“बेटी?” संध्या ने सीधे उसकी आँखों में देखा। उसकी आवाज में कोई कंपन नहीं था। “अपनी बेटी को कोई फार्महाउस पर बुलाने की धमकी देता है? अपनी बेटी की मजबूरी का फायदा उठाकर उसका घर छीनने की साजिश करता है? त्रिलोक चंद, तुम्हारे जैसे भेड़ियों को लगता है कि अगर किसी औरत के सिर से उसके पति का साया उठ जाए, तो वह लावारिस हो जाती है। तुमने सोचा था कि बदनामी के डर से मैं घुटने टेक दूंगी और चुपचाप तुम्हारा अत्याचार सहती रहूंगी?”
फागुन के आगमन की हल्की गुलाबी ठंड के बावजूद संध्या के माथे पर पसीने की बूंदें मोतियों की तरह उभर आई थीं। साँसें इतनी तेज चल रही थीं मानो फेफड़ों से हवा छिन गई हो। जयपुर के एक शांत रिहायशी इलाके में स्थित उस पुराने मकान की दहलीज पर खड़े होकर वह कांपते हाथों से दरवाजे की घंटी लगातार बजाए जा रही थी। दरवाजे की लकड़ी पर उसकी उंगलियों की थरथराहट साफ महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि अगर एक पल की भी देर हुई, तो पीछे से कोई आकर उसके वजूद को नोच लेगा।
अंदर से कुंडी खुलने की हल्की आवाज आई। जैसे ही दरवाजा आधा खुला, संध्या ने सामने खड़ी रश्मि को देखने का इंतजार भी नहीं किया। उसने पूरी ताकत से रश्मि का हाथ पकड़कर उसे भीतर धकेला, खुद अंदर घुसी और झटके से भारी दरवाजा बंद करके दोनों सिटकनियाँ चढ़ा दीं। फिर पीठ दरवाजे से टिकाए वह फर्श पर ही ढहती चली गई। उसकी छाती धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। गले से केवल घुरघुराहट जैसी आवाज निकल रही थी।
रश्मि अपनी इस सहेली और पड़ोसी की हालत देखकर सन्न रह गई। वही संध्या, जो पिछले तीन सालों से अपने जीवन के सबसे बड़े तूफान को सीने में दबाए समाज के सामने सिर उठाकर चलती थी। रेशमी साड़ियों में लिपटी, कलाई में सोने के कंगन, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और चेहरे पर एक सख्त, बेपरवाह मुस्कान। मोहल्ले की औरतें अक्सर उसके पीछे फुसफुसाती थीं कि पति के गुजर जाने के बाद भी यह औरत सफेद साड़ी क्यों नहीं पहनती? इतना सज-धज कर मंदिर और बाज़ार क्यों जाती है? लेकिन आज उस सजी-धजी, मजबूत दिखने वाली संध्या का यह टूटा हुआ, बदहवास रूप देखकर रश्मि के पैरों तले जमीन खिसक गई।
रश्मि दौड़कर रसोई से तांबे के लोटे में ठंडा पानी ले आई। उसने पानी का गिलास संध्या के कांपते होठों से लगाया, लेकिन संध्या ने गिलास को एक तरफ झटक दिया। उसके हाथ अपनी ही गर्दन पर चले गए। गले में पड़ी सोने की भारी चेन और कानों के बड़े-बड़े झुमकों को वह लगभग नोचते हुए उतारने लगी। हाथों की कांच और लाख की चूड़ियाँ उसकी बदहवासी में टूटकर फर्श पर बिखर गईं, जिससे उसकी कलाई से खून की एक पतली लकीर बह निकली। माथे की सिंदूरी बिंदी को उसने अपनी हथेली से इस तरह रगड़ दिया कि माथे पर लालिमा की जगह एक गहरा खरोंच का निशान बन गया।
रश्मि ने घबराकर उसके दोनों हाथ पकड़ लिए, “संध्या! यह क्या पागलपन है? शांत हो जाओ! क्या हुआ है तुम्हें? रास्ते में किसी ने कुछ कहा? कोई आवारा पीछे पड़ गया था क्या?”
