रेशमी धागों का अनकहा बंधन

माधव की आवाज सुनते ही अनिका के होश उड़ गए। ऐसा लगा मानो किसी ने उस पर घड़ों ठंडा पानी उड़ेल दिया हो। उसके हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। कमरे में एक गहरा, दमघोंटू सन्नाटा छा गया। शालिनी भी घबरा गई और नजरें चुराने लगी।

अनिका का चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसे यह समझने में एक पल भी नहीं लगा कि माधव ने उसकी सारी बातें सुन ली हैं। वही माधव, जो उसे दुनिया में सबसे ज्यादा चाहता था, जिसने कभी उस पर ऊँची आवाज में बात नहीं की थी, जिसने उसकी हर सांस को अपनी खुशी माना था—आज अनिका ने उसी हमसफर की पीठ पीछे एक बाहरी इंसान के सामने ऐसी घटिया बुराई कर दी थी!

 शादी से पहले जब अनिका अपने पुराने, पारंपरिक माहौल वाले घर में पली-बढ़ी थी, तब उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसे जिंदगी के इस नए सफर में इतनी आजादी और इतना प्यार करने वाला परिवार मिलेगा। उसके मायके में आज भी रीति-रिवाजों और पुरानी मान्यताओं की भारी बेड़ियाँ थीं, जहाँ बहुओं और बेटियों को हर बात के लिए चार बार सोचना पड़ता था। मगर ससुराल की दहलीज लांघते ही उसके सारे डर काफूर हो गए थे।

अनिका की सास कल्याणी जी बेहद सुलझी हुई, प्रगतिशील और ममतामयी महिला थीं। उन्होंने शादी के पहले दिन ही अनिका से कह दिया था कि यह घर उसका अपना है, यहाँ किसी पर्दे, किसी झिझक या बंदिश की कोई जगह नहीं है। अनिका को जो पहनना हो, जो खाना हो, जब सोना हो—वह पूरी तरह से स्वतंत्र थी। कभी अनिका कुछ कहने की सोचती, उससे पहले ही कल्याणी जी उसकी पसंद की चीजें सामने रख देती थीं।

और अनिका के पति, माधव, तो जैसे उसके लिए ही बने थे। माधव एक प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत थे। वे अनिका को पलकों पर बिठाकर रखते थे। अनिका की एक मुस्कान पर वे अपनी सारी खुशियाँ न्योछावर करने को तैयार रहते। ऑफिस से लौटते वक्त उसके पसंदीदा फूल लाना, वीकेंड पर उसे खूबसूरत जगहों पर डिनर के लिए ले जाना और उसकी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश का ख्याल रखना माधव की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था।

ससुराल का माहौल इतना सहज और आधुनिक था कि अनिका खुद को दुनिया की सबसे खुशनसीब औरत मानती थी। मगर इस अथाह प्यार और सुख-सुविधाओं के बीच एक छोटी सी कसक थी, जो धीरे-धीरे अनिका के मन के किसी कोने में चुपचाप पनप रही थी। माधव अनिका से बेइंतहा प्यार करते थे, और इस प्यार का एक पहलू यह था कि वे अनिका को एक पल के लिए भी अपनी नजरों से दूर नहीं होने देते थे।

अनिका जब भी अपने मायके जाने की बात करती या किसी रिश्तेदार के यहाँ जाने का मन बनाती, माधव तुरंत अपनी छुट्टियाँ एडजस्ट कर लेते और कहते, “तुम बस तैयार हो जाओ, मैं खुद तुम्हें अपनी कार से लेकर चलूँगा।” अनिका को कभी अकेले बस, ट्रेन या कैब से जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यहाँ तक कि वह बाजार में कोई छोटा-मोटा सामान लेने जाती, तो भी माधव उसके साथ ही जाते।

एक-दो बार अनिका ने हलके-फुल्के अंदाज में कहा भी, “माधव, आप हमेशा मेरे साथ क्यों लगे रहते हैं? कभी-कभी मुझे अकेले भी तो जाने दिया कीजिए, मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही हूँ।”

तब माधव ने बड़ी ही मासूमियत और बेपनाह मोहब्बत से उसे अपनी बाँहों में भरते हुए कहा था, “अनिका, तुम मेरी जिंदगी हो। जब तुम आसपास नहीं होती, तो यह पूरा घर मुझे काटने को दौड़ता है। मैं अपनी प्यारी पत्नी के बिना एक पल भी रहने की कल्पना नहीं कर सकता। क्या तुम्हें मेरा साथ अच्छा नहीं लगता?”

