रोहिणी भी आगे आई और उसने विशाखा के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों में भी पश्चाताप के आंसू थे। “भाभी, मुझे सच में माफ कर दीजिए। मैं अपनी माँ की सेवा में इतनी व्यस्त हो गई कि मैंने कभी आपकी तरफ देखा ही नहीं। मैं सोचती रही कि मैं माँ के पास रुककर बहुत बड़ा फर्ज निभा रही हूँ, लेकिन असल में मैं सारा शारीरिक और मानसिक बोझ आप पर डाल रही थी। माँ सिर्फ मेरी नहीं हैं, आपकी भी हैं, लेकिन आपकी भी तो अपनी एक माँ हैं जो आपका इंतज़ार कर रही होंगी।”
जबलपुर की उस सर्द सुबह में रसोई से उठती अदरक वाली चाय की खुशबू पूरे घर में महक रही थी। गैस की धीमी आंच पर दूध खौल रहा था और विशाखा एकटक उस उबलते दूध को देख रही थी, ठीक उसी तरह जैसे पिछले कुछ दिनों से उसके मन के भीतर अनगिनत विचार खौल रहे थे। शादी के सात साल बीत जाने के बाद भी कुछ रवायतें जस की तस थीं। हर साल सर्दियों की शुरुआत में जब उसकी ननद रोहिणी अपने बच्चों के साथ भोपाल से मायके आती, तो घर में एक अलग ही रौनक बिखर जाती थी। विशाखा भी इस रवायत की आदी हो चुकी थी।
रोहिणी जब भी आती, विशाखा दिल खोलकर उसकी खातिरदारी करती। उसकी पसंद की कचौरियां बनतीं, बच्चों के मनपसंद व्यंजन तैयार होते और पूरा हफ्ता हँसी-ठिठोली में बीत जाता। इस व्यवस्था के पीछे एक अलिखित समझौता भी था—रोहिणी के मायके में बिताए दस-पंद्रह दिनों के बाद, जैसे ही वह अपनी ससुराल लौटती, विशाखा का भी ग्वालियर अपने मायके जाने का रास्ता साफ हो जाता था। वह भी अपने माता-पिता, अपनी पुरानी सहेलियों और उस घर की यादों को समेटने निकल पड़ती जहाँ उसका बचपन बीता था। इस बार भी उसकी सारी योजनाएं तय थीं। उसने अपनी माँ से फोन पर कह दिया था कि रोहिणी दीदी के जाते ही वह अगले हफ्ते की ट्रेन से आ रही है। माँ ने भी अपनी लाडली के लिए तिल के लड्डू और उसकी पसंद की मंगौड़ियां बनाकर रख ली थीं।
लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी बनाई योजनाओं के मुताबिक कहाँ चलती है। इस बार परिस्थितियाँ अचानक बदल गई थीं। रोहिणी को आए अभी चार दिन ही हुए थे कि अचानक विशाखा की सास, कल्याणी देवी का स्वास्थ्य बिगड़ गया। अचानक बढ़े रक्तचाप और घुटनों के पुराने गठिया के दर्द ने उन्हें पूरी तरह बिस्तर पर ला पटका। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि उन्हें कम से कम दो-तीन हफ्ते तक पूर्ण विश्राम की आवश्यकता है, सीढ़ियां चढ़ना बिल्कुल मना था और समय पर दवाइयों के साथ-साथ विशेष देखभाल की ज़रूरत थी।
घर का माहौल एकाएक बदल गया। हँसी की जगह चिंताओं ने ले ली। कल्याणी देवी के अस्वस्थ होते ही रोहिणी ने अपने पति को फोन करके सूचित कर दिया, “सुमित, माँ की हालत अभी ठीक नहीं है। ऐसे समय में मैं उन्हें छोड़कर कैसे आ सकती हूँ? मैं अभी पंद्रह-बीस दिन और यहीं रुकूँगी। जब तक माँ अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं, मेरा जाना ठीक नहीं होगा।”
रोहिणी का यह फैसला एक बेटी के तौर पर बिल्कुल स्वाभाविक और सराहनीय था। अपनी बीमार माँ की सेवा करना हर संतान का धर्म होता है। लेकिन इस एक फैसले ने विशाखा के कदमों में जैसे अदृश्य बेड़ियां डाल दी थीं। उसके मन का सारा गणित गड़बड़ा गया था। रोहिणी का रुकना यानी विशाखा के मायके जाने की तारीख का अनिश्चितकाल के लिए टल जाना।
विशाखा की उलझन यह थी कि वह यह बात किससे कहे। सास बीमार थीं, उनकी तीमारदारी पहली प्राथमिकता थी। लेकिन मन का क्या करे? पूरे एक साल से वह इस छुट्टी का इंतज़ार कर रही थी। मायके में उसके छोटे भाई की सगाई की प्रारंभिक बातें चल रही थीं और माँ बार-बार फोन करके पूछ रही थीं, “विशाखा, कब तक निकलेगी बेटा? तेरी पसंद की साड़ियां भी देखनी हैं और भाई के लिए लड़की वालों से बात करने में तेरी मौजूदगी बहुत जरूरी है।”
