लचकता कदम, संभलता विश्वास

यह सुनते ही अनुराग के होश उड़ गए। वह असहाय होकर रोने लगा। उसने कांपते हाथों से अपना फोन ढूंढने की कोशिश की और सबसे पहले शिखा का नंबर मिलाया। उसने रोते हुए शिखा को अपनी हालत बताई और कहा, “शिखा, मैं अस्पताल में हूं। डॉक्टर कह रहे हैं कि मैं शायद कई महीनों तक चल भी न पाऊं। मुझे तुम्हारी जरूरत है, क्या तुम आ सकती हो?”

फोन के उस पार कुछ पल का सन्नाटा रहा। फिर शिखा की बेरुखी से भरी आवाज आई, “देखो अनुराग, मुझे तुम्हारी हालत सुनकर बहुत बुरा लगा। लेकिन प्रैक्टिकली सोचो, मैं एक अपाहिज इंसान की तीमारदारी करने के लिए अपनी जिंदगी और करियर दांव पर नहीं लगा सकती। हमारे बीच जो भी था, वह दोस्ती तक था। प्लीज अब मुझे फोन मत करना, मैं अपनी जिंदगी में कोई बोझ नहीं उठाना चाहती।” और कॉल कट गई।

 करीब पच्चीस साल पहले जब एक रेल हादसे ने कौशल्या जी के पति को उनसे सदा के लिए छीन लिया था, तब उनकी गोद में केवल तीन साल का अनुराग था। उस वक्त कौशल्या जी की उम्र ही क्या थी, लेकिन उन्होंने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। स्थानीय नगर निगम स्कूल में प्राथमिक शिक्षिका की नौकरी पकड़कर उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। एक अकेले हाथ से घर चलाना और बच्चे को पालना कितना कठिन होता है, यह वही जानती थीं। अनुराग की हर जिद, हर जरूरत को पूरा करने में उन्होंने अपने सुख-चैन की कभी परवाह नहीं की। इसी अति-दुलार और अकेलेपन की परवरिश ने अनुराग के स्वभाव में एक जिद्दीपन भर दिया था। वह जिस बात पर अड़ जाता, उससे पीछे हटना उसके स्वाभिमान पर चोट जैसा लगता था।

समय का पहिया घूमा और अनुराग अब सत्ताईस वर्ष का एक सुदर्शन युवक बन चुका था। भोपाल की एक प्रतिष्ठित ऑटोमोबाइल कंसल्टेंसी कंपनी में उसकी अच्छी नौकरी लग गई थी। कौशल्या जी अब सेवानिवृत्त हो चुकी थीं। घुटनों के दर्द और ढलती उम्र के साथ उनके मन में बस एक ही अभिलाषा बची थी—अनुराग का घर बस जाए। एक ऐसी संस्कारी और सुलझी हुई बहू घर आ जाए, जो न केवल अनुराग की जल्दबाजी और गुस्से को संभाले, बल्कि इस सूने पड़े घर में रौनक लौटा दे।

दूसरी तरफ, अनुराग के दिल की दुनिया कुछ और ही थी। उसके दफ्तर में उसकी एक सहकर्मी थी, शिखा। दोनों अक्सर लंच के समय साथ बैठते, प्रोजेक्ट्स पर लंबी बातें करते। अनुराग के मन में शिखा के प्रति एक अनकहा आकर्षण पनप चुका था। शिखा भी उसे पसंद करती थी, उसकी बुद्धिमत्ता और तीखे नैन-नक्श पर रीझती थी। पर कॉरपोरेट की औपचारिकता और झिझक के चलते दोनों ने कभी खुलकर अपने जज्बातों का इजहार नहीं किया था। अनुराग सोच रहा था कि सही वक्त देखकर वह अपनी मां से शिखा के बारे में बात करेगा।

