प्रेम की परिपक्वता

 मानसी ने चाय का एक कप अर्णव को थमाया और दूसरा कप कल्याणी जी के हाथों में देते हुए बोली, “माँ जी, आज आपकी मालिश अर्णव नहीं, मैं करूँगी। यह दिन भर के थके हुए हैं, इन्हें तो मालिश करना भी ठीक से नहीं आता होगा। अर्णव, आप जाकर गर्म पानी से नहाइए और फ्रेश हो जाइए। तब तक मैं माँ जी के घुटनों में सिकाई कर देती हूँ।”

कल्याणी जी ने आश्चर्य और असीम स्नेह से अपनी बहू की ओर देखा। उनकी आँखों में ममता का सागर उमड़ पड़ा। उन्होंने मानसी का हाथ पकड़कर अपने सिर से लगा लिया और कहा, “जीती रह मेरी बच्ची… भगवान तुम दोनों की जोड़ी हमेशा सलामत रखे।”

शाम ढलते-ढलते इंदौर शहर की सड़कों पर गाड़ियों की कतारें लंबी होने लगी थीं। लगातार हो रही बूंदाबांदी ने मौसम में ठंडक तो घोल दी थी, लेकिन महानगर की व्यस्तता को तनिक भी धीमा नहीं किया था। एक निजी ऑटोमोबाइल कंपनी में सीनियर कंसल्टेंट के पद पर काम करने वाला अर्णव पिछले अठारह दिनों से राजस्थान के विभिन्न शहरों के ऑफिशियल टूर पर था। सफर की थकान, लगातार होने वाली व्यावसायिक बैठकें और नींद की कमी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। उसका शरीर बुरी तरह टूट रहा था, आँखों में सिर्फ घर पहुँचकर अपनों के बीच कुछ सुकून के पल बिताने की चाह थी। जैसे ही टैक्सी उसके घर की चौखट पर रुकी, उसने चैन की एक लंबी सांस ली। सूटकेस और लैपटॉप बैग उठाकर उसने दरवाजे की घंटी बजाई।

दरवाजा उसकी नई-नवेली पत्नी मानसी ने खोला। मानसी और अर्णव का विवाह अभी छह महीने पहले ही हुआ था। विवाह के तुरंत बाद अर्णव का यह पहला इतना लंबा दौरा था। अठारह दिन मानसी के लिए अठारह सदियों जैसे बीते थे। वह हर दिन, हर पहर केवल अर्णव के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। उसने अर्णव के स्वागत के लिए न केवल अपने हाथों में उसकी मनपसंद हरी चूड़ियाँ पहन रखी थीं, बल्कि चेहरे पर भी एक खास चमक संजो रखी थी। उसने सोचा था कि अर्णव आते ही सबसे पहले उसे अपने सीने से लगा लेगा, उसकी आँखों में झाँकेगा और कहेगा कि वह उसके बिना कितना अधूरा था।

लेकिन अर्णव ने दरवाजे पर खड़े होकर केवल एक थकी हुई सी मुस्कान मानसी की तरफ उछाली, अपना बैग हॉल के सोफे पर रखा और सीधे अपने दायें हाथ वाले कमरे की ओर मुड़ गया—उसकी माँ कल्याणी जी का कमरा। कल्याणी जी पिछले कुछ वर्षों से गठिया की बीमारी से जूझ रही थीं और मौसम बदलने पर उनका दर्द अक्सर बढ़ जाया करता था। अर्णव सीधे माँ के कमरे में दाखिल हुआ, उनके घुटनों को छूकर प्रणाम किया और वहीं फर्श पर उनके पलंग से सटकर बैठ गया।

