पराए घर की बेटी

 रीना को अपनी पुरानी सारी बातें, अपने ताने और अपनी माँ की ज़हरीली सीखें याद आने लगीं। उसे याद आया कि जब भी अंजलि यहाँ आती थी, वह कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात नहीं करती थी। वह चुपचाप घर के कोने में बैठकर काम करती रहती थी। उसकी आँखों के नीचे के वो काले घेरे नींद की कमी से नहीं, बल्कि रात-रात भर रोने से बने थे। वह मायके इसलिए नहीं आती थी कि उसे भाभियों के घर पर हुक्म चलाना था, 

ग्वालियर के उस पुराने दोमंजिला पुश्तैनी मकान के आंगन में दोपहर की तीखी धूप उतर आई थी। कमरे के भीतर अलमारी के पल्ले से टिककर खड़ी रीना अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी। फोन के उस पार से उसकी माँ की तीखी हिदायतें उसके कानों में पिघलते हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।

“देख रीना, बहू बनकर ससुराल गई है तो अपना हक जमाना सीख। अगर हर दूसरे महीने तेरी ननद यूं ही सामान बांधकर मायके डेरा डाले रहेगी, तो तू उस घर की मालकिन कभी नहीं बन पाएगी। सास-ससुर तो अपनी बेटी के मोह में अंधे रहते हैं, पर तुझे समझदारी से काम लेना होगा। यह घर अब तेरा और तेरे पति का है, किसी शादीशुदा ननद का विश्रामगृह नहीं!”

माँ की इन बातों ने रीना के मन में पहले से सुलग रही खीझ को और भड़का दिया था। उसने फोन काटा, एक गहरी और बेचैन सांस ली और जैसे ही कमरे की देहरी लांघकर बाहर निकली, सामने ही बरामदे में बैठी उसकी ननद अंजलि पर उसकी नज़र पड़ गई।

अंजलि हाथ में एक छोटी सी टोकरी लिए मेथी के पत्ते साफ कर रही थी। उसके चेहरे पर एक सादापन था, मगर आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। रीना के भीतर नफरत और कड़वाहट की एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसने मन ही मन सोचा कि यह औरत कितनी बेमुरौवत है। शादी को चार साल हो गए हैं, एक भरा-पूरा ससुराल है, पति अच्छी नौकरी में है, फिर भी जब देखो मुंह उठाकर मायके चली आती है। क्या इसे जरा भी अहसास नहीं होता कि अब यह घर उसका नहीं, बल्कि उसकी भाभियों का है? माना कि माँ-बाबूजी इससे बहुत प्यार करते हैं और इसके आने पर पूरे घर का माहौल ऐसा हो जाता है मानो कोई बहुत बड़ा त्योहार आ गया हो, पर किसी के आत्मसम्मान और निजता की भी कोई सीमा होती है। जब भी आती है, पंद्रह-बीस दिन से पहले जाने का नाम नहीं लेती। रीना के मन में तल्खी इतनी बढ़ गई थी कि उसने बरामदे से गुजरते वक्त अंजलि की तरफ देखना भी गवारा नहीं समझा और पैर पटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई।

रसोई में उसकी सास कौशल्या जी कढ़ी में छौंक लगाने की तैयारी कर रही थीं। रीना को देखते ही वे बड़े स्नेह से बोलीं, “अरे रीना बहू, अच्छा हुआ तू आ गई। जरा देख तो, अंजलि के लिए थोड़ी पतली कढ़ी बनाई है। उसे बचपन से ही ऐसी कढ़ी पसंद है। तू ज़रा पकौड़े तल दे, तब तक मैं उसके लिए मेथी के परांठे का आटा गूंध लेती हूँ।”

रीना ने एक तीखी सांस भीतर खींची। उसके माथे पर बल पड़ गए। उसने बिना मन के कढ़ाई गैस पर चढ़ाते हुए कहा, “माँ जी, दीदी को आए अभी हफ्ता भर भी नहीं हुआ और उनकी फरमाइशों की फेहरिस्त खत्म ही नहीं होती। ससुराल में भी क्या वो इतना ही आराम करती हैं? कभी-कभार आना समझ आता है, पर यूं हर तीसरे महीने महीनों के लिए आ बैठना… घर की गृहस्थी का भी एक बजट और व्यवस्था होती है।”

