परंपरा की बेड़ियां

 “मम्मी जी, जब कोई इंसान अपने सबसे प्यारे शौक को, अपनी आत्मा की आवाज को मजबूरी में मार देता है, तो उसके भीतर एक टीस रह जाती है। आपने अपनी जवानी में त्याग किया क्योंकि तब का समाज ऐसा था। लेकिन आज जब आप मुझे गाते हुए देखती हैं, तो आपको मेरा गाना बुरा नहीं लगता, बल्कि आपको अपना वो अतीत याद आ जाता है जो आपसे छीन लिया गया था। आपको लगता है कि जब मुझे वो सब नहीं मिला, तो इस नई पीढ़ी को इतनी आजादी कैसे मिल रही है? क्या मैं गलत कह रही हूं, मम्मी जी?

ग्वालियर के एक पुराने मोहल्ले में स्थित ‘शांति निकेतन’ नामक पुश्तैनी हवेली में सुबह की धूप आंगन के तुलसी के चौरे पर सुनहरी चादर बिछा रही थी। चारों ओर भोर की नीरवता छाई थी, जिसे रसोई से आती बर्तनों की धीमी खनक और आंगन में टहलते कबूतरों की गुटरगूँ कभी-कभार तोड़ देती थी। लेकिन इस शांति के भीतर एक ऐसी घुटन और तनाव की परत हमेशा तैरती रहती थी, जिससे घर की दीवारें भी वाकिफ थीं। घर की मुखिया थीं कल्याणी देवी—सख्त मिजाज, पुरानी परंपराओं की सख्त पहरेदार और अपने बनाए नियमों से एक इंच भी न डिगने वाली सास। उनके पति विश्वंभर दयाल जी रिटायर्ड हेडमास्टर थे, जो स्वभाव से बेहद शांत, सहृदय और संगीत-प्रेमी इंसान थे, मगर पत्नी के तल्ख तेवरों के आगे अक्सर खामोश रहना ही बेहतर समझते थे।

घर में दो बहुएं थीं। बड़ी बहू अंजलि, जो पिछले आठ सालों से इस घर की चौखट के भीतर अपनी हर इच्छा को दबाकर जी रही थी। सिर पर घूंघट, धीमे स्वर में बोलना और सास के हर हुक्म को सर-माथे लेना उसकी दिनचर्या बन चुका था। वहीं छोटी बहू थी श्रेया, जिसका ब्याह अभी छह महीने पहले ही छोटे बेटे मयंक से हुआ था। श्रेया नई सोच वाली, पढ़ी-लिखी, हंसमुख और शास्त्रीय संगीत में विशारद प्राप्त लड़की थी। उसके आने से घर में एक नई ऊर्जा तो आई थी, लेकिन कल्याणी देवी के रूढ़िवादी विचारों से उसका हर कदम टकराता रहता था।

उस दिन भी सुबह के करीब दस बज रहे थे। विश्वंभर जी बैठक में बैठे चश्मा चढ़ाए अखबार के पन्नों को पलट रहे थे। तभी आंगन की तरफ बने कमरे से एक मीठी, सुरीली और रूह को छू लेने वाली तान गूंज उठी। श्रेया रियाज कर रही थी। राग यमन की बंदिश उसके गले से इतनी सहजता और मिठास के साथ बह रही थी कि आंगन में लगा हारसिंगार का पेड़ भी जैसे उस सुरमई हवा में झूमने लगा था। अखबार पढ़ रहे विश्वंभर जी के हाथ अपने आप रुक गए। उनके चेहरे पर एक असीम तृप्ति और सुकून की मुस्कान तैर गई। वे अनजाने में ही अपनी उंगलियों से मेज पर ताल देने लगे।

लेकिन यह सुकून ज्यादा देर टिकने वाला नहीं था। अंदर वाले कमरे से अचानक भारी कदमों की आहट और एक कर्कश आवाज ने उस मधुर वातावरण को चीर दिया।

“अंजलि! अरे ओ अंजलि! बहरी हो गई है क्या? कहां जा मरी?” कल्याणी देवी पलंग से उठते हुए अपनी सूती साड़ी का पल्लू कसकर कमर में खोंसते हुए चीखीं।

