आईना जब बोला

 शादी के सात साल बाद वह पूरे दस दिनों की फुर्सत निकालकर अपने मायके आई थी। मन में सुकून था, बचपन की यादें थीं और मां के हाथों के स्वाद की ललक थी। मगर पिछले दो दिनों से उसे घर की हवा में एक अजीब सा खिंचाव महसूस हो रहा था। वही घर जहां कभी हंसी के फव्वारे छूटते थे, आज वहां खामोशी की एक भारी चादर बिछी हुई थी।

उसकी मां सुमित्रा देवी रसोई में चुपचाप नाश्ता बना रही थीं। चेहरे पर वही ममतामयी भाव था, पर आंखों के नीचे पड़े काले घेरे और झुकी हुई पलकें किसी अनकहे दर्द की गवाही दे रही थीं। शालिनी रसोई की चौखट पर जाकर खड़ी हो गई। उसने देखा कि मां आटा गूंथते हुए बार-बार अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछ रही थीं।

मां, क्या बात है, शालिनी ने हौले से उनके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा। तबीयत ठीक नहीं है क्या आपकी?

सुमित्रा देवी एकदम से चौंक गईं। उन्होंने जल्दी से चेहरे पर एक फीकी मुस्कान ओढ़ ली और बोलीं, अरे कुछ नहीं लाडो, बस आंख में प्याज का छिलका लग गया था। तू चल बाहर बैठ, मैं तेरे लिए गरमा-गरम मेथी के परांठे लाती हूं।

शालिनी ने बात को आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन उसका मन बेचैन हो उठा। दोपहर को जब उसका छोटा भाई सुमित अपने दफ्तर चला गया और भाभी नीलिमा अपने कमरे में बच्चों को सुलाने चली गई, तब सुमित्रा देवी ने दबे पांव आकर शालिनी का हाथ पकड़ा।

शालिनी, चल मंदिर हो आते हैं। बहुत दिन हो गए गोपाल जी के दर्शन नहीं किए, सुमित्रा देवी ने धीमी आवाज में कहा।

दोनों मां-बेटी चुपचाप गली से निकलकर मंदिर की ओर चल पड़ीं। मंदिर परिसर में पीपल के चबूतरे पर जब वे बैठीं, तो सुमित्रा देवी का सब्र टूट गया। उनके आंसुओं का बांध फूट पड़ा। शालिनी सन्न रह गई। उसने अपनी मां को कभी इस तरह टूटते नहीं देखा था।

मां, क्या हुआ, मुझे बताओ ना। सुमित ने कुछ कहा या नीलिमा भाभी ने? शालिनी ने घबराकर मां के दोनों हाथ थाम लिए।

सुमित्रा देवी सिसकते हुए बोलीं, शालिनी, तेरे बाबूजी के जाने के बाद यह घर जैसे मेरा रहा ही नहीं। अभी छह महीने भी पूरे नहीं होते कि नीलिमा रोज सुबह ताने कसने लगती है। कहती है कि क्या सारी तीमारदारी की जिम्मेदारी छोटे बेटे की ही है? बड़े बेटे मयंक और जेठानी विशाखा की भी तो कोई जवाबदेही बनती है। छह-छह महीने बांट रखे हैं दोनों ने मुझे, जैसे मैं कोई जीती-जागती इंसान न होकर कोई पुराना संदूक होऊं जिसे जब चाहा इस कमरे से उस कमरे में खिसका दिया।

शालिनी के दिल पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया। उसने तड़पकर कहा, पर मां, सुमित भैया तो आपको बहुत मानते हैं। उन्होंने भाभी को कुछ समझाया नहीं?

सुमित्रा देवी ने बेबसी से सिर हिलाया। वह बेचारा क्या बोले? दिन भर नौकरी में खटता है। जब बोलता है तो नीलिमा घर सिर पर उठा लेती है। कहती है कि सारा खर्च हम उठाएं और वो लोग मजे करें। बड़े भैया मयंक के बच्चे अब कॉलेज में पढ़ते हैं, वहां कोई झंझट नहीं है। यहां दो छोटे बच्चे हैं। शालिनी, मयंक के पास कोटा जाने में मेरा दम घुटता है। वहां ऊंची इमारत की उस बंद कोठरी में मुझे कोई जानने वाला नहीं मिलता। यहां जयपुर में पचास साल गुजारे हैं मैंने। पास के दवाखाने वाला मुझे पहचानता है, पड़ोस की औरतें हालचाल पूछ लेती हैं। वहां तो बालकनी में खड़े होकर सिर्फ गाड़ियां देखना ही नसीब होता है। अब तो बस यही लगता है कि भगवान उठा ले मुझे, अपने ही बनाए घर में यह जिल्लत सही नहीं जाती।