“माँ, कैसी हो अब? घुटनों का दर्द कैसा है? दवाइयाँ समय पर ले रही थीं ना? डॉक्टर की वह नई पेनकिलर काम कर रही है या नहीं?” अर्णव एक ही सांस में कई सवाल पूछ गया और ममता भरी नजरों से अपनी माँ का चेहरा निहारने लगा। कल्याणी जी के चेहरे पर अपने बेटे को इतने दिनों बाद देखकर जो संतोष और चमक आई, वह किसी भी दवा से बड़ी थी। वे अर्णव के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “अरे पगले, मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ। तू तो इतना दुबला लग रहा है। ठीक से खाता-पीता भी था या बस काम ही करता रहा? जा पहले कपड़े बदल, हाथ-मुँह धो ले।”

अर्णव माँ की गोद में सिर टिकाकर दस-पंद्रह मिनट तक अपनी यात्रा के किस्से सुनाता रहा, मौसम का हाल बताता रहा और उनका हालचाल पूछता रहा।

इधर हॉल में खड़ी मानसी के दिल पर मानो किसी ने गर्म अंगारा रख दिया हो। उसकी आँखों में सजे सारे सपने पल भर में टूटकर किरकिरी बन गए थे। उसने सोचा था कि अर्णव के जीवन का केंद्र अब सिर्फ वही होगी, लेकिन यहाँ तो अर्णव ने उसे ठीक से देखा तक नहीं। उसके भीतर उपेक्षा, असुरक्षा और ईर्ष्या का एक अजीब सा बवंडर उठने लगा। उसका स्वाभिमान और उसका बचपना मिलकर उसे विद्रोही बना रहे थे। वह पैर पटकती हुई अपने बेडरूम में चली गई और दरवाजा आधा खुला रखकर खिड़की की ओर मुँह करके खड़ी हो गई। उसकी आँखों से आँसू छलकने को बेताब थे।

जब लगभग बीस मिनट बाद अर्णव अपने बेडरूम में आया, तो उसने मानसी को खिड़की के पास तनी हुई मुद्रा में खड़े देखा। अर्णव समझ गया कि उसकी पत्नी का पारा चढ़ा हुआ है। वह मुस्कुराता हुआ उसके करीब गया और बड़े प्यार से उसके दोनों कंधों पर हाथ रखकर बोला, “मानसी… देखो तो, कौन आया है!”

मानसी ने एक झटके में उसके हाथ झटक दिए और गुस्से में भरकर पीछे हट गई। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर तल्खी थी। वह उपहास भरे लहजे में बोली, “अरे वाह! आपको मेरी याद भी आ गई? मुझे तो लगा था कि आप आज रात वहीं अपनी परम पूजनीय माताश्री के चरणों में ही सो जाएंगे। जाइए ना, वहीं बैठिए! दिन-रात बस माँ-माँ-माँ! मेरे पास क्यों आए हैं? किसने बुलाया है आपको यहाँ? जाइए, मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी!”

मानसी के चेहरे पर गुस्सा तो था, लेकिन उस गुस्से के पीछे छुपा हुआ बेइंतहा प्यार और अपनापन भी साफ नजर आ रहा था। वह किसी प्रौढ़ महिला की तरह द्वेष में नहीं, बल्कि एक मासूम बच्ची की तरह अधिकार जताते हुए रूठी थी, जिसका खिलौना किसी और ने छू लिया हो। अर्णव उसकी इस बालसुलभ नादानी को देखकर मन ही मन मुस्कुरा दिया। उसे मानसी के इस उलाहने में कड़वाहट के बजाय अपने प्रति अनन्य प्रेम का अहसास हुआ। वह जानता था कि मानसी दिल की बुरी नहीं है, बस अभी रिश्तों के विस्तार को समझने में उसे थोड़ा समय लगेगा।

अर्णव ने बिना किसी झिझक के मानसी का हाथ पकड़ा और उसे धीरे से खींचकर बिस्तर के किनारे अपने पास बैठा लिया। मानसी ने थोड़ा प्रतिरोध किया, मुँह फेरना चाहा, लेकिन अर्णव की मजबूत और स्नेहिल पकड़ के आगे उसका गुस्सा पिघलने लगा।