रसोई से हाथ में गीला कपड़ा लिए अंजलि घबराते हुए भागी चली आई। उसका पल्लू माथे तक ढका हुआ था और चेहरे पर हमेशा रहने वाला एक अजीब सा डर साफ झलक रहा था।

“जी… जी माजी! आपने पुकारा? कुछ चाहिए था क्या?” अंजलि ने सांस फूलते हुए पूछा।

कल्याणी देवी ने अपनी त्योरियां चढ़ाते हुए आंगन की ओर उंगली उठाई, “यह घर है या कोई नौटंकी की मंडली? यह किसका गला फट रहा है सुबह-सुबह? क्या यह तुम्हारी लाडली देवरानी की करतूत है?”

अंजलि सहम गई। उसने नजरें झुकाकर हकलाते हुए कहा, “माजी… वो… श्रेया का रोज का रियाज है। वो कॉलेज में बच्चों को ऑनलाइन संगीत सिखाती है ना, बस उसी की तैयारी…”

“बंद करो ये दलीलें!” कल्याणी देवी ने उसे बीच में ही टोक दिया, “रियाज है तो क्या पूरे मोहल्ले को सुनाएगी? भले घरों की बहुएं ऐसे चीख-चीख कर तानें नहीं खींचतीं। अपने ससुर का, बड़े-बुजुर्गों का कोई लिहाज बचा है या सब ताक पर रख दिया? जाओ और उससे कहो कि ये राग-रागिनी बंद करे और जाकर रसोई में हाथ बंटाए। यहां कोई तानसेन का दरबार नहीं सजा है।”

“जी माजी, मैं अभी बोलती हूं,” कहकर अंजलि उल्टे पांव लौट गई।

चंद मिनटों बाद कमरे का पर्दा हटा। श्रेया हल्के पीले रंग की सिल्क की कुर्ती और सफेद पलाजो पहने, खुले बालों में संजीदगी लिए कमरे में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर न तो घबराहट थी और न ही कोई बदतमीजी, बल्कि एक सहज मासूमियत और विनम्रता थी।

“मम्मी जी, भाभी कह रही थीं कि आपको मेरे गाने से कोई ऐतराज है? क्या मेरी आवाज से आपकी तबीयत खराब हो रही है?” श्रेया ने बड़े ही आदर से पूछा।

बैठक के कोने में बैठे विश्वंभर जी ने अखबार नीचे किया और धीरे से बोले, “अरे नहीं बहू, कैसी बातें करती हो! तुम तो इतना मीठा गा रही थीं कि मन एकदम शांत हो गया। ऐसा लग रहा था मानो सुबह की प्रार्थना चल रही हो।”

यह सुनते ही कल्याणी देवी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने मुड़कर अपने पति को घूरा, “आप तो बीच में अपनी राय मत ही दिया करिए! आपको तो हर गलत बात में भी सुर सुनाई देता है।” फिर श्रेया की ओर मुखातिब होकर अपनी आवाज को और तीखा करते हुए बोलीं, “सुनो बहू! इस घर की एक मर्यादा है। हमारे खानदान की बहुएं इस तरह खुले गले से गाने नहीं गातीं। और ये क्या हुलिया बना रखा है? न सिर पर पल्लू, न कोई लज्जा। ससुर सामने बैठे हैं और तुम इस तरह तानपूरा लेकर बैठ जाती हो? कुछ शर्म-लिहाज बची है या कॉलेज की पढ़ाई के साथ वो भी बह गई?”

श्रेया ने गहरी सांस ली। उसने अपनी नजरें नहीं चुराईं, बल्कि बहुत ही सहजता से कहा, “मम्मी जी, जब मैं इस घर में आई थी, तो आपने कहा था कि वेस्टर्न कपड़े मत पहनना, तो मैंने कुर्ती और सूट पहनना शुरू कर दिया। लेकिन संगीत तो कोई गुनाह नहीं है। यह तो सरस्वती की साधना है। कल शाम ही तो बाबूजी कह रहे थे कि मेरे गाने से उन्हें अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं। क्यों बाबूजी, आपने ही कहा था ना?”

