उर्मिला का दिल भीतर तक रो पड़ा। जिस बेटे को उन्होंने फूलों की तरह सहेजा था, वह इस बदबूदार माहौल और गंदी लतों की गिरफ्त में फंसा हुआ था। किसी भी सामान्य माँ की तरह उर्मिला का पहला आवेग चीखने-चिल्लाने, रोने और बेटे को कोसने का हो सकता था। लेकिन उर्मिला ने असाधारण संयम का परिचय दिया। वह जानती थीं कि यदि उन्होंने इस समय गुस्सा दिखाया, तो मानव पूरी तरह विद्रोही हो जाएगा और शायद हमेशा के लिए उनके हाथ से निकल जाएगा। दलदल में फंसे व्यक्ति पर चिल्लाने से वह बाहर नहीं निकलता, बल्कि उसे निकालने के लिए मजबूती से हाथ पकड़ना पड़ता है।
प्रकाश नारायण और उनकी धर्मपत्नी उर्मिला के जीवन का एकमात्र केंद्र बिंदु उनका इकलौता बेटा मानव था। प्रकाश जी रेलवे में लेखा अधिकारी के पद पर कार्यरत थे और उर्मिला एक कुशल गृहणी थीं, जिनका संपूर्ण संसार घर की चारदीवारी और मानव की सुख-सुविधाओं के इर्द-गिर्द ही घूमता था। मानव बचपन से ही पढ़ाई में कुशाग्र था। दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं में उसने पूरे शहर में अव्वल स्थान प्राप्त किया था। बचपन से ही माता-पिता का यह सपना था कि मानव देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थान यानी आईआईटी में प्रवेश ले और परिवार का नाम रोशन करे। खुद मानव भी कम्प्यूटर साइंस का इंजीनियर बनने के ख्वाब देखा करता था।
जब मानव बारहवीं कक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर गया, तो घर में गहन विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि उसे प्रतियोगी परीक्षा की सघन तैयारी के लिए इंदौर भेजा जाए। इंदौर मध्य भारत का एक प्रमुख शैक्षणिक केंद्र माना जाता था, जहाँ हजारों छात्र अपने भविष्य की नींव रखने जाते थे।
जाने का दिन जब नजदीक आया, तो उर्मिला का कलेजा मुँह को आने लगा। मानव को उन्होंने कभी खुद से एक दिन के लिए भी अलग नहीं किया था। सुबह आँखें खुलते ही गर्म दूध का गिलास उसके हाथों में थमाना, कपड़ों की इस्त्री से लेकर जूतों के फीते तक का ध्यान रखना—उर्मिला ने कभी मानव को किसी घरेलू काम के लिए हाथ तक नहीं लगाने दिया था। यहाँ तक कि खुद पानी का गिलास उठाकर पीने की आदत भी उसे नहीं थी। पिता प्रकाश जी उसे बार-बार समझाते कि बाहर की दुनिया में अकेले रहना सीखना होगा, मगर माँ की ममता हमेशा उसके आगे ढाल बनकर खड़ी हो जाती थी।
इंदौर के विजय नगर इलाके में एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान के पास मानव के लिए एक पीजी कमरा किराए पर लिया गया। सामान व्यवस्थित कर जब माता-पिता के लौटने की घड़ी आई, तो मानव फूट-फूट कर रो पड़ा। माँ की साड़ी का पल्लू पकड़कर वह किसी छोटे बालक की भाँति सिसक रहा था। उर्मिला ने भी भारी मन और नम आँखों से उसे सीने से लगाया और ढांढस बंधाया कि यह त्याग उसके स्वर्णिम भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।
