बस माफ करें बाबूजी , बहुत हो गया -यह रमण था जो अपनी बहन कविता के लिए बोल रहा था।
वह मेरे लिए मर चुकी है ,उसका नाम मत लो , पंडित की बेटी होकर मुसलमान की लुगाई बन गई।मेरा नाम डुबो दिया -पंडित दीनदयाल का गुस्सा मानो फट गया और रूलाई बाहर आ गई।
बाबूजी ब्राह्मण कुल के हैं जो पेपर वाले का काम करके भी नैष्ठिक ब्राह्मण हैं।सुबह सबेरे जप , फिर पूजा पाठ और शाकाहारी भोजन।आज साठ पैंसठ की आयु में भी तंदरूस्त और खूब परिश्रमी।वे लगभग तीस साल पहले बिहार में अपना सबकुछ खोकर दिल्ली आये थे और तबसे एक ही मकान में पिछले तीस सालों से हैं। अशोक नगर में सुबह चार बजे चाय पीकर निकल जाते हैं और तबसे बारह बजे तक पेपर का काम।इसी दम से तीन बहनों की शादी,माता पिता की मृत्योपरांत तेरहवीं और बाकी सारे काम किया।दो बच्चे दोनों को अच्छी तालिम दी ।मगर संस्कार –!
ये चार साल की कविता और साल भर के रमण के साथ दिल्ली आये और एम ए करने के बावजूद पेपर बांटने लगे।
फिर तो वक्त गुजरता रहा और बच्चे पलते बढ़ते रहे। कविता ने बीएससी की और लगभग पच्चीस की आयु में धूमधाम से उसकी शादी दस लाख नकद देकर पंडित हरि प्रसाद के बेटे से ठीक किया।
मगर शादी बाले दिन –बाप रे। असली बात यह थी कि दहेज ज्यादा चाहिए था मगर यह बात कहकर जेल थोड़े जाना था।
देखो भाई तुम्हारी बेटी मांगलिक है अतः मैं अपने बेटे की जान जोखिम में नहीं डाल सकता,आप कोई मांगलिक लड़का ढूंढो।
पूरी तैयारी हो चुकी थी।बारात का इंतजार हो रहा था वहां यह खबर मिली। कविता जो दुल्हन बनी बैठी थी यह सुनते ही आग बबूला हो गई और उसी मंडप में इरफान के साथ फेरे लिए फिर नियमानुसार कोर्ट में विवाह और निकाह भी कर लिया।
बस तभी से कविता को छोड़ दिया।आज दस साल से कविता इसी शहर के नोएडा में रहती हैं।भाईकी शादी में बाहर बाहर आयी। फिर आज जब अति हो गई तो बेटे बहू से रहा नहीं गया।बेटे ने लव मैरिज कर ली।
आज दोनों बच्चे अपने अपने परिवार के साथ खुश हैं वहीं पंडितजी तो दुख से भरे हैं।उसी दिन अटैक आया जिसे मुश्किल से बचाया गया।वे आज भी दवा खाकर काम कर रहे हैं।बेटा बहू के साथ हैं मगर दिल से अकेले।किसी से बोलना नहीं,बस चुप रहना।
मगर आज जब भाई भावज दोनों बहन की ओर से बोले तो वे फट गये।
बाबूजी जब आपका अटैक आया था तो उसी मुसलमान दमाद ने जान बचाई थी।
जब आपकी इज्जत नीलाम हो रही थी तो वहीं मुसलमान आपकी बेटी का हाथ थामा था।कोई पंडित सामने नहीं आया। पंडित हरिप्रसाद ने तो रिश्ते तोड़े, परिवार को तोड़ा मगर दस लाख नहीं लौटाए,उससे लाख गुना अधिक अच्छा मुसलमान जीजा है जो सुख दुख में खड़ा है।
आज #मत रोकिए मां जी, आखिर कब तक चुप रहेंगे,भ्रम के माया जाल में जिएंगे।पहले समाज संभालता था और आज बर्वाद करता है। अतः समयानुसार बदलें और काम करें।
बेटे की बात सुनकर,बहू की बात सुनकर वे धम से जमीन पर बैठ गये और सिर पकड़कर सोचने लगे।
#शब्द संख्या -500कम से कम।
(रचना मौलिक और स्वरचित है इसे मात्र यही प्रेषित कर रहा हूं)
लेखक : परमादत्त झा