मंदाकिनी के संशय के सारे बांध टूट गए। उसने रोते हुए कल्याणी देवी के चरण स्पर्श कर लिए और फिर शास्त्री जी के चरणों में सिर झुका दिया। बद्रीनाथ के पावन प्रांगण में, अलकनंदा की कल-कल बहती धारा और भगवान बद्री विशाल की साक्षी में, बिना किसी आडंबर और दहेज के, केवल वैदिक मंत्रों और शंखध्वनि के बीच यश और मंदाकिनी का विवाह संपन्न हुआ। संपूर्ण धाम के संतों और यात्रियों ने दोनों को अपना आशीर्वाद दिया।
उत्तुंग हिमशिखरों की ओट से छनकर आती प्रातःकालीन सूर्य की किरणें जब अलकनंदा की चंचल जलधारा पर पड़तीं, तो पूरा वातावरण स्वर्णिम आभा से नहा उठता था। बद्रीनाथ धाम की उस पावन भूमि पर शंख और घंटों की गूंज मन के सारे संताप हर लेती थी। मंदिर की सीढ़ियों के पास पत्थरों से बने एक चबूतरे पर यश अपनी मां कल्याणी देवी के साथ बैठा हुआ था। ठंडी बयार जब उनके चेहरों को छूकर निकलती, तो कल्याणी देवी की आंखों में असीम तृप्ति का भाव तैर जाता। पिछले बीस दिनों से वे दोनों इस पावन धाम में ठहरे हुए थे।
यश बेंगलुरु की एक जानी-मानी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत था। उसके पिता का मुंबई में एक बड़ा आयात-निर्यात का व्यवसाय था। जीवन में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, पर महानगरों की आपाधापी और भागदौड़ ने यश के भीतर एक अजीब सा खालीपन भर दिया था। जब उसकी मां कल्याणी देवी ने चार धाम की यात्रा की इच्छा जताई, तो यश ने बिना किसी हिचकिचाहट के पूरे दो महीने की छुट्टी ले ली। उसका विचार था कि वह मां को हर धाम के दर्शन कराकर सप्ताह भर में आगे बढ़ जाएगा, परंतु जब वे बद्रीनाथ पहुंचे, तो यहां के शांत, निर्मल और आध्यात्मिक वातावरण ने दोनों के कदमों को जैसे बांध लिया। कल्याणी देवी, जो जोड़ों के दर्द और उच्च रक्तचाप से परेशान रहती थीं, यहां की औषधीय हवा और सादगी भरे जीवन में खुद को पूरी तरह स्वस्थ महसूस करने लगी थीं।
मंदिर के इसी प्रांगण में यश और उसकी मां पिछले कई दिनों से एक विशेष दृश्य को बड़े कौतूहल और आदर के साथ देख रहे थे। लगभग बाईस-तेईस वर्ष की एक सांवले-सलोने रंग-रूप वाली युवती, जिसके सिर पर हमेशा पहाड़ी शैली की ऊनी ओढ़नी सलीके से बंधी रहती थी, सुबह की पहली मंगला आरती से लेकर रात्रि शयन आरती तक निरंतर किसी न किसी सेवा कार्य में जुटी रहती थी। कभी वह किसी दुर्बल, कांपते वृद्ध तीर्थयात्री का हाथ थामकर उसे सीढ़ियां चढ़ाती, कभी दूर-दराज से आए अशक्त बच्चों के लिए गर्म दूध और दवा का प्रबंध करती, तो कभी मंदिर परिसर की सफाई में लीन हो जाती। उसके चेहरे पर कभी थकान या झुंझलाहट का लेशमात्र भी चिन्ह नहीं दिखता था। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में एक अगाध शांति और अधरों पर एक सहज, निष्कपट मुस्कान हमेशा विद्यमान रहती थी।
एक दोपहर, जब धूप की गर्माहट ठंडक को थोड़ा कम कर रही थी, यश ने देखा कि वही युवती कल्याणी देवी के पैरों में सरसों का गुनगुना तेल धीरे-धीरे मल रही थी और उनसे बड़े अपनेपन से उनके स्वास्थ्य का हाल पूछ रही थी। कल्याणी देवी वात्सल्य भाव से उसके सिर पर हाथ फेर रही थीं। यश की उत्सुकता अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई। जब युवती सेवा समाप्त करके दूसरे यात्रियों के लिए काढ़ा लाने चली गई, तब यश मंदिर के मुख्य सेवक, जिन्हें सब आदर से विद्याधर शास्त्री जी कहते थे, के पास गया।