विशाखा हर बार फोन पर एक ही रटा-रटाया जवाब देती, “हाँ माँ, बस माँजी की तबीयत ज़रा नासाज़ है, दीदी भी यहीं हैं, जैसे ही सब ठीक होता है, मैं निकलती हूँ।” फोन कटते ही उसकी आँखों के कोर भीग जाते।
उसे सबसे ज्यादा अखरती थी घर के लोगों की खामोशी। किसी ने एक बार भी उससे यह नहीं कहा कि ‘विशाखा, तुम्हारा भी तो मायके जाने का समय हो गया था।’ सबने मान लिया था कि क्योंकि ननद रुकी हुई है और सास बीमार हैं, इसलिए विशाखा का घर में मौजूद रहना एक स्वतः सिद्ध नियम है। उसके अपने कोई अरमान, अपनी कोई योजनाएं हो सकती हैं, इसका ख्याल जैसे किसी के ज़ेहन में आया ही नहीं।
दिन भर विशाखा एक पहिए की तरह घूमती रहती। सुबह जल्दी उठकर सास के लिए दलिया और काढ़ा बनाना, फिर पूरे परिवार का नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की मालिश और स्पंजिंग, दोपहर का खाना और फिर शाम की चाय। रोहिणी माँ के कमरे में बैठी रहती, उनके सिर में तेल लगाती, उनसे पुरानी बातें करती और उनका दिल बहलाती। एक बेटी होने के नाते वह माँ को भावनात्मक संबल दे रही थी, जो बहुत जरूरी था। लेकिन घर की रसोई और गृहस्थी की पूरी चक्की विशाखा अकेले पीस रही थी। रात होते-होते उसकी कमर दर्द से टूटने लगती।
एक रात, जब सब सो गए, विशाखा ने अपने पति मयंक से दबे लफ्जों में बात छेड़ी। मयंक ऑफिस के काम की फाइलें समेट रहा था।
“मयंक…” विशाखा ने धीमी आवाज़ में पुकारा।
“हूँ, बोलो विशाखा, बहुत नींद आ रही है, कल सुबह जल्दी मीटिंग है,” मयंक ने बिना उसकी ओर देखे कहा।
“मैं कह रही थी कि भाई की सगाई की तारीख तय हो रही है। माँ का आज फिर फोन आया था। अगर… अगर मैं चार-पाँच दिनों के लिए होकर आ जाती तो? दीदी तो यहाँ हैं ही माँजी की देखभाल के लिए।” विशाखा ने बहुत संकोच और डर के साथ अपनी बात रखी।
मयंक ने चौंककर फाइल बंद की और विशाखा को ऐसे देखा मानो उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। “विशाखा, तुम यह बात इस समय कैसे सोच भी सकती हो? तुम्हें दिख नहीं रहा कि माँ की क्या हालत है? दीदी यहाँ मेहमान की तरह आई थीं, वो तो माँ की खातिर रुक गईं। अब ऐसे में तुम घर छोड़कर मायके चली जाओगी, तो लोग क्या कहेंगे? दीदी पर सारा बोझ आ जाएगा। कुछ दिन सब्र नहीं कर सकतीं?”
मयंक के शब्दों ने विशाखा के सीने में सुई की तरह चुभन पैदा कर दी। ‘दीदी मेहमान हैं’… यह वाक्य उसके कानों में हथौड़े की तरह बजा। यानी सात साल बाद भी इस घर की असली बेटी मेहमान थी जिसकी सहूलियत का ध्यान सबको था, और जो इस घर की बहू थी, उस पर सारे कर्तव्यों का बोझ लादना सबका अधिकार था। विशाखा ने तकिए में मुँह छुपा लिया और रात भर उसके आँसू चादर को भिगोते रहे। उसने तय कर लिया कि अब वह किसी से अपने मायके जाने की बात नहीं करेगी। उसने अपनी इच्छाओं को मन के किसी गहरे कोने में दफन कर दिया।
अगले दो दिन विशाखा ने एक मशीन की तरह काम किया। चेहरे पर कोई भाव नहीं, होठों पर कोई मुस्कान नहीं। वह दवा का समय याद रखती, थर्मामीटर से बुखार नापती, कपड़े धोती, खाना बनाती, लेकिन उसका मौन इतना गहरा था कि घर की दीवारों को भी उसकी उदासी महसूस होने लगी थी।
तीसरे दिन दोपहर में एक अप्रत्याशित घटना घटी। कल्याणी देवी को अचानक चक्कर आया और वे बिस्तर से उठने की कोशिश में लड़खड़ा गईं। विशाखा उस समय बालकनी में कपड़े सुखा रही थी। रोहिणी वहीं पास की कुर्सी पर बैठी मोबाइल पर बात कर रही थी। उसने दौड़कर माँ को सम्भाला और जोर से आवाज़ लगाई, “विशाखा! जल्दी आओ, देखो माँ को क्या हुआ!”