“आवारा?” संध्या के सूखे, फटे होंठों से एक भयानक, कड़वी हँसी फूटी, जिसमें सिर्फ दर्द और चीत्कार भरा था। “काश कोई सड़क छाप आवारा होता रश्मि! उससे तो मैं अपनी चप्पल से निपट लेती। लेकिन जब समाज का सबसे सम्मानित चेहरा, जिसे सब ‘धर्म की मूरत’ कहते हैं, वही भेड़िया बन जाए, तो कोई औरत कहाँ भागे?”
रश्मि की आँखें फटी की फटी रह गईं। संध्या ने दीवार का सहारा लेकर खुद को समेटने की कोशिश की। उसकी आँखों से काजल बहकर गालों पर फैल चुका था।
“रश्मि, तुम सब सोचती हो न कि मैं इतनी सज-धज कर क्यों रहती हूँ? तीन साल पहले जब विनीत एक सड़क हादसे में मुझे और मेरी सात साल की बच्ची पिहू को छोड़कर चले गए, तब यह दुनिया अचानक बदल गई। कल तक जो लोग मुझे ‘भाभी जी’ और ‘बहन जी’ कहकर सम्मान से सिर झुकाते थे, विनीत की तेरहवीं बीतते ही उनकी निगाहों में एक अजीब सी भूख तैरने लगी। जिस समाज में एक अकेली, असहाय और सादे कपड़ों में रहने वाली विधवा को केवल एक आसान शिकार समझा जाता है, वहाँ मैंने इस श्रृंगार को अपनी ढाल बनाया था।”
संध्या की आवाज आंसुओं में डूबती जा रही थी, “मैंने खुद को मजबूत दिखाने के लिए ये रंग, ये आभूषण और यह बिंदी ओढ़ रखी थी ताकि कोई मुझ पर दया न करे, कोई मुझे लाचार समझकर मेरे घर में घुसने की जुर्रत न करे। मैं दिखाना चाहती थी कि मैं टूटी नहीं हूँ, मेरे पास अपना स्वाभिमान है। लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस श्रृंगार को मैं अपनी सुरक्षा की ढाल समझ रही थी, वही गिद्धों की नजर में मेरी कमजोरी का तमाशा बन जाएगा!”
“किसकी बात कर रही हो संध्या? खुलकर बताओ, मुझे डर लग रहा है,” रश्मि ने उसके कंधे को सहलाते हुए कहा।
“जाओ, जाकर अपनी बैठक की उस खिड़की के पर्दे की ओट से सड़क पार देखो,” संध्या ने कांपती उंगली से खिड़की की तरफ इशारा किया। “सोसायटी के अध्यक्ष, 65 वर्षीय त्रिलोक चंद जी… जिन्हें पूरा इलाका ‘चाचा जी’ कहता है, जिनके बिना मंदिर की कोई पूजा शुरू नहीं होती, जो हर सभा में नारी सम्मान पर उपदेश देते हैं। वह नीचे, तुम्हारे गेट के ठीक सामने नीम के पेड़ की छांव में अपनी कार के पास खड़ा मेरा ही इंतजार कर रहा है।”
रश्मि के कदम जैसे जम गए। त्रिलोक चंद? वही सम्मानित बुजुर्ग जो अक्सर संध्या के घर की देखरेख, उसके बिजली-पानी के बिल और कानूनी कागजात में मदद करने का दिखावा करते थे? रश्मि दबे पाँव खिड़की के पास गई। उसने पर्दे को एक इंच खिसकाकर बाहर देखा। बाहर दोपहर की धूप में सफेद धोती-कुर्ते में लिपटे त्रिलोक चंद हाथ में छड़ी लिए बार-बार रश्मि के घर के दरवाजे की तरफ घूर रहे थे। उनके चेहरे पर वह चिर-परिचित सौम्यता नहीं थी, बल्कि एक कुटिल, धैर्यवान शिकारी का भाव था, जो जानता है कि उसका शिकार इसी मांद में छिपा है।
रश्मि का कलेजा कांप उठा। उसने पर्दा गिरा दिया और पलटकर संध्या को देखा, जो अब फर्श पर घुटनों में सिर छिपाए हिचकियों से रो रही थी।
