धूप की छांव

“माँ, संसाधन मेहनत से कमाए जा सकते हैं, पर सच्चा दिल और वफादारी खरीदी नहीं जा सकती। मिहिर आज भी किसी अच्छे पद पर है, उसने मुझसे सच्चा प्रेम किया था और जब आपने उस रिश्ते से इनकार किया, तो उसने किसी और से शादी करने के बजाय अपनी जिंदगी को माँ-बाप की सेवा और काम में समर्पित कर दिया। उसने आज तक मेरा इंतजार किया है।”

माँ चुप रहीं। उनके चेहरे पर अपराधबोध और असमंजस की मिली-जुली परछाइयाँ दौड़ रही थीं।

मैंने माँ की गोद में अपना सिर रख दिया, “माँ, अगर मैं मिहिर से बात करूँ और वह शादी के बाद हमारे इसी घर में आकर रहने को तैयार हो जाए, तो क्या आपको ऐतराज होगा? आप तो जानती हैं, बाबूजी का यह घर इतना बड़ा है कि यहाँ कई जिंदगियाँ आराम से पल सकती हैं।”

भोपाल के पुराने इलाके की तंग गलियों से निकलकर जब मेरी गाड़ी अरेरा कॉलोनी की शांत सड़क पर मुड़ी, तो शाम के धुंधलके में घर की बत्तियाँ जल चुकी थीं। पाँच दिन का लंबा और थकाऊ ऑडिट टूर आखिरकार खत्म हुआ था। एक मल्टीनेशनल बैंक में रीजनल कंप्लायंस हेड की जिम्मेदारी मिलने के बाद से चैन जैसे छिन गया था। इंदौर में दो दिन की ऑडिटिंग के बाद हेड ऑफिस से अचानक जबलपुर जाने का निर्देश आ गया। फाइलें लटकी रह जातीं तो सालाना अप्रेजल और प्रमोशन दोनों पर आँच आती। दिल माँ के पास अटका था, पर दिमाग ने कहा कि काम पूरा करके ही लौटना ठीक रहेगा। घर पर रामरती काका और केयरटेकर रेखा थीं, यही सोचकर मन को थोड़ा ढांढस बँधाया था।

गाड़ी का दरवाजा बंद कर जब मैं मुख्य हॉल में दाखिल हुई, तो सन्नाटा चीखता हुआ सा महसूस हुआ। आहट पाकर रसोई से रेखा हड़बड़ाती हुई बाहर निकली। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, जैसे किसी बड़ी गलती का इल्जाम उस पर आने वाला हो।

“दीदी, आप आ गईं? मैं तो रोज राह देख रही थी आपकी।” रेखा ने दुपट्टे से हाथ पोंछते हुए कहा। उसकी आवाज में अजीब सी बेचैनी थी।

“माँ कैसी हैं रेखा? दवाइयाँ समय पर ले रही हैं न?” मैंने अपना बैग सोफे पर रखते हुए पूछा।

रेखा की नजरें झुक गईं। “दीदी, सच कहूँ तो अम्मा जी ने पिछले तीन दिनों से ठीक से अन्न का एक दाना नहीं छुआ। बस थोड़ा सा उबला सेब का पानी या कभी-कभार आधा कप नारियल पानी ले लेती हैं। खिचड़ी, ओट्स, दलिया… जो भी बनाया, सब ठंडा होकर वैसे ही लौट आया। आप यकीन मानिए, मैंने बहुत जतन किए, पर वो किसी बच्चे की तरह अड़ गईं कि जब तक अरुंधति अपने हाथ से नहीं खिलाएगी, वो मुँह नहीं खोलेंगी। मुझे डर था कि आप सोचेंगी मैं कामचोर हूँ या बूढ़े इंसान की देखभाल में लापरवाही कर रही हूँ।”

रेखा की रुआँसी आवाज सुनकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, “तुम्हारी कोई गलती नहीं है रेखा। मैं अपनी माँ की रग-रग से वाकिफ हूँ। तुम बस गर्म पानी से हाथ धोने की व्यवस्था करो।”

