“अरे! यह क्या हाल बना रखा है बहू का? इसे क्या हुआ अंकित?” कौशल्या देवी ने अपनी लाठी एक तरफ रखी और आगे बढ़कर अंकिता का दूसरा हाथ थाम लिया। अंकिता का तपता जिस्म छूते ही वे सिहर उठीं।
अंकित ने जब अस्पताल की सारी बात बताई, तो कौशल्या देवी ने बेटे को डांटते हुए कहा, “तू तो हमेशा से ही बेपरवाह रहा है, पर अंकिता, तूने भी हमें एक फोन करना जरूरी नहीं समझा? अरे, घर में इतनी बड़ी बीमारी पाल रखी थी और तुम दोनों अकेले जूझ रहे थे!”
अंकिता ने झुककर सास के पैर छूने चाहे, पर कौशल्या जी ने उसे तुरंत रोककर अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा, “रहने दे ये औपचारिकताएं। चल, सीधे अंदर कमरे में चल।”
अंकित जैसे ही अपनी मोटरसाइकिल पार्क करके फ्लैट की सीढ़ियां चढ़ रहा था, तीसरी मंजिल की गैलरी से ही उसे डेढ़ साल के आरव की लगातार चीखने की आवाज सुनाई दी। दिनभर ऑफिस के तनाव और ट्रैफिक की थकान से पहले ही उसका दिमाग भारी था, उस पर बच्चे की ऐसी बेतहाशा रुलाई सुनकर उसके सीने में चिड़चिड़ाहट की लहर दौड़ गई। वह मन ही मन बड़बड़ाया कि अंकिता को क्या जरा भी होश नहीं रहता? दरवाजे की कुंडी बाहर से तो बंद नहीं थी, पर अंदर से कोई जवाब भी नहीं आ रहा था। उसने दो-तीन बार तेजी से बेल बजाई। बच्चे का रोना और तेज हो गया, जैसे वह किसी अनजाने डर से चीख रहा हो।
अंकित ने जब अपने पास रखी चाबी से ताला खोला और हड़बड़ाहट में ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ, तो उसके होंठों पर अंकिता को डांटने के लिए कड़वे शब्द तैर रहे थे। वह चिल्लाने ही वाला था कि “अंकिता, क्या कान में रुई डाल रखी है?” लेकिन कमरे का दृश्य देखते ही उसके सारे शब्द गले में ही अटक गए और उसका गुस्सा पल भर में दहशत में तब्दील हो गया।
कमरे के सोफे के पास कालीन पर अंकिता बेसुध पड़ी हुई थी। पास ही आरव जमीन पर घुटनों के बल बैठा अपनी नन्हीं हथेलियों से अपनी मां का चेहरा हिला-हिलाकर बेतहाशा रो रहा था। अंकिता का एक हाथ बिखरे हुए खिलौनों पर बेजान सा टिका था। अंकित तेजी से आगे बढ़ा और बच्चे को एक तरफ हटाते हुए अंकिता के माथे को छुआ। उसका माथा भट्टी की तरह दहक रहा था और चेहरे पर पसीने की ठंडी बूंदें जमी थीं।
“अंकिता! अंकिता, सुनो! आंखें खोलो!” अंकित ने घबराकर उसका कंधा हिलाया, पर कोई हलचल नहीं हुई।
अंकित ने बिना एक भी पल गंवाए पड़ोस की शर्मा चाची को आवाज दी, जिन्होंने तुरंत आकर आरव को गोद में उठाया और दिलासा दिया। अंकित ने अंकिता को अपनी बांहों में उठाया और अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाकर पास के निजी नर्सिंग होम की तरफ दौड़ा दी। रास्ते भर उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। अंकिता पिछले दो-तीन दिनों से कह रही थी कि उसे हरारत लग रही है और बदन टूट रहा है, पर रोजमर्रा की आपाधापी में दोनों ने इसे मौसम का मामूली असर मानकर नजरअंदाज कर दिया था। अंकिता भी तो ऐसी ही थी, जब तक पैरों पर खड़ी रह सकती, घर के किसी काम को रुकने नहीं देती थी।