“पिछले छह महीनों से वह इंसान मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है,” संध्या की आवाज अब फुसफुसाहट में बदल गई थी। “शुरुआत में उसने विनीत के पेंशन और दुकान के किराए के मामलों में मदद की। मुझे लगा कि वह एक पिता तुल्य बुजुर्ग हैं जो एक बेसहारा बेटी का साथ दे रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे उनकी मदद के पीछे की शर्तें सामने आने लगीं। कभी बातों-बातों में गंदे दोहरे अर्थ वाले वाक्य बोलना, कभी मेरे कंधे पर बेमतलब हाथ रखना। जब मैंने दूरी बनानी शुरू की, तो उसने मुझे धमकाना शुरू कर दिया। उसने कहा कि इस शहर में एक अकेली औरत की बदनामी फैलाना चुटकियों का खेल है। अगर मैंने उसकी घिनौनी इच्छा पूरी नहीं की, तो वह सोसायटी में यह बात उड़ा देगा कि मेरे घर में रात को गैर-मर्द आते हैं और वह मुझे इस घर से बेदखल करवा देगा।”
संध्या ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया, “आज दोपहर जब मैं पिहू को स्कूल से लेकर लौट रही थी, उसने मुझे मंदिर के पिछले रास्ते पर रोका। पिहू को उसने गाड़ी में बैठाकर आइसक्रीम खिलाने का बहाना किया और मुझसे फुसफुसाकर कहा कि आज शाम अगर मैं उसके फार्महाउस पर नहीं पहुँची, तो कल सुबह का सूरज मेरे और मेरी बच्ची के लिए बदनामी की ऐसी कालिख लाएगा कि हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। मैं किसी तरह पिहू को पड़ोस की बुजुर्ग ताई जी के यहाँ सुरक्षित छोड़कर तुम्हारी तरफ भागी, लेकिन वह गाड़ी लेकर मेरे पीछे-पीछे यहाँ तक आ धमका। रश्मि, मैं थक चुकी हूँ। मैं कहाँ जाऊँ? किससे मदद मांगूँ? जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, जब कानून और समाज के तथाकथित पहरेदार ही भेड़िये हों, तो एक औरत अपनी अस्मत कैसे बचाए? मेरा मन करता है कि मैं अपनी बच्ची को लेकर किसी कुएँ में कूद जाऊँ!”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। केवल संध्या की सिसकियों की आवाज गूँज रही थी।
रश्मि कुछ देर तक जड़वत खड़ी रही। उसके भीतर एक भयानक द्वंद्व चल रहा था। एक तरफ समाज का वह प्रतिष्ठित, रसूखदार नाम था, जिससे पंगा लेने का मतलब था पूरे परिवार के लिए मुसीबत मोल लेना। दूसरी तरफ उसकी आँखों के सामने उसकी वह सहेली थी, जिसका आत्मसम्मान और जीवन चंद कदमों की दूरी पर खड़े एक हैवान के पैरों तले कुचला जा रहा था। रश्मि ने देखा कि फर्श पर टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़े पड़े थे और संध्या की कलाई से टपकता खून उसके आत्मसम्मान की अंतिम सांसों जैसा लग रहा था।
अचानक रश्मि की मुट्ठियाँ भिंच गईं। उसकी आँखों का डर गायब हो गया और उसकी जगह एक ठंडे, दृढ़ संकल्प ने ले ली।
वह आगे बढ़ी और उसने झुककर संध्या के दोनों कंधे पकड़े। उसे झकझोरते हुए उसने सख्त लेकिन बेहद आत्मीय आवाज में कहा, “संध्या! मेरी तरफ देखो! ऊपर देखो!”
संध्या ने भीगी पलकें उठाईं।
“तुम कुएँ में कूदोगी? क्यों? गुनाह तुमने किया है क्या? पाप तुम्हारा है? नहीं! पाप उस दरिंदे का है जो अपनी उम्र, अपने ओहदे और अपनी सफेद दाढ़ी की आड़ में तुम्हारी मजबूरी का सौदा करना चाहता है। और तुम अपनी जान देने की बात कर रही हो? ताकि वह कल किसी और बेसहारा औरत को अपना शिकार बना सके?”
