सावित्री के सीने पर जो पत्थर कई महीनों से रखा हुआ था, वह एकाएक पिघलकर आंसुओं के रास्ते बह निकला। वे जो आंसू बरसों से उनकी पलकों के पीछे कैद थे, वे आज पूरी शिद्दत से बह रहे थे। पर ये दुख के आंसू नहीं थे, ये मुक्ति, प्रेम और पुनर्जन्म के आंसू थे। उन्हें समझ में आया कि बच्चे स्वार्थी नहीं हुए थे, बल्कि वे भी उसी आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ के शिकार थे जिसमें इंसान अक्सर सबसे जरूरी चीजों को नजरअंदाज कर बैठता है। कभी-कभी अपनों को यह याद दिलाना पड़ता है कि हमें उनकी जरूरत है, और कभी-कभी जिंदगी ऐसे झटके देकर रिश्तों पर जमी धूल को साफ कर देती है।
सफेद दीवारों, नीले पर्दों और दवाइयों की तीखी गंध से भरे जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के वार्ड नंबर तीन के बिस्तर पर लेटी सावित्री को लगा कि जैसे वर्षों से अनवरत दौड़ रही रेलगाड़ी आखिरकार अपने अंतिम स्टेशन पर आकर ठहर गई है। सीलिंग फैन की धीमी, एकरस घरघराहट के बीच उसने छत के एक कोने पर अपनी नजरें टिका रखी थीं। मन ही मन वह एक अजीब सी राहत और शांति महसूस कर रही थी। उसने आंखों की कोरों को हल्का सा भींचते हुए विधाता के प्रति कृतज्ञता जताई कि अब शायद यह अंतहीन सफर समाप्त होने वाला है। इस बिस्तर पर पड़े-पड़े ही जीवन के बचे-खुचे दिन चुपचाप कट जाएंगे और उसके भीतर हर पल मची रहने वाली चीख-पुकार, असुरक्षा और उस वीराने का भी हमेशा के लिए अंत हो जाएगा, जिसे उसने समाज और रिश्तेदारों की नजरों से छिपाने के लिए चेहरे पर झूठी मुस्कान का नकाब ओढ़ रखा था।
लेकिन कुछ ही पलों बाद जब डॉक्टर माथुर ने अपनी फाइल बंद करते हुए मुस्कुराकर कहा, “सावित्री जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। टेस्ट की सारी रिपोर्ट्स नॉर्मल हैं। कोई गंभीर या जानलेवा बीमारी नहीं है। बस सही समय पर खाना न खाने, अत्यधिक कमजोरी और अकेलेपन की चिंता के कारण आपका शरीर जवाब दे गया है। घर जाकर अगर आप थोड़ा खुशगवार माहौल रखेंगी, हल्का-फुल्का टहलेंगी और नियमित रूप से पौष्टिक भोजन लेंगी, तो आप पहले की तरह एकदम स्वस्थ और तरोताजा हो जाएंगी।”
यह सुनते ही कमरे में मौजूद लोगों के चेहरों पर सुकून की लहर दौड़ गई, पर सावित्री के भीतर जैसे एक भारी चट्टान आ गिरी। तो वह ठीक हो सकती हैं? उन्हें कोई असाध्य रोग नहीं है? वह जीवित रहेंगी? यह खबर सुनकर उन्हें प्रसन्न होना चाहिए था, पर जाने क्यों मन के किसी कोने से खुशी की कोई किरण नहीं फूटी। और वे यह भी कैसे कहें कि इस जीवन-दान ने उनके सामने एक बहुत बड़ा और असहज सवालिया निशान खड़ा कर दिया था। अब क्या होगा? वे कहां जाएंगी? अस्पताल के कमरे में उनके इर्द-गिर्द खड़े डॉक्टर और नर्सें तो अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे थे, लेकिन जिनकी आंखें वे अपने चेहरे पर प्यार और अपनत्व से टिकते देखना चाहती थीं, उनके पति गिरधर तो सात साल पहले ही इस नश्वर संसार को अलविदा कहकर जा चुके थे।
सावित्री ने घबराकर अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं। लेकिन पलकें मूंद लेने से भी जेहन में तैरती यादों का सिलसिला कहां थमता है? बंद आंखों के परदे पर बरसों पुरानी स्मृतियां चलचित्र की भांति सजीव हो उठीं। बेटी रोहिणी के विवाह का वह दिन याद आ गया। घर में शहनाई के सुर गूंज रहे थे, रिश्तेदार नाच-गा रहे थे, पर सावित्री अंदर ही अंदर एक ऐसे अथाह सागर में डूबती जा रही थी जिसकी कोई थाह नहीं थी। विदाई के समय सब रो रहे थे, पर सावित्री की आंखों से एक बूंद आंसू नहीं टपका। लोग कह रहे थे कि मां कितनी मजबूत है, पर कोई यह कैसे समझता कि अंदर से पूरी तरह खाली हो चुकी काया कभी रो भी सकती है?