अस्पताल की इमरजेंसी में डॉक्टरों ने तुरंत ड्रिप चढ़ाई और जांचें शुरू कीं। लगभग दो घंटे बाद, जब अंकिता की आंखों की पलकें जरा सी हिलीं, तब डॉक्टर मेहरा बाहर आए। अंकित के चेहरे पर पसरे खौफ को देखकर उन्होंने तसल्ली देते हुए कहा, “घबराने की कोई बात नहीं है मिस्टर अंकित, सही समय पर ले आए। इन्हें सीवियर वायरल इंफेक्शन है और शरीर में डिहाइड्रेशन हो गया था। बुखार 104 के पार पहुंच चुका था, जिससे ब्रेन पर असर हुआ और वे बेहोश हो गईं। हमने दवाएं दे दी हैं, लेकिन मेरी एक बात गांठ बांध लीजिए। इन्हें कम से कम दो हफ्तों का पूरा बेड रेस्ट चाहिए। जरा सा भी मानसिक या शारीरिक तनाव इनके लिए खतरनाक हो सकता है।”
डॉक्टर ने पर्चे पर दवाएं लिखते हुए आगे कहा, “आपका बच्चा अभी बहुत छोटा है। अंकिता इस हालत में बिल्कुल नहीं हैं कि खुद का भी ध्यान रख सकें, बच्चे को संभालना तो दूर की बात है। अगर संभव हो तो परिवार में से किसी बुजुर्ग या जिम्मेदार सदस्य को अपने पास बुला लीजिए या फिर इन्हें कुछ दिनों के लिए किसी के पास छोड़ आइए।”
अगले दिन दोपहर तक जब अंकिता को होश आया और कमजोरी के कारण उसकी आवाज बेहद धीमी थी, अंकित ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए डॉक्टर की बात दोहराई। अंकित ने झिझकते हुए कहा, “अंकिता, डॉक्टर ने पूरी तरह आराम करने को कहा है। तुम कहो तो मैं तुम्हारी मम्मी को फोन करके यहां बुला लूं? या फिर तुम्हें और आरव को कुछ दिनों के लिए मायके छोड़ आऊं? वहां तुम्हारी मम्मी तुम्हारी देखभाल कर लेंगी।”
अंकिता ने धीरे से अपनी कमजोर आंखें उठाईं और अंकित का हाथ थाम लिया। उसने धीमे स्वर में, लेकिन पूरे विश्वास के साथ कहा, “नहीं अंकित, मायके नहीं। मेरी मां को खुद रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या है, उनसे तो ठीक से चला भी नहीं जाता। वे मेरी सेवा करेंगी या आरव के पीछे भागेंगी? ऊपर से आरव वहां ज्यादा दिन रहा नहीं है, तो वह उनके पास रमेगा भी नहीं और जिद्द करेगा। हम… हम इंदौर चलते हैं, मां जी और बाबूजी के पास।”
अंकित थोड़ा अचकचाया। आमतौर पर लड़कियां ऐसी नाजुक हालत में मायके की पनाह ढूंढती हैं, जहां उन्हें कोई संकोच नहीं होता। शादी के इन तीन सालों में अंकिता और उसकी मां कौशल्या देवी के बीच संबंध बहुत अच्छे थे, पर एक औपचारिकता का पर्दा हमेशा बना रहता था। अंकित ने संकोच से पूछा, “पर अंकिता, मां की उम्र भी तो हो चली है। घुटनों के दर्द से वे भी परेशान रहती हैं। क्या तुम वहां सहज रह पाओगी? कहीं तुम्हें आराम की जगह औपचारिकता न निभानी पड़े?”
