निश्छल प्रेम

रोहन के इन शब्दों में इतनी सच्चाई और दृढ़ता थी कि सुनयना की आंखों में खुशी और अविश्वास के आंसू छलक आए। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शहर का इतना पढ़ा-लिखा और अमीर लड़का उसे इस कदर मान देगा। वह बिना कुछ कहे रोहन के सामने हाथ जोड़कर वहां से चली गई, लेकिन इस बार उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य का सपना था।

रोहन ने भी अपने प्रेम को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा। उसी शाम उसने हिम्मत करके अपने पिता श्रीकांत जी और दादी के सामने सुनयना से विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया।

महानगर की भागदौड़ और धुएं से भरी जिंदगी से दूर, जब रोहन की गाड़ी ने अपने पैतृक गांव ‘चंदनपुर’ की सीमा में प्रवेश किया, तो उसे लगा जैसे उसने किसी दूसरी ही दुनिया में कदम रख दिया हो। खिड़की से आती ठंडी और ताजी हवा ने उसके चेहरे को छुआ, तो पिछले कई महीनों की कॉर्पोरेट नौकरी की सारी थकान जैसे पल भर में छूमंतर हो गई। रोहन एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और पुणे में रहता था। उसके पिता, श्रीकांत जी, सालों पहले गांव छोड़कर पुणे में ही बस गए थे। गांव में अब केवल रोहन के दादा-दादी रहते थे। उम्र के इस पड़ाव पर वे अपनी पुश्तैनी जमीन और घर का मोह नहीं छोड़ पाए थे।

इस बार पूरे परिवार के गांव आने का एक विशेष कारण था। रोहन की दादी ने मन्नत मानी थी कि यदि रोहन को उसकी मनचाही कंपनी में नौकरी मिल गई और उसका करियर सेट हो गया, तो वे गांव के प्राचीन शिव मंदिर में सात दिन का ‘अखंड रामायण पाठ’ और एक बड़ा भंडारा करवाएंगी। रोहन की सफलता के बाद दादी की उसी मन्नत को पूरा करने के लिए आज पूरा परिवार चंदनपुर में उपस्थित था। पुश्तैनी हवेली के बड़े से आंगन में कदम रखते ही रोहन को जो सुकून मिला, वह उसे पुणे के वातानुकूलित आलीशान फ्लैट में भी कभी नसीब नहीं हुआ था। मिट्टी की सोंधी महक, दालान में बंधी गाय के रंभाने की आवाज और दादी के गले लगने का वह अनूठा अहसास—सब कुछ कितना जीवंत और अपना सा था।

अगली सुबह रोहन की नींद बहुत जल्दी खुल गई। पुणे में जो रोहन सुबह आठ बजे से पहले कभी बिस्तर नहीं छोड़ता था, वह आज भोर की पहली किरण के साथ ही उठ बैठा था। पक्षियों की चहचहाहट और मंदिर से आती घंटियों की मधुर ध्वनि ने उसे बिस्तर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। वह बिना किसी को जगाए घर से बाहर टहलने के लिए निकल पड़ा। पक्की सड़कों से होता हुआ वह गांव की उन कच्ची पगडंडियों पर आ गया, जहां दोनों तरफ सरसों के लहलहाते खेत थे। चलते-चलते वह गांव के उस छोर पर पहुंच गया जहां एक पुरानी, साफ पानी की झील थी और उसके किनारे पारिजात (हरसिंगार) और कदम के घने पेड़ लगे हुए थे। यह जगह बेहद शांत और एकांत थी।