शुरुआती दो-तीन महीनों तक मानव की दिनचर्या पूरी तरह घर के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। वह दिन में कम से कम चार बार अपनी माँ को फोन करता था। कभी मेस के बेस्वाद खाने की शिकायत करता, तो कभी कपड़े धोने और कमरा साफ करने की जद्दोजहद में उसकी आँखों से आँसू बह निकलते। उर्मिला घंटों फोन पर रहकर उसका हौसला बढ़ातीं। जब भी वह कहता कि उसका मन नहीं लग रहा, उर्मिला उसे समझातीं कि मेहनत के दिन थोड़े ही होते हैं, एक बार सफलता मिल गई तो सारा संघर्ष सार्थक हो जाएगा। मानव हर रविवार को होने वाले टेस्ट के अंक भी सबसे पहले अपनी माँ को ही बताता था। उसके अंक अच्छे आ रहे थे और सब कुछ एक तयशुदा पटरी पर चलता दिख रहा था।
किंतु, छह महीने बीतते-बीतते हालात में एक सूक्ष्म और अप्रत्याशित बदलाव आना शुरू हुआ। मानव के फोन कॉल्स की संख्या दिन-ब-दिन घटने लगी। पहले जो लड़का दिन में चार बार बात किए बिना सो नहीं पाता था, अब दो-दो दिन तक उसका कोई संदेश तक नहीं आता था। जब उर्मिला चिंतित होकर स्वयं फोन लगातीं, तो वह झल्लाते हुए कहता, “मम्मी, आप बार-बार फोन करके मुझे परेशान मत किया करो। यहाँ बहुत पढ़ाई का दबाव है, लेक्चर्स रहते हैं, लाइब्रेरी में बैठना पड़ता है।”
उर्मिला को शुरू में लगा कि शायद सचमुच पढ़ाई का तनाव बढ़ गया है, इसलिए वह अपने मन को समझा लेतीं। लेकिन धीरे-धीरे मानव का व्यवहार और अधिक रूखा होता चला गया। जब भी उसका फोन आता, तो केवल औपचारिकता निभाने के लिए या फिर अतिरिक्त पैसों की माँग करने के लिए। कभी किताबों के नाम पर, कभी विशेष टेस्ट सीरीज के बहाने, तो कभी लैपटॉप अपग्रेड करने के लिए वह लगातार पैसों की माँग करने लगा।
प्रकाश जी को जब संस्थान से मासिक प्रगति रिपोर्ट का ई-मेल मिला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। मानव जो पहले शीर्ष पचास छात्रों में रहता था, अब निचले पायदानों पर खिसक चुका था। कई महत्वपूर्ण टेस्ट्स में उसकी अनुपस्थिति दर्ज थी। प्रकाश जी ने जब इस बारे में मानव से कड़ाई से बात करनी चाही, तो उसने नेटवर्क की समस्या का बहाना बनाकर फोन काट दिया और फिर दो दिनों तक फोन बंद कर लिया।
उस रात उर्मिला को एक पल के लिए भी नींद नहीं आई। एक माँ का अंतर्मन कह रहा था कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। केवल पढ़ाई का दबाव किसी बच्चे को अपने माता-पिता से इतना दूर और आक्रामक नहीं बना सकता। उर्मिला ने प्रकाश जी के सामने अपना दृढ़ संकल्प रखा, “मैं इंदौर जा रही हूँ। मानव को मेरी जरूरत है। वह भटक रहा है या किसी गहरी मुसीबत में है, मैं घर बैठकर तमाशा नहीं देख सकती। एक माँ ही अपने बच्चे को इस भंवर से निकाल सकती है।”
प्रकाश जी ने दफ्तर की व्यस्तताओं के कारण असमर्थता जताई, लेकिन उर्मिला के फैसले का पूरा समर्थन किया। अगली ही सुबह उर्मिला ने आवश्यक सामान बाँधा और बिना किसी पूर्व सूचना के इंदौर जाने वाली बस में सवार हो गईं। पूरे रास्ते उनके मन में कई तरह के विचार उमड़ते-घुमड़ते रहे। उन्हें लगा कि जब मानव अचानक अपनी माँ को अपने सामने देखेगा, तो वह खुशी से उछल पड़ेगा, अपनी सारी परेशानियाँ उनके आँचल में उड़ेल देगा और घर के बने स्वादिष्ट व्यंजनों को देखकर उसका चेहरा खिल उठेगा।
दोपहर के समय जब उर्मिला ने मानव के कमरे का दरवाजा खटखटाया, तो अंदर से कई मिनटों तक कोई हलचल नहीं हुई। दोबारा जोर से खटखटाने पर दरवाजा धीरे से खुला। सामने मानव खड़ा था, लेकिन यह वह मानव नहीं था जिसे उर्मिला ने छह महीने पहले विदा किया था। उसकी आँखें लाल और सूजी हुई थीं, बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई और चेहरे का तेज पूरी तरह गायब था।