अंकिता की आंखों के कोरों से एक आंसू ढुलक गया। उसने कहा, “अंकित, मुझे अपनी सास पर पूरा भरोसा है। जब मैं ठीक थी, तब तो मैंने उनके घर को अपना माना, तो आज जब मैं लाचार हूं, तो क्या मैं अपने ससुराल को पराया समझ लूं? मां जी भले ही कभी-कभी थोड़ा कड़ा बोल देती हैं, पर उनका दिल बहुत साफ है। आरव भी दादा-दादी के पास बहुत खुश रहता है। हम अपने घर चलेंगे।”
अंकिता का यह अटूट विश्वास देखकर अंकित की आंखें भर आईं। छुट्टी मिलते ही उसने कार में तकिए और चादर का इंतजाम किया और तीनों इंदौर के लिए रवाना हो गए।
इंदौर में जब पुराने मोहल्ले के उस पुश्तैनी मकान के सामने गाड़ी रुकी, तो दोपहर ढल रही थी। अचानक बेटे, बहू और पोते को बिना किसी पूर्व सूचना के दरवाजे पर खड़ा देखकर कौशल्या देवी और उनके पति जगदीश जी हैरान रह गए। लेकिन जैसे ही कौशल्या देवी की नजर पीली पड़ चुकी अंकिता पर पड़ी, जो अंकित के कंधे का सहारा लेकर बमुश्किल खड़ी थी, उनके चेहरे की हैरानी तुरंत ममतामयी चिंता में बदल गई।
“अरे! यह क्या हाल बना रखा है बहू का? इसे क्या हुआ अंकित?” कौशल्या देवी ने अपनी लाठी एक तरफ रखी और आगे बढ़कर अंकिता का दूसरा हाथ थाम लिया। अंकिता का तपता जिस्म छूते ही वे सिहर उठीं।
अंकित ने जब अस्पताल की सारी बात बताई, तो कौशल्या देवी ने बेटे को डांटते हुए कहा, “तू तो हमेशा से ही बेपरवाह रहा है, पर अंकिता, तूने भी हमें एक फोन करना जरूरी नहीं समझा? अरे, घर में इतनी बड़ी बीमारी पाल रखी थी और तुम दोनों अकेले जूझ रहे थे!”
अंकिता ने झुककर सास के पैर छूने चाहे, पर कौशल्या जी ने उसे तुरंत रोककर अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने कहा, “रहने दे ये औपचारिकताएं। चल, सीधे अंदर कमरे में चल।”
उस दिन के बाद से घर का पूरा माहौल ही बदल गया। कौशल्या जी, जो खुद सुबह उठने पर घुटनों की जकड़न से परेशान रहती थीं, उन्होंने अपनी सारी तकलीफें जैसे किसी संदूक में बंद करके रख दीं। सुबह पांच बजे से उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती। सबसे पहले वे अंकिता के लिए गिलोय और तुलसी का काढ़ा तैयार करतीं, फिर आरव के लिए हल्का दलिया और दूध बनातीं।
आरव पूरे घर में कभी इधर भागता तो कभी उधर। कभी खिलौने बिखेरता तो कभी अंकिता के कमरे की तरफ दौड़ता। कौशल्या जी अंकिता के कमरे का दरवाजा सटाकर रखतीं ताकि बहू की नींद में खलल न पड़े। वे अपनी दर्द भरी कमर को सहलाते हुए आरव के पीछे-पीछे दौड़तीं, उसे कहानियां सुनाकर बहलातीं, अपनी गोद में लेकर आंगन में घुमातीं।
दोपहर में जब अंकिता दवा खाकर सो जाती, तो कौशल्या जी धीरे से उसके कमरे में आतीं। कभी उसके पैरों में सरसों का तेल मल देतीं, तो कभी उसके माथे पर गीली पट्टियां रखतीं ताकि बुखार दोबारा न चढ़े। अंकिता जब भी आंखें खोलती और अपनी सास को अपनी सेवा में लगा देखती, तो उसका मन अपराधबोध से भर जाता।
एक दिन जब कौशल्या जी उसके बालों में कंघी कर रही थीं, तो अंकिता ने रुंधे गले से कहा, “मां जी, मेरी वजह से आपको इस उम्र में इतना कष्ट उठाना पड़ रहा है। आपका तो खुद शरीर साथ नहीं देता, ऊपर से आरव की शैतानियां और मेरा यह बिस्तर पकड़ लेना… मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मुझे मायके चले जाना चाहिए था।”
कौशल्या जी ने कंघी वहीं मेज पर रखी और अंकिता के दोनों गालों को अपने हाथों में भर लिया। उन्होंने बेहद शांत और गंभीर आवाज में कहा, “बहू, आज तूने यह बात कह दी, आगे से कभी मत कहना। अगर बीमारी में तू मायके जाती, तो मेरे इस घर की चौखट पर क्या यह लिखा जाता कि यह सिर्फ सुख की हिस्सेदार है? मायके की मां अगर सेवा करती तो वह उसका फर्ज कहलाता, पर सास अगर सेवा करे तो क्या वह एहसान हो जाता है? बहू जब ब्याह कर आती है, तो वह सिर्फ एक बेटे की पत्नी नहीं बनती, पूरे कुल की बेटी बनती है। तूने हमेशा इस घर को संवारा है, आज अगर तू कमजोर पड़ी है तो यह मां अपनी छांव कैसे हटा ले?”
