सुशीला जी पति की मृत्यु पर उदास बैठी हुई थीं। उनका पूरा घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था। उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी कि पति के साथ छोड़ने के बाद उनका क्या हाल होगा, बल्कि वह इस बात को लेकर परेशान थीं कि बेटा और बहू इन रिश्तेदारों को बारहवीं (तेरहवीं/श्राद्ध) पर रिटर्न गिफ़्ट में क्या देने वाले हैं?
उन्हें लगा कि बच्चों को रिश्तेदारों के सामने मेरी इज़्ज़त का ख़याल रखना चाहिए। सुबह उन्होंने बहू उज्ज्वला से पूछा भी था कि रघु ने ख़रीददारी की है या नहीं? लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया था।
सुशीला जी को याद आया कि यहाँ जितने भी लोग आए हुए हैं, उन सबने अपने आयोजनों में बहुत महँगे-महँगे रिटर्न गिफ़्ट दिए थे; फिर मैं कैसे पीछे हट सकती हूँ!
बारहवीं का कार्यक्रम संपन्न हो गया। सबने खाना खाया और जाने लगे। उनको खाली हाथ जाते हुए देख कर सुशीला जी का दिल टूट गया। उन्होंने सोचा—लोगों को क्या लगेगा कि बेटा इतना कमाता है, फिर भी पिता की याद में एक अच्छा सा रिटर्न गिफ़्ट तक नहीं दे सका!
रघु के घर आते ही उन्होंने उससे कहा, “बेटा, मैं तुमसे बहुत दुःखी हूँ।”
रघु ने हैरान होकर पूछा, “माँ, क्या कार्यक्रम को करने में मुझसे कोई ग़लती हो गई है?”
“तुमने सारे काम विधिवत तरीके से किए हैं, उसमें कोई ग़लती नहीं हुई है। लेकिन बेटा, घर आए हुए मेहमानों को तुमने अपने पिता की याद में कोई रिटर्न गिफ़्ट नहीं दिया। लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे?”
रघु ने कुछ कहा नहीं और चुपचाप वहाँ से चला गया। यह बात सुशीला जी को अच्छी नहीं लगी। उन्हें रात भर नींद नहीं आ रही थी। वह बार-बार याद कर रही थीं कि किस-किस ने क्या-क्या रिटर्न गिफ़्ट दिया था। वह सोच रही थीं कि कितना अच्छा होता अगर रघु ने भी लोगों को कुछ दिया होता, आज घर-घर में लोग मेरे पति को याद करते!
एक सप्ताह बाद, रघु ऑफिस से जल्दी आया और सबको फटाफट तैयार होने के लिए कहने लगा। जब सब तैयार होकर कार में बैठ गए, तो वह उन्हें एक जगह ले कर गया। जब सब अंदर पहुँचे, तो देखा कि वहाँ बहुत सारे छोटे-बड़े बच्चे हैं। वे सब अनाथ थे।
रघु ने सुशीला जी का हाथ थामकर कहा, “माँ, मैं इन बच्चों को पढ़ा रहा हूँ। यहाँ के जो बड़े बच्चे हैं, उनमें से कुछ डिग्री कर रहे हैं और एक-दो का मैंने बी.टेक. में दाख़िला करवाया है। जो छोटे हैं, उन्हें भी अच्छे स्कूल में पढ़ा रहा हूँ। यह सब मैंने पापा और आपके नाम से शुरू किया है।”
रघु ने आगे कहा, “माँ, ये बच्चे हमें और पापा को ताउम्र याद करेंगे और दुआ देंगे। स्टील के डिब्बे, जूट के बैग या किताबों पर पापा का नाम लिखकर दे देने से कोई याद नहीं रखता। लोग तो उन बर्तनों का ढंग से उपयोग भी नहीं करते हैं।”
सुशीला जी को अचानक याद आया कि बात तो सच ही है। एक बार उन्होंने अलमारी से दो लोटे निकाल कर कामवाली बाई को दिए थे, तो उसने भी लेने से मना कर दिया था और उन्हें वे लोटे वापस अंदर रखने पड़े थे। आज भी उनकी पूरी अलमारी ऐसे ही दिखावे के सामानों से भरी पड़ी थी।
उन्होंने भावुक होकर कहा, “रघु, मुझे एक बार गाँव वाले घर ले चल। वैसे भी कल रविवार है और तुम लोगों की छुट्टी है।”
वे सब गाँव के घर पहुँचे। सुशीला जी ने अपने पूरे घर को खँगाला, वहाँ रखा ऐसा सारा सामान समेटा और उसे अनाथालयों तथा वृद्धाश्रमों में बाँट दिया। इसके बाद उन्होंने सुकून की साँस ली।
दोस्तों, दूसरों की देखादेखी हम अक्सर रिटर्न गिफ़्ट देते रहते हैं। लेकिन एक बार दिल से सोचकर देखिए, हमारे अपनों को दूसरे लोग (दिखावे की चीज़ों के लिए) क्यों याद करेंगे? अगर सच में ही उनके लिए कुछ करना है, तो ज़रूरतमंद लोगों की मदद कीजिए; वे आपको सिर्फ याद ही नहीं करेंगे, बल्कि दिल से दुआ भी देंगे।
दो दिन पहले मैं किसी की बरसी पर गई थी। सच में, उन्होंने (बिना किसी दिखावे के) सबको श्रद्धा से खाना खिलाया और सबने भी उन्हें दिल से आशीर्वाद दिया।
के कामेश्वरी