संध्या चुपचाप उसे देखती रही।
“तुमने कहा था न कि तुमने यह साज-श्रृंगार समाज से बचने के लिए ढाल की तरह पहना था?” रश्मि ने फर्श पर गिरे एक कंगन को उठाया और संध्या की हथेली पर रख दिया। “ढाल केवल वार रोकती है संध्या, वार करने वाले का हाथ नहीं काटती। जब ढाल भारी पड़ने लगे, तो उसे फेंककर हाथ में तलवार थामनी पड़ती है। और आज हम दोनों मिलकर वही तलवार बनेंगे। तुम अकेली नहीं हो।”
रश्मि तुरंत उठी और उसने अपना फोन उठाया। उसने सीधे शहर के महिला सशक्तिकरण मंच और स्थानीय वूमेन हेल्पलाइन की जिला संयोजिका, एडवोकेट मालिनी शर्मा का नंबर मिलाया। मालिनी रश्मि की पुरानी परिचित थीं और इलाके में घरेलू हिंसा व उत्पीड़न के मामलों में कई महिलाओं को न्याय दिला चुकी थीं। रश्मि ने बिना किसी लाग-लपेट के पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी और बताया कि आरोपी इस वक्त घर के बाहर मौजूद है और पीड़िता जान के खतरे में है। साथ ही, उसने स्थानीय महिला थाने की प्रभारी को भी तुरंत स्थिति से अवगत कराया।
“संध्या, उठो,” रश्मि ने उसका पल्लू ठीक किया, उसके चेहरे पर बिखरे आंसुओं को अपने हाथों से पोंछा। “पानी पियो और अपने बाल बांधो। हम छिपकर नहीं बैठेंगे। हम इस कमरे के अंधेरे में घुटने के बजाय बाहर जाकर उस भेड़िए की आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे।”
संध्या के भीतर जैसे कोई मृत तार अचानक झंकृत हो उठा। उसने रश्मि के हाथ का सहारा लिया और खड़ी हो गई। उसने अपनी बिखरी हुई साड़ी को कसकर कमर में खोंसा। उसके चेहरे का भय अब धीरे-धीरे एक शांत, भयंकर आक्रोश में बदल रहा था।
लगभग बीस मिनट बाद, बाहर पुलिस की पीसीआर वैन का सायरन गूँजा। सायरन की आवाज सुनते ही सड़क पर खड़े त्रिलोक चंद के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने जल्दी से अपनी गाड़ी का दरवाजा खोला और भागने की कोशिश की, लेकिन तभी पीछे से एडवोकेट मालिनी शर्मा और महिला पुलिसकर्मियों की गाड़ी ने उसकी कार के आगे अपनी जीप अड़ा दी।
मोहल्ले के लोग, जो अब तक अपने घरों की खिड़कियों और छतों से चुपचाप तमाशा देख रहे थे, बाहर निकलने लगे।
रश्मि ने अपने घर का मुख्य दरवाजा पूरा खोल दिया। वह संध्या का हाथ थामे बाहर निकली। संध्या के चेहरे पर अब कोई आंसू नहीं था। उसके माथे पर खरोंच का लाल निशान अब सिंदूर से भी ज्यादा गहरा और दहकता हुआ अंगारा लग रहा था।
पुलिस की महिला सब-इंस्पेक्टर ने त्रिलोक चंद को गाड़ी से बाहर खींचा। त्रिलोक चंद अपनी सफेद दाढ़ी और बुजुर्गियत का रोना रोने लगा, “अरे दरोगा जी, यह क्या बदतमीजी है? मैं इस इलाके की विकास समिति का अध्यक्ष हूँ। मैं तो यहाँ बस अपनी एक परिचित बेटी का हालचाल लेने आया था।”
तभी संध्या आगे बढ़ी। उसकी आवाज में जो गूँज थी, उसने वहाँ मौजूद हर इंसान के रोंगटे खड़े कर दिए।
“बेटी?” संध्या ने सीधे उसकी आँखों में देखा। उसकी आवाज में कोई कंपन नहीं था। “अपनी बेटी को कोई फार्महाउस पर बुलाने की धमकी देता है? अपनी बेटी की मजबूरी का फायदा उठाकर उसका घर छीनने की साजिश करता है? त्रिलोक चंद, तुम्हारे जैसे भेड़ियों को लगता है कि अगर किसी औरत के सिर से उसके पति का साया उठ जाए, तो वह लावारिस हो जाती है। तुमने सोचा था कि बदनामी के डर से मैं घुटने टेक दूंगी और चुपचाप तुम्हारा अत्याचार सहती रहूंगी?”
