सब्जी बेचने वाली उस साधारण सी औरत के इन शब्दों ने अवनि के भीतर जैसे एक सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगा दिया। अवनि को लगा मानो किसी ने उसके सामने एक आईना रख दिया हो। वह जिस समाज के तानों से डरकर रो रही थी, उस समाज का उसके जीवन में कोई वास्तविक मोल था ही नहीं। उसका सुख, उसका सम्मान और उसका जीवन तो उसके अपने विचारों और उसके परिवार के प्रेम पर टिका था।
भोपाल की पुरानी और शांत कॉलोनियों में से एक, गुलमोहर एन्क्लेव के एक खूबसूरत दो-मंजिला मकान के दालान में अवनि अपनी बालकनी की मुंडेर पर हाथ धरे शून्य में निहार रही थी। हल्की ठंडक भरी सुबह की ताजी हवा उसके बिखरे बालों को छू रही थी, लेकिन उसके मन के भीतर एक ऐसा तूफान चल रहा था जो बाहर के शांत माहौल से कोसों दूर था। अवनि की शादी को पूरे छह साल बीत चुके थे। उसका पति, मयंक, एक समझदार, संवेदनशील और बेहद प्यार करने वाला इंसान था। दोनों का वैवाहिक जीवन बहुत मधुर था, घर में किसी भौतिक सुख-सुविधा की कोई कमी नहीं थी। लेकिन इन छह सालों में हर दिन, हर तीज-त्योहार पर एक खालीपन अवनि के सीने में किसी भारी पत्थर की तरह चुभता रहता था। भगवान ने अब तक उसकी गोद को सूना रखा था।
अवनि ने इस दर्द को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया था। वह हमेशा चेहरे पर एक मुस्कान सजाकर रखती, आस-पड़ोस के बच्चों को प्यार से पढ़ाती और दूसरों के सुख-दुख में सबसे आगे खड़ी रहती। लेकिन समाज की संकीर्ण निगाहें कब किसी के दिल के घावों को कुरेदने से बाज आती हैं? कल शाम जो कुछ हुआ, उसने अवनि के वर्षों से संजोए संयम और आत्मविश्वास को भीतर तक हिलाकर रख दिया था।
कल अवनि की बचपन की सबसे पक्की सहेली, नीरजा के घर उसकी नन्हीं बेटी का नामकरण संस्कार था। नीरजा जब प्रसव पीड़ा से गुजर रही थी और उसके मायके वाले दूर होने के कारण समय पर नहीं पहुँच पाए थे, तब अवनि ही पूरे दो दिन अस्पताल में एक पैर पर खड़ी रही थी। उसने नवजात बच्ची को अपनी हथेलियों पर पहली बार उठाया था, नीरजा को अपने हाथों से दलिया खिलाया था और एक सगी बहन से भी बढ़कर उसकी सेवा की थी। नीरजा के माँ बनने पर अवनि के मन में तनिक भी ईर्ष्या नहीं थी, बल्कि उसके दिल से सिर्फ दुआएँ निकल रही थीं।
शाम को जब नामकरण समारोह में कॉलोनी की तमाम संभ्रांत महिलाएँ उपस्थित हुईं, तो चारों ओर बधाई के गीत गाए जा रहे थे। हवन और पूजा की रस्में पूरी होने के बाद नीरजा काफी थकी हुई लग रही थी। उसने सोफे पर बैठकर अवनि को प्यार से इशारा किया, “अवनि, ज़रा थोड़ी देर के लिए बिटिया को अपनी गोद में ले लो ना। पूजा की धूप और धुएं से इसका सिर थोड़ा गर्म हो रहा है, मैं ज़रा पानी पीकर आती हूँ।”
“हाँ-हाँ, ला मेरी लाडो को,” अवनि ने बड़े वात्सल्य से नन्हीं बच्ची को अपनी बाँहों में समेटा। वह बच्ची को सीने से लगाकर प्यार से थपकियाँ देने ही लगी थी कि तभी कमरे में नीरजा की सास, रुक्मिणी देवी, पूजा की थाली हाथ में लिए दाखिल हुईं।
अवनि की गोद में बच्ची को देखते ही रुक्मिणी देवी की आँखें लाल हो गईं। उनके चेहरे पर ऐसा भाव आया मानो कोई अनर्थ हो गया हो। उन्होंने भरी सभा में, चीखते हुए कहा, “बहू! तेरा दिमाग तो ठिकाने है? अपनी पहली औलाद, वह भी इतने शुभ दिन पर, तूने किसके हाथ में थमा दी? तुझे इतनी भी अक्ल नहीं है कि ऐसी बांझ औरत की छाया भी किसी नई माँ और नवजात शिशु पर पड़ जाए तो अनिष्ट हो जाता है! नजर लग जाएगी मेरी पोती को!”