इधर एक दोपहर, कौशल्या जी पास के मंदिर से लौटते हुए किराना दुकान पर रुकी थीं। तभी अचानक उनकी नजर अपने स्वर्गीय पति के पुराने परिचित प्रभाकर जी की पत्नी मीनाक्षी जी पर पड़ी। प्रभाकर जी कभी उसी मुहल्ले में रहते थे, फिर शहर के दूसरे छोर पर अपना मकान बनाकर चले गए थे। मीनाक्षी जी के साथ उनकी बेटी अदिति भी थी। कौशल्या जी ने देखा कि अदिति बहुत ही शालीन, नीले रंग के साधारण सलवार-सूट में अपनी मां का थैला थामे खड़ी थी। चेहरे पर एक गजब का ठहराव और सादगी थी। कौशल्या जी ने बड़े स्नेह से पूछा, “अरे मीनाक्षी बहन! कितने बरस हो गए। और यह अदिति है न? कितनी बड़ी हो गई! क्या कर रही है आजकल बेटी?”

अदिति ने झुककर कौशल्या जी के चरण छुए और मधुर स्वर में बोली, “नमस्ते चाची जी। बस पिछले महीने ही लाइब्रेरी साइंस में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी हुई है। अब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हूं।” उसकी आवाज की मिठास और नजरों की विनम्रता सीधे कौशल्या जी के दिल में उतर गई। कुछ देर की कुशलक्षेम के बाद वे अपने-अपने रास्ते बढ़ गईं, लेकिन अदिति की वह शांत मूरत कौशल्या जी के जेहन में छप गई।

घर लौटते ही कौशल्या जी ने मीनाक्षी जी को फोन मिला दिया। इधर-उधर की बातों के बाद उन्होंने सीधा सवाल किया, “मीनाक्षी बहन, अदिति के लिए कोई रिश्ता तलाशा है क्या? बहुत प्यारी बच्ची है तुम्हारी।”

मीनाक्षी जी ने आह भरते हुए कहा, “हां कौशल्या दीदी, तलाश तो रहे हैं। पर आज के दौर में सादगी की कद्र किसे है? कोई अच्छा, सुलझा हुआ लड़का मिले तो बात आगे बढ़ाएं। आपकी नजर में कोई सुयोग्य वर हो तो जरूर बताइएगा।”

कौशल्या जी के चेहरे पर संतोष की चमक तैर गई। उन्होंने तुरंत नहीं कहा, पर मन ही मन तय कर लिया कि उनके अनुराग के लिए अदिति से बेहतर कोई नहीं हो सकता। शाम को जब अनुराग ऑफिस से थका-हारा लौटा, तो कौशल्या जी ने चाय की चुस्की के साथ बात छेड़ी, “अनुराग बेटा, अब तुम्हारी उम्र शादी की हो रही है। आज बाजार में प्रभाकर भाई साहब का परिवार मिला था। उनकी बेटी अदिति मुझे बहुत जंची। रूप-रंग भी सुंदर है और संस्कार तो पूछो ही मत। मैं सोच रही हूं तुम्हारी बात पक्की कर दूं।”

अनुराग चौंक पड़ा। उसने हाथ में पकड़ा चाय का कप मेज पर रखते हुए कहा, “मां, अभी इतनी जल्दी क्या है? और वैसे भी, मुझे अपने बारे में खुद सोचने का हक होना चाहिए। मैं ऑफिस में एक लड़की को…”

“बेटा, ऑफिस की चकाचौंध और घर-गृहस्थी चलाने में बड़ा फर्क होता है,” कौशल्या जी ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए दृढ़ता से कहा। “आजकल की हवा खराब है। अपना जाना-पहचाना खानदान हो, संस्कारी लड़की हो तो पूरी जिंदगी सुकून से कटती है। मैंने तुम्हें पाल-पोसकर इतना बड़ा किया है, क्या मेरा इतना भी हक नहीं कि तुम्हारे भले के लिए एक फैसला ले सकूं?”