कौशल्या जी के हाथ आटे की परात में ही ठहर गए। उन्होंने अपनी बहू की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी उदासी थी। वे बेहद शांत स्वर में बोलीं, “बहू, अंजलि इस घर की बेटी है। जब तक हम ज़िंदा हैं, यह उसका भी घर है। और फिर उसने कभी किसी चीज़ की फरमाइश नहीं की, यह सब तो मैं अपनी खुशी से कर रही हूँ।”

“हाँ माँ जी, बेटी है तो क्या हुआ? शादी के बाद बेटी का असली घर उसका ससुराल होता है। यहाँ अब भैया और उनके परिवार का हक है,” रीना ने तंज कसते हुए कहा और गैस की आंच तेज़ कर दी। कौशल्या जी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक लंबी सांस भरकर आटा गूंथने लगीं।

शाम को जब रीना का पति सुमित दफ्तर से लौटा, तो घर का माहौल काफी शांत था। सुमित अपनी बहन अंजलि से बहुत प्यार करता था। आते ही उसने अंजलि के सिर पर हाथ रखा, “कैसी है गुड़िया? आज चेहरे पर थोड़ी रौनक लग रही है। जीजाजी से बात हुई?”

अंजलि ने एक फीकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया, “हाँ भैया, सब ठीक है। आप हाथ-मुंह धो लो, मैं चाय लाती हूँ।”

रात को जब सुमित अपने कमरे में आया, तो रीना मुंह फुलाए बिस्तर पर बैठी थी। सुमित ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा, “क्या बात है रीना? आज मिज़ाज कुछ उखड़ा-उखड़ा सा क्यों है?”

रीना ने झटके से उसका हाथ हटा दिया। “सुमित, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती। मुझे इस घर में घुटन होने लगी है।”

सुमित हैरान रह गया, “घुटन? किस बात की घुटन रीना? क्या हुआ है?”

“क्या हुआ है, आपको सच में नहीं दिखता या अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं?” रीना की आवाज़ में बरसों का भरा हुआ गुबार बाहर आने लगा। “आपकी बहन अंजलि! शादी के चार साल बाद भी उनका मायका छूटने का नाम नहीं ले रहा। हर दूसरे महीने वो यहाँ आ जाती हैं। क्या उनका अपना कोई घर-संसार नहीं है? मुझे समझ नहीं आता कि वो यहाँ अपनी भाभियों पर हुक्म चलाने आती हैं या माँ-बाप की लाडली बनने? यह घर हमारा है सुमित! पर उनके आते ही मुझे लगता है जैसे मैं इस घर में कोई किराएदार हूँ और सारा ध्यान, सारी सुख-सुविधाएं सिर्फ उनके लिए हैं।”

सुमित का चेहरा गंभीर हो गया। उसने बहुत संयम से कहा, “रीना, अंजलि मेरी छोटी बहन है। उसने इस घर के आंगन में अपना बचपन बिताया है। क्या शादी होते ही उसका अपने मायके से, अपने माँ-बाप और भाई से सारा रिश्ता खत्म हो जाता है? उसने कभी तुम्हारे काम में दखल नहीं दिया, कभी किसी बात पर तुमसे ऊंची आवाज़ में बात नहीं की, फिर तुम्हें उससे इतनी नफरत क्यों है?”