पूरे हॉल में अचानक सन्नाटा छा गया। संगीत की धुनें थम गईं। अवनि के पैर जैसे वहीं ज़मीन में धँस गए। उसके हाथ कांपने लगे।
नीरजा तुरंत खड़ी हो गई और उसने अपनी सास का विरोध करते हुए कहा, “माँ जी! आप यह कैसी घिनौनी बात कर रही हैं? अवनि मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। अस्पताल में जब मुझे और मेरी बच्ची को सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब यही दो रातें जागी थी। इसका दिल इतना साफ है कि इसकी नजर कभी किसी को नहीं लग सकती। प्लीज़, आप इतने शुभ अवसर पर ऐसा मत बोलिए।”
लेकिन रुक्मिणी देवी के उस ज़हरीले तीर ने बाकी महिलाओं को भी बातें बनाने का मौका दे दिया। कोने में बैठी कॉलोनी की दो-तीन बुजुर्ग औरतें अपनी साड़ियों के पल्लू संभालते हुए कानाफूसी करने लगीं, “अरे रुक्मिणी जी गलत थोड़े ही कह रही हैं। हमारे बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते आए हैं कि जिनके भाग्य में औलाद का सुख न हो, उन्हें ऐसे शुभ आयोजनों में आगे नहीं आना चाहिए। खुद तो कुछ पैदा कर नहीं सकीं, अब दूसरों के बच्चों पर हसरत भरी नजरें डालेंगी तो असर तो पड़ेगा ही।”
वे शब्द नहीं थे, वे पिघले हुए सीसे की तरह अवनि के कानों में उतर रहे थे। अवनि की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसका गला पूरी तरह रुंध गया। उसने बड़ी मुश्किल से कांपते हाथों से बच्ची को नीरजा की गोद में लौटाया। उसने किसी की तरफ नहीं देखा, न ही किसी बात का जवाब दिया। वह अपना पर्स संभालते हुए तेज़ कदमों से उस घर से बाहर निकल आई।
घर लौटकर उसने मुख्य दरवाजा बंद किया और सोफे पर गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसका पूरा वजूद कांप रहा था। वह चीख-चीख कर ईश्वर से पूछ रही थी कि आखिर उसकी क्या गलती थी? क्या उसका एक स्त्री होना, एक संवेदनशील इंसान होना सिर्फ इसलिए बेमानी हो गया क्योंकि उसकी गोद खाली थी?
रात को जब मयंक अपने दफ्तर से थका-हारा लौटा, तो उसने अवनि के चेहरे पर वह भयानक उदासी और सूजी हुई आँखें देखीं। मयंक ने प्यार से उसका हाथ थामा और पूछा, “अवनि, क्या हुआ? तुम तो नीरजा के घर इतनी खुशी से गई थी, फिर यह आँसू कैसे? किसी ने कुछ कहा क्या?”