माँ को सामने खड़ा देखकर मानव के चेहरे पर खुशी या आश्चर्य की एक भी लकीर नहीं उभरी, बल्कि उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। एक गहरा खौफ और घबराहट उसके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी।
“मम्मी! आप? यहाँ… इस वक्त? बिना बताए क्यों आ गईं?” मानव की आवाज में स्वागत का भाव नहीं, बल्कि एक तीखी कड़वाहट और झुंझलाहट थी।
उर्मिला भीतर कदम बढ़ाते हुए बोलीं, “बेटा, कई दिनों से तुमसे ठीक से बात नहीं हुई थी, तो रहा नहीं गया। सोचा तुम्हें सरप्राइज दूँ।”
कमरे के भीतर कदम रखते ही उर्मिला का दम घुटने लगा। कमरे की खिड़कियाँ बंद थीं और भारी परदे गिरे हुए थे। कमरे में सिगरेट के धुएँ की तीखी दुर्गंध रची-बसी थी। फर्श पर जगह-जगह फास्ट फूड के खाली डिब्बे, कोल्ड ड्रिंक के कैन और डस्टबिन के पास बीयर की दो खाली बोतलें पड़ी थीं। मेज पर किताबों के ढेर के बीच ताश के पत्ते और ऑनलाइन गेमिंग के पर्चे बिखरे पड़े थे।
मानव ने हबड़ा-तबड़ा में चीजें समेटने की कोशिश की और बदहवासी में बोला, “मम्मी, यह सब मेरे एक दोस्त का सामान है, वह कल रात यहाँ रुका था। आपको इस तरह अचानक नहीं आना चाहिए था। अब मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ जिसे आपकी चौबीस घंटे की निगरानी की जरूरत हो। मैं अपनी जिंदगी संभाल सकता हूँ।”
उर्मिला का दिल भीतर तक रो पड़ा। जिस बेटे को उन्होंने फूलों की तरह सहेजा था, वह इस बदबूदार माहौल और गंदी लतों की गिरफ्त में फंसा हुआ था। किसी भी सामान्य माँ की तरह उर्मिला का पहला आवेग चीखने-चिल्लाने, रोने और बेटे को कोसने का हो सकता था। लेकिन उर्मिला ने असाधारण संयम का परिचय दिया। वह जानती थीं कि यदि उन्होंने इस समय गुस्सा दिखाया, तो मानव पूरी तरह विद्रोही हो जाएगा और शायद हमेशा के लिए उनके हाथ से निकल जाएगा। दलदल में फंसे व्यक्ति पर चिल्लाने से वह बाहर नहीं निकलता, बल्कि उसे निकालने के लिए मजबूती से हाथ पकड़ना पड़ता है।
उर्मिला ने एक गहरी साँस ली, अपने आँसुओं को भीतर ही पी लिया और शांत स्वर में कहा, “ठीक है मानव, जो बीत गया सो बीत गया। लेकिन अब जब मैं आ गई हूँ, तो कुछ दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगी। जब तक तुम्हारी परीक्षाएँ समाप्त नहीं हो जातीं, मैं यहीं रहकर तुम्हारा खाना-पीना और देखभाल संभालूँगी।”
मानव के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी स्वच्छंदता, उसकी तथाकथित आजादी पर यह सबसे बड़ा आघात था।
अगले कुछ हफ्ते उर्मिला के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। मानव ने हर संभव प्रयास किया कि किसी तरह माँ तंग आकर वापस लौट जाएँ। वह बात-बात पर चिढ़ जाता। उर्मिला सुबह प्यार से नाश्ता बनाकर देतीं, तो वह उसमें कमियाँ निकालता, “यह क्या बना दिया, मुझसे नहीं खाया जाता यह सब।” कई बार वह खाने की थाली को एक तरफ सरका देता और भूखा ही लेट जाता। जब उर्मिला उसे सुबह जल्दी उठकर पढ़ने के लिए कहतीं, तो वह चिल्ला उठता, “आप मेरी जिंदगी में दखल देना बंद कीजिए! मुझे रात में पढ़ने की आदत है। आपके यहाँ रहने से मेरा दम घुटता है, मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे सिर पर चौबीसों घंटे कोई नंगी तलवार लटकी हुई है।”