अर्णव ने उसकी आँखों में देखते हुए बहुत कोमलता से कहा, “लो, आ तो गया अपनी जान के पास। अब बताओ, क्या सजा दोगी अपने इस थके-हारे पति को? अठारह दिन मैंने बाहर कैसे काटे हैं, यह मेरा दिल ही जानता है। हर शाम होटल के कमरे में सिर्फ तुम्हारी तस्वीरें देखता था। अब जब सामने आया हूँ, तो थोड़ा प्यार करने के बजाय यह तेवर दिखा रही हो? थोड़ा हंसो, दो मीठी बातें करो। अगर तुम ऐसे ही मुँह फुलाकर रूठी रहोगी, तो मैं सच कह रहा हूँ, कल सुबह ही कंपनी के अगले प्रोजेक्ट के लिए असम निकल जाऊँगा और फिर अगले दो महीने तक लौटकर नहीं आऊँगा!”

असम का नाम सुनते ही मानसी का सारा कृत्रिम गुस्सा हवा में उड़ गया। उसका दिल धड़क उठा। अठारह दिन की जुदाई ही उसके लिए असहनीय थी, तो दो महीने की बात सुनकर वह सिहर उठी। उसने तुरंत दोनों हाथों से अर्णव का कॉलर पकड़ लिया और लगभग रोते हुए मासूमियत से बोली, “ना… ना… बिल्कुल नहीं! ऐसी बात मुँह से निकालिएगा भी मत! आप कहीं नहीं जाएंगे। मैं तो आपके बिना सच में जी ही नहीं पाऊँगी, मर जाऊँगी आपके बिना!”

कहते-कहते मानसी का गला भर आया और उसने बिना एक पल गंवाए अर्णव के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। वह अर्णव से लिपट गई मानो कोई खोया हुआ बच्चा अपनी सबसे सुरक्षित जगह पर लौट आया हो। मानसी का यह सच्चा, निश्छल और भावुक रूप देखकर अर्णव का दिल भर आया। उसने अपनी बाहें मानसी के चारों ओर लपेट लीं और उसके बालों को धीरे-धीरे सहलाने लगा। उस कमरे में केवल दो धड़कनों की आवाज़ थी, जो एक-दूसरे के बिना अधूरी थीं। अर्णव ने महसूस किया कि मानसी का गुस्सा दरअसल उसका डर था—उसे खोने का डर, उसके ध्यान से वंचित रह जाने का डर।

काफी देर तक दोनों उसी मौन आलिंगन में बंधे रहे। जब मानसी की सिसकियाँ थमीं और कमरे का वातावरण थोड़ा सामान्य हुआ, तो अर्णव ने हल्के अंदाज में मानसी के गाल थपथपाए और कहा, “अच्छा बाबा, अब रोना बंद करो। तुम्हारे हाथ की बनी अदरक और इलायची वाली चाय पीने के लिए मेरा गला तरस गया है। एक शानदार चाय बनाकर लाओ ना, तब तक मैं ज़रा माँ के पास जाकर उनके लिए रात की दवा निकाल देता हूँ।”

‘माँ’ का नाम सुनते ही मानसी के चेहरे का रंग एक बार फिर हल्का सा बदला, लेकिन इस बार उसने कुछ कहा नहीं। वह चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गई, जबकि अर्णव दोबारा माँ के कमरे में चला गया।

रसोई में चाय का पानी उबलने चढ़ाते समय मानसी के मन में विचारों का एक नया द्वंद्व शुरू हो गया। चाय की केतली से उठती भाप के साथ उसके भीतर की कड़वाहट फिर से जागने लगी। “यह क्या बात हुई? अभी तो मुझे प्यार से मना रहे थे और फिर तुरंत माँ के पास चले गए? क्या मेरा अपना कोई वजूद नहीं है? क्या इस घर में मेरा स्थान हमेशा दूसरा ही रहेगा? मैं उनकी पत्नी हूँ, मुझे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।”