“प्रणाम शास्त्री जी!” यश ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“सदा आनंद में रहो बेटा! कहो, तुम्हारी माताजी का स्वास्थ्य अब कैसा है?” शास्त्री जी ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए आत्मीयता से पूछा।
“बाबा के आशीर्वाद और यहां के वातावरण से मां अब बहुत बेहतर हैं। शास्त्री जी, मैं पिछले कई दिनों से उस कन्या को देख रहा हूं। वह बिना किसी स्वार्थ के दिन-रात यात्रियों की सेवा में लगी रहती है। क्या वह आपके परिवार से है?” यश ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की।
शास्त्री जी की आंखों में एक क्षण के लिए अतीत का भारी दर्द कौंध गया। उन्होंने एक गहरी सांस ली और मंदिर के विशाल शिखर की ओर देखते हुए बोले, “बेटा, उसका नाम मंदाकिनी है। हम सब उसे प्यार से मंदा कहते हैं। रक्त का संबंध तो उससे मेरा नहीं है, पर वह मेरी आत्मा से बंधी बेटी है। दस वर्ष पूर्व जब इस पूरे हिमालयी अंचल में भीषण जल-प्रलय आई थी, तब उसका पूरा गांव, उसका हंसता-खेलता परिवार, माता-पिता और छोटा भाई सब उस क्रूर सैलाब में समा गए। वह किसी तरह एक विशाल शिला की ओट में दबी बच गई थी। सेना के जवानों ने जब उसे निकाला, तो वह मात्र बारह वर्ष की अनाथ बच्ची थी। मैंने ही उसे अपनी शरण में लिया। इस दारुण दुख ने उसके जीवन को पूरी तरह बदल दिया। उसने अपने आंसुओं को दूसरों के दुख दूर करने का साधन बना लिया। उसने बद्री विशाल के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया और आज तक कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। वह आश्रम में बच्चों को पढ़ाती है, जड़ी-बूटियों का ज्ञान रखती है और दिन-रात यहां के दीन-दुखियों की सेवा करती है।”
शास्त्री जी की बात सुनकर यश का हृदय श्रद्धा और एक अव्यक्त आकर्षण से भर गया। जिस उम्र में आज की युवतियां चकाचौंध, फैशन और सुख-साधनों के पीछे भागती हैं, उस उम्र में मंदाकिनी त्याग, करुणा और सेवा की प्रतिमूर्ति बनी हुई थी। यश के मन में उसके प्रति उपजा आदर अब धीरे-धीरे एक गहरे अनुराग का रूप लेने लगा था।
आने वाले दिनों में यश अनजाने ही अपनी नजरों से मंदाकिनी को तलाशने लगा। वह जब भी मंदिर में होती, यश की आंखें उसी पर टिकी रहतीं। मंदाकिनी भी एक स्त्री थी, उसने यश की इन खोजी और सम्मानपूर्ण नजरों को भांप लिया था। उसने यह भी देखा कि वह पढ़ा-लिखा संभ्रांत युवक जब भी उसके पास से गुजरता, उसकी नजरें झुक जाती थीं, जिनमें किसी प्रकार की चंचलता नहीं बल्कि असीम आदर था। परंतु मंदाकिनी ने अपने मन के किसी भी कोने में कोई भ्रम नहीं पनपने दिया। वह जानती थी कि वह एक पहाड़ी, बेसहारा अनाथ लड़की है और यश महानगर का एक बड़ा बाबू। उसने यश को पूरी तरह नजरअंदाज करना शुरू कर दिया।
एक शाम जब मंदिर में संध्या दीप जल चुके थे और हल्की-हल्की बर्फबारी शुरू हो रही थी, मंदाकिनी अपनी सेवा समाप्त कर पहाड़ी पगडंडी से होते हुए महिला आश्रम की ओर बढ़ रही थी। रास्ता सुनसान था। तभी अचानक यश ने आगे बढ़कर उसका मार्ग रोक लिया। मंदाकिनी चौंक कर दो कदम पीछे हट गई।
“मंदाकिनी जी, क्षमा कीजिएगा यदि मैंने आपको डराया हो। पर मुझे आपसे कुछ अत्यंत आवश्यक बात करनी है,” यश ने अत्यंत शालीनता से कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी व्यग्रता थी।
