दीवार के उस पार का आँगन

 तन्वी ने उँगली उठाकर उस छह फीट ऊँची ईंटों की दीवार की तरफ इशारा किया, “यह दीवार… यह दीवार सिर्फ पत्थरों की नहीं है। यह आप दोनों के अहम् की वो खूनी लकीर है जिसने नानी की छाती को दबा रखा है। जब एक माँ ने आप दोनों को नौ महीने अपनी कोख में रखा, तब तो उसने अपनी कोख में कोई दीवार नहीं खींची थी कि आधा हिस्सा आलोक का और आधा मयंक का! जब बचपन में एक ही थाली में रोटियाँ कम पड़ जाती थीं, तो नानी खुद भूखी रहकर दोनों को आधा-आधा निवाला खिलाती थीं। तब तो उन्होंने नहीं कहा था कि पंद्रह दिन बड़ा बेटा मेरा है और पंद्रह दिन छोटा!”

गाड़ी से उतरते ही तन्वी ने गहरी साँस ली। भोपाल की उस सर्द शाम में उसके पुराने पुश्तैनी मकान का विशाल लोहे का फाटक हमेशा की तरह खुला तो था, लेकिन उसमें वो पुरानी खनक नदारद थी। मेडिकल कॉलेज के आखिरी इम्तिहान खत्म करके वह पूरे छह महीने बाद घर लौटी थी। हाथ में भारी ट्रॉली बैग संभाले जब वह मुख्य बरामदे से होती हुई सीढ़ियों की तरफ बढ़ी, तो उसे अजीब सी खामोशी ने घेर लिया। वही घर जहाँ कभी बच्चों की किलकारियाँ, बर्तनों की खटपट और रेडियो पर बजते पुराने गीतों की आवाजें गूँजती रहती थीं, आज किसी सूने खंडहर की तरह चुपचाप खड़ा था।

सीढ़ियों की चढ़ाई जैसे-जैसे खत्म हुई और उसने पहली मंजिल के बड़े हॉल में कदम रखा, उसके हाथ से ट्रॉली का हैंडल छूट गया। सामने का नजारा किसी बुरे सपने जैसा था। हॉल के ठीक बीचों-बीच, फर्श की सफेद संगमरमर की टाइलों को बेरहमी से तराश कर लाल ईंटों और सीमेंट की छह फीट ऊँची एक ताजी, खुरदरी दीवार खड़ी कर दी गई थी। दीवार इतनी क्रूर थी कि उसने छत पर लगे झूमर को भी दो हिस्सों में बाँट दिया था। एक तरफ आधा झूमर लटक रहा था, तो दूसरी तरफ बाकी का आधा।

और उस ठंडी, बदरंग दीवार के ठीक नीचे, कोने में एक पतली सी लकड़ी की चारपाई बिछी हुई थी। चारपाई पर सफेद सूती चादर ओढ़े एक बेहद कमजोर और काँपती हुई देह सिमटी पड़ी थी। वह उसकी नानी, कल्याणी देवी थीं। वही नानी जो पूरे कुनबे की धुरी हुआ करती थीं, आज उस अंधी दीवार की छाँव में लावारिस सामान की तरह पड़ी थीं।

तन्वी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका गला सूख गया। वह बदहवास सी अपनी माँ को पुकारने ही वाली थी कि तभी चारपाई से एक बेहद कमजोर, थरथराती हुई जानी-पहचानी आवाज उभरी, “आ गई मेरी बिटिया रानी… मेरे प्रभु ने सुन ली। अब मैं चैन से अपनी आँखें मूँद सकूँगी…”

तन्वी दौड़कर चारपाई के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने नानी के सूखे, ठंडे हाथों को अपने हथेलियों में थाम लिया। नानी की आँखों से आँसुओं की दो पतली लकीरें बहकर उनके गालों की झुर्रियों में समा रही थीं।

“नानी! ये… ये सब क्या है? ये दीवार बीच हॉल में किसने खड़ी कर दी? और आपका कमरा… आपका सुंदर कमरा कहाँ गया? आप यहाँ बरामदे जैसी जगह में क्यों लेटी हैं?” तन्वी के शब्द सिसकियों में बदल रहे थे।

नानी ने बस फीकी सी मुस्कान के साथ अपना काँपता हुआ हाथ तन्वी के सिर पर रख दिया और शून्य में ताकने लगीं।