शालिनी ने मां को सीने से लगा लिया। उसका गला रुंध गया। उसने गुस्से में कहा, मां, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। मैं आज ही भाभी से दो टूक बात करती हूं। अगर वे नहीं संभाल सकते तो आप मेरे साथ चलो।

सुमित्रा देवी ने तुरंत हाथ जोड़ लिए। नहीं बेटी, दामाद के घर बैठकर मैं अपनी बची-खुची इज्जत नहीं खो सकती। बेटी का घर बेटी का होता है। मैं तो बस अपनी किस्मत को रो रही हूं कि चार कमरे का मकान भी एक मां के लिए छोटा पड़ गया।

शाम को घर लौटकर शालिनी का मन सुलग रहा था। रसोई में जब नीलिमा चाय बना रही थी, शालिनी वहां पहुंची। उसने बहुत नपे-तुले शब्दों में कहा, भाभी, मां की उम्र अब आराम करने की है। वे इस शहर में पली-बढ़ी हैं, यहां उनका मन लगता है। आप उन्हें बार-बार कोटा भेजने की बात क्यों करती हैं? दोनों भाई मिलकर यहीं खर्च क्यों नहीं संभाल लेते?

नीलिमा ने गैस की आंच बंद की और पलटकर शालिनी की आंखों में देखा। उसके चेहरे पर कोई झिझक या अपराधबोध नहीं था, बल्कि एक अजीब सी तल्खी और व्यंग्य था।

नीलिमा ने तीखे सुर में कहा, अरे वाह ननद जी, आप मुझे ज्ञान देने चली हैं? पर उपदेश कुशल बहुतेरे। आप शायद भूल रही हैं कि आपकी ससुराल अजमेर में मेरी मौसी का घर उसी मोहल्ले में है जहां आप रहती हैं। मौसी सब बताती हैं कि आप अपनी सास कौशल्या जी के साथ कैसा बर्ताव करती हैं। छह महीने पहले जब आपने अपनी सास को ऑटो में बिठाकर देवर के घर छोड़ दिया था और कहा था कि छह महीने मेरी बारी पूरी हो गई, अब देवरानी सेवा करे, तब आपकी यह ममता कहां गई थी?

शालिनी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके पैर कांपने लगे। नीलिमा का हर एक शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहा था।

नीलिमा आगे बोली, अपनी मां को छह महीने का बंटवारा दर्द देता है, और अपनी सास को जब आप तारीख देखकर दूसरे घर रवाना करती हैं, तब वह सेवा कहलाती है? जब खुद अपनी सास को एक दिन ज्यादा अपने घर में नहीं रख सकतीं, तो मुझे नसीहत देने का हक आपको किसने दिया दीदी?

कमरे के बाहर खड़ी सुमित्रा देवी ने भी यह सब सुन लिया था। उनकी नजरों में अपनी बेटी के लिए जो दर्द था, वह पल भर में अविश्वास और गहरी निराशा में बदल गया। मां ने एक नजर शालिनी को देखा और बिना कुछ कहे, सिर झुकाकर अपने कमरे में चली गईं। उस नजर में जो धिक्कार था, उसने शालिनी की आत्मा को झकझोर कर रख दिया।

उस रात शालिनी सो नहीं सकी। छत के पंखे को देखते हुए उसकी आंखों के सामने पिछले पांच साल की घटनाएं किसी फिल्म की तरह चलने लगीं। हर महीने की पहली तारीख को सास के जाने का हिसाब लगाना, देवरानी से फोन पर बहस करना कि इस बार मां जी के घुटने के इलाज का बिल तुम दोगी, सास के खांसने पर चिढ़ना और उनका बिस्तर दूसरे कमरे में करवा देना।

आज जब उसने अपनी मां को उसी दर्द से तड़पते देखा, तो उसे समझ आया कि उसने अपनी सास कौशल्या जी के साथ क्या किया था। उसने जो कांटे अपनी सास की राह में बोए थे, वही कांटे आज उसकी अपनी मां के पैरों में चुभ रहे थे। नीलिमा कोई अजनबी नहीं थी, नीलिमा तो बस शालिनी का ही दूसरा रूप थी। उसने आईने में खुद को देखा और उसे अपनी ही परछाई से घिन आने लगी।

सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही शालिनी ने अपना बैग पैक कर लिया। उसने मां के कमरे में जाकर उनके पैर छुए। सुमित्रा देवी ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ नम आंखों से उसे देखा।

शालिनी ने कहा, मां, मुझे माफ कर देना। आपकी बेटी आज तक बहुत बड़ी मुगालते में जी रही थी। मैं अपनी गलती सुधारने जा रही हूं।

वह पहली बस पकड़कर अजमेर के लिए रवाना हो गई। रास्ते भर उसका दिल भारी रहा। दोपहर तक वह अपने ससुराल के घर पहुंची। घर का दरवाजा खुला था। आंगन में एक कोने पर उसकी सास कौशल्या देवी धूप में बैठी रामायण का पाठ कर रही थीं। कमजोर शरीर, सफेद बाल और शांत चेहरा।