अनुराग ने अपनी बात रखने की कई कोशिशें कीं, पर मां के आंसुओं और जिद के आगे उसकी एक न चली। मां की भावनात्मक जिद के आगे अनुराग का हठ टूट गया और उसने भारी मन से सिर झुका दिया। अगले दो महीनों के भीतर रस्में पूरी हुईं और धूमधाम से अदिति और अनुराग का विवाह संपन्न हो गया।

शादी की पहली रात जब अनुराग कमरे में दाखिल हुआ, तो लाल जोड़े में घूंघट ओढ़े बैठी अदिति को देखकर उसके मन का सारा भारीपन कुछ पलों के लिए छंट गया। घूंघट उठाने पर अदिति का चेहरा सचमुच किसी शांत नदी की भांति सुंदर और निष्कलंक लग रहा था। अनुराग ने सोचा कि शायद मां का फैसला गलत नहीं था।

अगली सुबह घर में नई शुरुआत की चहल-पहल थी। अदिति सुबह जल्दी उठकर स्नान कर रसोई में पहुंच गई। कौशल्या जी चाय के लिए पानी चढ़ा रही थीं। अदिति ने आगे बढ़कर उनके हाथ से केतली ली और बोली, “मां जी, अब से घर का यह काम आप मुझ पर छोड़ दीजिए। आप आराम से बैठिए, मैं चाय बनाकर लाती हूं।” कौशल्या जी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया।

चाय तैयार कर अदिति ने ट्रे उठाई और अनुराग के कमरे की ओर बढ़ी। फर्श पर बिछी कालीन से उतरकर जब वह नंगे पांव टाइल्स पर आई, तो अनुराग की नजर अनायास ही उसके कदमों पर पड़ी। अदिति के चलने में एक अजीब सी लड़खड़ाहट थी, उसका दायां पैर थोड़ा झुकता था और शरीर में एक स्पष्ट लचक आ जाती थी। अनुराग की त्योरियां चढ़ गईं। उसने बेचैनी से पूछा, “अदिति, तुम्हारे पैरों में कोई चोट लगी है क्या? तुम ऐसे अजीब तरीके से क्यों चल रही हो?”

अदिति के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने सकपकाते हुए नजरें झुका लीं और कांपती आवाज में बोली, “नहीं… चोट नहीं है। दरअसल, बचपन से ही मेरे दोनों पैरों की बनावट में मामूली सा अंतर है। दायां पैर थोड़ा सा छोटा है। इसलिए चलने में यह लचक आती है।”

अनुराग के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने अविश्वास से पूछा, “और यह बात मुझे अब पता चल रही है? शादी के किसी कार्यक्रम में तो ऐसा कुछ नहीं दिखा?”

अदिति ने डरते-डरते सच बयां किया, “क्योंकि खास तौर पर बनी आर्थोपेडिक चप्पलों और हील की एक अंदरूनी परत के सहारे मेरा चलना एकदम सामान्य दिखता है। शादी की सभी रस्मों में मैंने वही जूते-चप्पल पहने थे। और… और मां जी को तो यह बात पहले से मालूम थी। मेरी मम्मी ने शादी की बात तय होने से पहले ही उन्हें सब बता दिया था।”

“मां को सब पता था?” अनुराग की आवाज में आक्रोश भर गया। वह एक झटके में कमरे से बाहर निकला और आंगन में बैठी कौशल्या जी के सामने जाकर चीख पड़ा, “मां! यह सब क्या है? आपने मुझसे इतना बड़ा सच छिपाया? अदिति के पैर में दोष है और आपने मुझे बिना बताए धोखे में रखकर मेरी जिंदगी बांध दी?”

