अहंकार की दीवार  

विक्रम की बात सुनकर स्मृति वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसने मीरा के हाथ पकड़ लिए और बोली, “मुझे माफ कर दीजिए भाभी! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। उस दिन मेरी तबीयत आपके जूस से नहीं, बल्कि मेरे छुपकर बाहर का खाना खाने से खराब हुई थी। मेरी मां ने मेरे दिमाग में यह जहर भर दिया था कि आप मेरा बुरा चाहती हैं। आप सबकी चहेती थीं और मैं आपसे जलने लगी थी। मेरी इसी जलन और अहंकार ने हमारे हंसते-खेलते परिवार को तोड़ दिया। मुझे अब समझ आ गया है कि आपके बिना मैं कुछ भी नहीं हूं। मुझे सजा दीजिए, लेकिन प्लीज मुझे माफ कर दीजिए।”

जयपुर शहर की एक पुरानी लेकिन बेहद खूबसूरत कॉलोनी में सेठ केदारनाथ का भरा-पूरा परिवार रहता था। घर में उनकी पत्नी सुमित्रा, दो बेटे विक्रम और रोहन, और दो बहुएं मीरा और स्मृति थीं। मीरा, जो विक्रम की पत्नी और घर की बड़ी बहू थी, स्वभाव से बहुत ही चुलबुली, हंसमुख और जिम्मेदार महिला थी। सुबह उठने से लेकर रात को सबके सोने तक, मीरा पूरे घर का केंद्र बिंदु रहती थी। किसी को चाय चाहिए, किसी को दवाई, तो किसी को अपने ऑफिस की फाइल—सबके मुंह पर बस एक ही नाम रहता था, ‘मीरा’। उसकी इसी खूबी के कारण सास-ससुर से लेकर आस-पड़ोस के लोग भी उसकी मिसालें दिया करते थे। दूसरी तरफ, छोटी बहू स्मृति शांत स्वभाव की थी। उसे ज्यादा घुलना-मिलना पसंद नहीं था और वह अपने काम से काम रखती थी।

शुरुआत में सब कुछ ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे स्मृति के मन में एक अजीब सी हीन भावना घर करने लगी। जब भी वह सुनती कि घर में हर कोई बस मीरा की ही तारीफ कर रहा है, तो उसे लगता जैसे इस घर में उसका कोई वजूद ही नहीं है। उसके पति रोहन भी अक्सर कह देते, “स्मृति, तुम भी भाभी से कुछ सीखो। देखो वो कैसे पूरे घर को एक साथ लेकर चलती हैं और कभी उनके माथे पर शिकन तक नहीं आती।” रोहन की ये बातें स्मृति के दिल में तीर की तरह चुभती थीं। उसे लगता कि उसका पति भी उसे कमतर आंकता है। असल में, मीरा अपनी छोटी देवरानी स्मृति से बहुत प्यार करती थी। वह अक्सर स्मृति को काम से आराम देकर खुद सारा बोझ उठा लेती थी, लेकिन स्मृति ने इस प्यार को कुछ और ही रंग दे दिया। उसे लगने लगा कि मीरा जानबूझकर सारे काम खुद करती है ताकि वह सबकी नजरों में महान बन सके और स्मृति को नीचा दिखा सके।

स्मृति का यह भ्रम तब और गहरा हो गया जब उसकी मां, सुशीला, कुछ दिनों के लिए उनके घर आकर रहने लगीं। सुशीला ने जब देखा कि घर की चाबियों से लेकर हर फैसले में मीरा की ही चलती है, तो उन्होंने अपनी बेटी के कान भरने शुरू कर दिए। “तू तो इस घर में बस एक मेहमान की तरह है। सारा राज तो तेरी जेठानी का चल रहा है। अगर तूने अभी से अपनी जगह नहीं बनाई, तो कल को तेरा पति भी तेरी नहीं सुनेगा।” सुशीला की इन बातों ने आग में घी का काम किया। स्मृति अब मीरा को अपनी जेठानी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी दुश्मन समझने लगी। वह दिन-रात रोहन से मीरा की बुराई करने लगी। रोहन पहले तो उसे समझाता रहा, लेकिन जब कोई रोज-रोज एक ही बात दिमाग में डाले, तो इंसान का भी मन बदलने लगता है। धीरे-धीरे रोहन भी अपनी भाभी की तरफ से कटा-कटा रहने लगा।