विशाखा भागी हुई आई। उसने तुरंत कल्याणी देवी को सहारा देकर सीधा लिटाया, उनके पैरों के नीचे तकिया लगाया, बीपी मशीन से रक्तचाप जांचा जो काफी गिर गया था, और फुर्ती से किचन से नमक-चीनी का घोल बनाकर लाई। उसने बहुत ही धैर्य और कुशलता से सास के माथे को सहलाते हुए उन्हें घूंट-घूंट पानी पिलाया। पंद्रह मिनट की मशक्कत के बाद कल्याणी देवी की सांसें सामान्य हुईं और उनका रंग लौटा। डॉक्टर को फोन किया गया, तो डॉक्टर ने कहा कि अचानक बीपी गिरने से ऐसा हुआ, विशाखा ने जो प्राथमिक उपचार दिया वह बिल्कुल सही था।
जब सब शांत हुआ, तो कल्याणी देवी ने धीरे से आँखें खोलीं। उनके एक तरफ रोहिणी बैठी थी और दूसरी तरफ विशाखा उनके पैर दबा रही थी। कल्याणी देवी ने देखा कि विशाखा के चेहरे पर गहरी थकान थी, आँखों के नीचे काले घेरे साफ नज़र आ रहे थे और उसके हाथ जो उनके पैरों को सहला रहे थे, हल्के से काँप रहे थे।
रोहिणी ने अपनी माँ का हाथ थामते हुए कहा, “माँ, आप कितना डरा देती हैं। अगर विशाखा समय पर न आती तो पता नहीं क्या होता।”
कल्याणी देवी ने कुछ देर तक दोनों को देखा। फिर उन्होंने विशाखा के हाथ पर अपना कमजोर हाथ रख दिया। “विशाखा बेटा, तूने आज दोपहर का खाना खाया?”
विशाखा चौंक गई। उसने नज़रें झुका लीं, “माँजी, बस काम निबटाकर खाने ही जा रही थी कि…”
“तीन बज चुके हैं बहू,” कल्याणी देवी की आवाज़ में एक अजीब सी नमी थी। फिर उन्होंने रोहिणी की तरफ देखा, “रोहिणी, तूने कल मुझसे कहा था ना कि विशाखा के भाई की सगाई की बात चल रही है?”
रोहिणी झेंप गई, उसने धीरे से कहा, “हाँ माँ, वो चाची जी का फोन आया था तो बता रही थीं कि विशाखा को मायके वाले बहुत याद कर रहे हैं।”
कल्याणी देवी ने एक गहरी सांस ली और तकिए के सहारे थोड़ा उठकर बैठ गईं। उन्होंने विशाखा को अपने पास खींचा और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मुझे माफ कर दे बेटा। अपनी बीमारी के स्वार्थ में मैं इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने यह देखा ही नहीं कि तू पिछले दस दिनों से किस कदर पिस रही है। हम सबने बहुत आसानी से मान लिया कि तू तो यहीं की है, तेरी अपनी कोई दुनिया नहीं, तेरी अपनी कोई मां नहीं जो तेरी राह देख रही होगी।”
विशाखा की आँखों से बरसों का बांध टूट गया। वह सास की गोद में सिर रखकर सुबक पड़ी। इतने दिनों का दबा हुआ दर्द, उपेक्षा का अहसास और मायके की याद, सब आंसुओं के रास्ते बह निकला।
रोहिणी भी आगे आई और उसने विशाखा के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों में भी पश्चाताप के आंसू थे। “भाभी, मुझे सच में माफ कर दीजिए। मैं अपनी माँ की सेवा में इतनी व्यस्त हो गई कि मैंने कभी आपकी तरफ देखा ही नहीं। मैं सोचती रही कि मैं माँ के पास रुककर बहुत बड़ा फर्ज निभा रही हूँ, लेकिन असल में मैं सारा शारीरिक और मानसिक बोझ आप पर डाल रही थी। माँ सिर्फ मेरी नहीं हैं, आपकी भी हैं, लेकिन आपकी भी तो अपनी एक माँ हैं जो आपका इंतज़ार कर रही होंगी।”
उसी समय मयंक भी कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया था। उसने माँ और बहन की बातें सुन ली थीं। उसे अपनी उस रात की बेरुखी पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हुई जब उसने विशाखा को स्वार्थी ठहराया था। वह चुपचाप कमरे में आया और विशाखा के पास बैठ गया।