माधव की यह बात सुनकर उस वक्त तो अनिका का दिल पिघल जाता था। वह मन ही मन ईश्वर का शुक्रिया अदा करती कि उसे ऐसा चाहने वाला पति मिला है। सच्चाई यह भी थी कि वह खुद भी माधव से बहुत प्रेम करती थी और उनके बिना उसका भी दिल नहीं लगता था। मगर इसके बावजूद, कभी-कभी एक इंसान होने के नाते उसे अपने लिए कुछ निजी पलों की तलाश महसूस होती थी।

अनिका जब भी मायके जाती, तो माधव उसके साथ ही होते। मायके में अनिका की दोनों भाभियाँ आज भी सिर पर लंबा घूँघट काढ़कर चूल्हा-चौका संभालती थीं। उनके ससुर जी के कमरे में आने पर घर की सारी औरतें सहम जाती थीं। अनिका यह सब देखकर बहुत असहज हो जाती थी। एक दिन उसने अपनी माँ से कह ही दिया, “माँ, अब तो जमाना बदल चुका है। आप लोग आज भी इन पुरानी बेड़ियों को क्यों पकड़े बैठे हैं? देखिए मेरे ससुराल में, मेरी सास मुझे बेटी की तरह रखती हैं, कोई पर्दा नहीं, कोई रोक-टोक नहीं। जमाने के साथ चलिए माँ, तभी परिवार में खुशहाली आती है।”

माँ ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा था, “बेटी, हर किसी का नसीब तेरे जैसा नहीं होता। तू खुश है, हमारे लिए यही बहुत है। पर दुनिया में हर चीज का एक संतुलन होना जरूरी है।” अनिका को माँ की यह बात समझ नहीं आई और उसने बात वहीं टाल दी।

शादी के करीब एक साल बाद, एक दोपहर अनिका पास के एक शॉपिंग मॉल में ग्रॉसरी लेने गई थी। उस वक्त माधव अपनी एक जरूरी मीटिंग की वजह से नहीं आ पाए थे, इसलिए उन्होंने अपनी निजी कार और ड्राइवर के साथ अनिका को भेजा था। मॉल में अचानक अनिका की नजर अपनी स्कूल और कॉलेज के दिनों की सबसे करीबी सहेली शालिनी पर पड़ी।

शालिनी और अनिका बचपन के लंगोटिया यार थे। स्कूल के बंक मारने से लेकर कॉलेज के फेस्ट में धमाल मचाने तक, दोनों ने हर पल साथ जिया था। एक-दूसरे की छोटी से छोटी बात साझा किए बिना उनका दिन नहीं गुजरता था। मगर शादी के बाद व्यस्तताओं के चलते दोनों का संपर्क कम हो गया था।

“अरे शालिनी!” अनिका ने खुशी से चिल्लाते हुए आवाज दी।

शालिनी मुड़ी और अनिका को देखकर उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। दोनों सहेलियाँ वहीं एक-दूसरे से लिपट गईं।

“अनिका! तू यहाँ? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा!” शालिनी ने चहकते हुए कहा।

“हाँ शालिनी, मैं भी यहीं हूँ। चल, आज बहुत दिनों बाद मिली हैं, कैफे में बैठकर बात करते हैं।” दोनों ने बैठकर खूब सारी बातें कीं।

बातों-बातों में अनिका ने कहा, “शालिनी, तू कल मेरे घर आ न। इतवार है, हम दोनों बैठकर पुरानी यादें ताजा करेंगे और ढेरों बातें करेंगे।”

शालिनी ने तुरंत हामी भर दी, “हाँ, क्यों नहीं! मैं तो कब से तेरे ससुराल का ठाठ-बाट देखना चाहती थी। कल सुबह मैं जरूर आऊँगी।”

अगले दिन सुबह तय समय पर शालिनी अनिका के घर पहुँची। आलीशान घर, करीने से सजा हुआ ड्राइंग रूम और कल्याणी जी का गर्मजोशी से स्वागत देखकर शालिनी दंग रह गई। कल्याणी जी ने शालिनी के लिए स्वादिष्ट नाश्ता और चाय भिजवाई और फिर मुस्कुराते हुए बोलीं, “तुम दोनों आराम से कमरे में बैठकर बातें करो, मैं तुम लोगों के बीच नहीं आऊँगी।”