तभी बाईं तरफ के दरवाजे से उसकी माँ, सुमित्रा, एक कटोरी में दलिया लिए बाहर निकलीं। माँ का चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे काले घेरे थे। तन्वी को देखते ही उनके हाथ काँप गए।

“तन्वी, तू आ गई…” सुमित्रा की आवाज में अपराधबोध साफ झलक रहा था।

“माँ, मुझे कोई बताएगा कि इस घर में चल क्या रहा है? यह दीवार कैसी है? मामा कहाँ हैं? और छोटे मामा कहाँ हैं?” तन्वी लगभग चीख पड़ी।

सुमित्रा ने नजरें झुका लीं और सिसकते हुए दीवार की तरफ इशारा किया। उस दीवार ने सिर्फ घर को नहीं, बल्कि दो सगे भाइयों—बड़े मामा आलोक और छोटे मामा मयंक—के रिश्ते को भी चीर दिया था।

पिछले कुछ महीनों में जायदाद, पुश्तैनी दुकान और पुरानी रंजिशों ने ऐसा विकराल रूप लिया कि बात हाथापाई और थाने तक पहुँच गई थी। दोनों भाइयों ने आपस में बोलना बंद कर दिया। फिर एक दिन आपसी सहमति से तय हुआ कि पुश्तैनी मकान का बँटवारा होगा। दोनों ने अपने-अपने हिस्से पर ताले जड़ने की ठान ली और बीच हॉल में यह दीवार खड़ी करवा दी।

लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी नानी थीं। दोनों भाइयों के अपने-अपने तर्क थे। आलोक का कहना था कि नानी की सेवा का जिम्मा छोटे का है क्योंकि दुकान का ज्यादा मुनाफा उसे मिला है, जबकि मयंक का दावा था कि बड़ा बेटा होने के नाते माँ की जिम्मेदारी आलोक की है। बहस इतनी गिरी कि दोनों ने नानी को अपने-अपने कमरों से बाहर निकाल दिया। अंततः पंचों और पड़ोसियों के कहने पर तय हुआ कि नानी का बिस्तर ठीक बीच की इस साझा दीवार के पास रहेगा—पंद्रह दिन बड़े बेटे के हिस्से से खाना आएगा और पंद्रह दिन छोटे बेटे के हिस्से से।

यह सुनकर तन्वी के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस माँ ने अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ, अपनी देह का कतरा-कतरा निचोड़कर दोनों बेटों को काबिल बनाया, आज वही माँ एक बँटवारे की दीवार के साए में ‘साझा संपत्ति’ बनकर पड़ी थी।

उस रात घर में सन्नाटा था, लेकिन तन्वी की आँखों में नींद नहीं थी। वह हॉल में नानी की चारपाई के पास जमीन पर चादर बिछाकर बैठ गई। आधी रात को दीवार के उस पार से बर्तनों के टकराने की आवाज आई। छोटे मामा मयंक पानी पीने उठे थे। नानी को अचानक तेज खाँसी का दौरा पड़ा। उनका सीना धौंकनी की तरह चलने लगा।

तन्वी तुरंत उठी, नानी की पीठ सहलाई और उन्हें पानी पिलाया। दीवार के उस पार मयंक के कदमों की आहट रुक गई थी। तन्वी ने महसूस किया कि दीवार के उस पार कोई खड़ा है, साँस रोके सुन रहा है। लेकिन उस बदकिस्मत दीवार ने मयंक के कदमों को रोक रखा था। ठीक उसी समय सामने वाले कमरे का दरवाजा खुला और बड़े मामा आलोक भी दबे पाँव बाहर निकले। उन्होंने तन्वी को नानी को संभालते देखा। उनके चेहरे पर छटपटाहट थी, लेकिन झूठे अहम् की जंजीरों ने उनके हाथ बाँध रखे थे। आलोक ने अपनी जेब से एक दवा की शीशी निकाली, चुपचाप मेज पर रखी और बिना एक शब्द बोले वापस कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

तन्वी ने दोनों भाइयों की इस बेबसी और उस पर हावी खोखले अहंकार को बहुत करीब से देखा। उसने भाँप लिया कि नफरत सिर्फ ऊपरी है, दोनों के भीतर कहीं न कहीं गिल्ट और दर्द सुलग रहा है, बस उस दर्द पर अहंकार की एक मोटी परत चढ़ी हुई है।