कौशल्या जी ने उसे शांत करने की कोशिश की, “बेटा, कोई दोष नहीं है। केवल आधा इंच का मामूली अंतर है जो चप्पल पहनने पर दिखता भी नहीं। इतनी सुशील, पढ़ी-लिखी और सेवाभावी लड़की आज के जमाने में कहां मिलती है? इस छोटी सी बात को बतंगड़ मत बनाओ।”

लेकिन अनुराग के अंदर का जिद्दी इंसान जाग चुका था। उसे लगा कि उसकी पसंद को दबाकर उसके साथ धोखा किया गया है। उसका पौरुष और उसका अहंकार आहत हो चुका था। उसने उसी क्षण अदिति से बात करना बंद कर दिया।

दिन बीतने लगे, पर घर का माहौल भारी होता चला गया। अदिति ने हर मुमकिन कोशिश की कि वह अनुराग का दिल जीत सके। वह उसके कपड़े संभालती, उसकी पसंद का नाश्ता बनाती, उसके दफ्तर से लौटने पर पानी का गिलास लेकर दरवाजे पर खड़ी रहती, लेकिन अनुराग उसे देखते ही मुंह फेर लेता या गुस्से में कमरे से बाहर चला जाता। उसकी लचकती चाल अब अनुराग को अपनी हार जैसी लगती थी।

इस खिंचाव के बीच, अनुराग का मन दफ्तर में शिखा की तरफ और ज्यादा झुकने लगा। एक दिन कैंटीन में कॉफी पीते हुए अनुराग ने अपने दिल का सारा गुबार शिखा के सामने निकाल दिया। उसने अपनी शादी की मजबूरी और अदिति की शारीरिक खामी की बात भी कह डाली। शिखा जो अनुराग को खोने के मलाल में थी, उसे एक मौका दिखा। उसने अनुराग की सहानुभूति बटोरते हुए उसके कान भरने शुरू कर दिए, “अनुराग, तुम इतने हैंडसम और काबिल हो। तुम अपनी पूरी जिंदगी एक ऐसी लड़की के साथ कैसे बिता सकते हो जिसके साथ बाहर निकलते हुए भी तुम्हें झिझक हो? तुम्हारी मां ने तुम्हारे साथ सरासर नाइंसाफी की है। तुम्हें ऐसी बेमेल शादी से बाहर निकलना चाहिए। तलाक का फैसला लो, मैं तुम्हारे साथ खड़ी हूं।”

शिखा की बातों ने अनुराग के जले पर नमक छिड़कने का काम किया। वह अब घर पर और ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगा। इधर शादी को मुश्किल से डेढ़ महीना बीता था कि एक सुबह अदिति को रसोई में अचानक चक्कर आ गया और उसे तेज उल्टियां होने लगीं। कौशल्या जी घबरा गईं। उन्होंने अदिति को सहारा देकर पलंग पर लिटाया। उस समय अनुराग ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था। कौशल्या जी ने दौड़कर कहा, “अनुराग, जरा गाड़ी निकालो बेटा। अदिति की तबीयत बहुत खराब लग रही है, इसे फौरन डॉक्टर के पास ले जाना होगा।”

अनुराग ने रूखेपन से अपनी घड़ी बांधते हुए कहा, “मुझे देर हो रही है, आज बहुत जरूरी प्रेजेंटेशन है। कोई कैब बुला लीजिए या पड़ोस के किसी को कह दीजिए, मेरे पास इन सब फालतू ड्रामों के लिए वक्त नहीं है।” यह कहकर वह दरवाजा जोर से पटकते हुए बाहर निकल गया।

अदिति की आंखों से आंसू बह निकले, पर उसने कौशल्या जी का हाथ थामकर कहा, “मां जी, आप चिंता मत कीजिए। शायद कमजोरी है, थोड़ी देर में ठीक हो जाऊंगी।” कौशल्या जी का दिल अपनी ही परवरिश पर रो पड़ा।

दोपहर में जब अनुराग दफ्तर से एक क्लाइंट मीटिंग के लिए निकल रहा था, तभी एक व्यस्त चौराहे पर उसकी गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हो गया। एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी कार को साइड से जोरदार टक्कर मार दी। कार कई बार पलटते हुए सड़क किनारे जा गिरी। अनुराग खून से लथपथ होकर बेहोश हो गया।