अनिका शालिनी को अपने बेडरूम में ले गई। शालिनी कमरे की सजावट और भव्यता देखकर बोली, “वाह अनिका! तेरे तो सच में बड़े ठाठ हैं यार। सास इतनी समझदार और खुला खयाल रखने वाली, पति इतना हैंडसम और अमीर। तभी मैं सोचूँ कि तू मायके में कभी ज्यादा दिन क्यों नहीं रुकती।”

अनिका ने चाय का घूँट भरते हुए कहा, “अरे शालिनी, बात ऐशो-आराम की नहीं है। असल में माधव मुझसे इतना ज्यादा प्यार करते हैं कि मेरे बिना उनका एक पल भी मन नहीं लगता। मैं मायके में एक रात भी रुकने की बात करूँ, तो उनका चेहरा उतर जाता है। इसीलिए मैं ज्यादा दिन मायके में नहीं ठहर पाती।”

शालिनी ने एक गहरी नजर अनिका पर डाली और फिर रहस्यमयी अंदाज में हँसते हुए बोली, “ओह! तो यह बात है। मेरी प्यारी सखी आज भी उतनी ही भोली है जितनी स्कूल के दिनों में थी।”

अनिका चौंक गई, “मतलब? तू क्या कहना चाहती है?”

शालिनी अपने अंदाज में ज्ञान बघारते हुए बोली, “अरे पगली, यह मर्दों की पुरानी चाल होती है। ये जो लच्छेदार बातें होती हैं न कि ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता’, यह सब सिर्फ एक मुखौटा है। असल सच्चाई यह है कि हमारे घर पर रहने से उन्हें हर चीज वक्त पर और हाथ में मिलने की आदत हो जाती है। उनका रूटीन खराब न हो, उनकी सेवा में कोई कमी न आए, इसलिए वे हमें कहीं जाने नहीं देते। प्यार के नाम पर यह असल में हम पर कंट्रोल करने का तरीका होता है। सच बता, क्या तुझे कभी यह सब एक बंधन जैसा नहीं लगता?”

शालिनी की यह बात अनिका के दिल के उस कच्चे घाव पर जा लगी, जो अनजाने में कभी-कभी उसे कचोटता था। पिछले कुछ महीनों से अनिका के मन में जो हल्की सी घुटन कभी-कभी सिर उठाती थी, शालिनी की नकारात्मक बातों ने उसे हवा दे दी।

अनिका का मन भटक गया। उसने अपनी भावनाओं के बहाव में आकर कहा, “सच कहूँ शालिनी, तो कभी-कभी लगता तो है। माधव इतने प्यारे हैं, पर हर वक्त मेरे साथ साए की तरह लगे रहते हैं। मैं किसी से खुलकर, बेबाकी से बात तक नहीं कर पाती। मेरा भी कभी-कभी मन करता है कि मैं अपनी पुरानी सहेलियों के साथ बिना किसी पहरे के घूमूँ, मायके में भाइयों और भतीजों के साथ बेपरवाह होकर ऊधम मचाऊँ, पार्क में जाकर झूला झूलूँ, जोर-जोर से हँसूँ और खूब चिल्लाऊँ।”

अनिका एक सांस में बोलती चली गई, “तुझे सच बताऊँ तो कभी-कभी मुझे यह बेइंतहा प्यार भी एक रेशमी पिंजरा लगने लगता है। सोने का पिंजरा ही सही, पर है तो पिंजरा ही! मैं अपनी मर्जी से कहीं अकेले आ-जा नहीं सकती, अपनी जिंदगी अपने हिसाब से नहीं जी सकती।”

तभी कमरे का आधा खुला दरवाजा पूरी तरह खुला और माधव एक हाथ में ताजे फलों की प्लेट लिए अंदर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर वही जानी-पहचानी हल्की मुस्कान थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सा सन्नाटा था।

माधव ने सहज आवाज में कहा, “अरे वाह, तो यहाँ पुरानी सखियों के बीच हमारी शिकायतें चल रही हैं और हमारे प्यार को पिंजरा साबित किया जा रहा है!”

माधव की आवाज सुनते ही अनिका के होश उड़ गए। ऐसा लगा मानो किसी ने उस पर घड़ों ठंडा पानी उड़ेल दिया हो। उसके हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। कमरे में एक गहरा, दमघोंटू सन्नाटा छा गया। शालिनी भी घबरा गई और नजरें चुराने लगी।

अनिका का चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसे यह समझने में एक पल भी नहीं लगा कि माधव ने उसकी सारी बातें सुन ली हैं। वही माधव, जो उसे दुनिया में सबसे ज्यादा चाहता था, जिसने कभी उस पर ऊँची आवाज में बात नहीं की थी, जिसने उसकी हर सांस को अपनी खुशी माना था—आज अनिका ने उसी हमसफर की पीठ पीछे एक बाहरी इंसान के सामने ऐसी घटिया बुराई कर दी थी!