सास के इन शब्दों ने अंकिता के सीने से सारा बोझ उतार दिया। उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, लेकिन इस बार वे आंसुओं की धार दर्द की नहीं, बल्कि अपनेपन और सुरक्षा के अहसास की थी।
लगभग दस दिन बीत गए। कौशल्या जी के स्नेह, समय पर मिलने वाले परहेज के भोजन और आरव की निश्चिंत हंसी ने अंकिता पर चमत्कारी असर दिखाया। उसका बुखार पूरी तरह उतर चुका था और चेहरे पर खोई हुई रौनक लौटने लगी थी। अब वह बिस्तर से उठकर थोड़ा-बहुत टहलने लगी थी।
उसी हफ्ते की एक सुनहरी शाम को, कौशल्या जी अपने मोहल्ले के पास वाले पार्क में टहलने निकलीं। यह उनका रोज का नियम हुआ करता था, पर पिछले दस-बारह दिनों से वे पार्क नहीं जा पाई थीं। पार्क की बेंच पर उनकी हमउम्र सहेलियां—मंजू, शांति और विमला पहले से बैठी बातें कर रही थीं।
कौशल्या जी को देखते ही मंजू जी ने हाथ हिलाकर आवाज दी, “अरे कौशल्या! कहां गायब थीं इतने दिनों से? हमने तो सोचा कहीं तुम भी अपने जोड़ों के दर्द के चलते बिस्तर तो नहीं पकड़ बैठीं? फोन भी नहीं उठाया एक-दो बार!”
कौशल्या जी मंद-मंद मुस्कुराती हुई उनके पास जाकर बैठ गईं। उन्होंने लंबी सांस लेते हुए कहा, “अरे नहीं मंजू, मुझे कुछ नहीं हुआ। बस घर में थोड़ी जिम्मेदारी आ गई थी। बहू और पोता आए हुए हैं न।”
शांति जी ने हैरानी से चश्मा ठीक करते हुए पूछा, “अरे, अचानक? सब ठीक तो है न? बहू तो तुम्हारी नौकरी भी नहीं करती, फिर अचानक इतने दिनों के लिए कैसे आ गई? कहीं कोई अनबन तो नहीं?”
“नहीं शांति, अनबन क्यों होगी भला,” कौशल्या जी ने सहज भाव से कहा, “बेचारी अंकिता को बहुत तेज वायरल हो गया था। 104 डिग्री बुखार में बेहोश हो गई थी। डॉक्टर ने बिल्कुल बिस्तर से न उठने की हिदायत दी थी। अब वहां शहर में अंकित अकेला ऑफिस संभाले, बच्चे को देखे या अंकिता की तीमारदारी करे? अंकिता की अपनी मां की भी रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन हुआ है, वे खुद चलने-फिरने से लाचार हैं। ऐसे में मेरी बहू ने किसी और का आसरा ढूंढने के बजाय सीधे अपनी इस सास पर भरोसा जताया और अपने घर चली आई।”
विमला जी ने तुरंत टोका, “लेकिन कौशल्या, तुम्हारी तो खुद की उम्र साठ के पार है। शुगर की मरीज हो, बीपी की गोलियां रोज खाती हो, और वो छोटा बच्चा तो सिर पर आसमान उठा लेता होगा! इस उम्र में बहू की तीमारदारी और पोते की देखरेख… तुमने अपनी देह का कबाड़ा कर लिया होगा। तुम्हें तो सीधे कह देना चाहिए था कि अंकिता को कुछ दिन उसके मायके भेज दें या कोई आया रख लें।”
पार्क की उस बेंच पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कौशल्या जी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और अत्यंत गरिमा के साथ बोलीं, “विमला, अगर मन में ममता और नीयत में सच्चाई हो न, तो शरीर को भी अपने आप हिम्मत मिल जाती है। तुम कहती हो कि आया रख लेते या मायके भेज देते… पर एक बात बताओ, जब कल को मेरी देह बिल्कुल जर्जर हो जाएगी, जब मुझे पानी का लोटा उठाने के लिए भी किसी का सहारा चाहिए होगा, तब मैं किस मुंह से अपनी बहू से सेवा की उम्मीद करूंगी?”