“नफरत की बात नहीं है सुमित, यह सीमा की बात है! एक शादीशुदा औरत को अपनी हदें पता होनी चाहिए। अगर मैं अपने मायके जाकर ऐसे महीनों रहूँ, तो क्या आपके घर वाले बर्दाश्त करेंगे? कल सुबह मैं दीदी से साफ-साफ कह दूंगी कि अब उन्हें अपने घर लौटना चाहिए।” रीना ने गुस्से में तकिया पटकते हुए कहा और दूसरी तरफ करवट लेकर लेट गई। सुमित देर रात तक छत के पंखे को देखता रहा, उसके दिल में एक गहरा दर्द था जिसे वह शब्दों में बयां नहीं कर पा रहा था।

अगले दिन रविवार था। सुमित को किसी ज़रूरी काम से सुबह ही बाहर जाना पड़ा। ससुर जी मंदिर गए हुए थे और कौशल्या जी पड़ोस में किसी सत्संग में गई थीं। घर में सिर्फ रीना और अंजलि थीं। रीना ने सोच लिया था कि आज वह अंजलि से दो-टूक बात करके ही रहेगी।

दोपहर के समय जब अंजलि अपने कमरे में कपड़े समेट रही थी, रीना तमतमाते कदमों से उसके कमरे की ओर बढ़ी। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। रीना जैसे ही दरवाज़े के पास पहुँची, उसे कमरे के भीतर से किसी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दी। रीना के कदम अचानक ठिठक गए।

उसने दरार से झांककर देखा। अंजलि ज़मीन पर बैठी थी और उसके सामने एक खुला हुआ बैग रखा था। अंजलि के हाथ में एक मेडिकल फाइल थी और वह अपने आँचल से अपने बहते आंसुओं को पोंछने की नाकाम कोशिश कर रही थी। अंजलि का फोन बज रहा था। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया और कानों से लगाया।

फोन लाउडस्पीकर पर था या फिर कमरे के सन्नाटे की वजह से दूसरी तरफ की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। फोन पर अंजलि के पति की आवाज़ थी, जो बेहद कठोर और ज़हरीली लग रही थी।

“देखो अंजलि, सीधी सी बात है। अगर डॉक्टर ने कह दिया है कि तुम कभी माँ नहीं बन सकतीं, तो इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है। मेरी माँ ने तुम्हारे जैसी बांझ औरत के लिए यह घर नहीं बनाया है। तुम अपने मायके में ही रहो तो बेहतर है। अपने उस लाडले भाई और माँ-बाप से कहो कि तुम्हारा खर्च उठाएं। जब तक तुम हमारे खानदान को वारिस नहीं दे सकतीं, तब तक इस घर में तुम्हारी कोई जगह नहीं है। और अगर ज्यादा नाटक किया तो मैं तलाक के कागज़ात तुम्हारे मायके भिजवा दूंगा!”

उधर से फोन कट गया। एक तीखी ‘बीप’ की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज उठी।

अंजलि ने फोन ज़मीन पर रख दिया और अपने दोनों घुटनों में सिर छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसका पूरा शरीर सिसकियों से कांप रहा था। वह अपने सीने पर हाथ रखकर उस असहनीय दर्द को दबाने की कोशिश कर रही थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।

दरवाज़े के बाहर खड़ी रीना के पैरों तले से जैसे ज़मीन खिसक गई। उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसके दिल पर जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो। वह अंजलि, जिसे वह एक स्वार्थी, ऐश-ओ-आराम की भूखी और मायके पर बोझ बनने वाली ‘बुरी ननद’ समझ रही थी, वह असल में अपने भीतर इतना बड़ा नासूर छिपाए बैठी थी!

रीना को अपनी पुरानी सारी बातें, अपने ताने और अपनी माँ की ज़हरीली सीखें याद आने लगीं। उसे याद आया कि जब भी अंजलि यहाँ आती थी, वह कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात नहीं करती थी। वह चुपचाप घर के कोने में बैठकर काम करती रहती थी। उसकी आँखों के नीचे के वो काले घेरे नींद की कमी से नहीं, बल्कि रात-रात भर रोने से बने थे। वह मायके इसलिए नहीं आती थी कि उसे भाभियों के घर पर हुक्म चलाना था, बल्कि इसलिए आती थी क्योंकि दुनिया की हर चौखट से दुत्कारी जाने के बाद केवल यही एक देहरी बची थी जहाँ उसे यह महसूस होता था कि वह भी एक इंसान है, उसका भी कोई वजूद है और कोई है जो उससे बिना किसी शर्त के प्यार करता है।

रीना की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसे अपने आप से घिन आने लगी। वह खुद एक औरत थी, फिर भी उसने दूसरी औरत के दर्द को समझने के बजाय उसे सिर्फ अपने स्वार्थ और अहंकार के तराजू में तौला था।

रीना ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने दरवाज़ा पूरा खोला और तेज़ी से कमरे के भीतर दाखिल हुई। आहट सुनकर अंजलि ने घबराकर अपने आंसू पोंछे और ज़मीन पर बिखरी मेडिकल रिपोर्ट्स को दुपट्टे से छिपाने की कोशिश की।

“भा… भाभी! आप? मुझे लगा आप सो रही हैं… मैं बस कपड़े समेट रही थी,” अंजलि ने अपनी आवाज़ को सामान्य बनाने का झूठा प्रयास करते हुए सिर झुका लिया।

रीना कुछ नहीं बोली। वह सीधे अंजलि के सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने अंजलि के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। अंजलि ने हैरान होकर रीना की तरफ देखा। रीना की आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी।

“दीदी…” रीना का गला रुंध गया। “मुझे माफ कर दीजिए दीदी… मुझे माफ कर दीजिए। मैं कितनी अंधी थी, कितनी पत्थरदिल थी कि आपकी इस खामोश चीख को सुन ही नहीं पाई।”

अंजलि अवाक रह गई। “भाभी, आप यह क्या कह रही हैं?”

“मैंने सब सुन लिया दीदी,” रीना ने अंजलि के चेहरे पर बिखरी लटों को पीछे करते हुए कहा। “मैंने आपके पति की बातें सुन लीं। मुझे नहीं पता था कि आप जिस मायके में सुकून ढूंढने आती हैं, उसी मायके में मैं आपके लिए कांटे बिछा रही थी। मैं सोचती थी कि आप यहाँ आकर मुझ पर बोझ बन रही हैं, जबकि सच तो यह है कि मैं एक औरत होकर भी आपकी पीड़ा को नहीं समझ सकी।”

यह सुनते ही अंजलि के सब्र का बांध टूट गया। उसने रीना के गले लगकर रोना शुरू कर दिया। बरसों से जो दर्द उसने अपने सीने में पत्थर बनाकर दबा रखा था, वह आंसुओं का सैलाब बनकर बह निकला। रीना ने अपनी ननद को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया और उसकी पीठ सहलाने लगी।

“भाभी… मैं कहाँ जाऊं?” अंजलि सिसकते हुए बोली। “ससुराल वाले कहते हैं कि मैं अधूरी हूँ, बांझ हूँ। मेरी कोई कीमत नहीं है वहाँ। यहाँ आती हूँ तो डर लगता है कि कहीं आप लोगों को यह न लगे कि मैं आपका घर तोड़ने आई हूँ या आप पर बोझ बन गई हूँ। मेरा तो कोई घर ही नहीं बचा भाभी… न मायका रहा, न ससुराल…”

“किसने कहा कि आपका कोई घर नहीं है?” रीना ने अंजलि के आंसू अपने हाथों से पोंछते हुए बड़े दृढ़ स्वर में कहा। “यह घर आपका है दीदी। जितना यह सुमित का है, जितना मेरा है, उतना ही हक आपका है। इस घर की मिट्टी में आपके बचपन की खुशबू बसी है। और कोई औरत सिर्फ माँ बनने से पूरी नहीं होती, आपका वजूद किसी की दया का मोहताज नहीं है।”

तभी दरवाज़े पर किसी की आहट हुई। सुमित और कौशल्या जी बाहर खड़े थे। सुमित की आँखों में नमी थी और कौशल्या जी का चेहरा गर्व और भावुकता से चमक रहा था। सुमित थोड़ी देर पहले ही आ गया था और उसने दोनों की बातें सुन ली थीं।

सुमित आगे बढ़ा और उसने अंजलि के सिर पर हाथ रखा, “गुड़िया, जब तक तेरा यह भाई ज़िंदा है, तुझे किसी के आगे हाथ फैलाने या गिड़गिड़ाने की ज़रूरत नहीं है। जो लोग मेरी बहन के आंसुओं की कीमत नहीं समझ सकते, उनके घर में तेरी डोली दोबारा नहीं जाएगी। तू यहाँ हमारे साथ रहेगी, अपने स्वाभिमान के साथ।”

कौशल्या जी ने आगे बढ़कर अंजलि और रीना दोनों को अपने आंचल में समेट लिया। “मेरी दोनों बच्चियां… आज मुझे यकीन हो गया कि मेरे जाने के बाद भी यह घर कभी नहीं बिखरेगा। जिस घर की बहू अपनी ननद का दर्द अपनी सगी बहन की तरह समझ ले, उस घर में भगवान खुद वास करते हैं।”

रीना ने अंजलि के हाथ से वह मेडिकल फाइल ली और उसे बंद करके एक तरफ रख दिया। उसने अंजलि का हाथ पकड़कर कहा, “दीदी, आप बहुत पढ़ी-लिखी हैं। आपने एम.कॉम किया है ना? कल से आप घर पर नहीं बैठेंगी। सुमित आपको एक अच्छे स्कूल या कॉलेज में नौकरी दिलवाएंगे। आप अपने पैरों पर खड़ी होंगी। कोई आपको बेसहारा या लाचार नहीं कह सकता। और यह मायका… यह मायका हमेशा आपकी ढाल बनकर खड़ा रहेगा।”

अंजलि के चेहरे पर बरसों बाद एक ऐसा सुकून और आत्मविश्वास झलका जो उसने कभी महसूस नहीं किया था। घर की उस देहरी ने, जिसे वह पराया समझने लगी थी, आज उसे अपनी सबसे मजबूत पहचान दे दी थी।

उस दिन के बाद से घर की फिज़ा पूरी तरह बदल गई। रीना और अंजलि के बीच अब ननद-भाभी का औपचारिक रिश्ता नहीं, बल्कि दो सहेलियों का गहरा विश्वास था। कुछ ही महीनों में अंजलि को ग्वालियर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। उसने अपने पति और ससुराल के उस खोखले रिश्ते को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और अपनी ज़िंदगी को एक नया मकाम दिया।

शाम को जब सब आंगन में चाय पीने बैठते, तो रीना सबसे पहले अंजलि के लिए उसकी पसंद की इलायची वाली चाय बनाती। रीना ने अपनी माँ को भी फोन पर साफ कह दिया था, “माँ, बेटी की शादी के बाद मायके की चौखट पर उसका हक खत्म नहीं होता। ननद कोई पराई नहीं होती, वह उसी आंगन का हिस्सा होती है जिसकी देहरी पर हम बहू बनकर कदम रखते हैं। अगर हम उनके घर को अपना कह सकते हैं, तो उन्हें अपने ही घर से बेगाना कैसे कर सकते हैं?”

घर का वह आंगन अब कड़वाहट और तानों की गूंज से नहीं, बल्कि आपसी प्यार, सम्मान और सम्मान की मीठी खिलखिलाहट से महक रहा था।

अक्सर हमारे समाज में यह मान लिया जाता है कि शादी के बाद बेटी का अपने मायके पर कोई अधिकार नहीं रह जाता और बहुएं ननद के आने को अपनी गृहस्थी में दखलअंदाज़ी समझने लगती हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हर इंसान की एक अनकही कहानी और एक छुपा हुआ दर्द होता है।

क्या आपको भी लगता है कि शादी के बाद भी एक बेटी के लिए मायके के दरवाज़े हमेशा खुले रहने चाहिए? और क्या एक बहू अपनी समझदारी से ननद को पराया समझने के बजाय अपनी बहन जैसा प्यार देकर किसी बिखरते हुए जीवन को संवार सकती है? आपकी इस बारे में क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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