मैं जानता थी कि माँ केवल भूख से नहीं, भीतर के किसी गहरे घाव से जूझ रही थीं। दो साल पहले जब बाबूजी अचानक दिल का दौरा पड़ने से शांत हुए, तो हमारा भरा-पूरा परिवार ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। मेरी दोनों बड़ी बहनें, जिनकी शादियाँ बाबूजी ने अपने जीते-जी बड़े धूमधाम से की थीं, तीये की बैठक खत्म होते ही पैतृक संपत्ति के बँटवारे का राग अलापने लगी थीं। माँ ने हाथ जोड़कर कहा था कि पहले अरुंधति के हाथ पीले हो जाने दो, उसके बाद जो चाहे बाँट लेना। लेकिन दीदियों को लगा कि माँ छोटी बेटी के नाम सारी जायदाद करने का बहाना ढूँढ रही हैं। बड़ी बहन सुचित्रा दीदी तो जबलपुर में ही रहती थीं, जहाँ मैं अभी टूर पर थी, लेकिन जब मैंने उन्हें फोन करके कहा कि माँ की तबीयत ढीली है और आप दो दिन के लिए भोपाल आ जाइए, तो उन्होंने बच्चों के ट्यूशन और पति के व्यापार का बहाना बनाकर साफ पल्ला झाड़ लिया। दूसरी बहन वंदना तो मुंबई जाकर अपने में ही मगन थीं।

कमरे का पर्दा हटाकर मैंने देखा, माँ मद्धिम रोशनी में आँखें मूँदे करवट लिए लेटी थीं। सिरहाने रखी मेज पर कटोरी में जमी हुई मूँग की दाल की पतली खिचड़ी ज्यों की त्यों रखी थी। उनके चेहरे पर बीमारी से ज्यादा अकेलेपन की लकीरें खिंची थीं।

“माँ…” मैंने धीरे से पुकारा और उनके पास बिस्तर पर बैठ गई।

माँ ने भारी पलकें उठाईं। मुझे सामने देखकर उनकी आँखों में एक चमक सी कौंधी, जो तुरंत ही आंसुओं के समंदर में बदल गई। उन्होंने कांपते हाथों से मेरा गाल छुआ, “आ गई मेरी बच्ची? पाँच दिन… पूरे पाँच दिन तूने इस बूढ़ी को अनाथों की तरह छोड़ दिया।”

“माँ, आपको पता है न काम कितना जरूरी था। पर अब मैं आ गई हूँ। चलिए, पहले यह बताइए कि ये अनशन क्यों चल रहा था?” मैंने शरारती लहजे में माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

“कुछ भाता ही नहीं गले के नीचे। सब बेस्वाद लगता है,” माँ ने मुँह फेर लिया।

मैंने रेखा को आवाज दी और कहा कि वह तुरंत तवे पर बिना घी की दो फुल्के सेंक दे और थोड़ा सा गुड़ कूटकर रख दे। बचपन में जब कभी स्कूल में मेरा मन उदास होता था या बुखार चढ़ता था, तो माँ मुझे गर्म रोटी पर घर का ताजा मक्खन और पिसा हुआ गुड़ मसलकर खिलाया करती थीं। वह स्वाद केवल पेट नहीं भरता था, रूह को तृप्त कर देता था।

दस मिनट में रेखा गर्म फुल्के और मिट्टी की हाँडी में रखा ताजा मक्खन ले आई। मैंने अपने हाथों से गर्म-गर्म रोटी को मसला, उसमें दो चम्मच मक्खन और थोड़ा सा गुड़ मिलाकर एक मुलायम पिन्नी जैसी लोई बना ली। उसकी सौंधी खुशबू पूरे कमरे में फैल गई।

मैं माँ के पास आई, निवाला तोड़ा और कहा, “माँ, मुँह खोलो… जल्दी, नहीं तो सारा मक्खन पिघल जाएगा।”