मानव के वे दोस्त, जिनके साथ वह देर रात तक पार्टियों में पैसे उड़ाता था और सिगरेट के कश खींचता था, अब कमरे के बाहर से ही लौट जाते थे क्योंकि कमरे में एक सतर्क माँ की मौजूदगी थी। उर्मिला ने मानव के हाथ में अतिरिक्त पैसे देना पूरी तरह बंद कर दिया था। घर का राशन और जरूरी खर्च वह खुद देखती थीं। फिजूलखर्ची पर रोक और बुरी संगति से अलगाव के कारण मानव के भीतर भारी छटपटाहट थी। वह अक्सर दीवारों पर मुक्के मारता, देर तक खामोश बैठा रहता या माँ को ताने मारता।
उर्मिला महसूस कर रही थीं कि जब नई उम्र के परिंदों को अकेलेपन और बेलगाम आजादी की आदत पड़ जाती है, तो उन्हें अपने ही माता-पिता की फिक्र और मार्गदर्शन किसी जेल की सलाखों जैसा बंधन प्रतीत होने लगता है। उन्हें लगता है कि बड़े-बुजुर्ग उनकी खुशी के दुश्मन हैं।
लेकिन उर्मिला एक दृढ़ निश्चयी माँ थीं। वे हार मानने वालों में से नहीं थीं। उन्होंने मानव के किसी भी ताने का जवाब कटुता से नहीं दिया। जब मानव गुस्सा करता, तो वह चुप रह जातीं। जब वह रात को देर से जागता, तो वह बिना कुछ कहे उसके लिए गर्म बादाम वाला दूध बनाकर ले आतीं। जब वह पढ़ाई से जी चुराने की कोशिश करता, तो वह चुपचाप एक कोने में बैठकर रामायण या कोई धार्मिक पुस्तक पढ़ने लगतीं, ताकि कमरे का माहौल शांत और सात्विक बना रहे।
धीरे-धीरे, उर्मिला की मूक तपस्या और निस्वार्थ सेवा अपना असर दिखाने लगी। नशे और बुरी संगति का नशा जब धीरे-धीरे उतरने लगा, तो मानव का दिमाग साफ होने लगा। उसने देखा कि माँ सुबह पाँच बजे उठती हैं, उसके लिए पौष्टिक भोजन बनाती हैं, उसके कपड़े धोती हैं और रात को जब तक वह सो नहीं जाता, जागती रहती हैं। उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं होती, केवल एक मौन प्रार्थना होती है।
एक रात, मानव की तबीयत अचानक बिगड़ गई। नशे की लत छूटने के कारण होने वाले ‘विड्रॉल सिम्पटम्स’ और अत्यधिक मानसिक तनाव के चलते उसे तेज बुखार चढ़ आया। वह जाड़े से कांपने लगा और उल्टियाँ करने लगा। उस पूरी रात उर्मिला एक पल के लिए भी नहीं सोईं। उन्होंने ठंडे पानी की पट्टियाँ उसके माथे पर रखीं, उसकी पीठ सहलाई और जब वह दर्द से कराहता, तो अपने आँसुओं को उसकी चादर में छुपाती रहीं। आधी रात को जब मानव की आँख खुली, तो उसने देखा कि माँ जमीन पर बैठकर उसके पैरों को हल्के-हल्के दबा रही थीं और उनके होठों पर ईश्वर से अपने बेटे की सलामती की मूक प्रार्थनाएँ थीं।
उस एक दृश्य ने मानव के भीतर की सारी कठोरता, सारा अहंकार और सारी उद्दंडता को एक झटके में पिघलाकर रख दिया। उसे अपनी नीचता और माँ के प्रति किए गए दुर्व्यवहार पर गहरा पश्चाताप हुआ। वह फूट-फूट कर रोने लगा।
उसने उठकर अपनी माँ के दोनों हाथ पकड़ लिए और रोते हुए बोला, “माँ, मुझे माफ कर दो! मैं बहुत बुरा बेटा हूँ। मैंने तुम्हें इतना सताया, इतने ताने मारे, और तुम… तुम फिर भी मेरे लिए जाग रही हो? माँ, मैं गलत रास्ते पर चला गया था। अगर तुम यहाँ नहीं आतीं, तो मैं पूरी तरह बर्बाद हो जाता। मेरे दोस्त मुझे जुए और नशे की लत में धकेल रहे थे। मुझे बचा लो माँ!”
