मूक प्रीत की धड़कन

दरवाजा खुलने की धीमी सी आवाज के साथ जब पिताजी भीतर आए, तो उनके कदम लड़खड़ा रहे थे। उनके चेहरे की रंगत पूरी तरह उड़ चुकी थी, जैसे किसी ने अंदर से उनका सारा जीवन खींच लिया हो। हम सब भाई-बहन सोफे पर बैठे थे, पर उनके सूखे चेहरे और बेजान आंखों को देखकर कमरे में पसरा सन्नाटा और गहरा हो गया। किसी की जुबान नहीं खुली। मां ने कांपते हाथों से पानी का लोटा आगे बढ़ाया, पर पिताजी ने लोटा पकड़ते ही छोड़ दिया। पानी फर्श पर बिखर गया और पिताजी दीवार का सहारा लेकर फफक कर रो पड़े। साठ साल के उस मजबूत इंसान को यूं बच्चों की तरह बिलखते देख मां का कलेजा मुंह को आ गया। आंसुओं की धार में वो अनकहा सच बह निकला था, जिसे सुनने का हौसला घर में किसी के पास नहीं था। सब समझ चुके थे कि घर की चौखट का वो मूक पहरेदार, जो हमारे परिवार की धड़कन बन चुका था, अब इस दुनिया में नहीं रहा।

इंसान और बेजुबान के बीच का नाता शब्दों की सीमा में नहीं बंधता। यह रिश्ता उस पावन अहसास की तरह होता है, जहां न कोई मांग होती है और न कोई शर्त। दुनियादारी के तमाम हिसाब-किताब जहां खत्म होते हैं, वहीं से रूहानी रिश्तों की शुरुआत होती है। हमारी जिंदगी में भी वह ऐसे ही आई थी, अनजाने रास्तों से चलकर हमारे आंगन की रौनक बनने।

बात करीब ढाई साल पुरानी है। ठंड की शुरुआत थी और नवंबर की उस ठिठुरती रात में हम सब खाना खाने बैठे थे। पिताजी दिनभर के दफ्तर के किस्से सुना रहे थे और मां गरमा-गरम रोटियां परोस रही थीं। तभी बाहर लगे लोहे के भारी फाटक पर जोर-जोर से खट-खट की आवाज गूंजने लगी। पहले तो हमने सोचा कि शायद हवा का झोंका होगा या कोई आवारा जानवर गेट से टकरा गया होगा। मां ने कहा कि रात के ग्यारह बजने को हैं, बाहर मत निकलो, कोई कुत्ता होगा जो थोड़ी देर में भाग जाएगा। पर खटखटाहट बंद होने के बजाय और तेज हो गई, मानो कोई बाहर से अपनी बेबसी की गुहार लगा रहा हो। पिताजी से रहा नहीं गया। वे अपनी थाली छोड़कर उठ खड़े हुए और टॉर्च हाथ में लेकर मुख्य द्वार की तरफ बढ़ चले। हम दोनों भाई-बहन भी उनके पीछे हो लिए।

बाहर जाकर देखा तो दंग रह गए। एक सफेद रंग की कमजोर, भोली सी बछिया का सिर गेट की दो सलाखों के बीच बुरी तरह फंसा हुआ था। वह दर्द से कांप रही थी और खुद को छुड़ाने की कोशिश में उसके माथे से खून रिसने लगा था। वह रंभा भी नहीं पा रही थी, बस अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों से हमें देख रही थी, जिनमें बेइंतहा खौफ और मदद की आस तैर रही थी। पिताजी ने एक पल की भी देर नहीं की। उन्होंने पड़ोस से घनश्याम चाचा को बुलाया। दोनों ने मिलकर सलाखों को फैलाया और बड़ी मशक्कत के बाद बछिया का सिर बाहर निकाला।

आजाद होते ही वह भागी नहीं। वहीं गेट के पास खड़ी होकर अपनी थकी हुई सांसें लेने लगी। मां ने उसके जख्म पर हल्दी लगाई और रसोई से चार मोटी रोटियां और थोड़ा सा गुड़ ले आईं। मां ने मुस्कुरा कर कहा कि हमारी चौखट पर पहली बार कोई भूखा आया है, इसे मीठा खिलाकर तृप्त करना चाहिए। बछिया ने मां के हाथ से रोटियां ऐसे खाईं, जैसे कई दिनों से उसने दाना न देखा हो। गुड़ की मिठास और उस गर्म स्पर्श ने शायद उसके दिल के सारे डर को धो दिया था। पानी पीने के बाद उसने एक बार पिताजी को देखा और फिर धीरे-धीरे अंधेरे में ओझल हो गई।