शालिनी के पति आलोक दफ्तर में थे और देवरानी सीमा रसोई में कुछ बना रही थी। शालिनी ने बैग जमीन पर रखा और सीधे जाकर अपनी सास के चरणों में गिर पड़ी। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली।

अरे शालिनी, क्या हुआ बहू? तबीयत तो ठीक है ना तेरी? मायके से इतनी जल्दी क्यों लौट आई? कौशल्या देवी घबराकर उसे उठाने लगीं।

मां जी, मुझे मत उठाइए, शालिनी सिसकते हुए बोली। मुझे अपने पैरों में ही रहने दीजिए। मैं बहुत पापी हूं मां जी। मैंने आपको कभी मां समझा ही नहीं। हमेशा आपके दिनों की गिनती की। कभी इस घर भेजा, कभी देवरानी के घर धकेला। आपको सामान समझकर बांटती रही। मैं भूल गई थी कि बुजुर्ग घर का बोझ नहीं, घर की छत होते हैं।

कौशल्या देवी ने अचरज से अपनी बहू को देखा और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, पगली, यह क्या कह रही है? तूने तो हमेशा हमारा ख्याल रखा है।

नहीं मां जी, शालिनी ने सिर उठाकर सास की ओर देखा। जब मेरी अपनी मां पर बीती और मैंने उनकी आंखों में वही बेबसी देखी जो शायद हर दिन आपकी आंखों में होती थी, तब मुझे अपनी गलती समझ आई। जब खुद पर पड़ती है ना, तब इंसान को दूसरों का दर्द दिखता है। अब आप कहीं नहीं जाएंगी। यह घर आपका है, आलोक और सीमा से भी पहले आपका है। आप इसी घर में रहेंगी, हमेशा हमारे साथ। अगर आपकी सेवा में मुझसे कोई कमी रह गई हो, तो अपनी नादान बेटी समझकर मुझे माफ कर दीजिए।

रसोई की चौखट पर खड़ी देवरानी सीमा की आंखें भी भर आईं। कौशल्या देवी ने शालिनी को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उनके आंसुओं ने शालिनी के माथे के सारे अपराधबोध को धो दिया। बुजुर्गों का दिल समंदर जैसा गहरा और माफ करने वाला होता है, यह बात उस दिन शालिनी ने साक्षात महसूस की।

शालिनी वहीं नहीं रुकी। शाम को उसने अपनी भाभी नीलिमा को फोन मिलाया।

भाभी, शालिनी की आवाज में अब कोई तल्खी नहीं थी, सिर्फ एक गहरा ठहराव था। आपने कल मुझे जो आईना दिखाया, उसके लिए आपका शुक्रिया। मैं अपनी सास से माफी मांग चुकी हूं और अब वे हमेशा मेरे साथ सम्मान से रहेंगी। भाभी, मैं आपको कोई हुक्म नहीं दे रही, बस एक छोटी सी बात कहना चाहती हूं। आज हम जो बीज बोएंगे, कल हमारे बच्चे वही फसल काटेंगे। मां ने सुमित और भैया को पालने में अपनी पूरी जवानी लगा दी। आज जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत है, तो हमें उनका सहारा बनना चाहिए, उनका बंटवारा नहीं करना चाहिए। बाकी आपकी मर्जी, अगर आपको बोझ लगता है, तो मैं अपने पति से बात करके मां को अपने पास अजमेर बुलाने के लिए तैयार हूं, लेकिन उन्हें किसी पर मोहताज नहीं होने दूंगी।

नीलिमा फोन के उस पार खामोश रही। शालिनी की विनम्रता और अपनी गलती स्वीकारने के साहस ने नीलिमा के दिल पर गहरा असर किया। उसे लगा कि जो ननद कल तक हक जता रही थी, आज उसने झुककर बड़प्पन दिखाया है। नीलिमा का अहंकार पिघल गया।

दो दिन बाद सुमित का फोन शालिनी के पास आया। सुमित ने भावुक होकर बताया कि नीलिमा ने खुद जाकर मां के पैर छुए हैं और कह दिया है कि मां अब कहीं नहीं जाएंगी, वे यहीं अपने पुराने घर में रहेंगी और मयंक भैया सिर्फ छुट्टियों में मिलने आया करेंगे।

घर की दीवारें वही थीं, लेकिन अब उनके भीतर रिश्तों की गर्माहट लौट आई थी। शालिनी ने खिड़की से बाहर देखा, धूप अब तीखी नहीं, सुकून देने वाली लग रही थी।

क्या आपने भी कभी अपने आसपास बुजुर्गों को इस तरह तारीखों और घरों में बंटते देखा है? आपको क्या लगता है, माता-पिता की सेवा जिम्मेदारी है या सौभाग्य? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : गीता वाधवानी

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