शालिनी ने माहौल की नजाकत को समझा और झटपट उठते हुए बोली, “अच्छा अनिका, मुझे घर पर कुछ काम था, मैं अब चलती हूँ।”

माधव ने हमेशा की तरह बड़ी ही शालीनता से शालिनी को विदा किया, “अरे शालिनी जी, कुछ देर और रुकतीं, चलिए कोई बात नहीं, फिर कभी आइएगा।”

शालिनी के जाते ही माधव कमरे में वापस आए। अनिका की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह नजर उठाकर माधव का चेहरा देख सके। उसका सिर शर्म और पश्चाताप से बुरी तरह झुक गया था। वह सोच रही थी कि अभी माधव उस पर चिल्लाएँगे, नाराज होंगे या उससे सफाई माँगेंगे।

लेकिन माधव ने ऐसा कुछ नहीं किया। वे चुपचाप आए, फलों की प्लेट साइड टेबल पर रखी और बहुत ही शांत स्वर में बोले, “अनिका, मैं तुम्हारे और शालिनी के लिए ताजे फल काटकर लाया था। खा लेना।”

इतना कहकर माधव कमरे से बाहर चले गए। न कोई ताना, न कोई गुस्सा, न कोई उलाहना।

माधव का यह मौन अनिका के सीने में खंजर की तरह चुभ रहा था। अगर माधव उस पर गुस्सा करते, चिल्लाते, तो शायद उसका बोझ कुछ कम हो जाता। मगर उनकी उस शांत आँखों में जो दर्द उसने उस पल देखा था, उसने अनिका को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। वह अपनी ही नजरों में इतनी नीचे गिर चुकी थी कि उसे खुद से घिन आने लगी थी। वह रोते-रोते बिस्तर पर गिर पड़ी।

वह मन ही मन खुद को कोसने लगी, “हे भगवान! यह मैंने क्या कर दिया? जिसने मुझे रानी बनाकर रखा, जिसने मेरी हर खुशी को अपनी इबादत समझा, मैंने दूसरों की बातों में आकर उसी के प्यार को पिंजरा कह दिया? मैं अपनी जुबान पर काबू क्यों नहीं रख पाई?”

पूरा दिन बीत गया। शाम को जब चाय का वक्त हुआ, तो माधव सामान्य रूप से ड्राइंग रूम में बैठे थे, माँ जी से बातें कर रहे थे। उन्होंने अनिका से भी बहुत सामान्य तरीके से बात की, जैसे कुछ हुआ ही न हो। मगर अनिका उनकी आँखों में नहीं देख पा रही थी।

रात को जब दोनों बेडरूम में सोने आए, तो अनिका से यह खामोशी और बर्दाश्त नहीं हुई। उसके सब्र का बाँध टूट गया। वह सीधे जाकर माधव के सामने घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी।

“माधव… मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने जो कुछ कहा, वह सब बकवास था। मैं अपनी सहेली की बातों में बहक गई थी। मुझे नहीं पता मेरे मुँह से वे शब्द कैसे निकल गए। आप मुझे कोई भी सजा दे दीजिए, मुझ पर चिल्लाइए, लेकिन प्लीज इस तरह चुप रहकर मुझे मत मारिए। मैं आपकी नजरों से तो बाद में गिरी, आज मैं अपनी खुद की नजरों में गिर चुकी हूँ।” अनिका हिचकियों के बीच बोल रही थी।

माधव ने कुछ पल गहरी साँस ली। फिर उन्होंने झुककर अनिका के दोनों हाथ थामे और उसे उठाकर बिस्तर पर बैठाया। माधव ने अनिका के आँसू अपने हाथों से पोंछे।

माधव के चेहरे पर कोई नफरत या नाराजगी नहीं थी, बल्कि एक गहरी समझदारी थी। उन्होंने बहुत ही कोमल आवाज में कहा, “अनिका, रोना बंद करो। सच कहूँ तो जब मैंने तुम्हारी बातें सुनी थीं, तो एक पल के लिए मेरे दिल को बहुत गहरी चोट लगी थी। मुझे लगा कि शायद मेरी मोहब्बत में ही कोई खोट रह गई जो तुम्हें घुटन देने लगी। मगर जब मैंने अकेले बैठकर ठंडे दिमाग से सोचा, तो मुझे एहसास हुआ कि गलती तुम्हारी पूरी तरह से नहीं थी, कुछ कमी मेरी समझ में भी थी।”