मानसी ने चाय बनाई और कप ट्रे में रखकर माँ के कमरे की ओर बढ़ी। कमरे का पर्दा आधा गिरा हुआ था। जैसे ही मानसी दरवाजे के पास पहुँची, अंदर से आ रही बातचीत की आवाज सुनकर उसके कदम ठिठक गए।

अंदर अर्णव अपनी माँ के पैरों पर तेल की मालिश कर रहा था। कल्याणी जी कह रही थीं, “अरे अर्णव, तू रहने दे बेटा। तू इतना थक कर आया है, खुद आराम कर। मानसी को भी समय दे। वह बेचारी तेरे जाने के बाद से कितनी अकेली पड़ गई थी। दिन भर घर संभालती है, मेरा ख्याल रखती है, लेकिन उसकी आँखें हमेशा दरवाजे पर टिकी रहती थीं कि कब तू वापस आएगा। तू सीधे मेरे कमरे में आ गया, उसे बुरा लगा होगा।”

इस पर अर्णव की आवाज सुनाई दी, जो बेहद शांत, गंभीर और परिपक्व थी। अर्णव कह रहा था, “माँ, मानसी बहुत मासूम है, दिल की बहुत साफ है। वह मुझसे बेइंतहा मोहब्बत करती है, इसीलिए कभी-कभी बच्चों जैसी जिद कर बैठती है। वह अभी इस नए घर, इन नए रिश्तों को समझने की कोशिश कर रही है। पर माँ, आप मेरी वह नींव हो जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। जब बाबूजी हमें छोड़कर गए थे, तब मैं सिर्फ बारह साल का था। आपने सिलाई-कढ़ाई करके, अपनी दवाइयों के पैसे काटकर मुझे इंजीनियरिंग कराई। आपने कभी अपनी तकलीफ मुझे महसूस नहीं होने दी। आज जब मैं सफल हो गया हूँ, तो क्या अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लूँ? माँ, मानसी मेरा वर्तमान और मेरा भविष्य है, वह मेरी अर्धांगिनी है और मैं उसे अपनी जान से ज्यादा चाहता हूँ। लेकिन आप मेरा अतीत, मेरी जड़ें और मेरा आत्मसम्मान हो। अगर कोई इंसान अपनी उस माँ का आदर नहीं कर सकता जिसने उसे जन्म दिया और पाला, तो वह अपनी पत्नी के साथ भी कभी सच्चा और निष्ठावान नहीं रह सकता। मानसी को यह बात समझने में थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन मैं उसे समझाऊँगा कि मेरा प्यार उसके लिए और मेरा फर्ज आपके लिए कभी एक-दूसरे के रास्ते में नहीं आएंगे। मेरे दिल में दोनों का स्थान अलग है और दोनों ही अमूल्य हैं।”

दरवाजे के बाहर खड़ी मानसी के हाथ में चाय की ट्रे कांपने लगी। अर्णव का एक-एक शब्द मानसी की अंतरात्मा पर हथौड़े की तरह लगा। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने देखा कि जिस बेटे की मातृभक्ति को वह ‘उपेक्षा’ समझ रही थी, वह दरअसल उस पुरुष का चरित्र था, उसका संस्कार था। जो पुरुष अपनी माँ का इतना सम्मान करता था, वही तो भविष्य में अपने बच्चों और अपनी पत्नी का सबसे सच्चा रक्षक बन सकता था। उसने अपनी तुलना एक ऐसी माँ से कर डाली थी जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस बेटे को बनाने में होम कर दी थी।

मानसी को अपने संकीर्ण विचारों पर बेहद लज्जा आई। उसने अपने आँसू पोंछे, एक गहरी सांस ली और अपने चेहरे पर एक आत्मीय, विनम्र मुस्कान लाकर कमरे में प्रवेश किया।