संध्या ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और पुलिस अधिकारी के सामने कर दिया। “मैडम, इसमें इस इंसान की पिछले दो महीनों की कॉल रिकॉर्डिंग्स, इसके भेजे गए अश्लील संदेश और आज दोपहर मंदिर के बाहर मुझे दी गई धमकियों की आवाज दर्ज है। मैं जानती थी कि यह समाज सबूत मांगता है, इसलिए मैंने डरने के साथ-साथ अपनी सुरक्षा के लिए इसकी हर घिनौनी हरकत को रिकॉर्ड किया था।”
सब-इंस्पेक्टर ने फोन हाथ में लिया और रिकॉर्डिंग सुनते ही उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उन्होंने तुरंत महिला कांस्टेबलों को इशारा किया। एक झटके में उस सफेदपोश, तथाकथित सम्मानित बुजुर्ग की कलाइयों में हथकड़ी पहना दी गई।
मोहल्ले के वे लोग, जो कल तक संध्या के कपड़ों और आभूषणों पर कानाफूसी करते थे, आज शर्म से सिर झुकाए खड़े थे। त्रिलोक चंद गिड़गिड़ाने लगा, अपनी इज्जत की भीख मांगने लगा, लेकिन कानून के हाथ मजबूत थे और संध्या का हौसला उससे भी ज्यादा अडिग। पुलिस उसे अपनी गाड़ी में बैठाकर थाने ले गई।
उस शाम जब सूरज ढल रहा था, आसमान में सिंदूरी लालिमा बिखरी हुई थी। संध्या रश्मि के घर के बरामदे में बैठी थी। उसकी नन्ही बेटी पिहू दौड़ती हुई आई और संध्या की गोद में समा गई।
संध्या ने अपनी बेटी को सीने से लगाया और रश्मि की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब कोई डर नहीं था। उसे समझ आ चुका था कि किसी भी स्त्री की असली सुरक्षा उसके गहनों, उसकी बिंदी या किसी पुरुष की मौजूदगी में नहीं होती; उसकी असली ताकत उसके भीतर के आत्मसम्मान, सजगता और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के साहस में होती है।
उसने रश्मि का हाथ थामते हुए कहा, “रश्मि, अगर आज तुम मेरा हाथ न पकड़ती, तो शायद मैं हार जाती।”
रश्मि ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “नहीं संध्या, मैंने सिर्फ तुम्हारा हाथ थामा था, लड़ने की ताकत तो तुम्हारे अपने भीतर थी। जब एक औरत दूसरी औरत के आंसुओं को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी लड़ाई समझ लेती है, तब कोई भी दरिंदा कभी जीत नहीं सकता।”
संध्या ने पिहू के सिर पर हाथ फेरा। उसने फैसला कर लिया था कि अब वह किसी ढाल के पीछे नहीं छिपेगी। वह अपने हुनर, अपनी मेहनत और अपने सिर उठाकर जीने के हक के साथ जिएगी—एक आत्मनिर्भर, निडर और स्वतंत्र माँ बनकर।
क्या हमारे समाज में आज भी किसी अकेली या विधवा स्त्री को केवल इसलिए आसान शिकार मान लिया जाता है क्योंकि उसके पास कोई तथाकथित ‘संरक्षक’ नहीं होता? और क्या ऐसे हालात में हम चुप रहकर उस अन्याय के भागीदार नहीं बन जाते? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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सीमा वर्मा/ नोएडा