स्नेहा अब फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपनी उस ओछी मानसिकता पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी जिसने एक पिता के प्यार को पैसों की तराज़ू में तौल दिया था। वह उठी और रमाकांत जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। “बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिये। पैसे की तंगी और घर के खर्चों की चिंता ने मुझे इतना स्वार्थी बना दिया था कि मैं भूल ही गई कि आप इस घर की नींव हैं। आपने आज मुझे डांटा नहीं, बल्कि मुझे आईना दिखाया है। मैं वादा करती हूँ, आज के बाद इस घर में आपके सम्मान की कोई तारीख नहीं होगी।”
रमाकांत जी, जो कभी शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में गणित के वरिष्ठ शिक्षक हुआ करते थे, रिटायरमेंट के बाद अब अपना जीवन शांति से व्यतीत कर रहे थे। उनकी पत्नी के निधन के बाद उनका पूरा संसार उनका इकलौता बेटा मोहित, बहू स्नेहा और सात साल का पोता आरव ही थे। घर का माहौल वैसे तो सामान्य था, लेकिन रमाकांत जी एक गणित के शिक्षक होने के नाते हर चीज़ का बहुत बारीकी से आंकलन करते थे। उन्होंने पिछले कुछ सालों में एक बहुत ही अजीब और तकलीफदेह पैटर्न या यूँ कहें कि एक चक्र महसूस किया था। यह चक्र मौसम का नहीं, बल्कि कलेंडर की तारीखों का था।
महीने के अंतिम दिन चल रहे थे। आज छब्बीस तारीख थी। घर के बजट का तनाव स्नेहा के चेहरे पर साफ झलक रहा था। सुबह के साढ़े छह बजे थे और रमाकांत जी अपनी छड़ी उठाकर अपनी रोज़मर्रा की सुबह की सैर के लिए दरवाज़े की तरफ बढ़ ही रहे थे कि रसोई से स्नेहा की तीखी आवाज़ आई।
“पिताजी! कहाँ चल दिए सुबह-सुबह? बस पार्क में जाकर अपने रिटायर दोस्तों के साथ गप्पें ही तो मारनी हैं आपको। जाते-जाते पहले बाज़ार से होते हुए जाना। ताज़ी सब्ज़ियां लेते आना और मोल-भाव ठीक से करना। और हाँ, ध्यान रहे, सब्ज़ी के बचे हुए खुल्ले पैसे अपनी जेब में मत रख लीजिएगा, पिछली बार भी आपने हिसाब ठीक से नहीं दिया था।”
रमाकांत जी के कदम दरवाज़े पर ही ठिठक गए। उनके सफेद बालों वाले सिर में एक हल्की सी पीड़ा उठी, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जिस इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी ईमानदारी की मिसाल कायम की हो, उसे अपनी ही बहू से चंद रुपयों की चोरी का ताना सुनना पड़े, तो दिल पर क्या गुज़रती है, यह केवल वही समझ सकते थे। लेकिन घर की शांति बनाए रखने के लिए वह चुपचाप थैला लेकर बाज़ार चले गए। यह छब्बीस तारीख का रूखापन था, जो हर महीने उनके हिस्से आता था।
दिन बीतते गए और महीने की पहली तारीख आ गई। घर में मोहित की सैलरी आ चुकी थी। माहौल में थोड़ा सा बदलाव था। तनाव कुछ कम था और स्नेहा के स्वर में छब्बीस तारीख वाली कड़वाहट नहीं थी, लेकिन एक तरह का आदेश ज़रूर था। शाम के वक्त जब रमाकांत जी अख़बार पढ़ रहे थे, तब स्नेहा उनके पास आई और थोड़ी मीठी लेकिन मतलब भरी आवाज़ में बोली, “पापाजी! आपको थोड़ा कष्ट तो होगा, पर प्लीज… बाज़ार से इस महीने का राशन और कुछ फल ला दीजिये न। मोहित तो ऑफिस से थक कर आते हैं, उनसे कहा नहीं जाता।”
रमाकांत जी ने अख़बार मोड़कर रखा और मुस्कुरा कर हामी भर दी। यह पहली तारीख का व्यवहार था। काम अब भी उनसे ही करवाया जा रहा था, लेकिन ‘प्लीज’ और ‘पापाजी’ के आवरण में लपेट कर।