“अरे नहीं, अरु, अब इस उम्र में यह सब…” माँ ने मना करना चाहा।

“चुपचाप मुँह खोलिए, जैसे बचपन में मुझे जबरदस्ती खिलाती थीं,” मैंने थोड़ा डांटने के अंदाज में कहा और निवाला उनके मुँह में रख दिया।

माँ के चेहरे के भाव एक पल में बदल गए। पहले निवाले के साथ ही उनकी सूखी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन होठों पर एक संतोष भरी मुस्कान तैर गई। “सच में, तेरे हाथ का यह जादू किसी दवाई में नहीं है। आज कितने बरसों बाद बाबूजी के जमाने का स्वाद याद आ गया।”

माँ ने खुशी-खुशी पूरी रोटी खा ली। भूख शरीर की नहीं, उस अपनत्व की थी जो किसी बाजारू नौकर या वीडियो कॉल पर नहीं मिल सकता। खाना खिलाने के बाद मैंने माँ को दवा दी और उनके पैर दबाने लगी।

रेखा मेरे लिए अदरक वाली चाय लेकर आई। मैंने चाय का घूँट भरा ही था कि माँ ने मेरा हाथ थाम लिया। उनकी आँखों में वही पुराना डर फिर तैरने लगा था।

“अरु, जब तू अपने ससुराल चली जाएगी, तब मेरा क्या होगा? तेरी दीदियाँ तो मुझे मुड़कर भी नहीं देखतीं। संपत्ति के लालच ने उनके दिलों को पत्थर बना दिया है। कभी-कभी सोचती हूँ कि भगवान मुझे तेरे ब्याह से पहले ही उठा ले, ताकि मैं किसी पर बोझ न बनूँ।” माँ का गला रुंध गया।

“माँ! खबरदार जो ऐसी बातें दोबारा अपनी जुबान पर लाईं,” मैंने उनका हाथ सख्ती से पकड़ लिया। “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली। न शादी से पहले, न शादी के बाद।”

“यह दुनिया का दस्तूर नहीं है बेटा। बेटियाँ पराया धन होती हैं, उन्हें एक दिन विदा होना ही पड़ता है। तू कब तक अपनी उम्र इस घर और मेरी तीमारदारी में गँवाएगी?”

मैंने गहरी सांस ली। मन में एक बात बहुत दिनों से पक रही थी, आज उसे बाहर निकालने का सही वक्त था।

“माँ, आपको मिहिर याद है? वही, जिसका रिश्ता बाबूजी के एक परिचित लाए थे और आपने यह कहकर मना कर दिया था कि लड़का भले ही नेक हो, पर उसके पास अपना कोई बड़ा मकान या गाड़ी नहीं है, वह अपने माता-पिता के साथ किराए के छोटे से फ्लैट में रहता है?”

माँ ने चौंककर मेरी तरफ देखा, “हाँ, याद है। लेकिन मैं गलत तो नहीं थी न? हर माँ-बाप चाहते हैं कि उनकी बेटी ऐसे घर जाए जहाँ उसे जीवनभर कोई तंगी न देखनी पड़े। जिसके पास अपने खुद के संसाधन नहीं हैं, वह मेरी लाडली को क्या सुख देता?”

“माँ, संसाधन मेहनत से कमाए जा सकते हैं, पर सच्चा दिल और वफादारी खरीदी नहीं जा सकती। मिहिर आज भी किसी अच्छे पद पर है, उसने मुझसे सच्चा प्रेम किया था और जब आपने उस रिश्ते से इनकार किया, तो उसने किसी और से शादी करने के बजाय अपनी जिंदगी को माँ-बाप की सेवा और काम में समर्पित कर दिया। उसने आज तक मेरा इंतजार किया है।”

माँ चुप रहीं। उनके चेहरे पर अपराधबोध और असमंजस की मिली-जुली परछाइयाँ दौड़ रही थीं।