फिर उनका बेटा मयंक, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुनहरे भविष्य की तलाश में कनाडा चला गया था। वहीं नौकरी करते हुए उसने अपनी पसंद की लड़की से ब्याह रचा लिया और वहीं की सुख-सुविधाओं भरी जिंदगी में रम गया। ऐसा नहीं था कि सावित्री अपने बेटे के पास विदेश नहीं गई थीं। वह दो बार टोरंटो गई थीं। वह कांच की ऊंची इमारतों, सन्नाटे से भरी चौड़ी सड़कों और हीटर की बनावटी गर्माहट वाले उस देश के खट्टे-मीठे अनुभवों को आज भी नहीं भूली थीं। जब तक उनकी हड्डियों में जान थी, वे घर का सारा काम संभाल लेती थीं, बच्चों को बहला लेती थीं और पार्क तक टहल आती थीं। लेकिन अब? अब जब जोड़ों का दर्द बढ़ गया था, आंखों की रोशनी मद्धम पड़ने लगी थी और देह की ऊर्जा चुकती जा रही थी, तब से वे बेटे के हर बार टिकट भेजने के प्रस्ताव को किसी न किसी बहाने आगे टालती आ रही थीं। वे पराए देश के उस बंद अपार्टमेंट में किसी बोझ की तरह बैठकर अपने दिन नहीं बिताना चाहती थीं।
सावित्री ने अपने जीवन की अंतिम बची पूंजी और पति की पेंशन के सहारे खुद को खड़े रखने की बहुत कोशिश की थी। गिरधर के जाने के बाद वे उस बड़े से पैतृक मकान में बिल्कुल अकेली रह गई थीं। बेटी रोहिणी की शादी के बाद शुरुआती तीन-चार वर्षों तक वे अपने मन को यही तसल्ली देती रहीं कि अब वही उसका असली संसार है, एक मां को अपनी बेटी के जीवन में बेवजह दखल नहीं देना चाहिए। वे दूर बैठकर निरपेक्ष भाव से देखती रहीं कि कैसे रोहिणी ने अपनी नौकरी, बच्चों की परवरिश, ससुराल के तौर-तरीकों और पति के मिजाज के बीच एक परिपक्व तालमेल बिठा लिया है। लेकिन धीरे-धीरे वक्त के साथ वे यह भी भांप गईं कि अब बेटी के व्यस्त और सुनियोजित जीवन में ‘मां’ के लिए कोई खाली कोना नहीं बचा था। मां अब केवल हालचाल पूछने वाले फोन कॉल्स और तीज-त्योहारों पर भेजे जाने वाले औपचारिक उपहारों तक सीमित हो चुकी थी।
सावित्री ने करवट बदलकर देखा, रोहिणी वार्ड के दरवाजे के पास खड़ी होकर अपने पति से फोन पर बच्चों के स्कूल प्रोजेक्ट और ऑफिस की छुट्टी को लेकर दबी जुबान में बहस कर रही थी। सावित्री ने चुपचाप अपनी नजरें फेर लीं। क्या इसी का नाम परिवार है? क्या रिश्ते केवल एक-दूसरे की व्यवस्थाओं को दूर से देखते रहने और चुपचाप अपना दर्द निगल जाने का नाम हैं? सावित्री के सीने के भीतर एक तीखी, चीत्कार करती आवाज बार-बार टकरा रही थी, लेकिन उनके सूखे होंठ आपस में सिले हुए थे। न आंखों में आंसू थे, न चेहरे पर कोई शिकन। था तो बस एक घना, दमघोंटू कुहासा… एक अंतहीन सन्नाटा जो भीतर भी पसरा था और बाहर भी।