फिर आई महीने की सात तारीख। यह कोई आम तारीख नहीं थी। यह रमाकांत जी के बैंक खाते में उनकी सम्मानजनक पेंशन क्रेडिट होने का दिन था। सुबह के सात बजे थे। रमाकांत जी हमेशा की तरह उठकर नहा-धोकर अपने कमरे से बाहर आए। आज उन्हें किसी काम के लिए नहीं कहा गया था। उल्टे, डाइनिंग टेबल पर उनके पसंदीदा गोभी के पराठे और अदरक वाली चाय से उठती भाप उनका इंतज़ार कर रही थी।
स्नेहा आज बहुत जल्दी उठ गई थी और चेहरे पर एक अजीब सी, अतिरिक्त मिठास लिए उनके पास आई। “पापाजी! अरे आप कहाँ जा रहे हैं तैयार होकर? सब्ज़ी लाने? न बाबा न! आपसे इस उम्र में सब्ज़ी मंगवाना और काम करवाना हमें शोभा देता है भला? आप हमारे घर के बड़े हैं, आपके भोजन की थाली मैंने तैयार कर दी है। चलिए, पहले गरमा-गरम नाश्ता कीजिये।”
रमाकांत जी चुपचाप नाश्ता करने लगे। तभी स्नेहा उनके पास कुर्सी खींच कर बैठ गई और अपनी सबसे मीठी आवाज़ में बोली, “फिर हम दोनों तैयार होकर चलते हैं बैंक। आपकी पेंशन लाने का दिन है न आज। इतनी भीड़-भाड़ में आप अकेले जाएंगे, धक्का-मुक्की होगी, मुझे तो घर में चैन ही नहीं मिलेगा। मैं खुद चलूंगी आपके साथ।”
यह सात तारीख का वह चेहरा था, जिसे देखकर रमाकांत जी अंदर ही अंदर मुस्कुरा देते थे। यह कोई पहला महीना नहीं था जब उन्होंने तारीखों के हिसाब से बदलते इस व्यवहार को देखा था। पिछले दो सालों से वह चुपचाप अपनी पेंशन लाते और स्नेहा के हाथ में रख देते थे। स्नेहा उस पैसे से घर के कुछ ऐशो-आराम की चीज़ें लाती, अपनी शॉपिंग करती और फिर महीने के अंत तक वही तंगी और वही छब्बीस तारीख वाले ताने शुरू हो जाते।
लेकिन आज रमाकांत जी ने तय कर लिया था कि वह इस चक्र को तोड़ेंगे। वह किसी से लड़ना नहीं चाहते थे, न ही वह अपनी बहू को नीचा दिखाना चाहते थे। वह बस एक शिक्षक की तरह अपने परिवार को एक पाठ पढ़ाना चाहते थे।
बैंक में पहुंचकर रमाकांत जी ने अपना पेंशन का पैसा निकाला। स्नेहा उनके बगल में खड़ी थी, उसकी नज़रें कैश काउंटर से मिलने वाले रुपयों पर गड़ी थीं। लेकिन आज रमाकांत जी ने सारे पैसे अपनी जेब में नहीं रखे। उन्होंने बैंक मैनेजर से कहकर दो नए खाते खुलवाए थे। पहला खाता पोते आरव के नाम पर था, जिसमें उन्होंने अपनी पेंशन का एक बड़ा हिस्सा हर महीने फिक्स डिपॉज़िट (RD) के रूप में कटने का निर्देश दे दिया था। दूसरा हिस्सा उन्होंने शहर के एक अनाथालय को ऑटो-डेबिट के माध्यम से दान करने की व्यवस्था कर दी थी।
उनके हाथ में अब केवल दस हज़ार रुपये बचे थे। स्नेहा यह सब देखकर हैरान रह गई। उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया था। बैंक से घर तक का रास्ता एकदम खामोशी में कटा। स्नेहा के चेहरे पर सात तारीख वाली वह बनावटी मिठास गायब हो चुकी थी और उसकी जगह एक अजीब सी झुंझलाहट ने ले ली थी।
रात को जब मोहित ऑफिस से लौटा, तो घर का माहौल बहुत भारी था। स्नेहा ने मोहित के सामने अपनी भड़ास निकाल दी। “तुम्हारे पिताजी को न जाने क्या हो गया है! सारी पेंशन के पैसे पता नहीं कहाँ फंसा आए हैं और अनाथालय में दान दे रहे हैं। घर में इतनी ज़रूरतें हैं, उनका कोई खयाल नहीं है!”
मोहित भी थोड़ा हैरान हुआ। उसने अपने पिता के कमरे में जाकर पूछा, “पापा, क्या बात है? स्नेहा कह रही है कि आपने पेंशन का पैसा कहीं और निवेश कर दिया है? क्या आपको हम पर भरोसा नहीं है?”
रमाकांत जी बहुत शांत भाव से अपने बिस्तर से उठे। उन्होंने मोहित और स्नेहा दोनों को अपने पास सोफे पर बैठने का इशारा किया। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक पिता की गहरी करुणा थी।
“बेटा,” रमाकांत जी ने स्नेहा की तरफ देखते हुए बहुत ही कोमल स्वर में कहना शुरू किया, “मैं जानता हूँ कि घर चलाना आसान नहीं होता। महंगाई के इस दौर में तुम दोनों बहुत मेहनत करते हो। मैंने कभी अपनी पेंशन तुम लोगों से नहीं छुपाई। लेकिन पिछले कुछ समय से मैं महसूस कर रहा था कि इस घर में मेरा सम्मान एक पिता के रूप में नहीं, बल्कि एक एटीएम मशीन के रूप में हो रहा है।”
स्नेहा ने नज़रें चुराने की कोशिश की, लेकिन रमाकांत जी ने अपनी बात जारी रखी।
“जब सत्ताईस तारीख आती है, तो मैं इस घर का सबसे फालतू इंसान बन जाता हूँ, जिसे सब्ज़ी लाते समय पैसे चुराने के ताने दिए जाते हैं। पहली तारीख को मैं एक मज़दूर बन जाता हूँ जिससे मीठे बोल बोलकर घर का भारी सामान उठवाया जाता है। और सात तारीख को… सात तारीख को मैं अचानक इस घर का देवता बन जाता हूँ। मेरे लिए पराठे बनते हैं, मेरी चिंता होने लगती है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। स्नेहा का सिर शर्म से झुकने लगा था। उसे अंदाज़ा ही नहीं था कि उसके ससुर उसकी हर हरकत को इतनी गहराई से समझ रहे थे।
रमाकांत जी ने आगे कहा, “बेटा स्नेहा, मुझे तुम्हारे पैसे खर्च करने से कोई ऐतराज़ नहीं है। लेकिन रिश्ते जब स्वार्थ की बुनियाद पर टिकने लगें, तो उनकी उम्र लंबी नहीं होती। तुम मेरी बहू हो, मेरी बेटी जैसी हो। अगर तुम मुझसे बिना पेंशन आए भी उसी प्यार से बात करोगी, तो मैं अपना सब कुछ तुम पर लुटा दूँ। मैंने आज जो पैसा आरव के नाम जमा किया है, वह कल तुम लोगों के ही काम आएगा। और जो अनाथालय में दिया है, उससे मुझे सुकून मिलेगा। मैंने दस हज़ार रुपये अपने पास रखे हैं, जो मैं हर महीने घर के खर्च में अपनी तरफ से बिना तुम्हारे मांगे तुम्हें दिया करूँगा। लेकिन बदले में, मुझे छब्बीस तारीख वाले ताने नहीं, बल्कि एक पिता का सम्मान चाहिए… जो कलेंडर की तारीखों का मोहताज न हो।”
यह सुनकर मोहित की आँखों में आंसू आ गए। उसने आगे बढ़कर अपने पिता के पैर पकड़ लिए। “मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं अपने काम में इतना उलझा रहा कि मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि इस घर में आपके साथ क्या हो रहा है। मैं कितना नालायक बेटा हूँ।”
स्नेहा अब फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपनी उस ओछी मानसिकता पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी जिसने एक पिता के प्यार को पैसों की तराज़ू में तौल दिया था। वह उठी और रमाकांत जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। “बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिये। पैसे की तंगी और घर के खर्चों की चिंता ने मुझे इतना स्वार्थी बना दिया था कि मैं भूल ही गई कि आप इस घर की नींव हैं। आपने आज मुझे डांटा नहीं, बल्कि मुझे आईना दिखाया है। मैं वादा करती हूँ, आज के बाद इस घर में आपके सम्मान की कोई तारीख नहीं होगी।”
रमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए स्नेहा के सिर पर हाथ रखा और उसे आशीर्वाद दिया। उस रात घर में जो खाना बना, उसमें ना तो छब्बीस तारीख की कड़वाहट थी और ना ही सात तारीख का स्वार्थ। उस रात के खाने में परिवार के असली प्यार की मिठास थी। स्नेहा अब समझ चुकी थी कि बुज़ुर्ग घर का बोझ नहीं, बल्कि वह बरगद का पेड़ होते हैं, जिनकी छाँव अनमोल होती है।
समय बीतता गया। अब रमाकांत जी को ना तो सब्ज़ी लाने के लिए ताने सुनने पड़ते थे और ना ही सात तारीख को कोई बनावटी मिठास देखनी पड़ती थी। स्नेहा अब सच में उनका एक पिता की तरह खयाल रखती थी। रमाकांत जी भी ख़ुशी-ख़ुशी पोते को स्कूल से लाते और घर के छोटे-मोटे कामों में स्नेहा का हाथ बंटाते। इस घर ने सीख लिया था कि रिश्ते पैसों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सम्मान और सच्चे प्रेम से सींचे जाते हैं।
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लेखिका : शालिनी झा