अनिका ने अचरज से माधव की तरफ देखा।

माधव ने मुस्कुराते हुए कहा, “अनिका, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, यह सच है। और मैं तुम्हारे बिना अधूरा महसूस करता हूँ, यह भी सच है। मगर प्यार का मतलब किसी के व्यक्तिगत दायरे (पर्सनल स्पेस) को पूरी तरह खत्म कर देना नहीं होता। मैं हमेशा तुम्हारे साथ इसलिए रहता था क्योंकि मुझे लगता था कि मैं तुम्हारी हिफाजत कर रहा हूँ और तुम्हें अपना प्यार दिखा रहा हूँ। लेकिन मैं यह भूल गया था कि शादी के बाद भी तुम्हारी अपनी एक पहचान है, तुम्हारी अपनी सहेलियाँ हैं, तुम्हारा अपना बचपन है जिसे तुम कभी-कभी अकेले जीना चाहती हो।”

माधव की यह बात सुनकर अनिका के आँसू और तेजी से बहने लगे। वह सोच रही थी कि जो इंसान इतना महान है, जो अपनी पत्नी की गलती में भी अपनी कमी तलाश रहा है, उसके बारे में उसने कितनी घटिया सोच जाहिर की थी!

माधव ने उसका हाथ चूमते हुए आगे कहा, “अनिका, प्यार भरोसा सिखाता है, बाँधना नहीं। तुमने जो कहा, उससे मुझे अपनी गलती का भी एहसास हुआ। लेकिन हाँ, अगर तुम्हें कभी कोई बात बुरी लगे, तो किसी तीसरे के सामने कहने के बजाय सीधे मुझसे कहना। हम दोनों मिलकर हर मसले को हल करेंगे। तुम्हारे इस हमसफर के दिल में तुम्हारे लिए कोई गिला-शिकवा नहीं है।”

अनिका ने माधव के सीने से लगकर अपना रोना जारी रखा। उस रात अनिका को समझ आया कि सच्चा प्यार क्या होता है। सच्चा प्यार सिर्फ साथ घूमना या तोहफे देना नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की कमजोरियों को माफ करना, बिना उलाहना दिए गलतियों को स्वीकारना और रिश्ते को हर मोड़ पर मजबूती देना होता है। माधव का यह निस्वार्थ और परिपक्व व्यवहार अनिका के दिल में उनके प्रति सम्मान को सौ गुना बढ़ा गया।

अगले ही हफ्ते माधव ने अनिका के लिए एक सरप्राइज प्लान किया। उन्होंने अनिका के मायके में पूरे दस दिन का ट्रिप बुक किया, और इस बार माधव उसके साथ नहीं गए।

जब माधव ने अनिका के हाथ में टिकट और सूटकेस थमाते हुए कहा, “जाओ मेरी जान, अपने मायके जाओ। अपनी भाभियों, सहेलियों और भतीजों के साथ जितना ऊधम मचाना है मचाओ, जी भर के झूले झूलो और अपनी जिंदगी को अपने अंदाज में जियो। पर हाँ, जब मन भर जाए, तो वापस अपनी इस दुनिया में लौट आना, क्योंकि तुम्हारा यह पिंजरा नहीं, तुम्हारा घर तुम्हारा इंतजार करेगा।”

अनिका की आँखों में खुशी और कृतज्ञता के आँसू छलक आए। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अब मुझे कहीं अकेले जाने की जरूरत नहीं है माधव। जिस रिश्ते में इतनी आजादी और इतना सम्मान हो, वह पिंजरा नहीं, दुनिया का सबसे खूबसूरत आशियाना होता है।”

इस तरह एक नासमझी से बिखरने वाला रिश्ता माधव के सच्चे प्यार, परिपक्वता और बिना किसी उलाहने के माफ करने के जज्बे से हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया। अनिका को अपने जीवन का सबसे बड़ा सबक मिल चुका था कि दूसरों की बातों में आकर अपने अनमोल रिश्तों की तौहीन कभी नहीं करनी चाहिए।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में जरूरत से ज्यादा अधिकार जताना कभी-कभी घुटन बन जाता है, और क्या माधव की तरह हर साथी को इतनी समझदारी दिखानी चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं!

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 मूल लेखिका : कमलेश राणा

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