विश्वंभर जी ने अपनी पत्नी की तनी हुई भृकुटियों को देखा, फिर हिम्मत जुटाकर बोले, “कल्याणी, बहू सच कह रही है। संगीत में ईश्वर बसता है। और वैसे भी, तुम क्यों भूल जाती हो? जब तुम्हारी नई-नई शादी होकर इस घर में आई थी, तब तुम भी तो रेडियो पर गाना बजते ही कितना सुंदर गुनगुनाती थीं। वो कौन सा गीत था जो तुम अक्सर गाती थीं… ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे…’ याद है ना, तुम्हारी मां कहती थीं कि कल्याणी की आवाज में जादू है।”

विश्वंभर जी की यह बात सुनते ही कल्याणी देवी के चेहरे पर एक पल के लिए झेंप, दर्द और पुरानी यादों की एक लहर कौंध गई। लेकिन अगले ही पल उन्होंने अपने भीतर उठती उस कोमल भावना को सख्ती से दबा दिया। उनका चेहरा फिर से कठोर हो गया।

“बस करिए आप! बुढ़ापा आ गया है मगर आपकी अक्ल अभी भी वहीं अटकी है। उस जमाने की बात और थी, आज की बात और है। इस घर में सबको जैसे मनमानी करने का बुखार चढ़ा है। कोई किसी का आदर नहीं करता।” कल्याणी देवी ने बात बदलते हुए ताना मारा, “दोपहर के खाने का कोई इंतजाम हो रहा है या आज सब हवा पीकर ही रहेंगे? घड़ी की सुई बारह बजाने को आई है। गाने-बजाने से फुरसत मिले तो चूल्हा जले। अगर बहुओं के बस का घर संभालना नहीं है, तो साफ कह दो, यह बूढ़ी हड्डियां ही जाकर रोटियां सेकेंगी। क्या जमाना आ गया है, बहुओं को अपनी मर्जी चलानी है और सास दासी बनकर रहे!”

इतना कहकर कल्याणी देवी पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गईं और जोर से दरवाजा भिड़ा लिया। विश्वंभर जी ने एक लंबी और बेबस आह भरी। श्रेया वहीं खड़ी रही, उसकी आंखों में आंसू तो नहीं थे, लेकिन एक गहरा सवाल तैर रहा था कि आखिर क्यों एक औरत ही दूसरी औरत की खुशियों की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है?

उस दोपहर के बाद घर का माहौल और भारी हो गया। अंजलि रसोई में चुपचाप खाना बना रही थी। श्रेया वहां पहुंची और अंजलि के हाथ से आटा गूंधने की परात लेते हुए बोली, “भाभी, आप बैठिए, यह मैं कर लेती हूं।”

अंजलि ने डरते हुए दरवाजे की तरफ देखा और फुसफुसा कर बोली, “श्रेया, तू माजी से बहस मत किया कर। तू अभी नई है, जानती नहीं है उन्हें। वो जैसी हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार कर ले। अपनी खुशियों को थोड़ा दबा लेगी तो घर में शांति रहेगी। देख मुझे, मैंने भी तो सब छोड़ दिया ना।”

श्रेया ने अंजलि के चेहरे को देखा। अंजलि कभी एक बेहतरीन चित्रकार हुआ करती थी, लेकिन शादी के बाद उसके रंग और कूची कहीं संदूक में बंद होकर धूल फांक रहे थे।

श्रेया ने अंजलि के कंधे पर हाथ रखा, “भाभी, अपने अस्तित्व को मिटा देना संस्कार नहीं होता। अगर हम खुद खुश नहीं रहेंगे, तो इस घर को कैसे खुश रख पाएंगे? और मुझे लगता है कि मम्मी जी अंदर से बुरी नहीं हैं, बस उनकी अपनी कोई अधूरी टीस है जो गुस्से बनकर बाहर निकलती है।”

शाम को जब मयंक और उसके बड़े भाई आलोक दफ्तर से लौटे, तो घर की खामोशी उन्हें भी अजीब लगी। रात के खाने की मेज पर सब बैठे थे, लेकिन किसी के मुंह से एक लफ्ज नहीं निकल रहा था। कल्याणी देवी ने अपनी थाली में आधी रोटी छोड़ी और बिना किसी से बात किए उठकर सोने चली गईं। पूरा परिवार उस खामोश तनाव से घुट रहा था।