अवनि ने हिचकियों के बीच शाम का सारा मंजर मयंक के सामने बयाँ कर दिया।
मयंक का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया और अवनि को अपने सीने से लगा लिया। उसने बेहद शांत और गंभीर स्वर में कहा, “अवनि, समाज की सबसे बड़ी बीमारी यही है कि वह किसी के दुख को समझने के बजाय उस पर नमक छिड़कने में आनंद लेता है। अगर उन चार महिलाओं की संकीर्ण मानसिकता को तुम अपने दिल पर लगा लोगी, तो तुम कभी चैन से नहीं जी पाओगी। क्या तुम मेरी नजरों में कम हो? क्या हमारे इस रिश्ते में प्यार की कोई कमी है? नहीं ना! तो फिर उन लोगों की बातों से अपनी खुशियों को क्यों तोलती हो जिनका तुम्हारे जीवन में कोई सकारात्मक योगदान नहीं है? ऐसी बातों को नज़रअंदाज़ करना सीखो।”
अवनि ने सिसकते हुए कहा, “मयंक, कहना बहुत आसान होता है। पर जब कोई आपके अस्तित्व पर सवाल उठाता है, जब कोई आपको ‘अशुभ’ कह देता है, तो वह घाव सीधे रूह पर लगता है। मैं कैसे भूल जाऊं कि सबने मुझे एक अपशकुन की तरह देखा?”
उस रात मयंक ने उसे बहुत समझाया, पानी पिलाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे सुलाने की कोशिश की। अवनि सो तो गई, लेकिन उसका मन भीतर से अशांत ही रहा।
अगली सुबह का सूरज निकला, लेकिन अवनि के भीतर का अंधेरा छँटा नहीं था। वह अनमने मन से घर के काम निपटा रही थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। अवनि ने दरवाजा खोला तो सामने कॉलोनी में रोज़ ताजी सब्जियाँ बेचने वाली कमला मौसी खड़ी थीं। कमला मौसी लगभग पैंतालीस साल की एक सांवली, मजबूत कद-काठी वाली महिला थीं, जिनके चेहरे पर हमेशा एक आत्मीय मुस्कान खिली रहती थी। वे हर घर के सुख-दुख से वाकिफ रहती थीं और अवनि का उनके प्रति हमेशा एक विशेष आदर रहता था।
“नमस्ते भाभी जी! आज ताज़ी पालक, मेथी और एकदम मीठी गाजर लाई हूँ। क्या निकाल दूँ आपके लिए?” कमला मौसी ने अपनी टोकरी जमीन पर रखते हुए बड़े उत्साह से कहा।
अवनि ने बिना उनकी तरफ देखे, बेहद रूखे और बुझे हुए स्वर में कहा, “नहीं मौसी, आज कुछ नहीं चाहिए। कल की सब्जियाँ रखी हैं।”
कमला मौसी ने अवनि के चेहरे को ध्यान से देखा। उसकी सूजी हुई आँखें, मुरझाए हुए होंठ और आवाज में घुली बेरुखी उनसे छिप न सकी। उन्होंने अपनी टोकरी को एक तरफ सरकाया और चौखट के पास ही फर्श पर बैठ गईं।
“क्या बात है भाभी जी? हमेशा तो आप दरवाजे पर आते ही सबसे पहले हँसकर मेरा हाल-चाल पूछती थीं। जब मेरी तबीयत खराब हुई थी, तो आपने ही मुझे डॉक्टर की दवा लाकर दी थी। आज आपकी आँखों में यह उदासी कैसी? क्या बात है, किसी ने कुछ कह दिया क्या?” कमला मौसी ने बड़े अपनत्व से पूछा।
अवनि ने अपनी गर्दन झुका ली। उसकी आँखों के कोरों से एक बूँद आँसू टपक कर फर्श पर गिर पड़ा। “कुछ नहीं मौसी, बस दुनिया के दस्तूरों और लोगों की चुभती बातों से मन बहुत दुखी है।”
कमला मौसी एक तजुर्बेकार महिला थीं। वे कॉलोनी में कल शाम हुई चर्चाओं की भनक पा चुकी थीं। उन्होंने एक गहरी सांस ली और अपने पल्लू से अपनी हथेलियाँ साफ करते हुए कहा,
“भाभी जी, अगर आप बुरा न मानें तो मैं अपने जीवन की एक छोटी सी बात बताऊँ?”
