संस्कारों की पूँजी

रोहन की एक-एक बात मेरे कानों में अमृत की तरह घुल रही थी। मेरा गला भर आया। एक मध्यमवर्गीय माँ के लिए इससे बड़ा दिन और क्या हो सकता है कि जिस बेटे की उँगली पकड़कर उसने चलना सिखाया था, आज वही बेटा उसका संबल बनकर खड़ा था और कह रहा था कि ‘माँ, अब तू फिक्र मत कर, मैं हूँ न।’

मैंने अपनी आँखें पोंछते हुए उसके गाल पर हाथ फेरा और कहा, “पागल है क्या तू? ऐसे छोटी सी बात पर कोई नौकरी छोड़ता है क्या? इतने सालों से जा रही हूँ, घर पर खाली बैठकर क्या करूँगी? और फिर दो पैसे घर में आते हैं तो अपना ही हाथ खुला रहता है। पर सच कहूँ बेटा… आज मुझे लगा कि मेरा रोहन सचमुच बहुत बड़ा हो गया है। तेरी इस बात ने मेरा आधा बुखार तो वैसे ही उतार दिया।”

अहमदाबाद की उस मध्यमवर्गीय कॉलोनी में शाम की ठंडी हवा खिड़कियों से छनकर आ रही थी। रसोई से दाल के छौंक की खुशबू पूरे घर में तैर रही थी। मैं, यानी मालती, गैस की धीमी आँच पर तवा चढ़ाए रोटियाँ सेंकने की तैयारी कर रही थी, और कमरे में बैठे मेरे पति, सतीश जी, चश्मा नाक पर टिकाए दैनिक समाचार पत्र के पन्ने पलट रहे थे। पचास की उम्र पार कर चुके किसी भी मध्यमवर्गीय दंपति की तरह हमारा जीवन भी एक तयशुदा ढर्रे पर चल रहा था। सुबह की भागदौड़, दोपहर का सन्नाटा और शाम की वही जानी-पहचानी खामोशी। सतीश जी एक सरकारी दफ्तर से क्लर्क के पद से रिटायर हो चुके थे और पेंशन इतनी ही थी कि घर की गाड़ी खिंच सके। वहीं मैं पिछले आठ सालों से पास के एक बड़े निजी स्कूल के प्रशासनिक विभाग में अकाउंट्स असिस्टेंट के रूप में काम कर रही थी। सुबह नौ से शाम पाँच की यह नौकरी मेरे लिए केवल अतिरिक्त आमदनी का जरिया नहीं थी, बल्कि हमारे घर की कई छोटी-बड़ी ज़रूरतों को पूरा करने का मजबूत सहारा थी।

लेकिन उस शांत शाम को एक ऐसी घंटी बजी जिसने हमारी पूरी ज़िंदगी में खुशियों का एक नया रंग भर दिया। मेरा फोन डाइनिंग टेबल पर रखा था और उस पर हमारे इकलौते बेटे, रोहन का नाम चमक रहा था। हाथ पोंछते हुए मैंने जल्दी से फोन उठाया। दूसरी तरफ से रोहन की खिलखिलाती हुई आवाज़ आई, “माँ! प्रणाम, कैसी हो आप?”

“मैं बिल्कुल ठीक हूँ बेटा, तू बता, कैसा है? खाना खाया तूने समय पर?” मैंने हर माँ की तरह पहला सवाल वही पूछा।

“माँ, आज एक बहुत बड़ी खुशखबरी है,” रोहन के स्वर में उत्साह छलक रहा था, “मैंने अपनी पुरानी कंपनी छोड़ दी है। मुझे एक मल्टीनेशनल टेक फर्म में सीनियर सॉफ्टवेयर कंसलटेंट का ऑफर मिला है। पैकेज तो पहले से दोगुना है ही, पर सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने मुझे स्थायी रूप से ‘वर्क फ्रॉम होम’ यानी घर से काम करने की सुविधा दी है। मैं अपना सारा सामान पैक कर रहा हूँ माँ… अगले हफ़्ते मैं हमेशा के लिए घर लौट रहा हूँ!”

रोहन के यह शब्द सुनते ही मेरे हाथ काँपने लगे और आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। मैंने लाउडस्पीकर ऑन कर दिया था ताकि सतीश जी भी सुन सकें। सतीश जी के हाथ से अखबार छूटकर मेज पर गिर गया और उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक आ गई जो मैंने बरसों से नहीं देखी थी।