अगले दिन रविवार था। श्रेया ने ठान लिया था कि इस खामोशी की दीवार को तोड़ना ही होगा। दोपहर के समय जब कल्याणी देवी अपने कमरे में अकेली बैठी थीं, श्रेया हाथ में गर्म चाय का कप और एक पुरानी धूल भरी डायरी लेकर उनके कमरे में गई।

कल्याणी देवी ने उसे देखते ही मुंह फेर लिया, “अब क्या चाहिए तुम्हें? फिर कोई नया तमाशा करने आई हो?”

श्रेया चुपचाप उनके पास पलंग पर बैठ गई। उसने चाय की प्याली मेज पर रखी और वह पुरानी डायरी कल्याणी देवी की गोद में रख दी। उस डायरी को देखते ही कल्याणी देवी के हाथ कांप उठे। यह उनकी अपनी डायरी थी, जो ब्याह के समय उनके पिता ने उन्हें दी थी, जिसमें वे अपने लिखे भजन और लोकगीत लिखा करती थीं।

“यह तुम्हें कहां से मिली?” कल्याणी देवी की आवाज में सख्ती कम और घबराहट ज्यादा थी।

श्रेया ने बहुत ही नम्रता से उनके झुर्रियों भरे हाथ को अपने हाथों में थाम लिया। कल्याणी देवी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन श्रेया की पकड़ में इतना अपनत्व और आदर था कि वे बेबस हो गईं।

“मम्मी जी, आज सुबह जब मैं स्टोर रूम में पुरानी किताबें व्यवस्थित कर रही थी, तब मुझे यह डायरी और इसके पास रखा एक पुराना तानपूरा मिला, जिसके तार टूट चुके थे। बाबूजी ने मुझे बताया कि शादी से पहले आप अपने शहर के सबसे बड़े संगीत समारोह में गाती थीं। आपके पिता चाहते थे कि आप आकाशवाणी में गाएं। लेकिन शादी के बाद इस घर की जिम्मेदारियों, सास-ससुर की सेवा और पुराने रीति-रिवाजों के बोझ तले आपने अपने उस सपने का गला घोंट दिया।”

कल्याणी देवी की आंखें शून्य में ताकने लगीं। पुरानी यादों का एक बंद तूफान जैसे उनके सीने में उमड़ पड़ा।

श्रेया ने आगे कहा, “मम्मी जी, जब कोई इंसान अपने सबसे प्यारे शौक को, अपनी आत्मा की आवाज को मजबूरी में मार देता है, तो उसके भीतर एक टीस रह जाती है। आपने अपनी जवानी में त्याग किया क्योंकि तब का समाज ऐसा था। लेकिन आज जब आप मुझे गाते हुए देखती हैं, तो आपको मेरा गाना बुरा नहीं लगता, बल्कि आपको अपना वो अतीत याद आ जाता है जो आपसे छीन लिया गया था। आपको लगता है कि जब मुझे वो सब नहीं मिला, तो इस नई पीढ़ी को इतनी आजादी कैसे मिल रही है? क्या मैं गलत कह रही हूं, मम्मी जी?”

श्रेया के ये शब्द किसी तीर की तरह कल्याणी देवी के दिल के पार उतर गए। बरसों से जिस दर्द को उन्होंने पत्थर के अनुशासन के नीचे दबा रखा था, वह आज पिघल गया।

कल्याणी देवी की आंखों से आंसुओं की पहली बूंद गिरी और उस पुरानी डायरी के पीले पन्ने पर जा टपकी। उनकी आवाज भर्रा गई, “तू क्या जानेगी श्रेया… हम उस दौर की औरतें हैं जहां अपनी पसंद का नाम लेना भी गुनाह समझा जाता था। मेरे ससुर इतने सख्त थे कि घर में जोर से हंसने पर भी पाबंदी थी। मैंने अपने सारे शौक, अपने सारे सपने अपनी इस साड़ी के पल्लू में बांधकर कहीं गहरे दफना दिए थे। जब मैंने अपने अरमानों की बलि दे दी, तो मुझे लगा कि यही हर बहू की नियति है। जब तुझे बेपरवाह होकर गाते देखती थी, तो जाने क्यों सीने में एक जलन, एक टीस उठती थी कि काश… काश मुझे भी किसी ने ऐसे पंख दिए होते।”