अवनि ने धीरे से सिर हिलाया।
कमला मौसी ने कहना शुरू किया, “भाभी जी, मेरा एक बेटा है, सूरज। जब वह पैदा हुआ, तो दिमागी रूप से थोड़ा कमजोर निकला। वह सामान्य बच्चों की तरह जल्दी बोल नहीं पाता था, उसकी चाल थोड़ी अजीब थी। जब वह थोड़ा बड़ा हुआ, तो मोहल्ले के तथाकथित पढ़े-लिखे और सभ्य परिवारों के बच्चे उसके साथ खेलना बंद कर दिए। वे उसे ‘पागल’ और ‘मंदबुद्धि’ कहकर चिढ़ाते थे। मेरा सूरज रोज़ शाम को रोते हुए, अपनी आँखें मलता हुआ घर लौटता था और मुझसे लिपटकर पूछता था—’माँ, मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूँ? सब मुझसे नफरत क्यों करते हैं?'”
अवनि कमला मौसी की बात को ध्यान से सुनने लगी। उसके भीतर की संवेदना जाग उठी।
कमला मौसी ने आगे कहा, “शुरुआत के कई साल मैं भी आपकी तरह ही घुटती रही। रात-रात भर रोती थी, भगवान को कोसती थी कि मुझे ही ऐसा बच्चा क्यों दिया। समाज के तानों से डरकर मैं सूरज को कमरे में बंद रखने लगी थी। लेकिन फिर एक दिन मेरे भीतर एक सवाल उठा—क्या मेरे आँसुओं से इन तंज कसने वालों का दिल पिघल जाएगा? क्या मेरे दुखी होने से मेरे बेटे की ज़िंदगी संवर जाएगी? और सबसे बड़ी बात, क्या मैं अपने और अपने बच्चे के जीवन की खुशियों की चाबी इन बेदर्द लोगों के हाथ में सौंप दूँ?”
“खुशियों की चाबी?” अवनि ने चौंक कर पूछा।
“हाँ भाभी जी, खुशियों की चाबी!” कमला मौसी की आवाज में एक गजब का आत्मविश्वास था। “हम इंसान बहुत बड़ी भूल करते हैं। हम अपने सुकून, अपने मान-सम्मान और अपनी खुशियों की चाबी समाज के लोगों की जेब में रख देते हैं। जब उनका मन करता है, वे ताना मारकर हमारी खुशियों का ताला बंद कर देते हैं, और जब उनका मन करता है, वे थोड़ी सी झूठी तारीफ करके हमें हँसा देते हैं। उस दिन मैंने तय किया कि मैं अपने घर की चाबी किसी ऐरे-गैरे के हाथ में नहीं रहने दूँगी। मैंने सूरज को गले लगाया और उसे समझाया कि बेटा, कमी हर इंसान में होती है। कोई शरीर से अधूरा होता है, तो कोई दिमाग से, और कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो सब कुछ पाकर भी दिल से बिल्कुल कंगाल होते हैं।”
कमला मौसी ने मुस्कुराते हुए कहा, “उस दिन के बाद से मैंने और मेरे सूरज ने लोगों के तानों को कचरे के डिब्बे में डालना शुरू कर दिया। आज मेरा बेटा मेरे साथ मेहनत करता है, टोकरी उठाने में मेरी मदद करता है। हम दोनों शाम को हँसते-गाते रूखी-सूखी रोटी खाते हैं और चैन की नींद सोते हैं। जो लोग कल तक उसे चिढ़ाते थे, आज वही उसकी मेहनत देखकर चुप हो जाते हैं। भाभी जी, परमात्मा ने आपको इतना अच्छा पति दिया है, सुंदर घर दिया है, नेक दिल दिया है। अगर एक कमी रह गई है, तो क्या उसके कारण आप अपने बाकी के निन्यानवे सुखों को आग लगा देंगी?”