डॉक्टर ने कहा था कि उन्हें कल सुबह छुट्टी मिल जाएगी। पर छुट्टी पाकर वे कहां जाएंगी? ‘घर’… पर कौन सा घर? जिंदगी भर एक अदद अपने घर की तलाश में ही तो उम्र बीत गई। शादी से पहले पिता और भाइयों का घर था, जहां मर्यादा और अनुशासन के नाम पर सिखाया गया कि यह पराया घर है। शादी के बाद पति और ससुराल का घर मिला, जहां गृहस्थी को संवारने में खून-पसीना एक कर दिया, लेकिन हर फैसले का अधिकार बच्चों के पिता के पास ही रहा। और अब जब सब जिम्मेदारियां समाप्त हो चुकी थीं, बच्चे अपने-अपने घोंसले बना चुके थे, तब अहसास हुआ कि उनका अपना कोई वजूद ही नहीं था।
कल जब बेटी रोहिणी उन्हें अपने साथ ले जाने का आग्रह करेगी, तो क्या वे उसके सुसज्जित, आधुनिक और नियमों से बंधे फ्लैट में एक अनचाही अव्यवस्था बनकर रह पाएंगी? नहीं, उनका स्वाभिमान इसके लिए कभी राजी नहीं होगा। फिर उन्हें अपने भाइयों और मायके वालों का ख्याल आया। भाई-भाभी अपनी नाती-पोतों की दुनिया में मगन थे। पिछले कई महीनों से किसी ने फोन करके यह भी नहीं पूछा था कि सावित्री तुम कैसी हो, खाना खाया या नहीं। आज के दौर में रिश्ते केवल एक औपचारिकता का खोल बनकर रह गए थे, जिसके भीतर संवेदनाएं कब की सूख चुकी थीं।
सोचते-सोचते अचानक सावित्री की छाती में एक असहनीय खिंचाव पैदा हुआ। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके सीने पर मन भर का भारी पत्थर रख दिया हो। सांसें उथली होने लगीं और कंठ सूखकर कांटा हो गया। वे कुछ बोलना चाहती थीं, रोहिणी को पुकारना चाहती थीं, पर जुबान ने साथ छोड़ दिया। माथे पर ठंडे पसीने की बूंदें चमकने लगीं। कमरे का पंखा चल रहा था, फिर भी हवा जैसे गायब हो गई थी। वे बिस्तर से उठने का प्रयास करने लगीं, पर हाथ-पैरों की शक्ति पूरी तरह जवाब दे चुकी थी। नर्स को आवाज देने की अंतिम कोशिश में उनके गले से केवल एक हल्की सी घुरघुराहट निकली, और फिर चारों ओर गहरा, स्याह अंधेरा छा गया।
पूरे दो दिन बाद जब सावित्री की चेतना की परतें धीरे-धीरे खुलीं, तो एक जानी-पहचानी, तेज बीप-बीप की ध्वनि उनके कानों में पड़ी। उन्होंने भारी पलकें उठाईं। वे अब साधारण वार्ड में नहीं थीं, बल्कि इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) के एक सेमी-प्राइवेट केबिन में थीं। उनके हाथ में ड्रिप और सीने पर मॉनिटर के तार लगे हुए थे। उन्होंने धीमी गति से अपनी गर्दन घुमाई। सामने शीशे के बड़े से विभाजन के उस पार जो दृश्य दिखा, उसने सावित्री को भीतर तक झकझोर दिया।
कांच के उस पार बेटी रोहिणी खड़ी थी, जिसके चेहरे का सारा रंग उड़ा हुआ था। उसके बाल बिखरे थे और वह लगातार अपने आंचल से आंखें पोंछ रही थी। और उसके बगल में… मयंक खड़ा था! मयंक, जो हजारों मील दूर विदेश में रहता था, वह इस समय वहां मौजूद था। उसकी गोद में उसकी चार साल की नन्हीं बेटी आरुषि थी, जो शीशे पर अपनी नन्हीं हथेलियां टिकाए अंदर अपनी ‘दादी’ को बड़ी-बड़ी उत्सुक आंखों से निहार रही थी। मयंक के कंधे पर हाथ रखे दामाद सुमित खड़े थे, जिनके चेहरे पर गहरी चिंता और भागदौड़ की थकान साफ झलक रही थी।
