई पीढ़ी को शुरुआत से ही अलग छत दे देनी चाहिए या मिलकर रहने से रिश्ते और गहरे होते हैं? अपने विचार नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें।

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 मूल लेखिका : करुणा मलिक 

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