अगले दिन सुबह तन्वी उठी तो उसका संकल्प दृढ़ था। वह केवल एक डॉक्टर बनने की पढ़ाई नहीं कर रही थी, उसने इंसानी नब्ज को पहचानना भी सीखा था। उसने नानी के हाथ अपने हाथ में लिए और धीरे से कहा, “नानी, आप बस मेरा साथ दीजिए। हमें इस घर को उसका खोया हुआ सुकून वापस लौटाना है।”

दोपहर के समय, जब दोनों मामा अपने-अपने हिस्से में मौजूद थे और दोनों मामियाँ भी अपने-अपने कमरों में थीं, तन्वी ने जानबूझकर जोर से चीख लगाई, “माँ! माँ जल्दी आओ! नानी को क्या हो गया! नानी आँखें नहीं खोल रहीं!”

तन्वी की आवाज में ऐसी दहशत थी कि दोनों तरफ के दरवाजे एक साथ झटके से खुले। बड़े मामा आलोक नंगे पाँव दौड़े और दूसरी तरफ से छोटे मामा मयंक दीवार के किनारे से भागते हुए हॉल के बीच पहुँचे। दोनों के चेहरे सफेद पड़ चुके थे।

नानी ने आँखें मूँद रखी थीं और उनकी साँसें बहुत धीमी चल रही थीं। तन्वी ने नानी की कलाई पकड़ रखी थी और उसकी आँखों से सचमुच आँसू बह रहे थे।

“क्या हुआ मेरी माँ को? तन्वी, बोल क्या हुआ?” आलोक बदहवास होकर चारपाई के पास गिर पड़े।

“अरे कोई डॉक्टर को बुलाओ! भैया, गाड़ी निकालो, हम माँ को अस्पताल ले चलते हैं!” मयंक ने घबराकर बड़े भाई के कंधे पर हाथ रख दिया। महीनों बाद मयंक के मुँह से ‘भैया’ निकला था।

लेकिन आलोक ने कोई ऐतराज नहीं किया। उन्होंने तड़पकर माँ का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया, “माँ! आँखें खोलो माँ! देखो तुम्हारा आलोक आया है!”

तन्वी वहीं खड़ी रही। उसने दोनों भाइयों को देखा और शांत, पर बेहद सख्त आवाज में कहा, “अस्पताल ले जाने से कुछ नहीं होगा मामा। नानी को कोई शारीरिक बीमारी नहीं है। उनके दिल की धड़कनें सिर्फ इसलिए थम रही हैं क्योंकि उनका दम घुट रहा है।”

दोनों भाइयों ने चौंककर तन्वी की तरफ देखा।

तन्वी ने उँगली उठाकर उस छह फीट ऊँची ईंटों की दीवार की तरफ इशारा किया, “यह दीवार… यह दीवार सिर्फ पत्थरों की नहीं है। यह आप दोनों के अहम् की वो खूनी लकीर है जिसने नानी की छाती को दबा रखा है। जब एक माँ ने आप दोनों को नौ महीने अपनी कोख में रखा, तब तो उसने अपनी कोख में कोई दीवार नहीं खींची थी कि आधा हिस्सा आलोक का और आधा मयंक का! जब बचपन में एक ही थाली में रोटियाँ कम पड़ जाती थीं, तो नानी खुद भूखी रहकर दोनों को आधा-आधा निवाला खिलाती थीं। तब तो उन्होंने नहीं कहा था कि पंद्रह दिन बड़ा बेटा मेरा है और पंद्रह दिन छोटा!”

हॉल में पिन-ड्रॉप साइलेंस था। दोनों मामियाँ भी चौखट पर आकर खड़ी हो गई थीं और उनके सिर शर्म से झुक गए थे।

तन्वी की आँखों से अंगारे बरस रहे थे, “आप दोनों बाहर समाज में बड़े सेठ बनते हैं, प्रतिष्ठा की बातें करते हैं, लेकिन असलियत यह है कि आप दोनों इतने कंगाल हो चुके हैं कि अपनी जन्म देने वाली माँ के लिए आपके दिलों में छह फीट की जगह नहीं बची! नानी ने मुझसे कल कहा कि ‘अच्छा हुआ तू आ गई, अब मैं शांति से मर सकूँगी।’ सोचिए, जिस माँ को अपने भरे-पूरे परिवार को देखकर गर्व से जीना चाहिए था, वह अपनी औलादों के इस बँटवारे से तंग आकर मौत की भीख माँग रही है!”