कुछ समय बाद, केदारनाथ और सुमित्रा को एक लंबी तीर्थ यात्रा पर जाना पड़ा। जाते समय सुमित्रा ने मीरा के सिर पर हाथ फेरकर कहा, “बहू, हम एक महीने बाद लौटेंगे, तब तक घर और सबका ध्यान रखना।” फिर उन्होंने स्मृति से कहा, “बेटा, अपना ख्याल रखना।” उनके जाने के बाद घर का पूरा जिम्मा मीरा पर आ गया। वह सुबह से रात तक मशीन की तरह काम करती। विक्रम और रोहन का टिफिन बनाना, घर की सफाई, सब कुछ वही देखती। स्मृति अब अपनी मां की बातों में आकर बिल्कुल भी काम नहीं करती थी और न ही मीरा का हाथ बंटाने की कोशिश करती थी। इसी बीच एक बड़ी खुशखबरी आई। स्मृति मां बनने वाली थी। यह खबर सुनकर मीरा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्मृति को गले लगा लिया और पूरे घर में मिठाइयां बांटी।

मीरा ने अब स्मृति का दोगुना ध्यान रखना शुरू कर दिया। वह उसके लिए तरह-तरह के पौष्टिक सूप, ताजे फलों का जूस और मेवे के लड्डू बनाकर लाती। लेकिन स्मृति के मन में तो उसकी मां ने जहर भर दिया था। सुशीला ने फोन पर स्मृति को समझा दिया था कि, “तेरी जेठानी को तेरी खुशी बर्दाश्त नहीं हो रही होगी। उसके हाथ का बना कुछ मत खाना, क्या पता जलन के मारे कुछ मिला दे।” इस बेबुनियाद शक के चलते स्मृति, मीरा के हाथ का बना कुछ भी खाने से कतराने लगी। वह या तो अपनी मां के घर से आया सामान खाती या फिर बाहर से कुछ मंगवा लेती। मीरा जब भी प्यार से कुछ लेकर जाती, स्मृति कोई न कोई बहाना बनाकर उसे टाल देती।

एक दिन स्मृति ने चुपके से बाहर से कुछ मसालेदार और बाहर का तला-भुना खाना मंगवाकर खा लिया। शाम होते-होते उसकी तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उसे उल्टियां होने लगीं और पेट में तेज दर्द उठने लगा। रोहन घबरा गया और विक्रम भी ऑफिस से जल्दी आ गया। डॉक्टर को बुलाया गया। जब डॉक्टर ने पूछा कि क्या खाया था, तो स्मृति ने मौके का फायदा उठाते हुए अपनी सारी नफरत निकाल दी। उसने रोते हुए कहा, “दोपहर में मीरा भाभी ने मुझे एक जूस दिया था, उसके बाद से ही मुझे घबराहट होने लगी। मुझे पता है, ये मुझे और मेरे बच्चे को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं।”

यह सुनकर घर में सन्नाटा छा गया। रोहन, जो पहले से ही अपनी पत्नी की बातों में आकर भाभी से दूर हो चुका था, अपना आपा खो बैठा। उसने बिना सोचे-समझे मीरा पर चिल्लाना शुरू कर दिया, “भाभी, अगर आपसे हमारी खुशी नहीं देखी जाती तो साफ कह देतीं! मेरी पत्नी की जान के साथ खेलने का हक आपको किसने दिया?” विक्रम को अपनी पत्नी पर पूरा भरोसा था, उसने रोहन को शांत करने की कोशिश की, लेकिन रोहन ने एक नहीं सुनी। मीरा पत्थर की तरह खड़ी रह गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। जिस देवरानी को उसने छोटी बहन से बढ़कर प्यार दिया, आज उसी ने उस पर इतना घिनौना इल्जाम लगा दिया था।

अगले ही दिन, स्मृति अपनी मां के साथ अपने मायके चली गई। उसने कसम खा ली कि वह अपनी डिलीवरी तक वहीं रहेगी। जब केदारनाथ और सुमित्रा तीर्थ यात्रा से लौटे और उन्हें यह सब पता चला, तो वे गहरे सदमे में चले गए। सुमित्रा ने स्मृति को फोन करके वापस आने को कहा, तो स्मृति ने साफ शब्दों में शर्त रख दी, “मां जी, जब तक उस घर में मीरा रहेगी, मैं कदम नहीं रखूंगी। मैं अपने बच्चे की जान खतरे में नहीं डाल सकती।” घर का माहौल एकदम बोझिल हो गया था। विक्रम को अपने भाई और देवरानी के इस रवैये से बहुत गहरी ठेस पहुंची थी। घर में रोज-रोज का क्लेश न हो और माता-पिता को बुढ़ापे में शांति मिले, इसलिए विक्रम ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया।