सहेलियां चुपचाप उनकी तरफ देखने लगीं।
कौशल्या जी ने आगे कहा, “रिश्ते कभी एकतरफा नहीं चलते मंजू। हम सासें यह तो चाहती हैं कि बहू आते ही हमारे पैर दबाए, हमारे कहे अनुसार चले, और बुढ़ापे में हमारी लाठी बने; लेकिन जब उस पर कोई विपदा आती है, तो हम तुरंत ‘सास’ बनकर किनारे बैठ जाती हैं और उसे मायके का रास्ता दिखा देती हैं। ले-देकर अब हम दोनों ही तो एक-दूसरे की लाठी हैं। आज उसके दुख में मैं मां बनकर खड़ी हुई हूं, तो मुझे पूरा यकीन है कि कल जब मुझे जरूरत होगी, तो वह भी बहू बनकर नहीं, मेरी अपनी बेटी बनकर मेरे सिरहाने खड़ी रहेगी। परिवार ऐसे ही बचते हैं, हिसाब-किताब लगाने से सिर्फ व्यापार चलते हैं, घर नहीं।”
कौशल्या जी की यह बात सुनकर मंजू जी की आंखें भर आईं। उन्होंने कौशल्या जी का हाथ अपने हाथों में थाम लिया और भरे गले से कहा, “धन्य हो कौशल्या! तुम्हारी यह सोच आज के दौर में किसी सीख से कम नहीं है। सच कहूं तो हम सब बहुओं से सिर्फ उम्मीदें बांधना जानती हैं, पर उन्हें अपनी बेटी की तरह अपनाना भूल जाती हैं। काश, तुम्हारी जैसी समझ और ममता हर घर की सास में हो, तो किसी भी बहू को कभी यह न लगे कि उसका असली घर सिर्फ उसका मायका है। तुमने आज हम सबकी आंखें खोल दीं।”
शाम का सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और आसमान में सिंदूरी आभा बिखर रही थी। कौशल्या जी जब पार्क से उठकर अपने घर की ओर बढ़ीं, तो उनके कदमों में थकान नहीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून और ताजगी थी।
घर का दरवाजा खुला तो सामने का दृश्य देखकर उनका रोम-रोम खिल उठा। अंकिता रसोई के दरवाजे पर खड़ी थी और उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने अपनी सास को देखते ही आगे बढ़कर पानी का गिलास थमाया और धीरे से कहा, “मां जी, आप बैठिए। मैंने आपके लिए बिना चीनी की अदरक वाली चाय बना दी है। अब आप बिल्कुल आराम करेंगी।”
पास ही कालीन पर बैठा आरव अपने दादाजी की गोद में बैठकर खिलखिला रहा था। कौशल्या जी ने चाय का घूंट भरा, तो उन्हें लगा कि जिंदगी की सारी थकान और घुटनों का सारा दर्द उस एक घूंट में घुलकर कहीं दूर चला गया है। वह घर अब सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं था, वह एक ऐसा मंदिर बन चुका था जहां त्याग, सम्मान और अपनेपन की अखंड ज्योत जल रही थी।
सास और बहू के रिश्ते को अक्सर समाज में तकरार और फासलों के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन यह कहानी बताती है कि अगर सास मां का दिल रख ले, तो बहू के लिए ससुराल ही सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन जाता है। क्या आपको भी लगता है कि जब परिवार में एक-दूसरे के दुख को अपना मान लिया जाए, तभी सही मायने में घर स्वर्ग बनता है? इस बारे में आपकी क्या राय है, हमें अपनी प्रतिक्रिया जरूर बताएं।
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लेखिका : नेहा पटेल