रोहन को घर से दूर गए पूरे छह साल बीत चुके थे। पहले चार साल उसने पुणे से इंजीनियरिंग की, और फिर पिछले दो सालों से वह बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में दिन-रात एक कर रहा था। त्योहारों पर दो-चार दिन के लिए आना और फिर घड़ी की सुइयों के साथ उसका लौट जाना—बस यही हमारी मुलाकात का दायरा रह गया था। हर बार जब वह जाता, तो घर का हर कोना काटने को दौड़ता था। जिस कमरे में उसका बचपन बीता था, वहाँ सिर्फ उसकी पुरानी किताबें, दीवार पर टंगे क्रिकेट पोस्टर और एक गहरा खालीपन रह जाता था। अब वह हमेशा के लिए वापस आ रहा था, अपने उसी कमरे में, हमारे पास। उस रात न तो मुझे ठीक से नींद आई और न सतीश जी को। हम दोनों बस यही योजनाएँ बनाते रहे कि रोहन के आने पर उसके पसंद का क्या-क्या खाना बनेगा और उसका कमरा कैसे सजाया जाएगा।

दिन जैसे पंख लगाकर उड़े और वह बहुप्रतीक्षित दिन भी आ गया जब बाहर टैक्सी रुकी। रोहन दो बड़े बैग लिए दरवाजे पर खड़ा था। उसने झुककर पहले सतीश जी के और फिर मेरे पैर छुए। जब मैंने उसे गले लगाया, तो लगा कि मेरी दुनिया पूरी हो गई।

शुरुआती कुछ हफ़्तों में मैंने रोहन के भीतर एक बड़ा बदलाव महसूस किया। वह अब कॉलेज का वह अल्हड़, बात-बात पर चिढ़ने वाला या कपड़ों और जूतों के लिए ज़िद करने वाला लड़का नहीं रह गया था। वह बेहद शांत, गंभीर और जिम्मेदार युवक बन चुका था। सुबह जल्दी उठकर योग करना, अपने कपड़े खुद धोना और अपनी मेज खुद साफ रखना—उसने बाहर रहकर स्वावलंबन सीख लिया था। सबसे सुखद बात यह थी कि जब भी उसे अपने लैपटॉप से फुर्सत मिलती, वह रसोई में आकर खड़ा हो जाता। कभी सब्जियाँ काटने में मेरी मदद कर देता, तो कभी बिना कहे बाज़ार से दूध और फल ले आता। सतीश जी की दवाइयों की पर्चियाँ उसने अपने फोन में सहेज ली थीं और तारीख से पहले ही दवाइयाँ मँगा कर रख देता।

एक मंगलवार की शाम, जब मैं स्कूल से लौटी, तो मेरा शरीर बुरी तरह टूट रहा था। स्कूल में वार्षिक परीक्षाओं का दौर चल रहा था, फीस वसूली और खातों के मिलान के चलते पिछले कई दिनों से काम का बोझ बहुत ज्यादा था। मेरी प्रिंसिपल, श्रीमती वर्मा, अनुशासन और समय की बेहद पाबंद महिला थीं। उनके सामने किसी भी बहाने की कोई गुंजाइश नहीं होती थी।

घर पहुँचकर मैंने किसी तरह कपड़े बदले और रसोई की तरफ बढ़ गई। रात के खाने का समय हो रहा था और मैं नहीं चाहती थी कि मेरे बेटे को देर से खाना मिले। जैसे ही मैंने दाल चढ़ाने के लिए कुकर उठाया, अचानक मुझे चक्कर सा आया और मैं स्लैब का सहारा लेकर खड़ी हो गई। माथा भट्टी की तरह तप रहा था और जोड़ों में असहनीय दर्द था।

उसी समय रोहन पानी की बोतल लेने रसोई में आया। उसने मेरी हालत देखी, तो तुरंत मेरे हाथ से कुकर ले लिया और मेज पर रख दिया। उसने अपना हाथ मेरे माथे पर रखा।

“माँ! तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है! तुम इस हालत में रसोई में क्या कर रही हो?” रोहन की आवाज़ में चिंता और डाँट दोनों का मिलाजुला भाव था।

“कुछ नहीं है बेटा, बस मौसम बदल रहा है और आज स्कूल में काम थोड़ा ज्यादा था। मैं अभी चाय पीकर एक गोली खा लूँगी, आधे घंटे में बिल्कुल ठीक हो जाऊँगी। तू बैठ, मैं तेरे लिए गरमा-गरम पराठे बनाती हूँ,” मैंने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा।

“बिल्कुल नहीं,” रोहन ने दृढ़ता से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचते हुए हॉल के सोफे पर बैठा दिया। फिर उसने कमरे से एक गर्म शॉल लाकर मेरे कंधों पर डाल दी।

“माँ, आज कोई खाना नहीं बनेगा। मैं बाहर से हम तीनों के लिए सादा और पौष्टिक खाना ऑर्डर कर रहा हूँ। और हाँ, तुम अभी अपने फोन से अपनी प्रिंसिपल मैम को मैसेज करो कि तुम्हारी तबीयत खराब है और तुम कल स्कूल नहीं आ रही हो।”