विक्रम ने शहर के दूसरे कोने में एक छोटा सा घर किराए पर लिया और अपनी पत्नी मीरा तथा अपने माता-पिता के साथ वहां शिफ्ट हो गया। जाते वक्त केदारनाथ ने रोहन से सिर्फ इतना कहा, “बेटा, घर ईंट-पत्थर से नहीं, विश्वास और एक-दूसरे के सम्मान से बनता है। जब तुम्हें अपनी गलती का अहसास हो जाए, तब हमारे पास आना।”

अब उस बड़े से पुश्तैनी घर में सिर्फ रोहन और स्मृति का राज था। स्मृति ने एक बेटे को जन्म दिया और कुछ समय बाद अपने मायके से वापस आ गई। शुरुआत में तो उसे लगा कि अब उसे किसी की कोई रोक-टोक नहीं है और वह इस घर की इकलौती मालकिन है। लेकिन असली हकीकत का सामना तो उसे अब करना था।

पहले जो घर एक सुचारू मशीन की तरह चलता था, अब पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था। छोटा बच्चा रात-रात भर जागता और रोता था। सुबह उठकर रोहन के लिए नाश्ता बनाना, बच्चे की मालिश करना, उसे नहलाना, घर की साफ-सफाई देखना और फिर दोपहर का खाना बनाना—स्मृति अकेले इन सब में बुरी तरह उलझ गई। नौकरानियां भी कामचोरी करने लगी थीं क्योंकि उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। रोहन ऑफिस से थका-हारा आता, तो उसे न तो समय पर चाय मिलती और न ही शांति। स्मृति चिड़चिड़ी हो गई थी और छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी के बीच झगड़े होने लगे थे।

एक रात जब बच्चा लगातार रो रहा था और स्मृति बुखार से तपते हुए भी उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी, तब उसे अचानक मीरा की याद आई। उसे याद आया कि जब विक्रम और मीरा का बेटा छोटा था, तब मीरा कैसे पूरे घर का काम हंसते हुए निपटा लेती थी और कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं देती थी। उसे याद आया कि कैसे मीरा ने उसकी प्रेगनेंसी के शुरुआती दिनों में उसे बिना मांगे हर सुविधा दी थी। स्मृति को अपनी गलती का गहरा अहसास होने लगा। उसे समझ आ गया कि जिस जेठानी को वह अपना दुश्मन समझती थी, असल में वही उसकी सबसे बड़ी ढाल थी। जो काम आज उसे पहाड़ लग रहे थे, मीरा उन्हें बिना कोई एहसान जताए सालों से कर रही थी। स्मृति फूट-फूट कर रोने लगी।

अगली सुबह उसने रोहन से कहा, “मुझे अभी मीरा भाभी के पास जाना है।” रोहन, जो खुद भी इस अलगाव से टूट चुका था, हैरान होकर बोला, “क्यों? अब क्या हो गया?” स्मृति ने रोते हुए जवाब दिया, “मुझे भाभी से माफी मांगनी है। मैं अब और इस बोझ के साथ नहीं जी सकती।”

रोहन तुरंत स्मृति और बच्चे को लेकर उस किराए के घर की तरफ निकल पड़ा। जब वे वहां पहुंचे, तो दरवाजा मीरा ने ही खोला। सामने अपनी छोटी देवरानी और देवर को देखकर मीरा की आंखों में चमक आ गई। बिना पलक झपकाए वह तेजी से अंदर गई और आरती की थाली सजा लाई। उसने बच्चे के माथे पर तिलक लगाया और स्मृति की आरती उतारी। “अरे, तुम लोग बाहर क्यों खड़े हो? अंदर आओ,” मीरा ने प्यार से कहा।