जब अनुराग की आंख खुली, तो चारों तरफ सफेद दीवारें थीं और दवाइयों की तेज गंध फैली हुई थी। उसके दोनों पैरों पर भारी प्लास्टर बंधा था और शरीर में असहनीय दर्द उठ रहा था। पास ही डॉक्टर खड़े थे। डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, “मिस्टर अनुराग, आप खुशकिस्मत हैं कि जान बच गई। लेकिन आपकी रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से और दोनों पैरों में मल्टीपल फ्रैक्चर हुए हैं। अगले छह महीने से एक साल तक आप बिस्तर से हिल भी नहीं पाएंगे। शायद दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने के लिए आपको लंबा संघर्ष करना पड़े।”

यह सुनते ही अनुराग के होश उड़ गए। वह असहाय होकर रोने लगा। उसने कांपते हाथों से अपना फोन ढूंढने की कोशिश की और सबसे पहले शिखा का नंबर मिलाया। उसने रोते हुए शिखा को अपनी हालत बताई और कहा, “शिखा, मैं अस्पताल में हूं। डॉक्टर कह रहे हैं कि मैं शायद कई महीनों तक चल भी न पाऊं। मुझे तुम्हारी जरूरत है, क्या तुम आ सकती हो?”

फोन के उस पार कुछ पल का सन्नाटा रहा। फिर शिखा की बेरुखी से भरी आवाज आई, “देखो अनुराग, मुझे तुम्हारी हालत सुनकर बहुत बुरा लगा। लेकिन प्रैक्टिकली सोचो, मैं एक अपाहिज इंसान की तीमारदारी करने के लिए अपनी जिंदगी और करियर दांव पर नहीं लगा सकती। हमारे बीच जो भी था, वह दोस्ती तक था। प्लीज अब मुझे फोन मत करना, मैं अपनी जिंदगी में कोई बोझ नहीं उठाना चाहती।” और कॉल कट गई।

शिखा के वे शब्द अनुराग के सीने में खंजर की तरह चुभ गए। जिस खूबसूरती, आधुनिकता और तथाकथित समझदारी के पीछे वह भाग रहा था, उसका खोखलापन एक झटके में बेनकाब हो चुका था।

अगले ही पल वार्ड का दरवाजा खुला। कौशल्या जी बदहवास सी अंदर आईं और उनके पीछे-पीछे अदिति अपने उसी लचकते कदमों से दौड़ती हुई आई। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था, मांग का सिंदूर पसीने से बिखर गया था, पर आंखों में अनुराग को खो देने का अथाह खौफ था। उसने बिना एक पल गंवाए अनुराग का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और बोली, “आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैं आ गई हूं न। आपको कुछ नहीं होने दूंगी।”

अनुराग शर्म के मारे अपनी नजरें नहीं उठा सका। जिस औरत को उसने मामूली सी लचक के लिए दुत्कारा था, जिसे वह घर में एक पल देखने को तैयार नहीं था, वही उसके सबसे काले दौर में उसकी ढाल बनकर खड़ी थी।

अस्पताल से घर आने के बाद असली परीक्षा शुरू हुई। अनुराग पूरी तरह बिस्तर पर निर्भर हो चुका था। करवट बदलने से लेकर, समय पर दवाइयां देना, स्पंज बाथ कराना और मल-मूत्र की सफाई तक—अदिति ने बिना एक शिकन के सब कुछ अपने हाथों में ले लिया। कौशल्या जी की उम्र हो चुकी थी, इसलिए अदिति ने घर की रसोई और अनुराग की सेवा का सारा जिम्मा अकेले उठा लिया। वह रात-रात भर जागकर अनुराग के पैरों की सिकाई करती, उसे दर्द में तड़पते देख खुद रो पड़ती। अनुराग चिढ़कर कभी कड़वे बोल भी बोल देता, तो अदिति बस एक शांत मुस्कान के साथ उसका माथा चूम लेती और कहती, “गुस्सा मत कीजिए, आपकी दवा का असर कम हो जाएगा।”