रोहन झील के किनारे बैठकर उगते हुए सूरज की लालिमा को निहार ही रहा था कि तभी उसे पत्तों की सरसराहट और किसी के पायल की हल्की रुनझुन सुनाई दी। उसने मुड़कर देखा, तो पेड़ों के झुरमुट के पास एक दृश्य ने उसकी आंखों को वहीं बांध लिया। एक बेहद साधारण लेकिन सुंदर सी लड़की, जिसने हल्के गुलाबी रंग का सूती सूट पहना था और बालों की एक लंबी चोटी गूंथ रखी थी, पारिजात के फूलों को तोड़ने का प्रयास कर रही थी। फूल काफी ऊंचाई पर थे, इसलिए वह बार-बार पंजों के बल खड़ी होकर उछलती, लेकिन उसकी उंगलियां बस टहनी को छूकर रह जातीं।

वह लड़की इतनी तन्मयता से फूलों को पाने की कोशिश कर रही थी कि उसे इस बात का बिल्कुल भी भान नहीं था कि कोई उसे देख रहा है। उसके चेहरे पर कोई बनावट नहीं थी, बस एक निश्छल, भोलापन और सादगी थी जो महानगरों की सजी-संवरी लड़कियों में कहीं खो सी गई थी। रोहन कुछ पल तक तो अपनी सुध-बुध खोकर बस उसे ही देखता रह गया। जब कई बार उछलने के बाद भी वह लड़की सफल नहीं हुई और हांफते हुए अपनी कमर पर हाथ रखकर निराशा से पेड़ को देखने लगी, तो रोहन से रहा नहीं गया। वह अनजाने ही मुस्कुरा उठा और धीमे कदमों से चलकर उसके पीछे जा पहुंचा।

बिना कुछ कहे, रोहन ने अपना लंबा हाथ बढ़ाया और पारिजात की उस फूलों से लदी टहनी को नीचे की तरफ झुका दिया। अचानक हुए इस हस्तक्षेप से वह लड़की बुरी तरह चौंक गई। उसने घबराकर पीछे मुड़कर देखा। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में एक पल के लिए डर और संकोच तैर गया। लेकिन टहनी को नीचे झुका देखकर और फूलों की महक से वह खुद को रोक नहीं पाई। उसने जल्दी-जल्दी अपनी अंजलि में ढेर सारे पारिजात के फूल भर लिए।

रोहन ने बड़ी ही सौम्यता से मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या नाम है तुम्हारा? वैसे इन पारिजात के फूलों से ज्यादा सादगी और ताजगी तो तुम्हारे चेहरे पर है।”

रोहन की यह बात सुनकर लड़की का गोरा चेहरा लाज से बिल्कुल लाल हो गया। उसने अपनी नजरें झुका लीं और बिना कोई जवाब दिए वहां से जाने के लिए तेजी से मुड़ी। उसकी इस झिझक पर रोहन का दिल और भी ज्यादा मचल गया। उसने पीछे से आवाज दी, “कल फिर आओगी न फूल लेने? मैं इंतजार करूंगा… और हां, तुमने मुझे धन्यवाद भी नहीं कहा! मैं अभी कुछ दिन यहीं हूं गांव में…”

लड़की ने मुड़कर कुछ नहीं कहा, बस उसकी चाल थोड़ी और तेज हो गई। तभी दूर से किसी महिला की आवाज आई, “अरी ओ सुनयना! कहां रह गई तू? पूजा का समय हो रहा है।”

“आई काकी…” अपनी सुरीली आवाज में जवाब देती हुई सुनयना वहां से हिरणी की तरह भाग निकली। रोहन वहीं खड़ा काफी देर तक उस पगडंडी को देखता रहा जहां से वह गई थी। ‘सुनयना’—यह नाम उसके कानों में किसी मधुर संगीत की तरह गूंज रहा था।