“अरे, आप दोनों की बातें खत्म हो गई हों तो चाय पी लीजिए, ठंडी हो रही है,” मानसी ने बड़े सहज भाव से कहा।

अर्णव ने चौंककर मानसी को देखा। उसे लगा था कि मानसी शायद अभी भी खिन्न होगी, लेकिन मानसी का चेहरा तो बिल्कुल शांत और खिला हुआ था।

मानसी ने चाय का एक कप अर्णव को थमाया और दूसरा कप कल्याणी जी के हाथों में देते हुए बोली, “माँ जी, आज आपकी मालिश अर्णव नहीं, मैं करूँगी। यह दिन भर के थके हुए हैं, इन्हें तो मालिश करना भी ठीक से नहीं आता होगा। अर्णव, आप जाकर गर्म पानी से नहाइए और फ्रेश हो जाइए। तब तक मैं माँ जी के घुटनों में सिकाई कर देती हूँ।”

कल्याणी जी ने आश्चर्य और असीम स्नेह से अपनी बहू की ओर देखा। उनकी आँखों में ममता का सागर उमड़ पड़ा। उन्होंने मानसी का हाथ पकड़कर अपने सिर से लगा लिया और कहा, “जीती रह मेरी बच्ची… भगवान तुम दोनों की जोड़ी हमेशा सलामत रखे।”

अर्णव अवाक होकर मानसी को देख रहा था। मानसी ने पलटकर अर्णव की आँखों में देखा। उस एक नजर में ही अर्णव समझ गया कि मानसी ने सब कुछ सुन लिया है और अब घर में किसी भी स्पष्टीकरण या शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं बची है। दोनों के बीच शब्दों के बिना ही एक मूक संवाद हुआ, जिसने उनके रिश्ते की नींव को पहले से कहीं अधिक मजबूत कर दिया था।

उस रात, जब घर के सारे काम निबट गए और कल्याणी जी चैन से सो गईं, तो अर्णव और मानसी अपने कमरे की बालकनी में खड़े थे। हल्की बारिश अब थम चुकी थी और आसमान में तारे टिमटिमाने लगे थे।

मानसी ने अर्णव के कंधे पर अपना सिर रख दिया और धीमी आवाज में कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, अर्णव। मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी। मैंने समझा ही नहीं कि प्रेम सिर्फ पाने का नाम नहीं, बल्कि अपनों को समझने और उनका संबल बनने का नाम है। आज आपने मुझे सिखा दिया कि रिश्तों में अधिकार जताने से पहले अपनी जिम्मेदारियों को पहचानना कितना जरूरी है।”

अर्णव ने मुस्कुराते हुए मानसी को अपने आगोश में समेट लिया और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “माफी कैसी, पगली? रिश्तों की शुरुआत में यह नादानियाँ ही तो हमें एक-दूसरे को गहराई से समझने का मौका देती हैं। अब हम दोनों मिलकर इस घर को और अपनी जिंदगी को खूबसूरत बनाएंगे।”

उस रात उस छोटे से घर की छत के नीचे सिर्फ दो लोग नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों का विश्वास और सम्मान एक साथ मुस्कुरा रहा था। घर अब सिर्फ ईंट-गारे की इमारत नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और समझदारी का एक पवित्र मंदिर बन चुका था।

प्रिय पाठकों, अक्सर नए वैवाहिक जीवन में प्रेम के अतिरेक और नासमझी के कारण पति और पत्नी अपने पारिवारिक दायित्वों और दांपत्य जीवन के बीच संतुलन खो बैठते हैं। क्या आपको लगता है कि एक समझदार जीवनसाथी वही है जो अपने साथी के माता-पिता को भी उतना ही सम्मान और स्थान दे जितना वह अपने माता-पिता को देता है? इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें अपनी प्रतिक्रिया देकर जरूर बताएं।

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