अदिति ने फिजियोथेरेपिस्ट से खुद कसरत के तरीके सीखे। वह रोज सुबह-शाम अनुराग को सहारा देकर धीरे-धीरे पैरों को हिलाने का अभ्यास कराती। जब कभी अनुराग हिम्मत हार जाता और कहता, “मैं कभी नहीं चल पाऊंगा अदिति, मैं एक बोझ बन गया हूं,” तो अदिति उसकी आंखों में देखकर दृढ़ता से कहती, “मेरे एक पैर में लचक थी तो आपने मुझे आधा समझ लिया था न? देखिए, आज भगवान ने मुझे आपके दोनों पैरों की ताकत बना दिया है। आप उठेंगे, और जरूर चलेंगे।”

अदिति की यह निष्ठा, उसका अगाध समर्पण और उसकी पवित्र सहनशीलता अनुराग के पत्थर जैसे दिल को रोज थोड़ा-थोड़ा पिघला रही थी। उसे अपनी जिद्दी फितरत, अपनी संकीर्ण सोच और अपने व्यवहार पर बेइंतहा पछतावा होने लगा। वह रातों को अदिति को थकावट से चूर फर्श पर ही सोता देखता, तो उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकलते।

आठ महीने की अथक तपस्या रंग लाई। एक शाम, हल्की बारिश के बाद आंगन में ताजी हवा बह रही थी। अदिति ने अनुराग को व्हीलचेयर से सहारा देकर खड़ा किया। अनुराग ने कांपते पैरों को जमीन पर टिकाया। दर्द की एक लहर उठी, पर अदिति ने उसके दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में मजबूती से कस लिया। उसने कहा, “मेरी तरफ देखिए अनुराग। एक कदम आगे बढ़ाइए। मैं गिरने नहीं दूंगी।”

अनुराग ने अपना दायां पैर उठाया और एक थरथराता कदम आगे बढ़ाया। फिर दूसरा कदम। वह लड़खड़ाया, पर अदिति का कंधा चट्टान की तरह उसके साथ था। अनुराग अपने पैरों पर खड़ा था। उसने अदिति के चेहरे को देखा, जिसकी आंखों में जीत के आंसू छलक रहे थे।

अनुराग अब खुद को रोक नहीं सका। वह वहीं अदिति के सीने से लगकर फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने हाथ जोड़कर भरे गले से कहा, “अदिति, मुझे माफ कर दो। मैं कितना अंधा था जो तुम्हारी शारीरिक लचक को तुम्हारा दोष समझ बैठा, जबकि असली खोट तो मेरी अपनी सोच और मेरी नजरों में था। जिसे मैं अपनी कमजोरी समझकर ठुकरा रहा था, वही आज मेरी सबसे बड़ी ताकत बनकर मुझे नई जिंदगी दे गई। तुमने मुझे सिर्फ चलना नहीं सिखाया, तुमने मुझे एक इंसान बनाया है।”

कौशल्या जी दरवाजे की चौखट पर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनकी आंखों में संतोष और आनंद के आंसू थे। आज उनका घर सच मायने में बस चुका था। प्रेम किसी शरीर के सांचे या बेदाग चाल का मोहताज नहीं होता, वह तो आत्मा के समर्पण और संकट में एक-दूसरे का हाथ थामे रहने का नाम है।

हर इंसान में कोई न कोई कमी जरूर होती है, लेकिन जो दिल से पूरा हो, वही जीवन की राहों में सच्चा हमसफर साबित होता है। क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में बाहरी पूर्णता से कहीं ज्यादा जरूरी मन की सुंदरता और समर्पण होता है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : मंजू ओमर

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