सावित्री की आंखें फटी की फटी रह गईं। “हे ईश्वर! यह सब क्या है?” उन्होंने मन में सोचा। यह सच था कि वे उस निरुद्देश्य, वीरान और अकेले जीवन से थक चुकी थीं। वे उस खाली मकान के सन्नाटे में घुटने के बजाय इस संसार से विदा हो जाना बेहतर समझ रही थीं। पर वे अपने बच्चों को, अपने कलेजे के टुकड़ों को इस तरह टूटे हुए, बेबस और बदहवास हालत में देखने की कामना तो कभी नहीं कर सकती थीं। एक मां का दिल चाहे कितना भी उपेक्षित क्यों न महसूस करे, वह अपनी संतानों की आंखों में पीड़ा और भय का समंदर कभी नहीं देख सकती। उनके मुरझाए, सूखे होठों पर एक बहुत ही मद्धम, करुणामयी मुस्कान तैर गई।
तभी आईसीयू का दरवाजा खुला और डॉक्टर के साथ मयंक और रोहिणी को अंदर आने की अनुमति मिली। मयंक लगभग दौड़ता हुआ आया और सावित्री के पैरों के पास बैठकर फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने अपनी मां के कमजोर, झुर्रियों वाले पैरों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और अपने आंसुओं से भिगो दिया।
“मां… मुझे माफ कर दो मां,” मयंक की आवाज रुंध गई थी। “मैं अपनी तरक्की, अपनी कंपनियों, अपनी बैठकों और अपनी व्यस्तताओं में इतना अंधा हो गया था कि मुझे कभी यह दिखाई ही नहीं दिया कि मेरी मां अकेलेपन की किस गहरी खाई में गिरती जा रही है। डॉक्टर ने बताया कि आपको कोई बड़ी शारीरिक बीमारी नहीं है, आपका दिल सिर्फ इस बात से टूट गया था कि आपको लगा कि आपकी किसी को जरूरत नहीं रही। मां, जिस दिन रोहिणी का फोन आया कि आप बेहोश हो गई हैं और आपकी नब्ज डूब रही है, उस दिन मुझे समझ आया कि मेरे इस सारे कमाए हुए पैसे, बड़े मकान और विदेशी रुतबे की कोई कीमत नहीं है अगर मेरी मां ही मेरे सिर पर हाथ रखने के लिए न रहे। मैं सब कुछ छोड़कर आ गया हूं मां।”
रोहिणी भी आगे बढ़ी और उसने सावित्री के सिर को अपनी बाहों में समेट लिया। उसकी सिसकियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। “मां, मैंने सोचा था कि मैं अपनी जिम्मेदारियां बहुत अच्छे से निभा रही हूं। मुझे लगता था कि मैं रोज एक फोन करके अपना कर्तव्य पूरा कर लेती हूं। पर मैं यह भूल गई थी कि जैसे बचपन में मुझे हर छोटी बात पर आपकी गोदी और आपकी थपकी की जरूरत होती थी, वैसे ही आज उम्र के इस पड़ाव पर आपको भी मेरी मौजूदगी, मेरे वक्त और मेरे सहारे की जरूरत है। मुझे लगा कि आप अकेले सब संभाल सकती हैं, क्योंकि आपने हमेशा हमें मजबूत बनकर पाला था। मां, हमारी गृहस्थियां आपके बिना अधूरी हैं। आप अव्यवस्था नहीं हैं, आप तो हमारी बुनियाद हैं।”
बाहर शीशे के उस पार से नन्हीं आरुषि ने हाथ हिलाकर तोतली जुबान में कहा, “दादी… उठो, घर चलो।”