मैंने घबराकर कहा, “अरे नहीं बेटा, तू समझता नहीं है। कल बुधवार है और कल बैंक में स्कूल की फीस जमा कराने की आखिरी तारीख है। पहले से ही हमारे विभाग में दो लड़कियाँ छुट्टी पर हैं। मिसेज वर्मा बहुत सख्त हैं, वो किसी भी कीमत पर मुझे छुट्टी नहीं देंगी। अगर मैं बिना बताए या जबरदस्ती छुट्टी लूँगी तो वो पूरे महीने का वेतन काट लेंगी और बात-बात पर ताने मारेंगी। मैं चली जाऊँगी, बस आधा दिन निकाल लूँगी।”

रोहन का चेहरा गंभीर हो गया। उसने शांति से मेरा मोबाइल उठाया और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “माँ, सेहत से बढ़कर कोई काम नहीं होता। तुम अभी मैसेज टाइप करो। अगर वो इंसान हैं, तो समझेंगी।”

बेटे के इस अपनत्व भरे दबाव के आगे मैं हार गई। मैंने भारी मन से प्रिंसिपल को एक विनम्र संदेश भेजा कि मुझे तेज बुखार है और मैं कल आने में असमर्थ रहूँगी।

मेरी आशंका बिल्कुल सही निकली। मुश्किल से पाँच मिनट बाद ही फोन की स्क्रीन जली और प्रिंसिपल का संदेश आया। उसमें बेहद रूखे शब्दों में लिखा था: “मालती जी, आपको अच्छी तरह पता है कि कल ऑडिट की तैयारी है और स्टाफ कम है। इस वक्त छुट्टी मिलना नामुमकिन है। आप सुबह समय पर आइए, दोपहर बाद काम खत्म करके जल्दी चली जाइएगा। छुट्टी स्वीकृत नहीं हो सकती।”

मैंने वह मैसेज रोहन को दिखाते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “देखा, मैं कह रही थी न? प्राइवेट नौकरी में कोई किसी की मजबूरी नहीं समझता बेटा। हम जैसे छोटे कर्मचारियों के लिए छुट्टी माँगना भी गुनाह है। कोई बात नहीं, मैं सुबह चली जाऊँगी।”

रोहन ने वह मैसेज पढ़ा। कुछ क्षणों के लिए उसके चेहरे पर गुस्सा उभरा, लेकिन फिर उसने गहरी साँस ली। उसने मेरा फोन वापस मेज पर रखा, मेरे दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में लिया और सीधे मेरी आँखों में देखते हुए कहा:

“माँ, तुम कल स्कूल नहीं जाओगी। और सिर्फ कल ही नहीं, तुम अब कभी उस स्कूल में नहीं जाओगी। तुम कल ही अपना इस्तीफा भेज दो।”

मैं सन्न रह गई। मेरे मुँह से शब्द नहीं निकले।

रोहन ने आगे कहा, “माँ, जब मैं छोटा था, तब तुमने और पापा ने अपनी कितनी इच्छाओं का गला घोंटा ताकि मैं अच्छे स्कूल और कॉलेज में पढ़ सकूँ। तुमने यह नौकरी उस वक्त शुरू की थी जब मेरी कॉलेज की फीस भरनी थी। तुमने आठ साल तक हर मौसम में, हर परिस्थिति में खुद को खपाया है। लेकिन अब मैं आ गया हूँ माँ। भगवान की दया से मेरे पास एक बहुत अच्छी नौकरी है, मेरा वेतन इतना है कि हम तीनों का जीवन बहुत आराम से, बिना किसी तंगी के कट सकता है। पापा की पेंशन है, मेरी कमाई है। अब तुम्हें किसी की डाँट सुनने, अपनी बीमारी में हाथ जोड़ने या किसी के सामने लाचार होने की रत्ती भर भी ज़रूरत नहीं है। अब तुम्हारा आराम करने का समय है। घर हम सँभालेंगे।”

रोहन की एक-एक बात मेरे कानों में अमृत की तरह घुल रही थी। मेरा गला भर आया। एक मध्यमवर्गीय माँ के लिए इससे बड़ा दिन और क्या हो सकता है कि जिस बेटे की उँगली पकड़कर उसने चलना सिखाया था, आज वही बेटा उसका संबल बनकर खड़ा था और कह रहा था कि ‘माँ, अब तू फिक्र मत कर, मैं हूँ न।’

मैंने अपनी आँखें पोंछते हुए उसके गाल पर हाथ फेरा और कहा, “पागल है क्या तू? ऐसे छोटी सी बात पर कोई नौकरी छोड़ता है क्या? इतने सालों से जा रही हूँ, घर पर खाली बैठकर क्या करूँगी? और फिर दो पैसे घर में आते हैं तो अपना ही हाथ खुला रहता है। पर सच कहूँ बेटा… आज मुझे लगा कि मेरा रोहन सचमुच बहुत बड़ा हो गया है। तेरी इस बात ने मेरा आधा बुखार तो वैसे ही उतार दिया।”