उर्मिला ने उसे अपने सीने से लगा लिया। उस रात माँ और बेटे के आँसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो डाले। उर्मिला ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, माँ कभी अपने बच्चे से नाराज नहीं होती। जब तक साँस है, माँ अपने बच्चे को कभी अँधेरे में नहीं गिरने देगी। जो हुआ उसे भूल जाओ, अब एक नई शुरुआत करो।”
उस दिन के बाद से मानव का पूर्ण कायाकल्प हो गया। उसके मन से भटकाव का पर्दा हट चुका था और अब उसके सामने केवल उसका लक्ष्य था। उसने नियमित अध्ययन शुरू किया। पुराने गलत दोस्तों के नंबर ब्लॉक कर दिए और अपनी पूरी ऊर्जा किताबों में झोंक दी। उर्मिला वहीं रहीं, एक मजबूत चट्टान की तरह उसकी दिनचर्या को संभालती रहीं। हर दिन वह उसका हौसला बढ़ातीं और जब भी वह मॉक टेस्ट में कम अंक लाता, तो वह कहतीं—’करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान’।
महीनों की इस मौन साधना और कठोर परिश्रम का दिन आखिरकार आ ही गया।
आईआईटी प्रवेश परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित हुआ। शाम के समय जब प्रकाश जी का जबलपुर से फोन आया, तो उनकी आवाज खुशी से कांप रही थी। प्रकाश जी ने चिल्लाकर कहा, “उर्मिला! मानव ने कर दिखाया! उसने पूरे राज्य में शीर्ष रैंक हासिल की है! उसे आईआईटी दिल्ली में कम्प्यूटर साइंस मिल रहा है!”
खबर सुनते ही मानव स्तब्ध रह गया। अगले ही पल वह अपनी माँ के चरणों में गिर पड़ा और उनके पाँव पकड़कर बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगा।
“माँ! यह सफलता मेरी नहीं, यह तुम्हारी है। अगर उस दिन तुम उस गंदे कमरे में आकर मेरे अपमान और तानों को सहते हुए डटी न रहतीं, तो आज तुम्हारा बेटा किसी सड़क पर बर्बाद पड़ा होता। तुमने मुझे एक नई जिंदगी दी है माँ। तुम केवल मेरी माँ नहीं, साक्षात ईश्वर का रूप हो जिसने अपने बच्चे को नरक के मुहाने से खींचकर शिखर पर पहुँचा दिया।”
उर्मिला ने झुककर बेटे को उठाया, उसका माथा चूमा और नम आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, जब बच्चा चलना सीखता है और गिरता है, तो माँ हाथ थामती है। जब वह बड़ा होकर फिसलने लगता है, तब भी माँ का ही फर्ज होता है कि वह ढाल बनकर खड़ी हो जाए। आज मेरा जीवन सफल हो गया। तुम्हारी खुशी और तुम्हारा उज्ज्वल भविष्य ही तो हमारा संसार है।”
दूर जबलपुर से प्रकाश जी फोन पर दोनों की सिसकियों और खुशियों को महसूस कर रहे थे। एक परिवार का विश्वास, धैर्य और माँ का अडिग प्रेम अंततः अज्ञान और भटकाव के अंधकार पर विजय प्राप्त कर चुका था।
अगर आपको यह कहानी पढ़कर लगा कि आधुनिक जीवनशैली और एकाकीपन में हमारे बच्चों को वास्तव में संस्कारों और पारिवारिक साथ की कितनी आवश्यकता होती है, तो अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। क्या माता-पिता का बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखना और दखल देना सही है या इसे उनकी स्वतंत्रता का हनन माना जाना चाहिए? अपनी राय जरूर लिखें!
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही मार्मिक और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।