सावित्री के सीने पर जो पत्थर कई महीनों से रखा हुआ था, वह एकाएक पिघलकर आंसुओं के रास्ते बह निकला। वे जो आंसू बरसों से उनकी पलकों के पीछे कैद थे, वे आज पूरी शिद्दत से बह रहे थे। पर ये दुख के आंसू नहीं थे, ये मुक्ति, प्रेम और पुनर्जन्म के आंसू थे। उन्हें समझ में आया कि बच्चे स्वार्थी नहीं हुए थे, बल्कि वे भी उसी आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ के शिकार थे जिसमें इंसान अक्सर सबसे जरूरी चीजों को नजरअंदाज कर बैठता है। कभी-कभी अपनों को यह याद दिलाना पड़ता है कि हमें उनकी जरूरत है, और कभी-कभी जिंदगी ऐसे झटके देकर रिश्तों पर जमी धूल को साफ कर देती है।
सावित्री ने अपने कांपते हाथों से मयंक और रोहिणी के सिर पर हाथ रखा। उनके स्पर्श में वही पुरानी ममता, वही आशीष और वही अटूट विश्वास फिर से लौट आया था।
हफ्ते भर बाद सावित्री पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर निकलीं। लेकिन इस बार वे उस अकेले, खाली पड़े मकान में वापस नहीं लौटीं। मयंक ने कुछ समय के लिए वर्क-फ्रॉम-होम ले लिया था और वे तय कर चुके थे कि अब मां का जीवन किसी एक शहर या किसी एक कमरे की चारदीवारी में कैद नहीं रहेगा। सावित्री ने भी जीवन के प्रति अपना नजरिया पूरी तरह बदल लिया था। उन्होंने समझ लिया था कि चुपचाप घुटने और खुद को उपेक्षित मान लेने से रिश्ते नहीं सुधरते; संवाद और अपनी भावनाओं को व्यक्त करना ही हर दूरी को मिटाने का एकमात्र मार्ग है।
अब सावित्री के जीवन में सुबह की शुरुआत केवल खालीपन से नहीं होती थी, बल्कि आरुषि की चहचहाहट, रोहिणी की चाय की चुस्कियों और मयंक के दफ्तर की बातों के बीच होती थी। उन्होंने मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाना और शाम को मंदिर के बगीचे में महिलाओं के साथ समय बिताना भी शुरू कर दिया था। जीवन की ढलती शाम में सावित्री ने एक नया सवेरा खोज लिया था—एक ऐसा सवेरा जो अपनी शर्तों पर, आत्मसम्मान और अपनों के सच्चे प्यार के उजाले से जगमगा रहा था।
अक्सर हम अपनी व्यस्त दिनचर्या, काम के दबाव और आधुनिकता की अंधी दौड़ में उन बुजुर्गों को नजरअंदाज कर बैठते हैं, जिन्होंने हमारी उंगली पकड़कर हमें चलना सिखाया था। माता-पिता कभी अपने मुंह से अपना अकेलापन बयां नहीं करते, वे खामोशी से हमारे समय का इंतजार करते रहते हैं। क्या आपको भी लगता है कि बुजुर्गों को दवाओं और पैसों से ज्यादा हमारे समय, अपनापन और सम्मान की जरूरत होती है? क्या आपके घर या आसपास भी कोई ऐसा बुजुर्ग है जो अकेलेपन से जूझ रहा है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें, ताकि किसी और को भी अपने रिश्तों को संवारने की प्रेरणा मिल सके।
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