सतीश जी, जो कमरे के दरवाजे पर खड़े होकर हम दोनों की बातें सुन रहे थे, मुस्कुराते हुए अंदर आए। उनके चेहरे पर एक असीम संतोष था। रोहन जब बाहर से आया खाना लेने मुख्य द्वार की तरफ गया, तो सतीश जी मेरे पास आकर बैठ गए।

उन्होंने मज़ाकिया लहजे में मेरी तरफ देखते हुए चुटकी ली, “वाह भाई मालती! आज तो तुम्हारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। चेहरे की चमक बता रही है कि बुखार भाग गया। तुम्हारे लाडले ने तो तुम्हें बैठे-बिठाए अमीर बना दिया! अब तो तुम महारानी बनकर घर बैठोगी और हम दोनों बाप-बेटे तुम्हारी सेवा करेंगे।”

उनकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर एक गहरी, आत्मिक मुस्कान फैल गई। मैंने सतीश जी की तरफ देखा और बहुत शांत, भरे हुए स्वर में कहा:

“आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। धनी तो मैं सचमुच हो गई हूँ। पर आज जिस धन की मुझे अनुभूति हो रही है, वह बैंक का बैलेंस या नोटों की गड्डियाँ नहीं हैं। आज धन विचारणीय नहीं है, बल्कि हमारा बेटा विचारों से इतना धनी है—यह विचारणीय है। यह बहुत खास है। आज मुझे महसूस हुआ कि हमने ज़िंदगी भर जो संघर्ष किए, जो त्याग किए, और अपने बेटे को जो संस्कार दिए, आज वे संस्कार सच में धनी हो गए हैं। जब औलाद माता-पिता के श्रम का मोल समझने लगे और उनका सहारा बनने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ले, तो माँ-बाप से बड़ा अमीर इस दुनिया में कोई नहीं होता।”

सतीश जी ने मेरी बात सुनकर धीरे से सिर हिलाया। उनकी आँखों के कोरों में भी नमी तैर गई थी।

थोड़ी देर में रोहन खाना लेकर आ गया। उसने खुद प्लेटें लगाईं, मुझे अपने हाथों से गर्म सूप पिलाया और खिचड़ी खिलाई। उस साधारण सी खिचड़ी का स्वाद किसी अमृत से कम नहीं लग रहा था। खाना खाने के बाद उसने मुझे दवा दी और जबरदस्ती बिस्तर पर लिटाकर मेरे सिर पर हाथ फेरता रहा जब तक कि मुझे नींद नहीं आ गई।

अगली सुबह जब मेरी आँख खुली, तो सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं। बुखार पूरी तरह उतर चुका था और मन में एक अनोखी शांति और स्फूर्ति थी। जब मैं कमरे से बाहर आई, तो देखा कि रोहन ने स्कूल की प्रिंसिपल को मेरी बीमारी का मेडिकल सर्टिफिकेट और औपचारिक अवकाश का एक बेहद गरिमापूर्ण ईमेल अपनी तरफ से भेज दिया था, जिसमें साफ लिखा था कि स्वास्थ्य सुधार होने तक मालती जी उपस्थित नहीं हो सकेंगी।

मैंने नौकरी छोड़ने का फैसला एकदम से तो नहीं लिया, लेकिन अपने काम के घंटों को कम करने और अपनी सेहत को प्राथमिकता देने का मन बना लिया था। पर उससे भी बड़ी बात यह थी कि मेरे भीतर का वह अदृश्य डर हमेशा के लिए खत्म हो गया था जो हर मध्यमवर्गीय इंसान को भविष्य की अनिश्चितताओं से लगता है।

उस दिन मैंने गहराई से जाना कि जीवन में माता-पिता, पति-पत्नी और बच्चों के रिश्ते वास्तव में कितने अनमोल होते हैं। भौतिक संपत्तियाँ, पद और प्रतिष्ठा वक्त के साथ आते-जाते रहते हैं, लेकिन अगर आपके बच्चे संवेदनशील हैं, अपने माता-पिता के दर्द को महसूस कर सकते हैं और उनका सम्मान करना जानते हैं, तो आपका जीवन पूरी तरह सफल है। संस्कारों की यही पूँजी इंसान को असल मायनों में अमीर बनाती है।

क्या आपको भी लगता है कि आज के भौतिकवादी दौर में बच्चों का उच्च शिक्षित और धनी होने से कहीं ज्यादा जरूरी उनका ‘संस्कारों और संवेदनशीलता से धनी’ होना है? क्या आपके घर में भी किसी अपने के ऐसे ही प्यार ने कभी आपका दिल छू लिया है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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