तभी विक्रम बाहर आया और उसने सख्त लहजे में कहा, “मीरा, तुम स्मृति के बच्चे को हाथ मत लगाना। कहीं उसे कुछ हो गया तो फिर से तुम पर इल्जाम लग जाएगा।” यह सुनते ही मीरा के हाथ ठिठक गए और वह पीछे हट गई।

विक्रम की बात सुनकर स्मृति वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसने मीरा के हाथ पकड़ लिए और बोली, “मुझे माफ कर दीजिए भाभी! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। उस दिन मेरी तबीयत आपके जूस से नहीं, बल्कि मेरे छुपकर बाहर का खाना खाने से खराब हुई थी। मेरी मां ने मेरे दिमाग में यह जहर भर दिया था कि आप मेरा बुरा चाहती हैं। आप सबकी चहेती थीं और मैं आपसे जलने लगी थी। मेरी इसी जलन और अहंकार ने हमारे हंसते-खेलते परिवार को तोड़ दिया। मुझे अब समझ आ गया है कि आपके बिना मैं कुछ भी नहीं हूं। मुझे सजा दीजिए, लेकिन प्लीज मुझे माफ कर दीजिए।”

यह सुनकर रोहन को भी गहरा धक्का लगा। उसे अपनी पत्नी की बेवकूफी और अपने खुद के बर्ताव पर बहुत शर्मिंदगी हुई। उसने भी विक्रम और अपने माता-पिता के सामने हाथ जोड़ लिए। मीरा, जिसका दिल मोम की तरह था, स्मृति को ऐसे रोता हुआ नहीं देख पाई। उसने स्मृति को गले से लगा लिया और उसकी पीठ सहलाते हुए बोली, “पागल लड़की, बहनें भी कभी एक-दूसरे से नाराज होती हैं क्या? तूने अपनी गलती मान ली, मेरे लिए यही काफी है। इस बच्चे की कसम, मेरे मन में तेरे लिए कभी कोई मैल नहीं था।”

तभी ससुर केदारनाथ जी अपनी कुर्सी से उठे और पास आकर बोले, “बेटा स्मृति, यह परिवार एक हाथ की तरह होता है। हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, लेकिन जब वे एक साथ मिलती हैं, तभी एक मजबूत मुट्ठी बनती है। विक्रम ने घर इसलिए छोड़ा था ताकि तुम्हें यह समझ आ सके कि एक घर सिर्फ ईंटों से नहीं, बल्कि सबके सहयोग से चलता है। घर में हर व्यक्ति की अपनी एक अलग अहमियत होती है।”

रोहन ने आगे बढ़कर विक्रम के पैर छुए और कहा, “भैया, मैं भी बहुत अंधा हो गया था। मुझे माफ कर दीजिए। अब हम सब वापस अपने घर चलेंगे।”

उस दिन के बाद से वह परिवार फिर से अपने पुराने घर में लौट आया। स्मृति अब पूरी तरह बदल चुकी थी। उसने समझ लिया था कि एकता में ही सबसे बड़ी ताकत है और परिवार का साथ दुनिया की हर खुशी से बढ़कर है। अब जब बच्चा रोता, तो मीरा उसे संभाल लेती और स्मृति खुशी-खुशी रसोई का काम देख लेती। घर में फिर से वही पुरानी रौनक और हंसी-ठिठोली लौट आई थी।

रात का समय था। स्मृति अपने कमरे में बैठी पुराने दिनों के बारे में सोच रही थी, तभी बाहर से मीरा की आवाज आई, “स्मृति! मुन्ना सो गया है, तूने सुबह से कुछ ढंग का नहीं खाया। जल्दी बाहर आ, मैंने तेरे लिए गरम-गरम रोटियां सेंकी हैं।” स्मृति की आंखों में कृतज्ञता के आंसू आ गए। वह बाहर गई, तो देखा कि मीरा उसे बिल्कुल एक मां की तरह अपने हाथों से खाना खिलाने के लिए बैठी है। उस रात स्मृति ने जो सुकून महसूस किया, वह उसे जिंदगी में पहले कभी नहीं मिला था।

क्या आपको भी लगता है कि जब रिश्ते टूटते हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान घर की शांति का होता है? और क्या स्मृति की तरह अपनी गलती मानकर माफी मांग लेने से बड़े से बड़े घाव भर सकते हैं? अपने विचार हमें जरूर बताएं!

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मूल लेखिका : ख़ुशी (फरीदाबाद )

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