मंदाकिनी ने अपनी ओढ़नी को कसते हुए कहा, “बाबूजी, रात का समय है। इस तरह रास्ते में बात करना मुझे शोभा नहीं देता। यदि कोई सेवा का कार्य है या माताजी को कोई कष्ट है, तो आप शास्त्री जी से कहें।”
“नहीं मंदाकिनी, यह बात किसी सेवा की नहीं, मेरी अपनी जिंदगी की है,” यश ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “पिछले बीस दिनों से मैं तुम्हें देख रहा हूं। तुम्हारी सरलता, तुम्हारी करुणा और तुम्हारे सेवाभाव ने मेरे हृदय को पूरी तरह जीत लिया है। मैं केवल किसी आकर्षण में बहकर यह नहीं कह रहा हूं। मैं तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता हूं। मैं बेंगलुरु में एक बड़ी कंपनी में काम करता हूं, मेरे परिवार की मुंबई में अच्छी प्रतिष्ठा है। मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूं और तुम्हें अपने घर का सम्मान देना चाहता हूं।”
मंदाकिनी की आंखें स्तब्धता से फैल गईं, परंतु अगले ही पल उसके चेहरे पर एक कड़वी, उदास मुस्कान उभर आई। उसने सिर झुकाकर कहा, “यह पहाड़ है बाबूजी। यहां बर्फ गिरती है और पिघल जाती है। आप जैसे बड़े शहरों के लोग यहां आते हैं, भगवान के दर्शन करते हैं, कुछ दिन यहां की सादगी और शांति को देखकर मोहित होते हैं और फिर वापस अपनी रंगीन दुनिया में लौट जाते हैं। पहाड़ों की इस ठंडी जमीन पर उगने वाले जंगली फूलों को गमलों में सजाने का शौक मत पालिए। हम पहाड़ी लोग अभावों में जीते हैं, हमारे पास देने के लिए केवल सेवा और आदर है। आप अपने रास्ते जाइए और मुझे मेरे भाग्य पर छोड़ दीजिए।”
मंदाकिनी मुड़कर जाने लगी, लेकिन यश ने अपनी बात जारी रखी, “मंदाकिनी, मुझे परदेसी समझकर ठुकराओ मत। मेरा संकल्प कोई क्षणिक भावुकता नहीं है। मैं कल सुबह ही शास्त्री जी से तुम्हारे लिए बात करूंगा। यदि तुम्हारी अंतरात्मा इजाजत दे, तभी हां कहना। मैं कोई अनुचित दबाव नहीं बनाऊंगा।”
मंदाकिनी बिना कुछ कहे तेजी से कदमों से आगे बढ़ गई, पर उस रात आश्रम की ठंडी कोठरी में वह सो नहीं सकी। यश के शब्द, उसकी आंखों की सच्चाई और उसकी विनम्रता बार-बार उसके कानों में गूंज रही थी।
अगले दिन भोर में ही यश सीधे शास्त्री जी की कुटिया में पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर बिना किसी लाग-लपेट के अपने मन की संपूर्ण बात शास्त्री जी के सम्मुख रख दी। शास्त्री जी पहले तो आश्चर्यचकित रह गए, परंतु वे एक अनुभवी साधक थे। जब यश और उसकी मां धाम में आए थे, तब यात्री पंजीकरण पुस्तिका में उन्होंने यश का पूरा परिचय, उसकी कंपनी का नाम और उसके मुंबई स्थित पैतृक घर का विवरण पहले ही दर्ज कर लिया था। वे जानते थे कि युवक कुलीन और सत्यवादी है।
शास्त्री जी ने गंभीर होकर कहा, “यश बेटा, तुम्हारा प्रस्ताव उत्तम है। मंदा जैसी सुशीला और कर्मठ कन्या जिस घर में जाएगी, वह घर तीर्थ बन जाएगा। परंतु विवाह कोई दो दिनों का मेला नहीं है। यह जीवन भर का साथ है। क्या तुम्हारी मां एक अनाथ, साधनहीन और पहाड़ी लड़की को अपनी कुलवधू के रूप में स्वीकार करेंगी? और सबसे बड़ी बात, क्या मंदा इसके लिए तैयार है? मैं पहले तुम्हारी माताजी के मन की थाह लूंगा, फिर मंदा से बात करूंगा। बद्री विशाल जो चाहेंगे, वही होगा।”
उसी दोपहर शास्त्री जी कल्याणी देवी से मिलने उनके विश्रामालय में पहुंचे। कल्याणी देवी धूप में बैठी गीता का पाठ कर रही थीं। शास्त्री जी को देखकर उन्होंने अत्यंत आदर से उन्हें प्रणाम किया और बैठने के लिए आसन दिया।
“माताजी, बद्रीनाथ की यह पावन भूमि आपको कैसी लगी? अब स्वास्थ्य में कितना सुधार है?” शास्त्री जी ने सहजता से वार्ता आरंभ की।
“शास्त्री जी, यह तो साक्षात बैकुंठ है। जब से यहां आई हूं, मन ऐसा शांत हुआ है कि वापस उस कंक्रीट के जंगल में लौटने की इच्छा ही नहीं होती। सोचती हूं कि हफ्ता-दस दिन और यहीं प्रभु के चरणों में बिताऊं। यहां की हवा में ही कोई अमृत है,” कल्याणी देवी ने हाथ जोड़कर कहा।
शास्त्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “माताजी, प्रभु का आशीर्वाद आप पर बना रहे। परंतु संसार में हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य होता है। यश बेटा बहुत संस्कारी और सुलझा हुआ युवक है। क्या आपने कभी उसके विवाह के विषय में विचार किया है? उसके योग्य कोई कन्या देखी है?”
कल्याणी देवी के चेहरे पर एक मां की स्वाभाविक चिंता उभर आई। वे बोलीं, “शास्त्री जी, आप तो जानते ही हैं कि आज के युग में बेटे-बेटियों की अपनी पसंद होती है। मुंबई और बेंगलुरु में कई रिश्ते आए, बड़े-बड़े घरानों की लड़कियां थीं, परंतु यश किसी को पसंद ही नहीं करता। वह हमेशा कहता है कि उसे धन-दौलत या दिखावे वाली लड़की नहीं चाहिए, बल्कि ऐसी जीवनसंगिनी चाहिए जो संस्कारों को समझे, परिवार को जोड़े और जिसमें दया-धर्म हो। मैं तो थक गई हूं ढूंढते-ढूंढते।”
शास्त्री जी ने अवसर को उपयुक्त समझा। उन्होंने धीरे से कहा, “माताजी, यदि प्रभु की कृपा से ऐसी ही एक कन्या आपके सामने हो, पर उसके पास कोई कुल, गोत्र या धन की पूंजी न हो, तो क्या आप उसे अपनी बहू स्वीकार करेंगी?”
कल्याणी देवी चौंक कर शास्त्री जी का मुंह देखने लगीं। शास्त्री जी ने मंदाकिनी के संपूर्ण जीवन, उसकी अनाथ अवस्था, उसके सेवाभाव और प्रातःकाल यश द्वारा रखे गए विवाह प्रस्ताव की पूरी बात कल्याणी देवी को विस्तार से बता दी।
कल्याणी देवी कुछ क्षणों के लिए मौन हो गईं। उनका यह मौन शास्त्री जी को थोड़ा चिंतित करने लगा। क्या एक महानगर की संपन्न महिला एक अनाथ पहाड़ी लड़की को अपनी बहू बनाएगी? परंतु अगले ही पल कल्याणी देवी की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
“शास्त्री जी! क्या सचमुच मेरे यश ने मंदाकिनी को पसंद किया है? पिछले बीस दिनों से मैं उस बच्ची को देख रही हूं। जिस तरह उसने एक पराए वृद्ध की, मेरी और यहां आने वाले हर लाचार व्यक्ति की सेवा की है, वह कोई असाधारण आत्मा ही कर सकती है। मुझे अपने बेटे के लिए कोई करोड़ों का दहेज लेकर आने वाली बहू नहीं चाहिए। मुझे मेरे घर को मंदिर बनाने वाली अन्नपूर्णा चाहिए। यदि मंदाकिनी मेरी बहू बनती है, तो यह मेरे पूरे कुल का अहोभाग्य होगा!” कल्याणी देवी का स्वर कृतज्ञता से भीगा हुआ था।
यह सुनकर शास्त्री जी का हृदय गदगद हो गया। अब अंतिम और सबसे कठिन कार्य था—मंदाकिनी को मनाना। शाम को शास्त्री जी ने मंदाकिनी को अपनी कुटिया में बुलाया। मंदाकिनी सहमी हुई सी आकर एक कोने में खड़ी हो गई।
“बेटी मंदा, आज तेरे जीवन का सबसे बड़ा निर्णय तेरे सामने खड़ा है,” शास्त्री जी ने अत्यंत वात्सल्य से कहा, “यश ने मुझसे और अपनी माताजी से तेरे हाथ की मांग की है। उनकी माताजी ने तुझे अपनी बेटी और कुलवधू के रूप में सहर्ष स्वीकार किया है। यश एक सच्चा और नेक युवक है। तूने जीवन भर केवल दुख और अभाव देखे हैं, अब प्रभु तुझे एक भरा-पूरा परिवार और मान-सम्मान देना चाहते हैं। तेरा क्या विचार है?”