उस दिन हवेली वापस लौटने के बाद रोहन का मन किसी भी काम में नहीं लगा। घर में रामायण पाठ की तैयारियां चल रही थीं, रिश्तेदार आ-जा रहे थे, लेकिन रोहन की आंखें बस शून्यता में कुछ तलाश रही थीं। उसका पूरा दिन ख्यालों में ही बीता। रात को जब वह बिस्तर पर लेटा, तो उसे नींद नहीं आ रही थी। बार-बार उसकी बंद आंखों के सामने सुनयना का वह भोला चेहरा, उसकी झुकी हुई नजरें और वह गुलाबी सूट घूम जाता। शहर की चकाचौंध, महंगी गाड़ियां, क्लब और कैफे—सब कुछ उसे अब बेमानी लग रहा था। वह बस बेसब्री से सुबह होने का इंतजार कर रहा था।

अगली भोर होते ही वह फिर उसी पारिजात के पेड़ के पास जा पहुंचा। वहां हल्की धुंध थी। रोहन ने काफी देर तक इंतजार किया। हर आहट पर उसका दिल धड़क उठता, लेकिन आज सुनयना नहीं आई। काफी देर बाद जब धूप तेज होने लगी, तो वह उदास मन से घर लौट आया। उस दिन उसने ठीक से नाश्ता भी नहीं किया। दादी ने पूछा भी कि क्या बात है, चेहरा क्यों उतरा हुआ है, तो उसने सिर दर्द का बहाना बना दिया। पूरा दिन वह एक अजीब सी बेचैनी में रहा।

तीसरे दिन की सुबह भी रोहन बिना किसी उम्मीद के उसी जगह पहुंच गया। वह झील के किनारे उदास बैठा पानी में पत्थर उछाल रहा था। तभी उसे पीछे से सूखी पत्तियों पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। उसने झटके से मुड़कर देखा। सुनयना वहीं खड़ी थी। आज उसने पीले रंग का सूट पहना था और वह अपने दुपट्टे का सिरा उंगलियों में लपेटे, नजरें झुकाए खड़ी थी। रोहन को लगा जैसे उसके शरीर में प्राण वापस आ गए हों। वह तुरंत उठा और बिना कुछ कहे आगे बढ़कर उसने फिर से उसी टहनी को नीचे झुका दिया।

सुनयना आज भी खामोश थी। वह फूल तोड़ रही थी, लेकिन रोहन देख सकता था कि उसके हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे। यह घबराहट केवल डर की नहीं थी, बल्कि उसके मन में चल रही उथल-पुथल की भी थी।

रोहन ने धीमी और गहरी आवाज में पूछा, “कल क्यों नहीं आई? तुम्हें पता है मैंने कितनी देर इंतजार किया?”

सुनयना ने बिना नजरें उठाए, बहुत ही धीमी आवाज में जवाब दिया, “मुझे… मुझे शर्म आ रही थी। और गांव में कोई देख लेता तो क्या सोचता।”

उसकी इस मासूमियत और बेबाक सच पर रोहन मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। उसने कहा, “तुम बहुत अच्छी हो सुनयना। बिल्कुल इस गांव की मिट्टी की तरह पवित्र। अब तुम बताओ, मैं तुम्हें कैसा लगता हूं?”

यह सुनकर सुनयना के कदमों के पास की मिट्टी जैसे खिसकने लगी। वह मौन रही और अपने पांव के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी। रोहन ने फिर मनुहार करते हुए कहा, “अच्छा, अगर बोलने में शर्म आ रही है, तो बस सिर हिलाकर बता दो। क्या मैं तुम्हें अच्छा लगता हूं?”

कुछ पलों की गहरी शांति के बाद, सुनयना ने धीरे से ‘हां’ में अपना सिर हिलाया और अपने दुपट्टे से चेहरा छुपाते हुए वहां से भाग गई। रोहन को ऐसा लगा जैसे उसे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गई हो। घर लौटते हुए उसके कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