दरवाजे की ओट में खड़े विश्वंभर जी, आलोक, मयंक और अंजलि भी यह सब सुन रहे थे। विश्वंभर जी की आंखें भी नम थीं। उन्हें आज एहसास हुआ कि उनकी पत्नी का यह चिड़चिड़ापन और गुस्सा दरअसल उनकी उस दबी हुई कला की चीख थी, जिसे कभी समझा नहीं गया था।

श्रेया ने अपनी साड़ी के पल्लू से कल्याणी देवी के आंसू पोंछे और उनके गले लग गई, “मम्मी जी, आपका वो दौर मजबूरी का था, लेकिन आज का दौर आपका अपना है। अगर आपका कल अधूरा रह गया, तो क्या आज आप अपनी बहुओं के जरिए उसे पूरा नहीं देख सकतीं? अंजलि भाभी कितनी सुंदर पेंटिंग बनाती हैं, लेकिन वो भी आपकी डांट के डर से सब छिपाए बैठी हैं। यह घर किसी कैदखाने की तरह क्यों रहे? क्यों न हम सब मिलकर इसे एक खुशहाल उपवन बनाएं?”

कल्याणी देवी ने रोते हुए श्रेया को अपने सीने से लगा लिया। वर्षों से जमी बर्फ आज पिघल चुकी थी। उन्होंने दरवाजे पर खड़ी अंजलि को देखा और हाथ फैलाकर उसे भी अपने पास बुला लिया। दोनों बहुएं अपनी सास के आंचल में सिर रखे थीं और कल्याणी देवी आज एक सास नहीं, बल्कि एक ममतामयी मां बनकर उन दोनों के सिर पर हाथ फेर रही थीं।

विश्वंभर जी कमरे में अंदर आए और मुस्कुराते हुए बोले, “तो फिर क्या इरादा है सरला… मेरा मतलब है कल्याणी जी? क्या वो टूटा हुआ तानपूरा फिर से बनवाया जाए?”

कमरे में सभी हंस पड़े। कल्याणी देवी ने अपनी भीगी पलकों के बीच से मुस्कुराते हुए कहा, “हां, उसके तार बंधवाइए। और हां, अब से रोज सुबह इस घर में कोई बंदिश नहीं होगी। श्रेया गाएगी, अंजलि अपने रंगों से घर को सजाएगी, और मैं… मैं इन दोनों को अपनी पुरानी बंदिशें सिखाऊंगी।”

उस दिन के बाद से ‘शांति निकेतन’ का सन्नाटा हमेशा के लिए मिट गया। अब उस घर में हर सुबह राग भैरवी और यमन के सुर गूंजते थे, दीवारों पर अंजलि के बनाए सुंदर चित्रों की छटा बिखरती थी, और कल्याणी देवी गर्व से मोहल्ले की औरतों को बताती थीं कि उनकी बहुएं सिर्फ घर नहीं संभालतीं, बल्कि घर की आत्मा को भी जीवंत रखती हैं। परंपराओं ने आधुनिकता को गले लगा लिया था और उस परिवार ने यह साबित कर दिया था कि घर नियमों की सख्ती से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों को सम्मान देने से स्वर्ग बनता है।

दोस्तों, परिवार वही होता है जहां हर सदस्य के सपनों को उड़ान भरने का खुला आसमान मिले, न कि परंपराओं की बेड़ियां। अगर पिछली पीढ़ी के साथ कुछ गलत हुआ हो, तो उसका बदला अगली पीढ़ी की खुशियां छीनकर नहीं, बल्कि उन्हें वे सारे हक देकर चुकाना चाहिए जो हमें नहीं मिल सके। सास और बहू अगर एक-दूसरे के दर्द को समझ लें, तो हर घर स्वर्ग बन सकता है।

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