सब्जी बेचने वाली उस साधारण सी औरत के इन शब्दों ने अवनि के भीतर जैसे एक सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगा दिया। अवनि को लगा मानो किसी ने उसके सामने एक आईना रख दिया हो। वह जिस समाज के तानों से डरकर रो रही थी, उस समाज का उसके जीवन में कोई वास्तविक मोल था ही नहीं। उसका सुख, उसका सम्मान और उसका जीवन तो उसके अपने विचारों और उसके परिवार के प्रेम पर टिका था।
अवनि की आँखों में जो आँसू लाचारी के थे, वे अब एक नई रोशनी में चमकने लगे। उसने अपने चेहरे से उदासी की परत को झटक दिया। उसके होठों पर एक दृढ़, आत्मविश्वासी मुस्कान तैर गई।
उसने आगे बढ़कर कमला मौसी के दोनों हाथ अपनी हथेलियों में थाम लिए। “मौसी, आज आपने मेरी आँखें खोल दीं। मैं पढ़ी-लिखी होकर भी कितनी कमजोर पड़ गई थी। मैं भूल गई थी कि मेरा अस्तित्व किसी की दया या किसी के प्रमाण पत्र का मोहताज नहीं है। आपने बिल्कुल सही कहा, आज के बाद मेरी खुशियों की चाबी सिर्फ और सिर्फ मेरे अपने हाथ में होगी। कोई भी अपनी ज़हरीली ज़ुबान से मेरे सुकून को नहीं छीन पाएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं; और अगर कल को मेरी गोद नहीं भी भरी, तब भी मैं अपने जीवन को दूसरों के लिए प्रेम और रोशनी का जरिया बनाऊँगी।”
“यह हुई ना बात, मेरी बिटिया जैसी भाभी जी!” कमला मौसी खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
उस दिन अवनि ने पूरे उत्साह के साथ ताज़ी सब्जियाँ खरीदीं। उसने रसोई में जाकर मयंक की पसंद का खाना बनाया। जब शाम को मयंक घर लौटा, तो वह अवनि को देखकर हैरान रह गया। अवनि ने एक सुंदर पीली साड़ी पहन रखी थी, बालों में जूड़ा बना रखा था और उसके चेहरे पर वही पुरानी, खनकती हुई ताजगी थी।
“अरे वाह! आज तो मेरी पुरानी अवनि वापस लौट आई?” मयंक ने आश्चर्य और खुशी से पूछा।
अवनि ने हँसते हुए मयंक को चाय का प्याला थमाया और कहा, “हाँ मयंक, क्योंकि आज मैंने अपनी खुशियों की चाबी वापस छीन ली है। अब कोई मुझे रुला नहीं सकता।”
कुछ ही दिनों बाद कॉलोनी में एक सामूहिक उत्सव का आयोजन हुआ। जब अवनि वहाँ पहुँची, तो उसने किसी से नजरें नहीं चुराईं। वही रुक्मिणी देवी जब सामने से गुजरीं, तो अवनि ने बिना किसी झिझक के, पूरे आदर और आत्मविश्वास के साथ हाथ जोड़कर उन्हें “नमस्ते काकी जी” कहा। अवनि के उस निर्भीक और शालीन व्यवहार के आगे रुक्मिणी देवी की आँखें खुद-ब-खुद शर्म से झुक गईं।
अवनि ने समझ लिया था कि दुनिया का काम है कमियाँ ढूँढना, लेकिन एक मजबूत इंसान वही है जो अपने भीतर के आत्मसम्मान और सकारात्मकता के दीये को कभी बुझने न दे। उसने अपने जीवन को समाज की संकीर्ण सीमाओं से आज़ाद कर लिया था, और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
प्रिय पाठकों,
क्या किसी महिला का सम्मान और उसके जीने का अधिकार केवल इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि वह माँ बन सकी या नहीं? क्या हमें अपनी खुशियों की चाबी दूसरों की बातों में ढूँढनी चाहिए, या कमला मौसी की तरह अपने स्वाभिमान को अपनी ढाल बनाना चाहिए? इस प्रेरक कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव