जब बैग खोला गया तो सब स्तब्ध रह गए। उसमें सुप्रिया के मायके से मिला सारा स्त्रीधन, सोने के कंगन, हार और उसके नाम की एक पुरानी जमीन के दस्तावेज थे जो उसके पिता ने उसे उपहार में दिए थे। सुप्रिया ने हाथ जोड़कर कहा कि विवेक जी, नकुल, मयंक… माँ जी ने कभी मुझे पराया नहीं समझा। जब मेरी सूनी गोद देखकर पूरी दुनिया मुझे ताने देती थी, तब माँ जी ने अपनी छाती से लगाकर मुझे संसार की सबसे सुखी स्त्री बनाया था। आज अगर माँ को बचाने के लिए मेरे तन का आखिरी कतरा भी बिक जाए, तो भी मैं उनका कर्ज नहीं चुका सकती। इन गहनों और जमीन को बेच दीजिए, लेकिन मेरी माँ के इलाज में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।
घर के बड़े बेटे विवेक की सरकारी बैंक में अफसर पद पर नियुक्ति क्या हुई, पूरे शहर से विवाह के प्रस्तावों की कतार लग गई। हर कोई अपनी लाडली के लिए एक सुलझा हुआ और संस्कारी दामाद चाहता था। रिश्ते लेकर आने वाले लोग भांति-भांति के दहेज और ठाठ-बाट की बातें करते, लेकिन घर की मुखिया कौशल्या देवी का मन किसी पर नहीं टिक रहा था। वे हमेशा यही कहतीं कि मुझे अपने घर के लिए कोई रानी नहीं, बल्कि पूरे परिवार को एक माला में पिरोने वाली संस्कारी गुड़िया चाहिए।
एक दिन पड़ोस के एक परिचित के जरिए वे पड़ोस के कस्बे में रहने वाले एक शिक्षक के घर पहुंचीं। जैसे ही सुप्रिया चाय की ट्रे लेकर सादगी भरे कदमों से कमरे में आई, कौशल्या देवी की नजरें उस पर टिक गईं। सुप्रिया की सौम्य मुस्कान, बड़ों के चरण स्पर्श करने का सलीका और उसकी आँखों की निश्छलता ने पहली ही नजर में कौशल्या देवी का दिल जीत लिया। बिना किसी देर के उन्होंने वहीं शगुन का एक रुपया और नारियल सुप्रिया की हथेली पर रख दिया और स्पष्ट कह दिया कि यही बेटी मेरे घर की बड़ी बहू बनेगी। रिश्तेदार हैरान थे कि इतने अच्छे रिश्ते छोड़कर साधारण परिवार की लड़की क्यों चुनी, लेकिन कौशल्या देवी जानती थीं कि सोने की परख केवल जौहरी ही कर सकता है।
विवाह बड़े ही धूमधाम से संपन्न हुआ। सुप्रिया जब गृहप्रवेश कर उस चौखट के भीतर आई, तो उसके स्वागत के लिए विवेक के छोटे भाई-बहन खड़े थे। दो देवर नकुल और मयंक तथा दो छोटी ननदें रुचि और प्रीति। सुप्रिया खुद अपने मायके में बड़े और भरे-पूरे परिवार के बीच पली-बढ़ी थी, इसलिए ससुराल में देवर-ननदों का भरा-पूरा आंगन पाकर उसका मन मयूर की तरह नाच उठा। उसे एक पल के लिए भी यह अहसास नहीं हुआ कि वह किसी पराये घर में आई है। बच्चे भी नई भाभी के इर्द-गिर्द ऐसे घूमने लगे जैसे वे बरसों से उनका ही इंतजार कर रहे हों।
ससुराल में आमतौर पर नई बहू को रसोई का सारा भार सौंप दिया जाता है, लेकिन यहाँ नजारा बिल्कुल जुदा था। रसोई पर पूरा अधिकार कौशल्या देवी का ही रहता था। सुबह उठते ही वे नाश्ते और चाय की तैयारी में जुट जातीं। सुप्रिया जब भी पल्लू संभालते हुए कहती कि माँ जी, अब आप आराम किया कीजिए, मैं पूरा खाना बना दिया करूंगी, तो कौशल्या देवी मुस्कुराकर उसे प्यार से डांट देतीं। वे कहतीं कि क्यों, तू इस घर के लोगों से अलग खाना खाती है क्या? जैसे मैं अपने बाकी चार बच्चों के लिए रोटियां सेकती हूँ, वैसे ही दो रोटियां तेरी भी सेक दूंगी। तू भी तो इसी घर की बेटी है, फिर काम का ऐसा बंटवारा कैसा?
एक दोपहर जब दोनों आंगन में बैठकर गेहूं साफ कर रही थीं, कौशल्या देवी ने सुप्रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए बड़ी आत्मीयता से समझाया। उन्होंने कहा कि देख बहू, जैसे मैं अपने बाकी बच्चों को प्यार करती हूँ और कभी गलती करने पर डांट भी लगा देती हूँ, तो वे कभी दिल पर नहीं लेते। उसी तरह तू भी मेरी ही संतान है। अगर कभी मुझसे कोई बात ऊंची आवाज में निकल जाए या मेरी कोई बात बुरी लगे, तो सीधे मुझसे आकर कहना। अपना दर्द कभी मायके में अपनी मां से मत बांटना, क्योंकि बेटी के ससुराल की छोटी-सी भी तकलीफ सुनकर मायके की मां का कलेजा कांप उठता है। मैं भी एक बेटी की मां हूँ, इसलिए यह दर्द भली-भांति समझती हूँ।
माँ जी के इन शब्दों ने सुप्रिया की आँखें नम कर दीं। उसने झट से सास के गले लगकर कहा कि माँ जी, आप तो मेरी माँ जैसी नहीं, साक्षात मेरी माँ ही हैं। अगर मुझसे अनजाने में भी कोई भूल हो जाए तो आप बिना झिझक मुझे कान पकड़कर डांटिएगा, मैं कभी बुरा नहीं मानूंगी। मैं वादा करती हूँ कि इस आंगन में किसी की आँखों में मेरी वजह से आँसू नहीं आएंगे। नकुल, मयंक, रुचि और प्रीति में मुझे अपने ही सगे भाई-बहनों का अक्स दिखाई देता है।
दिन बीतते गए और समय के पहिए ने बड़ी तेजी से रफ्तार पकड़ी। सुप्रिया ने पूरे घर को अपने प्यार की खुशबू से महका दिया। सुबह बच्चों के स्कूल और कॉलेज के टिफिन तैयार करने से लेकर रात को उनके दूध के गिलास तक, हर चीज का ध्यान सुप्रिया अपनी पलकों पर रखती। नकुल और मयंक को अपनी पढ़ाई का कोई प्रोजेक्ट पूरा करना हो या रुचि और प्रीति को अपनी कोई सहेली जैसी बात कहनी हो, वे सबसे पहले बड़ी भाभी के पास ही दौड़ते। विवेक भी अपनी पत्नी के इस निस्वार्थ प्रेम और समर्पण को देखकर खुद को धन्य मानते थे।
लेकिन समय के इस खूबसूरत सफर में एक गहरी कसक भी छिपी हुई थी। शादी को सात-आठ वर्ष बीत चुके थे, मगर सुप्रिया की गोद अब तक सूनी थी। परिवार में बच्चे की किलकारी गूंजने की उम्मीद हर महीने टूटती और बिखर जाती। आस-पड़ोस की औरतें ताने मारने से नहीं चूकती थीं। जब भी कोई शादी-ब्याह या तीज-त्योहार होता, लोग दबी जुबान में सुप्रिया को बांझ कहने से भी बाज नहीं आते। लेकिन सुप्रिया कभी किसी के सामने अपनी पीड़ा जाहिर नहीं होने देती थी। जब भी कोई ऐसी बात उठती, वह चेहरे पर मंद मुस्कान लाकर कह देती कि भगवान ने मुझे पहले से ही चार प्यारे बच्चे दे रखे हैं। नकुल, मयंक, रुचि और प्रीति मेरे ही तो बच्चे हैं। अगर मेरी अपनी कोख से कोई संतान नहीं जन्मी तो क्या फर्क पड़ता है, इन चारों का प्यार ही मेरी पूरी दुनिया है।
कौशल्या देवी अंदर ही अंदर अपनी बहू के इस दर्द को समझती थीं। उन्होंने शहर के सबसे बड़े डॉक्टरों से लेकर बड़े-बड़े वैद्यों तक सुप्रिया की जांच कराई, तमाम दवाइयां और इलाज चले, लेकिन हर जगह से यही जवाब मिला कि मेडिकल रूप से कोई उम्मीद नहीं बची है। इस कड़वे सच के सामने आने के बाद कौशल्या देवी का प्यार सुप्रिया के लिए और ज्यादा गहरा हो गया। उन्होंने कभी बहू को किसी ताने या उलाहने की आंच तक नहीं छूने दी।
उम्र ढलने के साथ-साथ कौशल्या देवी के घुटनों में दर्द रहने लगा और उनकी सेहत कमजोर होने लगी। अब सुप्रिया ने आगे बढ़कर घर की पूरी बागडोर अपने मजबूत कंधों पर संभाल ली। उसने सास को पूरी तरह से विश्राम दिया और खुद सुबह से लेकर देर रात तक घर के हर सदस्य की सेवा में जुटी रहती।
कुछ समय बाद दोनों ननदों, रुचि और प्रीति के विवाह के रिश्ते तय हो गए। सुप्रिया ने अपनी शादी के गहने तक बिना किसी संकोच के दोनों ननदों के दहेज और विदाई के लिए अलमारी से निकाल कर रख दिए। उसने एक मां की तरह दोनों बेटियों की डोली सजाई। विदाई के समय रुचि और प्रीति अपनी सगी मां से ज्यादा अपनी भाभी के गले लगकर फूट-फूट कर रो रही थीं। वे दोनों अपने-अपने ससुराल में बहुत सुखी और संपन्न थीं।
मगर सुप्रिया का मन कहाँ मानने वाला था। जैसे ही शादी को पंद्रह-बीस दिन बीतते, वह शाम को काम से लौटते ही विवेक के आगे हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती कि सुनिए जी, कल जाकर रुचि और प्रीति को मायके ले आइए। कौशल्या देवी मुस्कुराते हुए टोकतीं कि अरे सुप्रिया, अभी तो कुछ दिन पहले ही वे दोनों अपने ससुराल गई हैं, उन्हें वहां भी तो रमने दे। लेकिन सुप्रिया का भोला जवाब होता कि माँ जी, उनके बिना यह बड़ा सा घर काटने को दौड़ता है। जब तक वे दोनों आंगन में चहकती नहीं हैं, मेरा कलेजा शांत नहीं होता। सुप्रिया के इस असीम और निश्छल दुलार को देखकर कौशल्या देवी हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करतीं कि अगले जनम में भी मुझे यही बहू मिले।
समय आगे बढ़ा और नकुल की भी पढ़ाई पूरी होकर एक अच्छी कंपनी में नौकरी लग गई। परिवार की रजामंदी से उसका विवाह एक बहुत ही सुशील और संस्कारी कन्या राधिका के साथ तय हुआ। शादी के बाद जब राधिका घर आई, तो सुप्रिया ने उसे देवरानी नहीं, बल्कि अपनी छोटी बहन और बेटी की तरह सिर-आँखों पर बिठाया। राधिका भी समझदार और सुलझे विचारों की थी। उसने कुछ ही दिनों में सुप्रिया के त्याग और घर के प्रति उसके समर्पण को भांप लिया और बड़ी भाभी के पदचिह्नों पर चलते हुए परिवार में पूरी तरह घुल-मिल गई। दोनों देवरानी-जेठानी मिलकर घर को स्वर्ग जैसा बनाए रखती थीं।
इसके दो साल बाद सबसे छोटे बेटे मयंक की भी शादी हो गई और उसकी पत्नी शालिनी भी घर में आ गई। अब घर में तीन बहुएं थीं। कौशल्या देवी अब काफी वृद्ध हो चुकी थीं और चारपाई पर ही रहती थीं। सुप्रिया नियमित रूप से उनकी सेवा करती, उन्हें समय पर दवा देती और उनके पास बैठकर उनका हालचाल पूछती।
एक दिन अचानक घर में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे परिवार की नींव को हिलाकर रख दिया। कौशल्या देवी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उन्हें फौरन अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने बताया कि उनकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से प्रभावित हो चुकी हैं और बिना डायलिसिस या ट्रांसप्लांट के उनका बचना बहुत मुश्किल है। अस्पताल का खर्च दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। परिवार के सभी सदस्य अस्पताल के गलियारे में चिंता में डूबे बैठे थे।
अस्पताल के बाहर जब पैसों और इलाज की बात आई, तो माहौल में एक अनकहा तनाव तैरने लगा। नकुल और मयंक अपनी-अपनी आर्थिक तंगहाली का जिक्र करने लगे। मयंक ने सिर पकड़कर कहा कि भैया, मेरी कंपनी में छंटनी चल रही है, मेरे पास तो बिल्कुल भी सेविंग्स नहीं बची हैं। नकुल ने भी धीरे से कहा कि मैंने पिछले महीने ही नया फ्लैट बुक कराया है, उसकी ईएमआई जा रही है।
गलियारे के एक कोने में खड़ी सुप्रिया सब सुन रही थी। उसने देखा कि जिस मां ने सबको पाला, आज उसके अंतिम पड़ाव पर बच्चे विवशता की दीवारें खड़ी कर रहे हैं। सुप्रिया बिना कुछ कहे चुपचाप वहां से निकली और कुछ घंटों बाद लौटी। उसके हाथ में एक बैग था। उसने वह बैग विवेक और अपने दोनों देवरों के हाथों में थमा दिया।
जब बैग खोला गया तो सब स्तब्ध रह गए। उसमें सुप्रिया के मायके से मिला सारा स्त्रीधन, सोने के कंगन, हार और उसके नाम की एक पुरानी जमीन के दस्तावेज थे जो उसके पिता ने उसे उपहार में दिए थे। सुप्रिया ने हाथ जोड़कर कहा कि विवेक जी, नकुल, मयंक… माँ जी ने कभी मुझे पराया नहीं समझा। जब मेरी सूनी गोद देखकर पूरी दुनिया मुझे ताने देती थी, तब माँ जी ने अपनी छाती से लगाकर मुझे संसार की सबसे सुखी स्त्री बनाया था। आज अगर माँ को बचाने के लिए मेरे तन का आखिरी कतरा भी बिक जाए, तो भी मैं उनका कर्ज नहीं चुका सकती। इन गहनों और जमीन को बेच दीजिए, लेकिन मेरी माँ के इलाज में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।
सुप्रिया के इन शब्दों ने दोनों देवरों और दोनों देवरानियों के सीने पर हथौड़े जैसा प्रहार किया। नकुल और मयंक की आँखें शर्म से झुक गईं। राधिका और शालिनी दौड़कर सुप्रिया के गले लग गईं और रोते हुए बोलीं कि दीदी, आप सिर्फ हमारी जेठानी नहीं हैं, आप तो हमारे घर की साक्षात देवी हैं। हमें अपनी संकीर्ण सोच पर बेहद पछतावा है। नकुल और मयंक ने तुरंत अपने गहने और जमा पूंजी निकालने का फैसला किया और कहा कि माँ हम सबकी हैं, भाभी के त्याग के आगे हम इतने बौने नहीं बन सकते।
पूरा परिवार एक बार फिर एक अटूट डोर में बंध गया। सुप्रिया ने दिन-रात एक करके अस्पताल में सास की ऐसी सेवा की कि डॉक्टर भी हैरान रह गए। कई हफ्तों के सघन इलाज और सुप्रिया की निस्वार्थ सेवा के बल पर कौशल्या देवी मौत के मुंह से बाहर निकल आईं। जब वे स्वस्थ होकर घर लौटीं, तो उन्हें अस्पताल में सुप्रिया द्वारा किए गए त्याग की सारी बात पता चली।
घर के मंदिर के सामने कौशल्या देवी ने अपने कांपते हाथों से सुप्रिया को उठाया और अपने सीने से चिपका लिया। उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं कि बेटा न हो तो वंश नहीं चलता, लोग कहते हैं कि अपनी कोख से जन्मा बच्चा ही बुढ़ापे का सहारा बनता है। लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि कोख से ज्यादा बड़ी ममता की छांव होती है। तू सिर्फ इस घर की बहू नहीं, तू तो मेरी चारों संतानों से भी बढ़कर मेरा सच्चा सहारा है। भगवान ने तेरी गोद सूनी रखकर भी तुझे पूरे संसार की सबसे विशाल ममता से भर दिया है।
उसी शाम राधिका, जिसे हाल ही में एक बेटा हुआ था, वह अपने नन्हे बच्चे को लेकर आई। उसने उस मासूम को सुप्रिया की खाली गोद में रख दिया और हाथ जोड़कर बोली कि बड़ी दीदी, यह बच्चा सिर्फ मेरा नहीं है। इस घर को घर बनाए रखने वाली, हम सबको जीने का सलीका सिखाने वाली माँ तो आप हैं। आज से इस बच्चे की पहली माँ आप ही हैं। यह आपका बेटा है।
सुप्रिया ने जब उस नन्हे बालक को अपने सीने से लगाया, तो उसकी सूनी गोद बरसों की तपस्या के बाद ममता के अमृत से भर गई। पूरे घर में खुशी और प्रेम की एक ऐसी गंगा बह निकली जिसने हर शिकवे, हर दर्द को हमेशा के लिए धो दिया। शांति निकेतन का आंगन एक बार फिर रिश्तों की खुशबू से महक उठा, जहां त्याग ने स्वार्थ को हरा दिया था और प्रेम ने रिश्तों को अमर बना दिया था।
आज के इस दौर में जहाँ ज़रा-सी बात पर परिवार बिखर जाते हैं और संपत्ति के नाम पर रिश्ते तार-तार हो जाते हैं, क्या आपको लगता है कि सुप्रिया जैसी निस्वार्थ बहुएं ही आज भी हमारे समाज और संयुक्त परिवारों की असली रीढ़ हैं? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : सुनीता मुखर्जी