मंदाकिनी की आंखें भर आईं। उसने कांपते होठों से कहा, “बाबा, मैंने अपने माता-पिता और भाई को खोने के बाद इस धाम को ही अपना सर्वस्व मान लिया था। मुझे डर लगता है कि बड़े शहरों की उस चकाचौंध में मैं कैसे रह पाऊंगी? मैं तो केवल सेवा करना जानती हूं। यदि कल को उनके समाज ने मुझे नहीं अपनाया तो?”
तभी कुटिया के द्वार पर एक परछाईं उभरी। कल्याणी देवी स्वयं यश के साथ वहां उपस्थित थीं। कल्याणी देवी ने आगे बढ़कर मंदाकिनी को अपने सीने से लगा लिया।
“मेरी बच्ची,” कल्याणी देवी ने मंदाकिनी के आंसुओं को पोंछते हुए कहा, “समाज बनता है हमारे आचरण से। जो कन्या दूसरों के आंसुओं को पोंछना जानती हो, वह जिस घर में जाएगी, वहां केवल खुशियां ही बरसाएगी। तू बहू बनकर नहीं, मेरी वह बेटी बनकर चल जो भगवान ने मुझे नहीं दी। मेरा घर तेरा इंतजार कर रहा है।”
यश ने भी हाथ जोड़कर कहा, “मंदाकिनी, मैं तुमसे वादा करता हूं कि तुम्हारे सेवाभाव और तुम्हारी आस्था को कभी ठेस नहीं पहुंचेगी। तुम जैसी हो, मुझे वैसी ही स्वीकार हो। मैं तुम्हारे अतीत का नहीं, तुम्हारे भविष्य का साथी बनना चाहता हूं।”
मंदाकिनी के संशय के सारे बांध टूट गए। उसने रोते हुए कल्याणी देवी के चरण स्पर्श कर लिए और फिर शास्त्री जी के चरणों में सिर झुका दिया। बद्रीनाथ के पावन प्रांगण में, अलकनंदा की कल-कल बहती धारा और भगवान बद्री विशाल की साक्षी में, बिना किसी आडंबर और दहेज के, केवल वैदिक मंत्रों और शंखध्वनि के बीच यश और मंदाकिनी का विवाह संपन्न हुआ। संपूर्ण धाम के संतों और यात्रियों ने दोनों को अपना आशीर्वाद दिया।
विदाई की बेला में जब मंदाकिनी ने शास्त्री जी के पैर छुए, तो शास्त्री जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटी, परदेसी केवल घूमने नहीं आते, कभी-कभी वे ईश्वर का भेजा हुआ वह वरदान होते हैं जो जीवन की उजड़ी हुई बगिया को फिर से महका देते हैं। जाओ, अपने नए संसार को प्रेम से सींचो।”
गाड़ी में बैठते समय मंदाकिनी ने मुड़कर एक बार फिर उन हिमशिखरों और मंदिर के स्वर्ण कलश को देखा। इस बार उसकी आंखों में वियोग का दुख नहीं, बल्कि एक नए जीवन की उमंग, विश्वास और कृतज्ञता का उजाला था।
आज के इस भौतिकवादी युग में जहां रिश्ते धन, हैसियत और सामाजिक दिखावे की तराजू पर तौले जाते हैं, वहीं यश और उसके परिवार का यह निर्णय हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या किसी इंसान का चरित्र, उसके संस्कार और उसका सेवाभाव दुनिया की किसी भी दौलत से बढ़कर नहीं है? इस विषय पर आपकी क्या राय है? अपने विचार हमें नीचे अवश्य बताएं।
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