तन्वी के एक-एक शब्द हथौड़े की तरह दोनों भाइयों के सीने पर लग रहे थे।

मयंक फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने जमीन पर घुटने टेक दिए और आलोक के पैर पकड़ लिए, “भैया… मुझे माफ कर दो भैया! मैं लालच में अंधा हो गया था। मुझे दुकान नहीं चाहिए, मुझे जमीन नहीं चाहिए। मुझे बस मेरी माँ और मेरा भाई वापस दे दो!”

आलोक की आँखों से भी आँसुओं का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने झुककर छोटे भाई को गले से लगा लिया, “नहीं मयंक, गलती मेरी थी। मैं बड़ा था, मुझे समझदारी दिखानी चाहिए थी। मैंने अपने छोटे भाई का हक मारने की कोशिश की, मैंने माँ को सड़क पर ला खड़ा किया… मैं पापी हूँ!”

दोनों भाई एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगे। महीनों की जमी हुई कड़वाहट और अहंकार उस रोने में बह गया।

तभी चारपाई से एक कमजोर हाथ उठा। नानी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में अब दर्द नहीं, बल्कि ममता का समंदर उमड़ रहा था। उन्होंने दोनों बेटों के सिर पर अपने हाथ रख दिए।

“मेरे बच्चों…” नानी की आवाज सुनकर आलोक और मयंक ने सिर उठाया।

“माँ!” दोनों ने एक साथ माँ के सीने से अपना सिर सटा दिया।

तन्वी कोने में जाकर चुपचाप खड़ी हो गई। उसने माँ सुमित्रा की तरफ देखा, जिनकी आँखों में राहत और कृतज्ञता के आँसू थे।

उसी शाम, घर में कोई राजमिस्त्री नहीं बुलाया गया। बड़े मामा आलोक ने स्टोर रूम से लोहे का बड़ा घन निकाला और छोटे मामा मयंक ने हथौड़ा उठाया। दोनों भाइयों ने मिलकर उस मनहूस दीवार पर पहला वार किया।

धड़ाम की आवाज के साथ जब पहली ईंट गिरी, तो लगा जैसे घर की बरसों पुरानी घुटन बाहर निकल गई हो। दोनों भाइयों ने अपने हाथों से, पसीने से तरबतर होकर, एक-एक ईंट को उखाड़ फेंका। दोनों मामियों ने मिलकर मलबा साफ किया। जहाँ कुछ घंटे पहले एक बदरंग दीवार खड़ी थी, वहाँ अब खुला, रोशन और हवादार हॉल मुस्कुरा रहा था।

नानी की चारपाई को वापस उनके पुराने, बड़े कमरे में पहुँचाया गया। खिड़की से आती शाम की ताजी हवा में नानी के चेहरे पर एक अलौकिक तेज था।

उस रात बहुत दिनों बाद पुश्तैनी मकान की रसोई में एक साथ चूल्हा जला। एक ही जाजम पर पूरा परिवार बैठा। आलोक ने अपने हाथों से पहला निवाला मयंक को खिलाया और मयंक ने माँ को।

तन्वी बरामदे में खड़ी इस दृश्य को देख रही थी। उसने महसूस किया कि रिश्ते कभी जायदाद या ईंट-पत्थरों से नहीं बँधते, वे तो सिर्फ त्याग, समझदारी और संवाद की डोर से सँवरते हैं। अगर कोई एक इंसान सच का आईना दिखाने की हिम्मत कर ले, तो बरसों पुरानी नफरत की दीवारें भी मिनटों में ढह जाती हैं। घर वही सच्चा होता है जहाँ दीवारों से ज्यादा दिलों की जगह बड़ी हो।

क्या आपके आस-पास भी कभी किसी बुजुर्ग को औलादों के बँटवारे का दर्द सहना पड़ा है? क्या आपको लगता है कि तन्वी की तरह आज हर परिवार को रिश्तों की नब्ज टटोलने वाले की जरूरत है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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