अगली रात जब ठीक दस बजे फिर वही खटखटाहट सुनाई दी, तो इस बार हम डरे नहीं। पिताजी ने मुस्कुराते हुए गेट खोला। वही बछिया बाहर खड़ी थी। इस बार उसका सिर सलाखों में फंसा नहीं था, बल्कि वह अपने माथे से गेट को सहला रही थी। मां ने तुरंत उसके लिए खाना निकाला। उसने शांत मन से खाया और चली गई। बस, उसी दिन से वह हमारे परिवार का अटूट हिस्सा बन गई। हमने उसका नाम ‘गौरी’ रख दिया।

गौरी का नियम बन गया था। रात का खाना खाने वह ठीक दस बजे हाजिर हो जाती। पिताजी, जो बरसों पहले गांव छोड़कर शहर बस गए थे, अपने भीतर एक अधूरापन महसूस करते थे। दादाजी के जमाने में हमारे पैतृक घर में गायों का एक बड़ा बाड़ा हुआ करता था। सुबह-शाम दूध दुहना, गायों को नहलाना, उनकी सेवा करना दादाजी की दिनचर्या थी। दादाजी के जाने के बाद और शहर के कंक्रीट के मकान में सिमट जाने के कारण पिताजी की वह सेवा भावना मन ही मन घुट रही थी। गौरी के आने से मानो पिताजी को अपने पुराने दिन वापस मिल गए। वे रात में खुद अपने हाथों से गौरी को चारा डालते, उसकी पीठ सहलाते और जब तक वह गली के मोड़ तक नहीं पहुंच जाती, वहीं खड़े रहते।

एक दिन हमें कौतूहल हुआ कि आखिर गौरी रात के वक्त कहां से आती है और कहां जाती है। एक इतवार की रात पिताजी ने अपनी पुरानी बजाज चेतक पर उसका पीछा किया। उन्होंने देखा कि वह पास ही रेलवे लाइन के किनारे बसी झोपड़पट्टी की एक बाड़े में जाती है, जहां कुछ दिहाड़ी मजदूर रहते थे। पूछताछ करने पर पता चला कि एक बूढ़े मजदूर की यह बछिया थी, जिसे वे दिन में चरने के लिए छोड़ देते थे और रात में वह घूम-फिर कर वापस लौट आती थी। यह जानकर पिताजी का मन हल्का हो गया कि गौरी लावारिस नहीं है, बल्कि उसके सिर पर भी एक आशियाना है।

दिन बीतते गए और गौरी हमारे जीवन में घुलती चली गई। पिताजी जब सुबह दफ्तर के लिए स्कूटर निकालते, तो अक्सर गौरी मुख्य चौराहे पर पीपल के पेड़ के नीचे बैठी मिलती। पिताजी के स्कूटर की जानी-पहचानी आवाज सुनते ही वह अपने कान खड़े कर लेती और उठकर सड़क किनारे आ खड़ी होती। पिताजी हमेशा अपनी जेब में भुने चने और गुड़ की डली रखते थे। स्कूटर रोककर वे गौरी को दुलारते, उसे मीठा खिलाते और फिर दफ्तर की ओर बढ़ते। पिताजी कहते थे कि दादाजी हमेशा सिखाते थे कि बेजुबानों की दुआएं सीधे ईश्वर तक पहुंचती हैं, इन्हें जो दोगे, वो जिंदगी में हजार गुना होकर लौटेगा।

पर जिंदगी हमेशा एक सी नहीं चलती। एक मनहूस दोपहर जब पिताजी दफ्तर से लौट रहे थे, तो चौराहे पर भारी भीड़ जमा थी। पिताजी ने स्कूटर धीमा किया और भीड़ चीरते हुए आगे बढ़े। सड़क के बीचों-बीच खून से लथपथ एक सफेद जिस्म पड़ा था। एक बेकाबू ट्रक गौरी को टक्कर मारकर फरार हो चुका था। गौरी तड़प रही थी। पिताजी की चीख निकल गई। वे बदहवास होकर उसके पास पहुंचे, उसका सिर अपनी गोद में रख लिया। गौरी की सांसें उखड़ रही थीं। उसने अंतिम बार अपनी दर्द से भरी आंखें खोलीं, पिताजी को पहचाना, अपनी जीभ से उनके हाथ को धीरे से छुआ और अपनी आंखें हमेशा के लिए मूंद लीं।

पिताजी वहीं सड़क पर बैठकर दहाड़े मार-मार कर रोने लगे। आसपास के दुकानदारों ने मिलकर गौरी को उठाया और नगर निगम की मदद से उसका अंतिम संस्कार कराया। वही मातम भरा मंजर लेकर पिताजी घर लौटे थे, जब उन्होंने मां के हाथ से पानी का लोटा गिरा दिया था।