मैंने माँ की गोद में अपना सिर रख दिया, “माँ, अगर मैं मिहिर से बात करूँ और वह शादी के बाद हमारे इसी घर में आकर रहने को तैयार हो जाए, तो क्या आपको ऐतराज होगा? आप तो जानती हैं, बाबूजी का यह घर इतना बड़ा है कि यहाँ कई जिंदगियाँ आराम से पल सकती हैं।”

माँ ने अचरज से मेरी आँखों में झाँका, “तू कह तो रही है अरु, लेकिन समाज क्या कहेगा? लोग कहेंगे कि बेटी ने दामाद को घरजमाई बना लिया। मिहिर का स्वाभिमान इस बात की गवाही देगा? और उसके अपने बूढ़े माता-पिता का क्या? समाज की बातें बहुत चुभती हैं बेटी।”

“माँ, समाज तब कहाँ था जब बाबूजी की तेरहवीं की रात दीदियाँ अपनी-अपनी अलमारियों की चाबियाँ माँग रही थीं? समाज तब कहाँ था जब आप बिस्तर पर लाचार पड़ी थीं और आपकी अपनी बड़ी बेटी जबलपुर में बैठकर बच्चों के बहाने बना रही थी? जिस समाज ने हमारे आंसुओं में साथ नहीं दिया, उसे हमारी खुशियों का फैसला करने का कोई हक नहीं है। और रही बात मिहिर के स्वाभिमान की, तो वह किसी के अहसान के तले नहीं, अपने परिवार की तरह यहाँ रहेगा। लेकिन माँ, मेरी एक शर्त है।”

“कैसी शर्त?” माँ ने घबराकर पूछा।

“मिहिर यहाँ तभी आएगा जब उसके सीधे-सादे और अकेले माता-पिता भी हमारे साथ इसी घर में रहेंगे। वे दोनों भी बुजुर्ग हैं। अगर मिहिर यहाँ आ गया, तो वे उस किराए के मकान में बिल्कुल तन्हा रह जाएँगे। जैसे मुझे आपकी चिंता है, वैसे ही मिहिर को भी अपने माता-पिता की फिक्र करने का पूरा हक है। हम सब एक साथ एक छत के नीचे एक परिवार बनकर रहेंगे।”

माँ कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गईं। कमरे में केवल पंखे की सरसराहट गूँज रही थी। फिर अचानक माँ की आँखों से बहते आँसू रुक गए और उनका चेहरा एक दिव्य शांति से भर गया। उन्होंने मुझे खींचकर अपने सीने से लगा लिया।

“मेरी बच्ची… तूने आज मेरी आँखें खोल दीं। मैं किस संकीर्ण सोच में उलझी हुई थी। अगर मिहिर और उसके माता-पिता इस छत के नीचे आते हैं, तो यह घरजमाई का रिश्ता नहीं, दो परिवारों का संगम होगा। इस सूने मकान को चार बुजुर्गों की हँसी और आशीष मिल जाएँगे। तूने केवल अपनी माँ का नहीं, उस लड़के के माँ-बाप का भी मान रख लिया। मुझे यह रिश्ता पूरी तरह मंजूर है।”

माँ की कही बातों ने मेरे दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतार दिया था। जिस संपत्ति के बँटवारे के लिए बहनें रिश्ते तार-तार कर रही थीं, वही मकान अब प्रेम और सेवा की एक नई इबारत लिखने जा रहा था। मुझे लगा, जैसे सालों बाद खिड़की से आ रही हवा सचमुच ताजी और सुकून देने वाली थी।

क्या आज के दौर में बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल केवल बेटों की जिम्मेदारी है, या बेटियाँ भी शादी के बाद इस दायित्व को पूरी गरिमा के साथ निभा सकती हैं? क्या दो परिवारों को एक छत के नीचे जोड़ना एक सही कदम है? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी प्रतिक्रिया जरूर लिखकर बताएं।

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