“विशाखा,” मयंक ने धीमे स्वर में कहा, “मुझे माफ कर दो। मैं एक अच्छा बेटा बनने की होड़ में एक संवेदनशील पति बनना भूल गया था।”
कल्याणी देवी ने मुस्कुराते हुए अपनी बेटी रोहिणी की ओर देखा और दृढ़ स्वर में कहा, “रोहिणी, तूने बचपन से इस घर में राज किया है, अब बेटी होने का असली फर्ज निभा। अगले एक हफ्ते तक इस घर की रसोई, मेरी दवाइयां और मेरी तीमारदारी पूरी तरह तेरी जिम्मेदारी होगी। और मयंक, तू अभी के अभी विशाखा का ग्वालियर का टिकट बुक कराएगा।”
विशाखा ने घबराकर सिर उठाया, “नहीं माँजी, इस हालत में मैं आपको छोड़कर कैसे जा सकती हूँ? जब आप पूरी तरह ठीक हो जाएंगी, मैं तब चली जाऊँगी।”
“नहीं बेटा,” कल्याणी देवी ने ममता भरे अधिकार से कहा, “अगर एक बेटी अपनी माँ की सेवा के लिए रुक सकती है, तो एक बहू भी अपनी माँ के आंचल में सुकून पाने का पूरा हक रखती है। अगर तू इस बोझिल मन से यहाँ रहेगी, तो मेरी दवाएं भी मुझ पर असर नहीं करेंगी। तू जा, अपने भाई की सगाई की खुशियों में शामिल हो, अपनी माँ के हाथ का खाना खा और जब तेरा मन पूरी तरह तृप्त हो जाए, तब वापस आना। यह घर तेरा है, और यहाँ तेरा हक सिर्फ जिम्मेदारियों पर नहीं, खुशियों पर भी उतना ही है।”
रोहिणी ने हँसते हुए विशाखा के आंसू पोंछे और कहा, “और भाभी, बिल्कुल बेफिक्र होकर जाइएगा। मैं अपनी माँ का पूरा ख्याल रखूँगी। आखिर मुझे भी तो साबित करना है कि मैं सिर्फ बातें बनाना नहीं, काम संभालना भी जानती हूँ!”
कमरे का भारीपन एक पल में हल्की फुहार बनकर बिखर गया। विशाखा ने महसूस किया कि रिश्तों में खिंचाव तब नहीं आता जब हालात मुश्किल होते हैं, बल्कि तब आता है जब हम एक-दूसरे के दर्द को समझना बंद कर देते हैं। आज उस घर में कोई पराया नहीं था; न बहू बेबस थी, न बेटी सिर्फ मेहमान थी। समझदारी और संवेदनशीलता ने उस परिवार को एक ऐसे खूबसूरत सूत्र में पिरो दिया था जहाँ हर किसी के आत्मसम्मान और भावनाओं की जगह सुरक्षित थी।
अगली सुबह, जब विशाखा स्टेशन के लिए तैयार होकर निकली, तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक चमक थी। उसने सास के पैर छुए, जिन्होंने दिल खोलकर उसे दुआएं दीं। रोहिणी ने उसके हाथ में रास्ते के लिए नाश्ते का डिब्बा थमाया। मयंक उसे मुस्कुराते हुए गाड़ी की तरफ ले गया। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए विशाखा सोच रही थी कि घर सिर्फ ईंट-पत्थरों और नियमों से नहीं बनता, घर बनता है उस समझ से जहाँ एक स्त्री दूसरी स्त्री के त्याग और उसकी चाहतों का मोल समझती है।
यह कहानी हमें यह सुंदर सीख देती है कि परिवार में संतुलन तभी बना रह सकता है जब जिम्मेदारियों के साथ-साथ हर सदस्य की व्यक्तिगत भावनाओं और जरूरतों का भी सम्मान किया जाए। बहू भी किसी घर की बेटी होती है और उसका अपने मायके से जुड़ाव उतना ही पवित्र और स्वाभाविक है जितना किसी बेटी का। जब परिवार में संवाद, सहानुभूति और आपसी समझ होती है, तो बड़ी से बड़ी उलझन भी प्रेम की मिठास में बदल जाती है।
क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में अक्सर बहुओं के मायके जाने को एक विशेषाधिकार मान लिया जाता है, न कि उनका स्वाभाविक अधिकार? क्या एक स्त्री ही दूसरी स्त्री की सबसे बड़ी संबल बन सकती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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