अगले कुछ दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। रामायण पाठ के दौरान भी कई बार सुनयना अपनी काकी के साथ हवेली आई। भीड़ में भी रोहन और सुनयना की आंखें एक-दूसरे को ढूंढ़ ही लेतीं। रोहन को बातों ही बातों में पता चला कि सुनयना गांव के ही एक सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है और गरीब महिलाओं को सिलाई सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का काम करती है। यह जानकर रोहन के मन में सुनयना के लिए प्रेम के साथ-साथ एक गहरा सम्मान भी पैदा हो गया। वह केवल एक सुंदर चेहरा नहीं थी, बल्कि एक मजबूत और नेक विचारों वाली लड़की थी।

पाठ के आखिरी दिन, जब भंडारे की तैयारी चल रही थी, रोहन ने सुनयना को हवेली के पिछले हिस्से में तुलसी के चौरे के पास अकेला पाया। वह वहां दीये जलाने आई थी। रोहन उसके पास गया और अपनी भावनाओं पर काबू न रख पाते हुए, उसने बहुत ही शालीनता से सुनयना का हाथ थाम लिया।

हाथ थामते ही सुनयना सिहर उठी। गांव की मर्यादा और समाज का डर उसकी आंखों में साफ झलक रहा था। उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, “बाबूजी, कोई देख लेगा। हम गांव की लड़कियां हैं, हमारे लिए यह सब…”

रोहन ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए उसके हाथों को अपनी हथेलियों के बीच बड़ी कोमलता से रख लिया और कहा, “डरो मत सुनयना। मैं महानगर का वह लड़का नहीं हूं जो चंद दिनों के शौक के लिए किसी की भावनाओं से खेले। मुझे अच्छी तरह पता है कि एक स्त्री का सम्मान क्या होता है। मेरा प्रेम तुम्हारे लिए उतना ही पवित्र है जितना यह तुलसी का पौधा। मैं तुमसे छुपकर कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता। मैं तुम्हें पूरे सम्मान के साथ, अपने माता-पिता की रजामंदी से ब्याह कर अपने घर ले जाना चाहता हूं।”

रोहन के इन शब्दों में इतनी सच्चाई और दृढ़ता थी कि सुनयना की आंखों में खुशी और अविश्वास के आंसू छलक आए। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शहर का इतना पढ़ा-लिखा और अमीर लड़का उसे इस कदर मान देगा। वह बिना कुछ कहे रोहन के सामने हाथ जोड़कर वहां से चली गई, लेकिन इस बार उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य का सपना था।

रोहन ने भी अपने प्रेम को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा। उसी शाम उसने हिम्मत करके अपने पिता श्रीकांत जी और दादी के सामने सुनयना से विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया। शुरुआत में श्रीकांत जी थोड़े हैरान हुए कि उनका बेटा एक गांव की साधारण लड़की को चुन रहा है, लेकिन दादी सुनयना को बहुत अच्छे से जानती थीं। दादी ने कहा, “बेटा, सुनयना के संस्कार और उसका चरित्र सोने की तरह खरा है। आज के जमाने में ऐसी गुणी लड़की किस्मत वालों को मिलती है।”

पिता जी ने भी रोहन की आंखों में सुनयना के लिए सच्चा प्रेम और सम्मान देखा। वे समझ गए कि रोहन ने केवल रूप नहीं, बल्कि एक आत्मा से प्रेम किया है। अगले ही दिन रोहन का परिवार सुनयना के घर रिश्ते का प्रस्ताव लेकर पहुंच गया। सुनयना के माता-पिता की आंखों में खुशी के आंसू थे।

कुछ महीनों बाद, पुणे के उस बड़े से फ्लैट में सुनयना ने कदम रखा, तो उसने केवल उस घर को ही नहीं, बल्कि अपने संस्कारों और सादगी से रोहन की पूरी दुनिया को महका दिया। रोहन ने साबित कर दिया कि प्रेम जब निश्छल हो और उसमें सम्मान का भाव हो, तो वह शहरों की दूरी और गांव की पगडंडियों के हर फासले को मिटाकर दो दिलों को हमेशा के लिए एक कर देता है।

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मूल लेखिका : निभा राजीव “निर्वी”

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