उस रात हमारे घर का चूल्हा नहीं जला। हर कोने में सिर्फ सन्नाटा और सिसकियां थीं। रात के दस बजे जब घड़ी की सुइयां आपस में मिलीं, तो अनायास ही सबकी नजरें मुख्य द्वार की तरफ उठ गईं। लगा जैसे अभी सलाखों पर कोई माथा टकराएगा, कोई बेजुबान अपनी हाजिरी लगाएगा। पर बाहर सिर्फ सर्द हवा की सांय-सांय थी। पिताजी अपने कमरे में बंद होकर रोते रहे। अगले दो हफ्तों तक घर का माहौल किसी गहरे अवसाद जैसा रहा। पिताजी का चेहरा बुझ सा गया था। उन्होंने चौराहे से गुजरना छोड़ दिया, रास्ता बदल लिया ताकि उन्हें पीपल का वह पेड़ न देखना पड़े।

समय बीतता रहा, पर पिताजी के दिल का जख्म भर नहीं रहा था। लगभग एक महीना बीत चुका था। एक शनिवार की शाम, जब हल्की बारिश हो रही थी, पिताजी दालान में गुमसुम बैठे थे। तभी बाहर गेट पर एक धीमी सी, बहुत ही कोमल खटखटाहट हुई। आवाज इतनी हल्की थी कि लगा कोई पत्ता गिरा हो। हम सब चौंक पड़े। मां ने सहमी नजरों से पिताजी को देखा। पिताजी के दिल की धड़कन बढ़ गई। वे तेजी से उठे और नंगे पैर ही गेट की तरफ भागे।

गेट खोलते ही जो दृश्य सामने था, उसने हम सबके रोंगटे खड़े कर दिए।

सामने एक बहुत छोटी, दूध सी सफेद बछिया खड़ी थी। उसकी आंखें बिल्कुल गौरी जैसी थीं, गहरी, शांत और मासूम। उसके गले में लाल रंग का वही पुराना धागा बंधा था, जो कभी पिताजी ने गौरी के गले में बांधा था। पीछे मुड़कर देखा तो वही बूढ़ा मजदूर खड़ा था, जिसकी झोपड़ी में गौरी रहती थी।

बूढ़े मजदूर ने हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा, “बाबूजी, गौरी जब गई, तो उससे दस दिन पहले ही इसने इस नन्ही जान को जन्म दिया था। यह गौरी की ही बेटी है। गौरी के जाने के बाद यह बीमार पड़ गई थी, दूध नहीं पी रही थी। आज जब यह संभली, तो सीधे आपकी गली की तरफ भागी चली आई। मुझे समझ आ गया कि इसकी मां इसे कहां का रास्ता दिखा गई थी। यह अमानत आपकी है बाबूजी, इसे अपना लीजिए। मैं गरीब आदमी हूं, शायद इसकी वैसी सेवा न कर पाऊं जैसी आप लोग करते थे।”

पिताजी की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला, पर इस बार उन आंसुओं में मातम नहीं, बल्कि एक असीम कृतज्ञता और सुकून था। पिताजी तुरंत घुटनों के बल बैठ गए और उस नन्ही बछिया को अपने सीने से चिपटा लिया। बछिया ने बड़े प्यार से पिताजी के चेहरे को चाटना शुरू कर दिया, मानो कह रही हो कि मां भले चली गई हो, पर प्यार कभी नहीं मरता।

मां तुरंत अंदर भागीं और थाली में ताजी रोटियां, गुड़ और कटोरी में दूध लेकर आईं। पिताजी ने अपने हाथों से उस नन्ही जान को दूध पिलाया। बूढ़े मजदूर को पिताजी ने आदर से भीतर बुलाया, उसे भोजन कराया और तय किया कि उस मजदूर के परिवार का खर्च भी अब हमारा परिवार ही उठाएगा।

उस रात हमारे घर में एक नया सवेरा हुआ। पिताजी ने उस नन्ही बछिया का नाम ‘गंगा’ रखा। घर के आंगन में एक छोटा सा शेड बना दिया गया ताकि गंगा को अब सड़कों पर न भटकना पड़े। जिस घर में महीने भर से मातम पसरा था, वहां आज फिर से खुशियों की घंटी बज उठी थी। प्रेम कहीं नहीं गया था, वह लौट आया था एक नए रूप में, एक नए जीवन का संदेश लेकर। बेजुबानों का रिश्ता जिस्म से नहीं, रूह से होता है, और रूहानी रिश्ते कभी मरा नहीं करते। वे किसी न किसी बहाने, किसी न किसी रूप में हमारे आंगन में रोशनी बनकर लौट ही आते हैं।

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